#103
“ये मेरा कमरा है ” मैंने निशा को अन्दर लाते हुए कहा
निशा- बढ़िया सजाया है
मैं- क्या तुम भी सब कुछ अस्त व्यस्त तो पड़ा है , वैसे भी आजकल मैं ज्यादातर कुवे पर ही रहता हूँ न
“कोई बात नहीं कबीर ” निशा ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा.
मैं- समझ नहीं आ रहा क्या करू तुम्हारे लिए
निशा- तुमने बहुत कुछ कर दिया है अब और की जरुरत नहीं
“ये कबीर के कमरा किसने खोला ” बाहर से चंपा की आवाज आई तो मैंने उसे अन्दर आने को कहा. चंपा मेरे साथ निशा को देख कर थोडा हैरान हो गयी.
मैं- ऐसे क्या देख रही है , मैंने कहा था न तुझसे की निशा से मिलवा दूंगा तुझे
चंपा- ये तो वो ……..
मैं- हाँ वो ही है. आ बैठ पास
निशा ने आगे बढ़ कर चंपा को गले लगाया और उसके माथे को चूमा
“बड़ी प्यारी हो ” निशा ने कहा.
चंपा- मैं कुछ लाती हूँ आपके लिए
निशा- जरुरत नहीं तुम बैठो पास मेरे, तुमसे मिलने ही तो आई हूँ मैं
निशा की सादगी, उसका बड़प्पन उसका स्नेह एक डायन के दिल में इंसानों से ज्यादा दरियादिली थी .
निशा- सब लोग खामोश क्यों हो बोलो भी कुछ
चम्पा- मैं क्या बोलू
निशा- जो तुम्हारा दिल करे वो बोलो. कबीर तो तुम्हारी तारीफ करते हुए नहीं थकता.
तभी भाभी नाश्ता ले आई निचे से. चंपा ने भाभी के हाथ से ट्रे ली और सबको चाय नाश्ता देने लगी.
भाभी- चंपा निशा तेरे लिए कुछ तोहफे लाई है तू निचे जाकर देख और संभाल कर रख दे उनको.
चंपा के जाने के बाद हमारी तरफ मुखातिब हुई.
भाभी- तुमको यहाँ देख कर बड़ी प्रसन्नता हुई ,
निशा- तुम्हारे निमन्त्रण को कैसे मना करती .
मैं- आप दोनों एक दुसरे को कैसे जानती है
भाभी- जंगल में सिर्फ तुम ही नहीं जी रहे हो तुमसे पहले भी कुछ लोग है जो तुमसे ज्यादा जानते है जंगल को.
मैं- भाभी आपसे मैंने कुछ नहीं छिपाया . आज जब निशा भी यहाँ पर है तो मैं आपसे विनती करता हूँ की आप हमारे रिश्ते पर अपनी हाँ की मोहर लगा दे. ये प्रेम दुनिया समझे ना समझे आप जरुर समझेंगी मैंने शुरू से ही ये माना है . मेरा और निशा का रिश्ता किसी स्वार्थ पर नहीं टिका है
भाभी- जानती हु, समझती भी हूँ प्रेम को .पर मैं डरती हूँ कबीर . शुरू में मुझे लगता था की निशा कभी इतना आगे नहीं बढ़ेगी पर जब निशा ने ये निर्णय लिया है तो सोच कर ही लिया होगा.
निशा- नंदिनी, मैं तुम्हारे मन की बात समझती हूँ . जानती हूँ की जिस पथ पर चलने के लिए मैंने कबीर का हाथ थामा है वो राह आसान नहीं है
मैं- हर राह आसान कर लूँगा मैं निशा, मेरा वादा है तेरे दामन में इतनी खुशिया भर दूंगा की तू नाज करेगी मुझ पर
भाभी- वो नाज करती है तुझ पर कबीर. पर ये जमाना, अभिमानु को कैसे समझा पाउंगी मैं
मैं- आप फ़िक्र ना करे, भैया ने मुझसे वादा किया है की वो खुद जायेंगे रिश्ता लेके
भाभी- एक बार मुझसे पूछ तो लेते कबीर,
निशा- नियति का खेल निराला है नंदिनी . खैर, अब मुझे चलना चाहिए . ब्याह की रात नहीं आ सकती थी इसलिए सोचा की आज ही चंपा से मिल लू .
