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Update 26 B

मैंने खंजर को मूठ से पकड़ा और फल से बाहर की ओर खिंचने लगा । थोड़ी सी कोशिश के बाद मूठ फल से बाहर निकल गया । मूठ एक तसबीर से लिपटी हुई थी ।

मैंने खंजर की खोखली मूठ में झांका । फिर गोल लिपटी हुई तस्वीर को मूठ में धकेला । तस्वीर बड़ी सहुलियत से मूठ में समा गई । फिर मूठ को अपने एक हाथ की हथेली पर पटका तो तस्वीर का एक सिरा मूठ से बाहर सरक आया । मैंने तस्वीर मूठ से बाहर खींच ली ।

लगता है कि इस तस्वीर का मूल ठिकाना इस खंजर की मूठ ही था ।

मैंने तस्वीर खोला तो उसके पीछे कोई पच्चीस साल पहले की एक तारिख पायी गई । तारिख के नीचे लिखा था रमाकांत सिंह और जानकी सिंह की शादी । तस्वीर ब्लैक एंड व्हाइट थी और रंगत में पीली पड़ चुकी थी । तस्वीर देखकर लगता था कि अपनी जवानी में जानकी सिंह बहुत ही हसीन और दिलकश रही थी । उसके विपरीत रमाकांत जी बड़ा पिचका और दुर्बल सा लग रहा था । दाढ़ी तब भी रखा हुआ था और चश्मा तब भी उसके नाक पर मौजूद था । दृश्य वरमाला का था । उसमें रमाकांत जी अपने हाथ कन्धों से ऊंचे उठाकर एड़ियों पर उचक कर वधु को वरमाला पहनाने की कोशिश कर रहा था ।

मैंने तस्वीर अपने पाकेट में रखा और श्वेता दी के पास चला गया ।

घर में श्वेता दी के अलावा कोई नहीं था । वो सलवार सूट में थी । उनके पुछने पर सारा किस्सा मैंने कह सुनाया । मैंने उन्हें रमाकांत और जानकी जी की वरमाला वाली तस्वीर दिखाया ।

वो तस्वीर देखी फिर असमंजस होकर बोली -” इस तस्वीर में ऐसी क्या खूबी है जिसकी वजह से उसे इतने यत्न से इतने गुप्त रूप से यूं अमर ने छुपा कर रखा था ?”

खूबी मुझे मालूम हो चुकी थी ।

तभी रमणीक लाल का फोन आया । उससे थोड़ी देर बातें करने के बाद मैंने डैड को फोन लगाया ।

” डैड , कनात पैलेस के इंडियन बैंक शाखा में एक रमाकांत सिंह नाम के एक शख्स का एकाउंट है ” – मैंने कहा -” मुझे पता करना है कि एक साल में उस शख्स ने अपने एकाउंट में क्या जमा करवाया और उसमें से क्या निकलवाया ।”

डैड खूद एक प्राइवेट बैंक में असिस्टेंट मैनेजर थे तो उनके लिए ये कोई बड़ी बात नहीं थी ।

” एकाउंट नंबर ?” – डैड ने पूछा ।

” नहीं मालूम ।”

” ऐसी जानकारी तो बैंक में गोपनीय रखी जाती है ।”

” मुझे मालूम है तभी तो आपको कहा ।”

” ओके । मैं कोशिश करता हूं ।”

” एक और शख्स की भी एक साल की स्टेटमेंट चाहिए ?”

” किसका ?”

” अमर गुप्ता । उसका एकाउंट कनात पैलेस में ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में है ।”

” ठीक है । एक घंटे बाद फोन करो ।”

” यदि काम हो जाय तो मेरे मेल में फारवर्ड कर दिजियेगा ।”

डैड ने एक घंटे का समय कहा था । तो मैंने इस का सदुपयोग करना चाहा । श्वेता दी से बढ़िया और क्या हो सकता था । एक घंटे तक हम दोनों ने खूब जमकर सेक्स का मजा लिया ।

सवा घंटे बाद मैंने अपना मेल खोला । डैड ने मेल कर दिया था । रमाकांत जी के एकाउंट में हर महीने एक ही चेक चालीस हजार रुपए का जमा होता था जिसकी रकम पूरी की पूरी ये खाते में लगते ही हर महीने निकलवा लेते थे । लास्ट में बैलेंस पांच सात हजार रुपए से ज्यादा नहीं रहता था । सिर्फ एक रकम मोटी थी – दस लाख रूपए की – जो फिक्स्ड डिपॉजिट से ट्रांसफर होकर इस एकाउंट में जमा हुआ था और वो एक हफ्ते बाद निकाल लिया गया था ।

इंस्पेक्टर कोठारी शाम तक खंजर के साथ मुझे थाने बुलाया था । मैं श्वेता दी को ‘ बाॅय ‘ बोलकर गाजियाबाद के लिए निकल गया ।

मैं थाने न जाकर रमाकांत जी के फ्लैट जा पहुंचा । उनके फ्लैट की कालबैल बजाई तो दरवाजा खुद जानकी जी ने खोला ।

दोनों पति-पत्नी वहां मौजूद थे ।

मैंने दोनों का अभिवादन किया । वे लोग काॅफी पी रहे थे ।

” मैं तुम्हारे लिए काॅफी लाती हूं “- जानकी जी बोली ।

” नहीं, नहीं ” – मैं जल्दी से बोला -” इसकी जरूरत नहीं ” – फिर मैं रमाकांत जी से सम्बंधित हुआ -” मैंने डिस्टर्ब तो नहीं किया ?”

” बिल्कुल नहीं “- रमाकांत जी अपनी दाढ़ी में उंगलियां फिराते हुए बोले -” बल्कि बहुत अच्छा लगा । जैसा माहौल यहां का कुछेक दिनों से होकर रखा है उससे तो एक डर का आलम सा हो गया है। तुम्हारी बहन और जीजा के यहां से जाने के बाद तो हमें भी यहां मन नहीं लग रहा है । और ऊपर से मनीष की हत्या । कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि हम क्या करें ?”

” यदि ऐसा है तो ” – मैंने धीरे से कहा -” क्यों नहीं अपने रिश्तेदारों से मिलते हैं ?”

” रिश्तेदार ! किसके रिश्तेदार ?” – रमाकांत जी ने चौंकते हुए कहा ।

” आप की ” – मैं जानकी जी को देख कर बोला -” छोटी बहन की बेटियां ।”

” क्या ?” वो आश्चर्यचकित हो कर बोली ।

” नाम तो याद होगा आपको अनुष्का और वीणा….या ये भी याद नहीं “- मैंने व्यंग्य से कहा ।

” तुम कैसे जानते हो उन्हें ?”

” अनुष्का वही लड़की है जो जीजू के फ्लैट में मेरे दोस्त अमर के मर्डर वाले दिन पाई गई थी और वीणा दिल्ली के एक नाइट क्लब में बतौर डांसर काम कर रही है वो भी इसलिए कि बुरे दिनों में न तो उसकी बहन ने उसकी सुध ली और न ही उसकी मौसी ने उसकी कोई खोज-खबर ली ।”

दोनों हतप्रभ मुंह बाए मुझे देख रहे थे ।

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