#108
बाहर आते ही मैं भाभी से टकरा गया . जो थोडा गुस्से में थी .
भाभी-ताला क्यों तोडा चाबी मांग लेते मुझसे
मैं- नया लगा लो
भाभी- किस चीज की तलाश है तुमको
मैं- भैया ने आपको नहीं बताया क्या
भाभी- नहीं तुम ही बता दो
मैं-मैं पल पल मर रहा हूँ भाभी, अपने हिस्से की जिन्दगी तलाश रहा हूँ
भाभी इस से पहले की कुछ और कहती सरला आ गयी रसोई में तो मैं वहां से बाहर निकल गया. बाहर आकर मैंने सरला से कहा की थोडा दूध ले आए मेरे लिए. मैंने पत्तल ली और खाना खाने के लिए बैठ गया . अंजू ने मुझे देखा तो मेरे पास आई.
अंजू- इतने बड़े होकर भी दूध पीते हो .
मैं-पीना तो मैं बहुत कुछ चाहता हूँ पर तुम बुरा मान जाओगी
अंजू- मैं क्यों बुरा मानूंगी बताओ क्या पीना चाहते हो मैं ले आती हूँ
मैं- रहने दे तू
अंजू पास ही बैठ गयी और मेरे साथ ही खाना खाने लगी.
अंजू- पूरा दिन कहा गायब थे .
मैं- तुझे याद आ रही थी क्या मेरी .
अंजू- इतना भी नहीं है तू की मरी जा रही हूँ तेरी याद में
मैं- तो फिर क्यों पूछती है कहीं भी जाऊ मैं
अंजू- तू भी नहीं था अभिमानु भी नहीं था . अकेली का टाइम पास नहीं हो रहा था मेरा.
मैं- तू कहे तो पूरी रात टाइम पास कर सकते है
अंजू- इस से आगे भी दुनिया है तू कब तक इसी में अटका रहेगा.
मैं- जहाँ तक तुझे समझा है , प्रकाश से तेरे सम्बन्ध वैसे नहीं थे जैसे तू बताती है
अंजू- मैंने आज मंगू से बात करने की कोशिश की थी पर वो राय साहब के साथ कहीं चला गया .
मैं- तुझे बुरा नहीं लगा जब तूने देखा की प्रकाश रमा को चोद रहा था तेरे जैसी गदराई साथी होने के बाद भी वो रमा के पास गया अजीब है न
अंजू- कितनी बार कहा है मेरे निजी मामले में मत घुस
मैं- घुसने तो तूने नहीं दिया परकाश को वर्ना वो क्यों जाता रमा के पास
अंजू- मुह तोड़ दूंगी तेरा
मैं- शायद तेरे नसीब ने चुदाई का सूख है ही नहीं
अंजू- तू खुश रह मैं जा रही हूँ
मेरी निगाह चाची पर थी जिसकी मटकती गांड मुझे पागल किये हुए थी. कितने ही दिन बीत गए थे मैंने चाची को नहीं पेला था . कुवे पर चुदाई का रिस्क नहीं ले सकता था मैं निशा अगर आ निकली तो मामला काबू से बाहर हो सकता था . लोगो से भरे घर में कहा चूत मारू खाना खाते हुए मैं ये ही सोच रहा था
जिन्दगी में इतना सब कुछ हो रहा था की मैं करू तो क्या करू कल रात आदमखोर को छत पर देख कर मैं समझ गया था की ये साला भी कुछ न कुछ करने की ताक में है . खैर मैं चाची के पास गया .
मैं- चाची कुछ भी कर आज देनी ही पड़ेगी
चाची- देखती हूँ जगह भी तो नहीं है न
मैं- सुन मेरी बात , बिस्तर सीढियों पर बने छज्जे पर लगा ले. सबके सोने के बाद उधर मिलेंगे सीढियों का दरवाजा बंद कर लेंगे किसी के आने का डर भी नहीं रहेगा.
