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37 निम्न वर्ग

* मैं चढ़ कर कमोड पर कमलाबाई के सामने बैठ गया और उसकी जाँघों को फैला कर अपनी जाँघों के ऊपर रख दीं। कमलाबाई को तो जैसे किसी बात की सुध नहीं थी, बस सिर्फ अपनी वैसलीन से चिकनी हो चुकी भोंसड़ को मेरी उंगली पर मसलती जा रही थी।” ।

“मैने मौका देखकर अपने लन्ड को उसकी गरम भोंसड़ी पर दबाया, अपनी उंगली के नीचे लन्ड को छुपाया और पलक झपकते ही उंगली बाहर निकाली और उसके बदले अपना लौड़ा अन्दर घुसा डाला। फिर तो हरामजादी ऐसी चीखी की अगर मैं उसके मुंह को अपनी हथेली से नहीं दबाता तो सारे पड़ोसी घर आ जाते। कुतिया छह महीने बाद पहली बार किसी लन्ड को अपनी चूत में लिये थी। पर मिनटों में उसे जवानी की यादें ताजा हो गयीं और फिर पेशेवर रन्डी की तरह लन्ड का मजा लेने लगी।”

“जल्द ही कमलाबाई अपनी झाँटेदार चिकनी चूत को ऐसे उचकाने लगी, कि मैने सोचा बुढ़िया को अपनी जवानी के दिन याद आ गये !” टीना जी ने अपना मुँह खोला तो, परन्तु कोई स्वर नहीं निकला, उनकी स्वयं की योनि से उनके पुत्र की रगड़ती ठोड़ी पर द्रवों का प्रवाह प्रारम्भ हो गया था। मम्मी, सच, बुढ़िया की भोंसड़ी में ग़जब का जादू था। मेरा लन्ड ऐसा लग रहा था कि किसी गरम भट्टी में घुसा हुआ है !”
“साली आवारा कुतिया की तरह बिलबिला रही थी, और मैं उसे मजे से चोद रहा था। मैने नीचे देखा तो मेरा लन्ड उसकी भोंसड़ी में अन्दर-बाहर, अन्दर-बाहर चले जा रहा था। उसकी भोंसड़ी के झोल भी मेरे लन्ड के साथ फच्च – फच्च करते हुए अन्दर बाहर हिल रहे थे। जब लन्ड को बाहर खींचता तो रन्डी ऐसी स्टाइल से मेरे लन्ड पर भोंसड़ी जकड़ती थी कि सोलह साल की कुंवारी चूत हो! क्या कस के निचोड़ती है हमारी भंगिन अपनी चूत से ! साथ-साथ अपने मुंह से ऐसी गन्दी गाली-गलौज करती जा रही थी। अरे मम्मी, आप तो ऐसी गालियाँ सपने में भी नहीं सोच सकतीं !”

परन्तु टीना जी अच्छी तरह से अनुमान लगा सकती थीं कि नीच कुल की महिलायें कैसी भद्दी भाषा का उपयोग कर सकती हैं। जय अपनी माँ के हर हाव-भाव को ताड़ता हुआ आगे कहने लगा।

कहती थी, “अबे सूअरनी की औलाद, तेरी माँ ने भी संदास पर चुद कर तुझे पैदा किया है! ऍह … ऍह … तुम शर्मा लोग हम भंगियों से ही तो सीखे हो संडास पर चोदना! :: ऍह :: आँह ::अपनी सुअरनी माँ की चूत समझ रखी है क्या जो लन्ड से खुजा रहा है। चोद साले चोद! खैर मना, मेरा मरद जिन्दा नहीं,… आँह :: ‘नहीं तो ऐसी कमजोर चुदाई देख कर तेरी अभी गाँड मार लेता। बस मम्मी, मुझे ऐसे ही रन्डी की तरह चैलेंज दे-दे कर पागल कर रही थी हरामजादी!”

