मेरा पेनिस इतना हार्ड हो गया की दर्द करने लगा … माँ को जरूर मेरे पेनिस का अहसास हो रहा होगा मैंने धीरे से अपने हाथ माँ के कांधों पे रख दिए … मुझे साफ़ मेहसुस हो रहा था माँ के जिस्म में उठती हुई कम्पन में धीरे धीरे अपने हाथ निचे उनके बाँहों पे सरकाता चला गया. माँ की दोनों मुठियाँ बंद थि, मेरी उँगलियों ने जैसे ही उन मुठियों को छूआ दोनों मुठियाँ खुल गई और मैंने उनकी उँगलियों में अपनी उँगलियाँ फसा डालि.
हम दोनों की उँगलियाँ आपस में कसती चलि गई और दोनों के हाथ फिर से मुठियों में बंध गये … ये बंधन था हमारे प्रेम का … हमने एकदूसरे को पूरा करने की शुरुवात की.मेरे नाक में माँ की सुगंध आने लगी में अपना मुंह माँ के बालों में फेरेने लगा मुझे लगा जैसे माँ अभी थोड़ा पीछे हुई है और मुझ से सट गई है. माँ के बालों को सुंघता हुआ में माँ की गर्दन पे आ गया … माँ की साँसे तेज होने लगी … और मेरी साँसे भी तेज होती जा रही थी.
मैने माँ की गर्दन को चूम लिया और मेरे मुंह से अपने आप निकल पड़ा
‘आई लव यु’
शायद बहुत ही हलके से माँ मुंह में बुदबुदाई “आई लव यू टू”
जिसे मेरे तड़पते हुए कानो ने पकड़ लिया … मुझे आज अधिकार मिल गया था अपनी माँ को छूने का … उसे प्यार करने का … उसे फिर से पूरा करने का.
‘’हम्म’
‘तुम बहुत खूबसूरत हो’ अब में माँ को अपने पत्नी के रूप में देखने लगा था हमेशा जो जुबान आप बोलती थी आज उनके मुंह से कितनी आसानी से तुम निकल गया. मैं समझ सकता था इस वक़्त माँ के दिल में क्या क्या आँधियाँ चल रही होंगीं … आज में अपने पिता की जगह ले चुक्का था … आज में माँ का पति था … पर जिस विश्वास के साथ माँ ने मुझे अपनाया था उस विश्वास को मुझे कायम रखना था.
मै तड़प रहा था पर फिर मुझे खुद पे कण्ट्रोल रखना था … यही वक़्त का तक़ाज़ा था … इसी संयम से हमारा प्यार परवान चढ़ने वाला था.माँ कोई जवाब नहीं देती में फिर बोलपडताहु
‘आज में बहुत खुश हु”
“मुझे बहुत खुबसुरत, ‘बहुत सेक्सी बीवी मिली है’
माँ शर्मा कर गर्दन झुका लेती है और में माँ की गर्दन पे अपनी जुबान फेरने लगता हु.
‘जूठ कहते हैं आप ‘
‘ये तो में जानता हु सच क्या है”
“इधर आओ’ और में माँ को ऐसी ही साथ में लिपटाये हुए शीसे के सामने ले जाता हुं.
‘देखो सामने’
माँ सामने देखती है तो उसे अपना अक्स नजर आता है और उनके पीछे में उनके साथ चिपका खड़ा हु. शर्म से आँखें बंद कर लेती है. और में शीसे में माँ के सुन्दर रूप को निहारने लगता हुं.
‘देखो ना’
‘क्या?’
बहुत ही धीमे स्वर में जवाब देती है.
‘आंखे खोल के सामने देखो’
माँ गर्दन हिला के ना कर देती है.
‘मेरी कसम’
माँ फट से अपनी आँखें खोल देती है.
‘आप बहुत तंग करने लग गए हैं”
‘कसम क्यों दी?’
‘और क्या करता” ‘ऐसे तुम मान ही कहाँ रही थी, देखो सामने, अपने होठो को देखो’
माँ शरमाती हुई सामने देखति है लज्जा के मारे उनके गाल लाल सुर्ख़ हो जाते हैं होंठ थरथराने लगते है.
