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38 उच्च वर्ग

मम्मी, उसकी अगली हरकत ने तो मुझे हैरान कर डाला। जब कमलाबाई ने मेरे लन्ड को अपनी भोंसड़ी में फूल कर उछलता हुआ महसूस किया, तो एक हाथ नीचे कर के मेरे लन्ड को दबोच कर बाहर निका लिया! हरामजादी बोली, “आ साले , तुझे गाँड मारना सिखाऊँ! फिर उसने खड़ा होकर एक हाथ को कमोड की टंकी पर टेका और दूसरे हाथ को अपनी टाँगों के बीच से पीछे लेकर मेरे लन्ड को पकड़ा और अपनी उचकी हुई गाँड में दबा कर सटाने लगी। बुढ़ापे में सूखी चूत से ज्यादा अब कमलाबाई को गाँड मरवाने में मजा आता है !”

टीना जी अपने सगे पुत्र के मुख से उसकी कामक्रीड़ा के स्पष्ट वर्णन को सुनकर मारे उत्तेजना के पागल हो रही थीं। यदि जय अब जल्द ही उनकी तड़प का निवारण नहीं करता, तो वे पुत्र के लिंग को बलपूर्वक अपनी योनि में घुसा कर बलात्कार करने का इरादा कर चुकी थीं।

| फिर मैने कुत्ती की गाँड से अपनी उंगली बाहर निकाली, और अपने लन्ड को उसकी बदबूदार गाँड में घुसेड़ डाला! साली और चीखने लगी, ‘साले तू माँ की चूत से नहीं : ‘आँह, गाँड से पैदा हुआ है।”आँह : ‘ झुक कर मेरे टट्टों को दबाती हुई बोली, “निकाल टट्टों से तेल, अँह तो तेरे लन्ड पर टट्टी कर देंगी !’ फिर चीख चीख कर मेरे लन्ड को अपनी गाँड से सिकोड़ने लगी, “ऍह आजा अन्दर, ऍह और अन्दर ‘ऍह ऍह ‘ऍह ‘ऍह ऍह’:’। गाँड मरवाते हुए कमलाबाई को थूकने की आदत है, बार बार कमोड मे थूके जा रही थी, ‘सूअर तेरी माँ की तो, थू!’, तो कभी मुड़ कर मेरे मुँह पर ही थूक देती, ‘मादरचोद ! थू!’ बस ऐसे ही चीख-चीख कर गन्दी गन्दी बातें करती रही और मैने भी उसकी गाँड में लन्ड रगड़-रगड़ कर आखिर उसकी गाँड को अपने वीर्य से भर दिया।” |

टीना जी अब और आत्मनियंत्रण की क्षमता नहीं रखती थी। वे तुरन्त खड़ी होकर औंध मुँह मेज पर लेट गयीं और अपनी सुडौल गोरी टांगों को फैला कर पाश्विक मुद्रा में पुत्र की वासना से बोझिल आखों के समक्ष अपनी सराबोर योनि और गुदा को प्रदर्शित करने लगीं।

“जय, मुझे चोद! मादरचोद, तुने मुझे अपनी बातों से बड़ा गर्मा डाला है, अब नहीं सहा जाता! चोद मेरे लाल ! उस राँड कमलाबाई को जैसे चोदा था, वैसे ही अपनी बेचारी मम्मी को भी तू आज चोद !”

जय फुर्ती से माता के पीछे जा खड़ा हुआ और उनके पटे हुए योनि – कोपलों पर अपने विशाल लिंगोभार को रगड़ने लगा। जैसे ही उन्होंने अपने पुत्र के नग्न, बलिष्ठ तन का आभास पाया, टीना जी के तन में पापी वासना की एक उमंग जाग गयी।

