हवेली – Update 21 | Adultery Story

दिलजले - Adultery Story by FrankanstienTheKount
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#21

अख़बार की कटिंग को देखते हुए मैं सोचता रहा की क्यों ये खबर इतनी महत्वपूर्ण रही होगी की इसे इतना संभाल कर रखा गया हो .लाल मंदिर में चोरी के आरोप लगे थे ठाकुर पुरुषोतम और चांदनी के पिता पर . अगर ये खबर अख़बार की सुर्खियों में आई थी तो मामला गर्म रहा होगा क्योंकि ठाकुरों पर इल्जाम लगाना उस दौर में हिम्मत का काम था और जब बात इतनी आगे बढ़ी थी तो समझा जा सकता था की हालात क्या रहे होंगे. यहाँ पर मेरे लिए एक सवाल खड़ा हो गया था की पुरुषोतम जो खुद इतना अमीर था उसको चोरी की भला क्या जरुरत आन पड़ी होगी. मेरे लिए अगर कोई प्लस पॉइंट था तो बस इतना की मैं रुपाली के मायके में था . कैसी रही होगी वो जिसके आज तक चर्चे होते है , मैं सोचने लगा .पर तभी लखन के आने से मैंने अपना काम छोड़ा और उसके पास गया .

मैं- आजकल कुछ ज्यादा ही गायब रहते हो , तुम पर घर की जिम्मेदारी छोड़ी है और तुम नशे में डूबे हो .

लखन- मुझे खेतो का काम ही पसंद है , सारा दिन काम करके थक जाता हूँ थोड़ी बहुत ले ली तो क्या बात हुई

मैं- तू चाहे पूरी बोतल पी पर अपने घर पर बैठ कर , कभी ठेके पर पड़ा रहता है कभी नालियों में गिरता पड़ता है . जीवन में सुधार होगा या नहीं तुझे अपना बड़ा भाई मानता हूँ पर तू अपने न सही मेरे बारे में तो सोच ले .

लखन- जितना होता है उतना करता तो हूँ मैं

मैं- कोई परेशानी है तो बता सकता है मुझे, शराब के अलावा भी और चीजे है दुनिया में उनसे दोस्ती कर ले . वैसे लखन तू तो बरसो से इस घर का काम देख रहा है तूने कभी पुरुषोत्तम ठाकुर को यहाँ आते जाते देखा था क्या

ये सवाल मैंने पूछ तो लिया था पर अपनी मुर्खता पर खुन्नस भी आई पुरुषोतम की ससुराल थी यहाँ पर वो नहीं आएगा तो कौन आएगा.

लखन- वो बहुत कम आते थे इधर , शायद दो चार बार ही आये होंगे ब्याह के बाद पर सरपंच जी और पुरषोत्तम अक्सर शिकार के लिए जाते थे

मैं- कहाँ पर जाते थे वो लोग

लखन- पक्का तो नहीं पर शायद लाल मंदिर के पास वाले जंगल की तरफ .

पहले लाल मंदिर में हुई चोरी की खबर और अब शिकार करना वहां पर , चांदनी के भाई ने भी मुझे लाल मंदिर में रोका था क्या वो जानता था वहां के बारे में . हो न हो लाल मंदिर में कुछ न कुछ तो छिपा हुआ था . लखन को अपने हाल पर छोड़ कर मैं सीधा लाल मनदिर के लिए चल दिया रस्ते में मैंने देखा की अजित सिंह रस्ते के बीचोबीच बैठ कर शराब पी रहा था .

“ अर्जुन, बड़े दिनों बाद दिख रहा है , कहाँ गायब रहता है , सुना क्या हाल है तेरे , गुजारा तो ठीक हो रहा है न , ” उसने एक तरह से मेरा उपहास सा उड़ाया

मैं- मेरी फ़िक्र छोड़ अपना देख, सरपंची के नशे को थोडा कम कर, गाँव वाले बड़ी शिकायते कर रहे है तेरी.

अजित- गाँव वालो को अपनी जुती के निचे रखता हूँ मैं और मत भूल की अब तेरा बाप भी नहीं है तेरे सर पर

मैं- माना की वो नहीं है पर गाँव वालो के हक़ के लिए तेरे सामने मैं हमेशा खड़ा रहूँगा. खुद में सुधार कर ले वर्ना कहीं ऐसा न हो की दूसरा मौका नहीं मिले

अजित- वो भी देखेंगे अर्जुन, मैं तो खुद इंतज़ार में हूँ की कब वो मौका आये

मैं- क्या पता उपरवाला तेरी ये दुआ पूरी कर ले .