‘बिलकुल गुलाब की पंखुडियों की तरहा कोमल , सुन्दर और रस के भरे है.’
माँ की सांस तेज हो जाती है
‘अपनी आँखें देखो बिलकुल झील सी गहरी, जिसमे प्यार का सागर लहरा रहा है’
‘बस’
ओर माँ पलट के अपना सर मेरे सीने पे रख देती है.
‘क्या हुआ?’
‘बस कीजिये ना’ शर्माती हुई मेरे सीने से लगी माँ धीरे से बोलती है.
‘क्यों में तो अपने देवी की पूजा कर रहा हु, उसकी सुंदरता को पढ़ने की कोशिश कर रहा हु’
‘प्लीज बस कीजिये ना बहुत शर्म आ रही है’
मै माँ को अपनी बाहो में लप्पेट लेता हु मेरा सपना आज पूरा हो गया जो सपना में कब से देखता आ रहा था आज वो सच्चाई में बदल गया.
मेरी माँ आज मेरी पत्नी बनकर मेरी बाँहों में थी.
थोड़ि देर बाद माँ मुझ से अलग होने की कोशिश करती है,
लेकिन में उसे बाँहों की क़ैद से आजाद नहीं करता.
‘छोडिये न’
‘हमम हु’
‘प्लीज छोडिये न’
‘दूर होना चाहती हो?’
माँ ना में सर हिलाती है.
‘फिर?’
‘खाना नहीं खाएँगे क्या? … छोडिये में खाना लगाती हु’
‘आज तो कुछ औरे खाने का मन है’
‘क्या?’
‘बताऊँ’
फिर ना में गर्दन हिलाती है.
‘प्लीज छोडिये ना … बहुत भूख लगी है’
मेरे हाथ अपने आप माँ को बंधन से आज़ाद कर देते है.
मै खुद भूखा रह सकता था, क्यूँकि मुझे तो भूख ही माँ की लगी हुई थी, पर अपनी माँ को कैसे भूखी रहने देता. पर में अच्छी तरह जानता ना एक माँ अपने बेटे को भूखा रहने देती है और न ही एक पत्नी … और माँ तो दोनों थी- फिर कैसे वो मुझे भूखा रहने देती.
‘आप बैठिये, में फ़टाफ़ट खाना लगाती हु’
‘रहने दो- में बाहर से लाता हु, तुम बहुत थक गई होगी, और आज क्यों किचन में खुद को झुलसाना चाहती हो’
‘नहीं इसमें मुझे सुख मिलता है,जो कल करना है वो आज क्यों नहीं’
अब मेरे मुंह से निकल ही नहीं पाया की आज हमारी सुहागरात है इस्लिये नहि
माँ किचन में चलि जाती है और में पीछे पीछे जा के उसे देखने लगता हु.
माँ के हाथ बिजली की गति से चल रहे थे. सब कुछ तो उसने तैयार कर रखा था बस सिर्फ गरम करना था.
मुझे याद आता है की मुझे तो सुहाग सेज तैयार करनी थी.
मैं फटाफट जा के वो छुपे हुए गुलाब की पंखुडियों का पाकेट निकालता हु और पुरे बिस्तर को गुलाब की पंखुडियों से सजा देता हु.
जब तक में इस काम से फ्री हुआ, माँ की आवाज़ आ गई
‘आइये खाना लगा दिया है’
मैने कमरे को पर्दा कर दिया और बाहर आ गया .माँ प्लेट में खाना दाल रही थी.
‘रुको’ मेरे मुंह से निकल जाता है.
माँ मुझे सवालिया नजऱों से देखति है.
इस से पहले में कुछ कहता वो शर्मा के चेहरा झुका लेती है और एक प्लेट रख देती है एक ही प्लेट में खाना डालती है. एक दूसरे के दिल की बात हम समझ जाते है.
माँ शर्माकर निचे टेबल की तरफ देखति हुई खड़ी थि, खाना एक प्लेट में दाल चुकी थी.