‘मेरा पहलवान चोदू बेटा।’, अपने वक्राकार नितम्बों को प्रतिक्रिया में उसके तन पर मसलते हुए टीना जी ने सोचा। जय भी कंपकंपा उठा था, अपनी सुरूपा, कामाक्षी माता के संग पीछे से सम्भोग क्रिया के लिये तैयार होता हुआ, वो तीव्र दैहिक इच्छा के प्रभाव से सिहर रहा था। इस समय तक टीना जी आतुर ही नहीं बल्कि पुरुष लिंग की चाह के मारे तड़प रही थीं। एक पल की प्रतीक्षा भी अब असम्भव थी! अपनी टाँगों के बीच से हाथ पीछे बढ़ा कर, उन्होंने अपने पुत्र के लिंग को दबोचा और उस वासना-उदिक्त गौरवांग को अपनी भीगी योनि के प्रवेश द्वार का दिशा-दर्शन करवाया। माँ ही तपती उंगलियों को अपने लिंग पर लिपटते हुए पाकर, जय उतावला होकर कराहने लगा। । “वाह मम्मी! एकदम रन्डी स्टाइल है ये! अपने प्यारे हाथों से मेरे लन्ड को अपनी चूत में डालिये, फिर आपका लाडला बेटा आपको चोदेगा !” |

टीना जी की योनि से तीव्र प्रवाह हो रहा था, योनि से निकल कर द्रव उनकी जाँघों के भीतरी भाग पर बहता हुआ दोनों के गुप्तांगों को परस्पर सोख रहा था। जय के लिंग पर चुपड़ा हुआ द्रव एक प्राकृतिक चिकनाहट का काम कर रहा था जो माँ-बेटे के मध्य में होने वाली सम्भोग क्रिया के लिये अत्यन्त आवश्यक था। जय ने एक कदम आगे बढ़ कर अपने लिंग को प्रविष्टि की मुद्रा में तैयार कर लिया। टीना जी भी अधीर हो चली थीं।

हँ! पहलवान, आजा मैदान में ! डाल अपने मादरचोद लन्ड को मम्मी की चुतिया में और मुझे कस के चोद ! देखें मेरे दूध में कैसा असर है !” अपने पुत्र – लिंग के फूले हुए सुपाड़े का आभास अपनी काँपती योनि के भीगे हुए पटों पर पाकर टीना जी चीखीं। जय ने आज्ञाकारी पुत्र की तरह माँ की आज्ञा का पालन किया। |

माँ के चौड़े कूल्हों को जकड़ कर उनका सहारे लेते हुए, बलिष्ठ नौजवान जय ने एक आगे की ओर बलशाली झटका दिया, और अपने कामास्त्र लिंग को माता की टपकती, चूसती योनि के भीतर अपने अण्डकोष तक झोंक डाला।

“ऊँह हह ऊँह! ओह, मादरचोद! ऊह, चोद मुझे, जय! हे भगवान : ईंह, बेटा तेरा इतना मोटा है! • ईंह, टीना जी चिल्लायीं और अपने पुत्र के ठेलते लन्ड पर पीछे को दबाने लगीं। जय ने अपनी माँ की लिसलिसी योनि को कमलाबाई की अधेड़ योनि की भाँति कुशल शैली में लिंग पर जकड़ते हुए महसूस किया। उसने नोट किया कि माँ की योनि कमलाबाई से कहीं अधिक गहन थी, लाख प्रयत्न के बावजूद वो अपने लिंग से उसकी तह तक नहीं पहुँच पा रहा था। टीना जीन ने गर्दन घुमायी और पलट कर अपने पुत्र को वासना और ममता से सम्मिश्र भाव से देखा। । “ओह , शाबाश बेटा! दिखा अपनी माँ को तू कैसा मर्द है! आँह
“तेरे लन्ड को अपनी छाती के दूध से सींच कर मैने बड़ा किया है, ‘इँह देखें कितना दम है मेरे मादरचोद बेटे! ‘ईंह ऍह ईंह ऍह Smile

| माता की वासना से बावली चीखों ने जय की कामोत्तेजना की अग्नि में घी का काम किया। पाठकों, आप ही बतायें, ऐसी स्त्री, जो साधरणतय कुलीनता की मूर्ती हो, यदि आपके साथ सम्भोग के समय, वही स्त्री, अपने मुख से ऐसी गन्दी और निर्लज्ज बातें करे, तो क्या आपका पौरुष चुनौती पाकर नहीं भड़केगा ? क्या आपको सैक्स के आनन्द में कोटि-कोटि वृद्धि नहीं होगी ? दोस्तों, अगर आप भी जय की तरह भाग्यवान होते और अपनी सगी माता के संग प्रणय क्रिया के समय उनके श्रीमुख से ऐसे गन्दे वचनों द्वारा अपने परुष को उकसाते हुए सुन लेते, तो आपका लिंग भी जय ही की तरह सूज कर दैत्यकारी आकर ले चुका होता।