“फिर उसने मेरी गाँड पर अपनी उंगलियों के नाघूनों को गाड़ना शुरू कर दिया और मेरे लन्ड को अपनी भोंसड़ी में और अन्दर डालने की कोशिश करने लगी। मेरा लन्ड अब पूरा का पूरा अब अन्दर घुस चुका था। और मम्मी मेरे टट्टे झूल झूल कर कभी उसकी गन्डी गाँड पर टकराते तो कभी कमोड पर। पर कमलाबाई तो चुप होने का नाम नहीं लेती थी। जानती हो क्या बोली वो ?”, जय ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए पूछा।

“कः ‘क्या बेटा ?”, टीना जी हकलाते हुए बोलीं। वे अपनी जाँघों के बीच पनपती हुई कामुकता की तरंगों का असफ़ल विरोध कर रही थीं, इस प्रयास में कि इस असाधारण रूप से लज्जाहीन प्रसंग की अवधि को किसी तरह से लम्बा करें।

“वो राँड मुझसे अपनी गाँड में उंगली डालने को कहने लगी, मम्मी। मम्मी, तुम मानोगी नहीं, पर वो साली, मेरी दादी की उमर की बुढ़िया, मुझी से अपनी गाँड में उंगल करने को कह रही थी !”

टीना जी को जय के कथन पर विश्वास करने में कोई आपत्ति नहीं थी, उल्टे उनका मन तो किया कि वे उसे वही हरकत अपनी गुदा पर करने का प्रस्ताव दे डालें। जय ने सांकेतिक रूप से अपनी ठोड़ी को टीना जी के पेड़ पर रगड़ कर वर्णन जारी रखा।

“लो, मैने अपने हाथों पर थोड़ी और वैसलीन ली और अपनी बीच की उंगली को उसकी चौड़ी गाँड पर दबाने लगा। हरामजादी के दोनों बटक्स मेरी हथेली पर थे। मम्मी कमलाबाई की गाँड ऐसी चौड़ी थी कि मुझे विश्वास हो गया उसका पति वाकई गाँड मारने में उस्ताद था! मैने उससे पूछा भी, क्यों कमलाबाई, लगता है तेरे पति ने ही तेरी गाँड ऐसी खोल रखी है।”

बस कुतिया को मौक़ा मिल गया, ‘ऊँह ::: ऍह ::: मेरा मरद तो साला लड़कों की गाँड ज्यादा मारता था, मेरी कम। आँह • आँह ये तो मेरे मामा ने बचपन में मारी हुई है! : ‘आँह चाहूं तो तेरे और तेरे बाप, दोनों के लन्ड को एक साथ गाँड में ले लें : ‘आँह बोल सूअर, मारेगा बाप के साथ मिलकर मेरी गाँड :: हाँ ?’ मैने हाँ कर दी। ‘मेरी माँ तो हाथ से मामा का लन्ड पकड़ कर मेरी गाँड में डालती थी। ‘अँह बोल, सूअर, तू भी बाप के लन्ड को हाथ में पकड़ कर घुसायेगा ना ऍह ?’ मैने फिर हाँ किया। सच मम्मी, कमलाबाई से ऐसी बातें करके बड़ा मज़ा आ रहा था।”

“लगता है उसे ऐसे बोलने में और भी मज़ा आ रहा था, बस कुछ ही मिनटों में हरामजादी कमोड पर बैठी झड़ने लगी। मेरा लन्ड अब भी उसकी भोंसड़ी में कूद रहा था, और मेरी उंगली उसकी गाँड को खोद रही थी।” | टीना जी कराहते हुए अपने स्तनों को दबोच रही थीं। अत्यन्त बेसुधी की मुद्रा में अपने निप्पलों को निचोड़ रही थीं वे । कठिनाई से अपने पुत्र के सामने उनसे सम्भोग क्रिया का प्रस्ताव रखने की कामना पर वे काबू पा सकीं। आगे की कथा जो सुनना चाहती थीं। जय की कथा उनके कामानन्द को कई गुना अवृद्ध जो कर रही थी।

“साले मुस्टंडे, तू नहीं झड़ा ?”, जय की माँ ने शरारत भरे स्वर में पूछा।

“मैं भी बस झड़ ही जाता मम्मी! कमलाबाई जब झड़ी तो उसकी भोंसड़ी सौ चूतों की तरह मेरे लन्ड को पुचकारने लगी थी। उसकी चूत में ऐसा कस-कस के मैने लन्ड मारा, कि हरामजादी हाँफ़ने लगी।”

“मम्म ::: तू मुझे बता रहा है, मुझे याद है जब मैं झड़ी तो तू कैसे जानवरों से मुझे चोद रहा था! खैर आगे कः क्या हुआ ?”, टीना जी कराहीं।

 

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