#22
मेरी नजर आसमान पर पड़ी, चाँद इतना खूबसूरत पहले कभी लगा नहीं था , पर क्या वो इस चेहरे जितना खूबसूरत था अपनी सोच में गुम मुझे मालूम ही न हुआ की कब वो सीढियों को पार कर चुकी थी .
“सुनो जरा, ” मैंने उसे आवाज दी . उसके कदम ठिठक गए . मैं दौड़ कर उसके पास गया .
मैं- इतनी रात को अकेले जाना सुरक्षित नहीं , गलत मत समझना पर तुम्हे ठीक लगे तो मैं छोड़ दू तुम्हे तुम्हारे घर तक
उसने अपने कंधे उचकाए मैं समझ नही पाया की हाँ कहा या न . बस उसे देखता ही रहा मैं .
वो- इतना तकल्लुफ क्यों भला, मेरे रस्ते मेरे कदमो को पहचानते है और फिर मैं तुमको जानती ही नहीं
मैं- कभी कभी अजनबियों पर भी भरोसा कर सकते है , माना की आज अनजाने है पर कल न रहे
वो- कल किसने देखा
मैं- इसका जवाब आज तो नहीं मेरे पास
वो- फिर सवाल क्यों
मैं कुछ नहीं कह पाया उसे , उसने भी मुड कर नहीं देखा और चली गयी . चली तो गयी थी पर लगा की मेरा कुछ ले गयी अपने साथ वो . अगली सुबह मैं एक बार फिर से हवेली में मोजूद था , आँगन के बीचोबीच खड़ा मैं सोच रहा था की क्यों ये ईमारत इतनी खास है आखिर क्यों. क्या महज मेरी दिलचस्पी ही थी या फिर कुछ तो यहाँ ऐसा हुआ था जो मेरा आज बनकर मेरे सामने खड़ा हो गया था . एक बार फिर से मैंने हवेली की तलाशी लेना शुरू किया , एक बार फिर मैं सरिता देवी के कमरे में था . जितना इस परिवार के बारे में सुना था उसके हिसाब से मेरी खोजबीन के तीन आधार थे जर जोरू और जमीन . जिसने भी ठाकुरों को मारा दिलेर रहा होगा उसके मन में नफरत खूब रही होगी . पर पेंच ये था की मैंने जितने भी लोगो से बातचीत की एक बात थी की ठाकुर गाँव वालो की मदद खुले हाथ से करते थे बेशक बदले में वो उनकी बहन बेटियों को नोच लेते थे पर गाँव वालो ने उनका मान भी खूब रखा जब तक की ठाकुर के तीनो बेटे मर न गए उसके बाद हवेली मुरझा गयी और लोगो में उसका रुतबा भी खत्म हो गया . रुपाली के बारे में गाँव के लोग बात नहीं करते थे न जाने क्यों .
सरिता देवी के कमरे को मैने गहनता से देखा , एक पूरी अलमारी महंगे गहनों से भरी थी जिनमे अब दिलचस्पी नहीं थी . सामान में साला कुछ ऐसा नहीं था की कोई तो वजह लगे . रह रह कर मुझे जो बात परेशान किये हुए थी की सरिता देवी को सीढियों से धक्का ठाकुर ने दिया था क्यों, क्या शराब के नशे में हुआ था ऐसा या फिर कोई और वजह थी . मैने चांदनी से इस बारे में बात करने का सोचा एक वो ही थी जो मेरी उलझन को सुलझा सकती थी . तभी मेरी नजर उस बात पर गयी जिसे मैंने शायद इग्नोर कर दिया था , वो एक तस्वीर थी एक पुराणी तस्वीर जिसमे मैंने सरिता देवी किसी लड़के के साथ खड़ी थी और वो जगह कोई और नहीं बल्कि लाल मंदिर थी . दिलचस्प बात ये थी की वो लड़का सरिता देवी के तीनो बेटो में से कोई नहीं था . न जाने क्यों मुझे अजीब सी उत्सुकता हो गयी मैंने वो तस्वीर जेब में डाली और हवेली से बाहर आ गया .