भाभी- अच्छा किया
हम लोग निचे आये. निशा ने थोड़ी बाते चंपा के साथ की और फिर चली गयी. मैं उसके साथ जाना चाहता था पर भाभी ने मुझे रोक लिया.
भाभी- क्या वादा किया है अभिमानु ने तुझसे
मैं- यही की वो खुद मेरे रिशते की बात करने जायेंगे.
भाभी और कुछ कहती की तभी उनकी नजर आँगन में आती चाची पर पड़ी तो वो चुप हो गयी. मैं चंपा के पास गया .
मैं- तोहफे कैसे लगे.
चंपा- अप्रतिम, तेरी दोस्त तो बहुत अमीर है
मैं- अमीर का तो मालूम नहीं पर दिल की बहुत नेक है .और हाँ डाकन कभी बुरी नहीं होती वो मेरे जैसी ही होती है .
मेरी बात सुन कर चंपा के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी. चाची के पीछे पीछे मैं कमरे में गया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया. चाची के लाल होंठ चूसने लगा.
चाची- मत कर कोई आ निकलेगा मरवा के मानेगा तू
मैं- कितने दिन हो गए रुका नहीं जा रहा मुझसे
चाची- ठीक है आज रात को कर दूंगी तेरा काम अभी तंग मत कर.
चाची के लहंगे में हाथ डाला और चूत को मसलते हुए बोला- रात को पक्का
एक बार फिर मैंने चाचा की चाबी को देखा और सोचने लगा की क्या चक्कर है इस चाबी का, कहाँ होगा वो ताला जो चाचा की गुत्थी सुलझाएगा. रसोई में मैंने देखा की सरला बर्तन धो रही थी .
मैं- बर्तनों पर ध्यान मत दे थोडा ध्यान मुझ पर भी दे भाभी
सरला- कल मौका ही नहीं मिला पर आज तुम्हारी मनचाही कर दूंगी.
मैं- यहाँ जगह नहीं है , और तेरे घर पर आ नहीं सकता
सरला- एक जगह है , जहाँ मिल सकते है
मैं- कहाँ
सरला- वैध के घर पर . घर बंद पड़ा है किसी को मालूम भी नहीं होगा
मैं- ठीक है पर आज ना नहीं होनी चाहिए
मैं अपने दोनों हाथो में लड्डू रखना चाहता था चाची या सरला दोनों में से एक को तो चोदना ही चोदना था मुझे. तभी मुझे ध्यान आया की चोदने के लिए इस घर में भी तो जगह है . मैंने रसोई में छिपे दरवाजे को खोलना चाहा पर उस पर ताला लगा था . जरुर भाई ने ही किया होगा ये काम.
थोड़ी देर सोना चाहता था पर ब्याह के घर में सब कुछ मिल सकता है बस नींद नहीं. चाची ने कहा की भाभी को बुला ला ऊपर गया तो देखा की भाभी पलंग पर बैठी थी उनकी गोद में लाल जोड़ा था .
मुझे देख कर वो बोली- सोचा था की तेरी दुल्हन को दूंगी ये
मैं- आई तो थी दे देती हमारा भी थोडा मान रह जाता.
भाभी- पर दे नहीं पाई
मैं- आपका मन अब भी नहीं मान रहा क्या
भाभी- मुझे डर लग रहा है कबीर.
मैं- कैसा डर भाभी
भाभी- यही की तुझे खो न दू कहीं.