सिर्फ दो ही कुर्सियाँ थी और एक छोटा टेबल, ज्यादा खरीद दारी तो मैंने की नहीं थि, क्यूँकि जगह ही इतनी थी.
मैने एक कुरसी साइड पे कर दी और एक पे बैठ गया, माँ तिरछी नजऱों से मुझे देख रही थी, उफ़ क्या शर्म आ रही थी माँ को, वो मेरी शरारत कुर्सी के हटते ही भांप गई थि, आखिर माँ थी वह मेरि, मेरे अंदर कब क्या ख्याल आते हैं उस से छुपा नहीं पाता. लज्जा से उनका गुलाबी चेहरा और भी लाल होता जा रहा था, साँसे और भी तेज हो गई थी.
मैने धीरे से माँ का हाथ पकड़ लीया, उसने मेरी तरफ देखा, उसकी नजऱों में मुझ से शरारत न करने की प्राथना थि, पर में कहाँ मानने वाला था आज तो मेरा दिन था मेर्री भी साँसे तेज हो चलि थी मैंने माँ को अपनी तरफ खिंचा और अपनी गोद में बैठने का इशारा किया माँ ने शर्मा कर ना में गर्दन हिलायी … में उनका हाथ पकडे बस उसे ही देखे जा रहा था- उनके रूप और उसकी मादकता में खोता जा रहा था … मेरी आँखों में भी एक प्राथना आ गई जिसे माँ ने भाँप लिया और सकुचति हुई धीरे से चलके मेरी गोद में बैठ गई
हम दोनों का ये स्पर्श हमें कहीं और ले चला … भूल ही गये की खाना खाने बैठे है.
उनके जिस्म की खुशबु से में और भी मदहोश हो गया और मेरा पेनिस फुदकता हुआ जरूर उसे चुबने लगा होगा जो उसकी और भी तेज होती हुई साँसे मुझे इशारा कर रही थी.
यूं लग रहा था जैसे वक़्त की सुई यहीं पे रुक गई हो. और मेरे होंठ उनके ब्लाउज के उप्पर उसकी नंगी पीठ से चिपक गये
अअअअहहहह माँ सिसक पाडी.
शायद बड़ी मुश्किल से उनके मुंह से एक शब्द निकल पाया.
‘खाना’
मेरा ध्यान भंग हुआ. और मेरी नजर खाने की प्लेट पे चलि गई
‘ आज तक तुम मुझे खिलाती रही,आज में तुम्हें खिलाऊंगा’
माँ ने मुस्कुरा के मुझे देखा और धीरे से बोली
‘दोनों एक दूसरे को खिलायेंगे’
मुझे लगा की माँ की झिझक धीरे धीरे दूर हो रही है और मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गई
‘मैं चेयर पे बैठती हूँ ऐसे आपको तकलीफ होगी’
वह मुस्कुरा कर सर झुकाए हुये बोली.
‘नही कल में तुम्हारी गोद में बैठा करता था आज से तुम मेरी गोद में बैठोगी हम रोज ऐसे ही खाना खाया करेंगे’
‘धत्त!
“आप बहुत बेशर्म होते जा रहे है’
‘इसमें बेशरमी कहाँ से आ गई अपनी बीवी को अपने गोद में बिठा रहा हु, किसी और को थोड़े ही बिठा रहा हूँ’
‘उफ़ बहुत बोलने लगे हैं आप’
माँ ने एक निवाला मेरे मुंह में ड़ाला तो मैंने उनके ऊँगली भी काट ली.
”उइ”
मेरी हसि छूट गई और वो झूठा गुस्सा दिखाते हुए मुंह बनाने लगी.
फिर मैंने माँ को एक निवाला खिलाया तो उसने भी वही हरकत कर डाली.
”उफ”
ओर वो खिलखिला के हस् पड़ी उसकी हसी मे में खोता चला गया, और इसी तरह हम दोनों ने खाना ख़तम किया .
अब ये दूध वो था जो में रोज रात को पिया करता था जब भी माँ के पास होता था या फिर ये दूध वो था जो सुहागरात की एक रसम होती है जब नयी नवेली दुल्हन हाथ में दूध का गिलास ले कर कमरे में प्रवेश करती है.