चाची- चल ठीक है
मैंने मौका देख कर चाची की गांड को सहला दिया. आंच तापते हुए मुझे इंतज़ार था सबके सोने का ताकि चूत का सूख प्राप्त कर सकू . तभी बाप की गाडी आ गयी वो सीधा अपने कमरे में गया और दरवाजा बंद कर लिया. मैं हमेशा सोचता था की ये बंद दरवाजे के पीछे करता क्या होगा. धीरे धीरे करके बत्तिया बुझने लगी.पूरी तरह से सुनिश्चित करने के बाद मैं चाची के घर जा ही रहा था की गली में मूतने के लिए रुक गया. मूत ही रहा था की मैंने राय साहब को पैदल ही घर से बाहर निकलते देखा.
इतनी रात ओके बाप कहाँ जा रहा था एक तरफ चूत थी एक तरफ ये जानने की इच्छा की बाप कहाँ जा रहा था. मैंने तुरंत पीछा करना शुरू किया. थोड़ी दूर पीछा करने के बाद मैं समझ गया था की बाप कहाँ जा रहा था . वो रमा के घर जा रहा था . राय साहब के घर में घुसते ही मैं पीछे वाली खिड़की की तरफ गया और जब वहां पहुंचा तो हैरान रह गया . खिड़की पर अंजू पहले से ही मोजूद थी .
“ये बहन की लौड़ी यहाँ क्या कर रही है ” मैंने खुद से कहा और अंजू से थोड़ी दुरी बना कर खड़ा हो गया. खिड़की से अन्दर दिख रहा था . कमरे में राय साहब थे थोड़ी देर बाद रमा भी कमरे में आई, पूर्ण रूप से नग्न रमा शायद नाहा कर आई थी क्योंकि बदन से पानी टपक रहा था . उनकी चुदाई शुरू हो गयी . अंजू खिड़की से हट गयी और मेरी तरफ आने लगी.
मैं- हट क्यों गयी अपने मामा की रास लीला तो देख ले
अंजू- रमा पर नजर थी मेरी पर यहाँ तो कुछ और ही चल रहा है
अंजू का सीना तेजी से ऊपर निचे हो रहा था .
मैं- मैंने तुझसे कहा था न मेरा बाप वैसा नहीं है जैसा दीखता है
अंजू-चल चलते है यहाँ
मैं- कहाँ चलेंगे
अंजू-घर और कहा
मैं- बात तो सुन
अंजू-घर चल कर करेंगे जो भी बात करनी होगी.
मैं- ऐसा क्यों लगता है की तू कुछ छिपा रही है मुझसे
अंजू- मैं क्या छिपा रही हूँ तू ही बता
मैं- देख अंजू , तेरी जो भी तलाश है रमा उसकी बहुत महत्वपूर्ण कड़ी है . ये औरत उनसब से चुद रही है जिनको हम जानते है
अंजू- जानती हूँ ,
मैं- इतना तो मालूम कर ले इ मेरा बाप क्यों पेल रहा है इसे.
अंजू- करुँगी पता
मैं- तेरा मन करता है क्या चुदाई करने का
अंजू- करेगा तब भी तुजसे नहीं करुँगी ये सब
मैं- क्यों
अंजू- मेरी मर्जी .
घर आते ही अंजू चौबारे मे जाने लगी. मैं चाची के पास जाने को मुड़ा ही था की अंजू ने मुझे आवाज दी.
“अब कहाँ जा रहा है ”
मैं- एक काम याद आ गया निपटा के आता हूँ
अंजू- काम तो चोबारे में भी करना होगा , आजा ऊपर.
मैं- ठीक है .
ऊपर जाने से पहले मैंने सोचा की दरवाजा बंद कर देता हूँ . मैंने दरवाजे को पकड़ा और गीलेपन से मेरा हाथ सन गया………………….मैंने तुरंत पीछे मुड कर देखा अंजू सीढियों पर नहीं थी पर गली में दरवाजे के ठीक सामने…………