“बिलकुल चोदूंगा, मम्मी! तेरे दूध का कर्ज मैं तेरी ही कोख को चोद कर उतारूंगा! मेरी रन्डी मम्मी, तू मेरे बाप की चुदाई भूल जायेगी !”, जय नथुने फुला कर मस्त साँड की तरह अपनी माँ की उठी हुई योनि के भीतर लिंग के क्रमवार प्रहार करता हुआ बोला।

टीना जी जय की कहानी में कमलाबाई की मुँहफट अश्लील बाषा से बड़ी उत्तेजित हुई थीं। साथ ही कुछ ईष्र्या भी थी कि भंगिन ने किस तरह उनके पुत्र को अपनी अश्लीलता से रिझा लिया था। अपनी कुलीन शिक्षा और सभ्य व्यव्हार को त्याग कर टीना जी भी आज वेश्या अवतार में उतर कर अपने सैक्स जीवन में एक नवीन अनुभव पाना चाहती थीं। साथ ही पुत्र के समक्ष अपनी पाश्विक वासना का प्रदर्शन कर अपने व्यक्तित्व के रूद्र पहलू को उजागर करने और खुद को सर्व-गुण सम्पन्न दिखलाने का ध्येय भी रखती थीं वे । वो स्त्री ही है जो पुरुष को रिझाने के वास्ते खुद को किसी भी रूप में ढाल सकती है। आज तो उनके त्रिया-चरित्र का पात्र पुरुष स्वयं उनका पुत्र था!

“आँह :: अबे तेरे बाप ने जिस चूत को चोदकर तुझे पैदा किया है, आज तू उसे ही चोद रहा है! : ‘आँह ‘ऐंह ‘ई’ 4 : ‘आँह ऊँह जिस लन्ड से जमादारिन की गाँड मारी, ”आइँह उसी से मम्मी को चोदता है!”

अबे उचक! मादरचोद जब लन्ड चूत में अन्दर घुसाता हैं तो एड़ी को उचका कर अन्दर झटका दे! ‘आँह कमलाबाई ने तुझे नहीं सिखाया ?”

“ऊँह ‘आँह मादरचोद, तेरी मम्मी की चूत को छोड़ कर परायी जमादारिन को चोदता है? आँह फिर मम्मी को चुदवाने वास्ते क्या बाजार जाना होगा ? ”आँह ऊँह आँह ऊँह बोल साले, धंधा करवायेगा माँ से

“राँड, मैं तेरी चूत चोदूंगा, और तेरी गाँड को किराये पर उठा दूंगा!”, जय ने भी हिम्मत दिखायी।

“जा सूअर, तुझसे नहीं चुदने की!’ ‘आह’ ‘भोंसड़ी चोद कर शेर बनता है ? ‘ ‘ईयाँह ‘टीना की कसैल चूत चोदते – चोदते बड़े-बड़े पहलवान झड़ गये ईयाँह ‘आँह मादरचोद, तेरे टट्टे सूख जायेंगे ‘ऐंह, जय तो गाली-गलौज का आदी था, पर टीना जी का रक्त अपने पुत्र के एक ही वाक्य को सुन कर खौलने लगा था।

लगी शर्त कुतिया! मैं झड़ा तो गाँड मरवा दूंगा!” । ६ : ‘आइंह ‘ऐ ऐंह डैडी से मरवानी होगी !” “ओके! तू झड़ी तो मेरा वीर्य पियेगी !”