मैं चंदा से मिलना चाहता था क्योंकि वो ही एक कड़ी थी जो इस तस्वीर के बारे में मुझे बता सकती थी .पर इससे पहले की मैं चंदा से मिल पाता मुझे रस्ते में चांदनी मिल गयी जो गाड़ी लेकर कहीं जा रही थी .
“अर्जुन, कहाँ गुम हो मैं तुमसे मिलने ही जा रही थी ” उसने मुझे इशारा किया तो मैं गाड़ी में बैठ गया
मैं- बस उलझा हूँ अपने आप में , वैसे मैं भी तुमसे मिलना चाह रहा था .
चांदनी के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी
“इतनी बेताबी होती तो कभी का मिल लेते यूँ इंतज़ार न करवाते ” उसने कहा
मैं- तुमसे मिलने को तो बेताब हूँ मैं हमेशा से पर अभी मेरा कारण कुछ और है
मैंने जेब से तस्वीर निकाली और उसके हाथ में रख दी
“ये तो दादी के साथ पिताजी है चांदनी ने एक साँस में ही कहा
मैं- ओह , तुम्हारे पिता को कभी देखा नहीं न इसलिए समझ नहीं पाया पर ये जगह कौन सी है
चांदनी- लाल मंदिर के पीछे जंगल के पास कभी आम का बाग़ होता था हमारा , पिताजी को बहुत पसंद था वहां पर जाना . पर तुम्हे ये तस्वीर कहाँ से मिली
मैं- हवेली से
चांदनी- ओह , मैं भी न
मैं हलके से मुस्कुरा दिया .
मैं- तुमने कभी प्रयास नहीं किया अपने पिता को तलाशने का
चांदनी- क्या तुम्हे भी ऐसा लगता है
मैं- बस पूछ रहा हूँ
चांदनी- सबको लगता है की पिताजी ने सब हडप लिया पर जाने से पहले ताईजी खुद सौंप गयी थी उनको , उन्होंने खुद वसीयत पिताजी को दी थी
चांदनी की बात सुनकर मेरे कान खड़े हो गए क्योंकि मुझे मालूम हुआ था की शौर्य सिंह ने केवल हवेली की मालकिन बनाया था रुपाली को और ये बात सच थी तो वो कैसे जायदाद सौंप सकती थी चांदनी के पिता को
मैं- तुमने चंदा से बात की , क्या वो तैयार हुई तुम्हारे घर काम करने को
चांदनी- उस नौकरानी में इतनी दिलचस्पी क्यों है तुम्हे
मैं- पता नहीं , पर मुझे लगता है की कुछ तो झोल कर रही है वो
चांदनी- तुम कहो तो उठा लू उसे और दो थप्पड़ मार कर पता कर लू
मैं- कोशिश करके देख सकती हो , घाघ लोग कैसे होते है तुम समझ जाओगी वैसे मुझे लगता है की भूषण की मौत में उसका हाथ जरुर है
चांदनी- मैंने भी सोचा था ऐसा सबको मालूम है की चंदा और भूषण की कभी भी नहीं बनी , भूषण ने खुद दादाजी को कई बार कहा था की चंदा को हवेली से बहार निकाल दे.
मैं- पर ठाकुर ने भूषण की एक नहीं सुनी मतलब हवेली में चंदा की अहमियत भूषण से ज्यादा थी .
जब मैंने चांदनी से ये बात कही तो मुझे ख्याल आया की चंदा के पास गर्म जिस्म था परोसने को और उसके जिस्म के शोकीन हवेली में चारो तरफ थे पर एक बात और थी की चंदा के पति को पुरुषोत्तम ने फांसी दी थी . घूम फिर कर बात एक बार फिर लाल मंदिर पर आ गयी थी और अब कुछ भी करके मुझे उस चोरी की घटना का पता करना ही था …………..

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