#101
भाभी- क्या नहीं दे रही हो चाची
चाची- कुछ , कुछ नहीं ऐसे ही जिद करे हुए है की मैं खाना परोस कर दूंगी तभी खायेगा. अब तू ही बता घर में इतने काम है खुद खा लेगा तो क्या घट जायेगा इसका.
भाभी- देनी तो तुमको ही होगी चाची .
भाभी ने ये कहा तो इस बार मैं सकपका गया .
भाभी- मेरा मतलब रोटी चाची. आप तो जानती है की कितना जिद्दी है ये
चाची- तू ही संभाल अपने देवर को , वर्ना मुझे ऐसे ही तंग करता रहेगा.
चाची हम दोनों को छोड़ कर बाहर चली गयी.
भाभी- बड़े बेशर्म हो गए हो तुम खुले आम मांग रहे हो चाची से
मैं- कैसी बाते कर रही हो भाभी
भाभी- अच्छा जी तुम कर सकते हो हम बोल नहीं सकते.
मैं- कोई और नहीं मिला क्या सुबह से जो मेरी टांग खींच रही हो.
भाभी- चलो छोड़ो, ये बताओ सुबह से किधर गायब थे.
मैं- डायन से मिलने गया था
भाभी- कैसी रही मुलाकात
मैं- जैसी हमेशा होती है
भाभी- खैर, तुम्हारे भैया शाम तक आयेंगे, तब तक यही रहना छोटे मोटे काम देख लेना.
मैंने चंपा को देखा बड़ी प्यारी लग रही थी . उसके हाथो पर मेहँदी रचाई जा रही थी. दरवाजे की टेक लगाये मैं उसे देखता रहा. कुछ ही दिनों में बचपन की साथी हमसे पराई हो जाने वाली थी इक पल के लिए हमारी नजरे मिली और मैं वहां से हट गया.
दिमाग में बस वो चाबी घूम रही थी . मैंने सरला को पास आने का इशारा किया . वो आई.
मैं- इस चाबी के बारे में तू क्या जानती है
सरला ने चाबी को देखा और बोली- कुछ नहीं .
मैं- पक्का
सरला- पक्का.
मैं- आज रात मिलेगी
सरला- इतने लोग है कैसे मुमकिन होगा.
मैं- कोशिश करेगी तो मुमकिन होगा.
सरला- देखूंगी.
कुछ देर के लिए मैं धर्मशाला में चला गया. बारात के रुकने की वयवस्था वहीँ पर होनी थी . सफाई वगैरह करवाई. दरी बिछवाई . हुक्का वगैरह का इंतजाम में शाम हो गयी थी. अँधेरे , मैं वापिस आया था भैया भी आ पहुंचे थे. ठण्ड बहुत ज्यादा थी आज तो मैंने भैया से कहा की दो बूँद दे दो हमको भी . भैया और मैं छत पर बैठ गए.
मैं- कहाँ थे पूरा दिन
भैया- न्योते बाँट रहा था . काफी तो हो गए कुछ रह गए है वो तू देख लेना
मैं- हो जायेंगे वैसे क्या हम रुडा को न्योता देंगे
भैया- तू जानता है न छोटे
मैं- सूरजभान तो दोस्त है आपका
भैया- कुछ चीजे बाहर ही ठीक रहती है उनको घर की दहलीज पर लाना उचित नहीं और फिर पिताजी को मालूम हुआ तो जानता ही है तू
मैं- आपने सब को थाम कर रखा, सबको साथ रखा, अंजू को , सूरजभान को पर क्या मेरा भाई मेरा साथ देगा
भैया- तू जिगर है मेरा तू मांग कर तो देख
मैं- मांग तो लूँगा पर आप दे न पाए तो
भैया ने अपना पेग निचे रखा और बोले- अपने जिगर की फरमाइश पूरी न कर पाया तो क्या फायदा मेरे होने का
मैं- वक्त आने पर मांगूंगा भाई,
भैया- ऐसा क्या चाहिए तुझे जो तू संकोच कर रहा है
दिल किया की बाप की करतूत भाई को बता दू पर खुद को रोक लिया ब्याह की शुभ घडी में तमाशा हो जाता .
मैं- ब्याह करना चाहता हूँ मैं
भैया- हाँ तो कहा तो था न तुझसे , चंपा के ब्याह के बाद तेरा ही नम्बर है . तू बता तो सही मुझे मैं खुद जाऊंगा रिश्ता लेकर.
मैं- बता दूंगा जल्दी ही .
भैया- लड़का बड़ा हो गया है हमारा.
मैंने देखा नंदिनी भाभी सीढियों पर खड़ी हमें ही देख रही थी .
