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34 मातृ-दीक्षा

“ओहूह, हा! चोद्दी! ऐसे ही! चुसती रह, पीती जा मम्मी! कैसा लगा बेटे का वीर्य ?”, वो कराहा।

टीना जैसे निगल – निगल कर किसी वैक्यूम – पम्प की तरह अपने पुत्र के लिंग से वीर्य – पान कर रही थीं, किशोर जय अपनी माँ के मुँह का क्रमवार कसाव अपने लिंग पर अनुभव कर रहा था। उनकी नंगी जाँघों और नितम्बों पर भी योनि द्रव की धाराएं अपनी चिपचिपी गर्माहट फैला रही थीं। वे भी अब अपनी कामसन्तुष्टि के कगार पर आकर कुर्सी पर बैठी-बैठी बदन को कसमसा रहीं थीं।

जब टीना जी ने अपने पुत्र के धीमे-धीमे फड़कते लिंग से वीर्य की अन्तिम बून्द चूस ली,

तब उनका बदन लुहार की भट्टी जैसा तपतपा रहा था। जय ने अपनी निगाहें उनकी निर्लज्जता से फैली हुई जाँघों के बीच फेरीं, और अपनी माँ की योनि की चमचमाती दरार को एकटक देखने लगा। वे अपनी टांगें चौड़ी फैलाये बैठी थीं, और जय ने सम्मोहित होकर सुर्ख लिसलिसे माँस को उत्तेजना के मारे फड़कते और कसते हुए देखा। वो टीना जी की योनि की भीगी हुई कोपलों को स्पष्ट रूप से मारे लालसा के सिकुड़ता देख रहा था। माता की कामुक देह के मोहपाश में बढ़ कर, जय ने उन्हें छूने के लिये अपना एक हाथ आगे बढ़ा दिया। जय की उंगलिया गीले मुलायम योनि-माँस में ऐसे घुसीं जैसे मक्खन की डलि में छुरी। ।

“मम्मी, तू तो गजब की गर्मा रही है !”, वो हाँफ़ा। “मम्मी, तेरी चूत कितनी गरम और भीगी हुई है !”,

टीना जी ने अपने मुख से अर्ध-कठोर लिंग को अलग करते हुए चेहरे को उठाकर आग्नेय नेत्रों से जय को देखा।
“गर्माऊगी क्यूं नहीं साले !”, वे कराहीं, “मेरे लाडले बेटे का लन्ड जो आज नसीब हो रहा है! ::: अब झट-पट फिर से खड़ा करवा दे ना इसे, मेरे रँडुए पूत! जानता नहीं मम्मी की गरम-गरम चूत तेरे काले मोटे लन्ड से चुदने को कितनी बेसब्र है! अ अ अह अह, बेसरम, तेरी मादरचोद उंगलियाँ तो मुझे पागल कर देंगी !” ।

जय ने अपनी माँ को ऐसी भाषा का प्रयोग करते हुए पहले कभी नहीं सुना था, और टीना जी के यह बेशर्मी भरे वचन उसे और अधी उत्तेजित कर रहे थे। जरूर मम्मी की टाईट, रसीली योनि में फेंटती हुई उसकी उंगलियों का असर होगा। अगर इसी ढंग से मम्मी उससे बतें करती रहीं, तो वो तुरन्त ही मातृ-देह से संभोग के लिये तैयार हो जायेगा!

टीना जी के स्नायूओं में कामुकता के प्रवाह का मुख्य करण तो अपने हट्टे-कट्टे युवा पुत्र के साथ सैक्स-क्रीड़ा का वर्जित होना ही था। सगे पुत्र के साथ वर्जीत सैक्स , वो भी अपने ही किचन में! एक ऐसा रोमाँचकारी खतरा था इस करतूत में, जो उनके तड़पते बदन के रोम-रोम में एक के बाद एक थरथराहट कौन्धा रहा था।

“कहो ना, मम्मी! : जो भी कुछ मुझसे करवाना चाहती हो, कह दो। आपकी बातें सुनकर मेरा लन्ड फिर खड़ा होने लगा है !”, जय ने आह भरी, और अपने हाथ को माँ की रस से सरोबर योनी की लम्बाई पर ऊपर से नीचे तक फेरता हुआ बोला। ।

“ओहहह! जियो मेरे लाल !”, टीना जी चीखीं , अपनी उन्मत्तता में उन्होंने जय की बात ठीक से सुनी भी नहीं थी, “ रगड़ मादचूद, मम्मी की चूत को प्यार से रगड़, जोर से मसल !”