मैंने अजित को उसके हाल पर छोड़ा और लाल मंदिर के लिए चल पड़ा. पहुचंते पहुँचते अँधेरा घना हो गया था . लाल मंदिर की ईमारत अपने सूनेपन के साथ भुतहा सी लग रही थी , ऊपर से यहाँ बेतारिब फैले झाड़ झंखाड़ मैंने सोचा इनको कटवा दूंगा कभी न कभी. खैर, माता की मूर्ति को पार करते हुए मैं तालाब के पास पहुंचा तो मैंने देखा की सीढियों पर कोई बैठा है , मैंने आँखों को साफ़ किया और गौर से देखा, कोई लड़की बैठी थी . इतनी रात को अकेली लड़की सुनसान इलाके में बिना किसी की फ़िक्र के बैठी है बात अजीब ही थी .

मैं- खामोश रातो में अकेले यूँ नहीं भटकना चाहिए खासकर बियाबान में

“इस दुनिया में कौन अकेला नहीं है ,वैसे भी आबादी से ज्यादा सकून होता है इन भूली हुई जगहों पर . रही बात इन अंधेरो की तो जिनके उजाले मिट चुके हो उनको क्या फर्क पड़ता है अंधेरो से, ” उसने बिना मेरी तरफ देखे कहा .उसे जैसे फर्क ही नहीं पड़ा हो मेरे वहां होने से .

मैंने अपने कदम आगे बढ़ाये और उसके पास से गुजरते हुए कुछ सीढिया निचे उतरा और तालाब के ठन्डे पानी को हथेली में भर कर पहले तो चेहरे को भिगोया और फिर छक कर पिया.

“खारा पानी है ये मत पियो इसे ” उसने कहा

मैं- क्या खारा क्या मीठा पानी तो पानी है

उसने अपनी मश्क मेरी तरफ बढाई मैंने उसे खोला उअर होंठो से लगा लिया, इतनी शीतलता मैंने कभी महसूस नहीं की थी . पानी की वो चंद घूँट गले से सीधा रूह में ही तो उतर गयी थी .

“आभार ” मैंने कहा और उसके पास बैठ गया .

मैं- अक्सर आती हो तुम यहाँ

वो- नहीं तो

मैं कोशिश कर रहा था उस से बात करने की पर समझ नही आ रहा था की कैसे शुरुआत करू. मन उसके रूप को निहारने से थक ही नहीं रहा था , उसके खुले हुए बाल मंद मंद बहती हवा संग अटखेलिया कर रहे थे . उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था , जितना की तालाब की लहरे शांत थी उतना ही उसका मन शांत था बस उसकी नजरे पानी को घुर रही थी .

मैं- इतनी शिदत से क्या देख रही हो तुम

वो- मैं इस जगह को आबाद करना चाहती हूँ

मैं- नेक विचार है यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद करना चाहूँगा इस काम में

वो- मदद एक झूठा शब्द है , सबके अपने अपने स्वार्थ है इस रात में अगर तुम यहाँ पर हो तो कोई न कोई वजह जरुर होगी , अपना घर बार छोड़ कर तुम यहाँ आये हो तो कोई बात जरुर होगी .

मैं- तुम कुछ ज्यादा ही साफ़ हो

वो- तो क्या स्वार्थ ले आया तुमको यहाँ पर

मैं- कुछ सवाल है मन में , इस जगह का क्या इतिहास है , यहाँ पर क्या हुआ था .यहाँ पर बरसो पहले एक चोरी हुई थी , मैं जानना चाहता हूँ की वो किसने की थी .

वो- अतीत के भी बड़े अजीब अफसाने है,

मैं- तुम्हारे क्या फ़साने है

वो- मेरे क्या फ़साने होंगे, मैं रात हूँ , मेरी बात थोड़ी सी है , अंधेरो में उजालो की तलाश है मुझे

मैं- रात है तो बीत जाएगी , उजाले आयेंगे माना की देर होगी पर रात बीत ही जाएगी .

उसने घूर कर मुझे देखा और उठ खड़ी हुई…………………..

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