भाभी- हो गया हो तो खाना लगा दू, फिर फुर्सत नहीं होगी मुझे
भैया- कुछ ख़ास भूख नहीं है मुझे तो अपने देवर से पूछ लो
भाभी- इस से क्या पूछना आजकल तो चाची ही देती है इसको
भाभी ने जिस अंदाज से कहा था भैया ने मेरी तरफ देखा
भाभी- मेरा मतलब आजकल इसका खाना-पीना चाची के साथ ही होता है न, वो ही परोसती है इसको
भैया- हां तो ठीक ही है न . परिवार साथ रहे इस से बड़ा सुख और क्या होगा. मैं जरा व्यवस्था देख कर आता हूँ.
मैं- ढोल बजा कर सारे गाँव को बता दो न चाची और मेरी बात
भाभी- जरुरत नहीं अपने आप ही सब जान जायेंगे.
मैं- तब की तब देखेंगे.
कम्बल ओढ़े, आंच तापते हुए मैं नाच-गाना देख रहा था . आँखों के सामने निशा का चेहरा आ रहा था बार बार. मैंने सोचा एक दिन आयेगा जब उसे साथ नाचूँगा मैं. मेरी जिदंगी में जब वो दुल्हन बन कर आएगी तो ये बेरंग जिदंगी रंगों से भर जाएगी.
“क्या सोच रहे हो कबीर ” भाभी ने मेरे पास बैठते हुए कहा
मैं- निशा के बारे में , ऐसी किसी रात में उसका हाथ थाम कर बैठने की ख्वाहिश है मेरी.
तुरंत मुझे ध्यान आया की मैं क्या बोल गया .
मैं- कुछ नहीं भाभी , कुछ नहीं
भाभी- फ़िलहाल उसका नहीं मेरा हाथ थामो और उठो. बड़े दिनों बाद मौका लगा है अपने देवर संग नाचने का. आओ
भाभी ने लगभग मुझे खींच लिया था . सच ही तो था बरसों बाद इस घर में खुशियाँ आई थी , इन खुशियों को ही तो तरसता है इन्सान . मेरी आँख भर आई थी . उन लम्हों में कुछ देर के लिए मैं सब कुछ भूल गया था .
धीरे धीरे सब लोग चले गए था. जो रह गए वो सोने की तयारी करने लगा. जिसे जहाँ जगह मिली पसरा हुआ था . मैंने चाची को चोदने का सोचा पर वो कुछ और औरतो संग सोयी हुई थी . धीरे धीरे बत्तिया बुझने लगी. सर्द रात में मैं अलाव के पास बैठा नींद भरी आँखों से खुद को सोते-जागते महसूस कर रहा था .
“अभी तो रात ठीक से जवान नहीं हुई, अभी तो रात का दीदार नहीं हुआ, हम तो सनम के दर पर आये और हमारे सनम की आंखे डूबी जा रही है ” कानो में ये आवाज आते ही झट से आँखे खुल गयी मेरी. केसरिया आंच के पार हमारी सरकार खड़ी थी. आधी सी रात में , गहरी धुंध की चादर ओढ़े मेरे आँगन में वो खड़ी थी , जिसको थोड़े दिन बाद इसी घर में लाल जोड़ा पहन कर आना था .
“तू कब आई मेरी जाना ” मैंने कहा
निशा- डाकन ने तेरा न्योता स्वीकार कर लिया. अब तूने इतनी शिद्दत से याद जो किया ये कदम रुक ही नहीं पाये.
मैंने उठ कर उसे अपने आगोश में भर लिया. उसके माथे को चूमा . उसका हाथ अपने सीने पर रखा और बोला- देख , महसूस कर इन धडकनों को .
निशा की कमर में हाथ डाल कर और पास किया उसे खुद को .
मैं- ये रात गवाह है मेरी जान , इतना प्यार किया है , बस तुमसे प्यार किया है . तेरा इस घर में कदम रखना बंजर रेत में बरसात होने सा है .
निशा- इतना प्यार मत कर मुझे , मैं डायन हूँ
मैं- मेरी डायन के सीने में एक दिल धडकता है , जिसकी धड़कने बेताब है मुझे प्यार करने को , मुझे चाहने को
निशा-प्यार कर तो बैठी हूँ निभा कैसे पाउंगी
मैं- मोहब्बत अपनी मंजिल खुद ढूंढ लेगी.
“कौन है उधर ” भाभी की आवाज आई . निशा ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मेरे पीछे हो गयी. लालटेन की रौशनी हमारी तरफ आने लगी. मेरा दिल जोरो से धडकने लगा.

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