मै किचन में दिवार के सहारे खड़ा देख रहा था दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थि, मेरा पेनिस सख्त हो रहा था, अचानक मुझे याद आया में तो गजरे ले कर आया था. फ़टाफ़ट जा कर में वो गजरे वाला पाकेट लाया और किचन में माँ के करीब रख दिया.
माँ ने सवालिया नजऱों से मुझे देखा तो मैंने भी आँखों के इशारे से कहा की देख लो.
दुध गरम हो चुक्का था, माँ ने गैस बंद कर दिया, और फिर एक गिलास में दाल लिया .
गिलास वहीँ रख के माँ वो गजरे वाला पैकेट खोला और देखते ही शर्म से लाल हो गई चेहरा निचे झुका लिया होठो पे एक मंद मुस्कान आगई, अपना मुंह दूसरी तरफ कर मेरे सामने अपने बँधे हुए बाल कर दिए और हाथ में उस पाकेट को पकड़ पीछे मेरी तरफ कर दिया ये इशारा था की उनके बालों में वो गजरे में लगाऊ.
मैने उनके हाथों से वो पैकेट ले लिया और उनके करीब हो गया, दिल कर रहा था की बाँहों में जकड लु.
उनकी साँसे बहुत तेज हो चुकी थी शायद पिताजी ने भी कुछ ऐसा किया था.
शायद माँ को उनके पहली सुहागरात याद आगई थी उनके जिस्म में कम्पन बढ़ता जा रहा था और मेरे दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी.
कोई भी औरत अपनी सुहागरात नहीं भूल सकती सारी उम्र और माँ की जिंदगी में दूसरी बार सुहागरात आ गई थी में शायद अपने माँ के दिल की हालत समझ रहा था इस्लिये मेरे हाथ कांपने लगे और किसी तरह मैंने गजरे उनके बालों में लगा दिये पीछे से ही उनका रूप यूँ लग रहा था जैसे मेरे सामने कोई अप्सरा उतर के आ गई हो.
मै खुद को रोक नहीं पाया और अपने दोनों हाथ उनके कांधों पे रख दीये.
माँ को एक झटका सा लगा, पूरा बदन हिल गया और उनके मुंह से एक सुखद अह्ह्ह निकल गई जो बहुत हलकी थी पर फिर भी मेरे कानो ने उसे पकड़ लिया था.
माँ के कांधों पे जैसे ही मैंने अपने हाथ रखे मुझे पता चल गया की उनका दिल बहुत जोरों से धड़क रहा है मुझ से भी तेज.
अब सवाल ये था की कमरे में कौन जाए पहले या फिर दोनों एक साथ जायें सुना तो ये था की दुल्हन घुंगट काढ़े बिस्तर पे बैठि अपने दुल्हे का इंतज़ार करती है.
मुझे समझ में नहीं आ रहा था की क्या करूँ क्या कहुँ और शायद यही दशा माँ की भी थी क्यूँकि दुल्हन को कमरे में ले जाने वाला परिवार का कोई भी शख्स यहाँ नहीं था.
यहाँ तो सिर्फ हम दोनों थे
हमारी आत्मायें जो मिलन के लिए तड़प रही थी हमारे जिस्म जो एक होने का इंतज़ार कर रहे थे हमारा प्रेम जो पूर्ण होने की राह देख रहा था.
अब शायद एक पति होने के नाते पहल मुझे ही करनी थी.
लेकिन शायद मेरी हिम्मत जवाब दे रही
थी में अंदर से कीतना भी तड़प रहा था
न जाने क्यों वो साहस नहीं जोड पा रहा था की माँ को सुहाग शेज तक ले चलूँ
मेरे होंठ सुख रहे थे यूँ लग रहा था जैसे मेरे पैर जमीन से जम गये हो
मेरे दिल की हालत माँ अच्छी तरहा जानती थी समझती थी
पर आज वो भी मजबूर थी
आज वो माँ नहीं एक पत्नी बन चुकी थी एक दुल्हन
जो लाज के मारे मरी जा रही थी.
उनके होठो से आज कैसे कुछ निकलता.

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