लगी शर्त, मादरचोद ! : ‘आँह ऐंह : ‘, टीना जी बड़ी अदा से मुँह फेर कर पलटीं, और मेज पर लेटे हुए ही प्रेमपूर्वक शरारत में अपने बेटे के मुंह पर थूक दिया, “थू! ले मादरचोद, तेरा ईनाम!: ‘आँह . ) ।

जय ने बड़ी बेतकल्लुफ़ी से माँ की थूक को चेहरे से पोंछा और लन्ड पर मल कर सैक्स क्रीड़ा को जारी रखा। टीना जी अपने पुत्र की ढीठता को देख कर एक पल स्तब्ध हो गयीं, और दूसरे ही पल शेरनी सी उत्तेजित हो गयीं। माता की पाश्विकता का जय ने ईंट से पत्थर वाला उत्तर दिया था। जय अब माँ पर अपने पौरुष का स्वामित्व स्थापित कर चुका था। प्रमाण के तौर पर उसने अपनी माँ को लम्बे काले बालों को दोनो हाथों से समेटा और एक मुट्ठी मे बाँध कर हल्के-हल्के खींचने लगा। टीना जी अब एक लाचार घोड़ी की तरह थीं, जिसकी लगाम जय के हाथों में थी। जय अपने लिंग पर भरपूर आत्म-नियंत्रण किये हुए था। पर टीना जी बेसुध होकर कामुकता के प्रवाह में बह रही थीं।

हरामजादी, बोल कितना किराया लेगी गाँड का ?” ८ : ‘आँह सौ रुपये में एक बार ।” बच्चों और बूढ़ों की फ्री एन्ट्री !”, जय गुर्राया, “यानी तेरे बाप और ससुर को फ्री है, समझी राँड ?”

* : ‘हा हा मादरचोद, मेरे बाप का लन्ड तो अब खड़ा भी नहीं होता है! : ‘आँह ‘ऊँह बोल हरामी, करेगा चूस कर नाना जी का लन्ड खड़ा ?”, टीना जी कच्ची खिलाड़ी नहीं थीं। सुनकर जय ने अपने कूल्हों की गति को अधिक तीव्र कर दिया, मेज अब चूं-चू कर रही थी।

“सुअरनी, तूने होमो को नहीं जना है चूत से! रिश्ते में चोदता हूँ पर चोदता सिर्फ औरतों को ही हूँ !” जय ने कलाई का झटका देकर माँ के बालों को खींचा। टीना जी ने दाँत भींच लिये और भौहें उठा कर रणचण्डी सा आगबबूला निगाहों से पीछे देखा।

: ‘आँह लन्डचूस! आँह होमो नहीं तो झड़ता क्यों नहीं ?”, टीना जी त्रिया-चरित्र के हर दाँव को पहचानती थीं। टीना जी पसीने से तरबतर थीं, किसी भी समय सम्भोग के चरमानन्द को प्राप्त कर सकती थीं।

“थू!” इस बार थूकने वाला जय था। जय ने माँ के केश पकड़ कर उनका चेहरा पीछे फेर लिया था, और उसी चेहरे पर नटखटता से थूक दिया। “ले झड़ गया! राँड, फिर दो बार, “थू! थू!” । हर स्त्री पुरुष के स्वामित्व और संरक्षण की इच्छा रखती है। जय ने माँ की ललकारों से दबे बिना अपने पौरुष का लोहा मनवा लिया था। टीना जी के अन्तरमन ने जय के खुद पर स्वामित्व को अपने तन व मन दोनो से स्वीकर कर उसे जीवन में पुरुष का दर्जा दे दिया था। स्वीकृति की यही वो अलौकिक घड़ी होती है जब नारी सर्वोच्च आत्मिक और दैहिक सुख की प्राप्ति पाती है। सहसा इसी अनुबोध ने टीना जी को ऑरगैस्म दिला दिया। उनकी देह में एक बाँध टूटा
और जाँघों के बीच से उमंग की लहरें उठने लगीं, जो फैल कर उनके रोम-रोम को पुलकित करने लगीं। जय के पौरुष-पाश में जकड़ी हुई वे निर्बल नवयौवना की तरह कामतृप्ति के प्रभाव से चीत्कार करने लगीं।

“ऊँह ‘आआह ‘मेरे लालः ”आह अआआहहहः ‘मेरा बेटा, मेरा मरदः ‘आँहः आँहः जय, अब मम्मी तेरी रखैल है !” जय माँ की आत्मसमर्पण भरी बातें सुनकर फूला नहीं समा रहा था। उसे अपने पौरुष बोध और माँ को ऐसा आनन्द दे पाने पर बहुत गर्व हो रहा था।

 

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