उनके बेटे ने आज्ञा का पालन किय। टीना जी कुर्सी पर पीछे को पसर गयीं और अपने नितम्बों को कुर्सी के सिरे पर टिका दिया, इस मुद्रा में उनकी योनि जय की उंगलियों के आवाजाही के लिये पूर्ण रूप से प्रस्तुत हो गयी थी। इसके बाद उसकी माँ को कोई अतिरिक्त निर्देश देने की अवश्यकता नहीं पड़ी, जय अब अधीर हो गया था।

“तेरे साथ और क्या-क्या करूं, मम्मी ? झिझकती क्यों हो, बोल भी डालो ना अपने मन की बात !”

इस बार टीना जी को उसकी बात समझ में आ गयी। उन्हें थोड़ी हैरानी अवश्य हो रही थी, कि उनका बेटा, उन्हीं के मुख से, सैक्स के विषय में उनके अन्तर्मन की सर्वाधिक गोपनीय कल्पनाओं का विस्तृत ब्यौरा सुनाने की इच्छा रखता था। पर अधिक हैरानी उन्हें इस बात की थी, कि वो भी उससे सब कुछ कह डालने के लिये उतावली थीं!
“मममममम! हाँ जय! मम्मी को ऐसे बड़ा मज़ा आता है! मेरी चूत को मसल , मेरे लाल ! अपनी उंगलियों से मम्मी की चूत को चोद। क्या तू मेरी चूत को अपनी उंगलियों पर कसता हुआ महसूस कर रहा है, मेरे बच्चे ?”, टीना जी ने दाँत भींचते हुए पूछा। ।

“ओहहह, भोंसड़चोद, हाँ मम्मी!”, जय कराहा, “आपकी चूत ऐसी टाइट और गरमागरम है, अब तो जी करता है कि बस अन्दर घुसेड़े अपना लन्ड और चोद डालें फिर एक बार !”

“चोद लेना, मम्मी की चूत कहाँ भगती है, उसकी माँ ने जय के सर की ओर बढ़ते हुए उत्तर दिया, “मैं चाहती हूं कि चोदने के पहले तू मेरी चूत को चाटे। बोल बेटा, चाटेगाअ ना अपनी प्यारी मम्मी की चूत ?”

“क्यों नहीं मम्मी!”, जय ने गरमजोशी से उत्तर दिया। टीना जी ने प्रसन्नता से नोट किया कि उनके इस वार्तालाप के उपरांत उनके पुत्र के लिंग की मोटायी में अच्छी वृद्धि हो गयी थी। पुत्र – लिंग को हाथ में लेकर उन्होंने उसे दुलार-भरे ढंग से ऊपर और नीचे रगड़ा। । जय की आँखों में आँखें डाल कर उन्होंने अपना अश्लील वार्तालाप जारी रखा।

चल फिर, मैं चाहती हूँ कि तू अपनी जीब मम्मी की चूत में घुसेड़े।”, वे नागिन जैसे फुफकारती हुई बोलीं, “जितनी अन्दर घुसती है, घुसेड़ना। घुसेड़कर चूसना। मेरी चूत के चोंचले को भी चूसना पुत्तर! जोर-जोर से चूसते रहना, जब तक मैं तेरे मुँह में झड़ न जाऊँ। तुझे पाल-पोस कर बड़ा किया है, इतना करना तो तेरा फ़र्ज बनता है, है ना जानेमन ?” अपना कथन स्माप्त करते-करते उनकी योनि अब बेसब्री के मार निरंकुश होकर कंपकंपा रही थी।

बिलकुल मम्मी! तेरे दूध का बदला तो जरूर दूंगा। आप कहें तो पूरी रात आपकी गरम और रसीली चूत को चूसता रहूं”, अपनी माँ के अश्लील और बेहया निर्देशों को सुनकर जय की आँखों में उत्साह के दीपक टिमटिमा रहे थे।

 

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