#80
अपने अन्दर के जानवर को मैंने बहुत रोका था पर परकाश मेरी आँखों में खटक गया था मैंने निर्णय कर लिया था की रात को इसकी ऐसी गांड तोडूंगा की ये याद रखेगा. वापिस आया तो कुवे पर मंगू के साथ भैया भी मोजूद थे. मैंने एक नजर सरला पर डाली और भैया के पास गया .
भैया- मालूम हुआ की तू यहाँ मकान बनाना चाहता है
मैं- जी
भैया- वो घर किसका है फिर , तू वहां नहीं होगा तो फिर वो घर कैसा घर रहेगा
मैं- मेरा ज्यादातर समय यही इन्ही खेतो पर बीता है भैया , इसी जगह से मुझे प्यार है यही बसना है मुझे
भैया- पर वो जगह जिसे तू छोड़ना चाहता है वो घर है हमारा. तेरी जो भी वजह रही हो. तू यहाँ मकान बनाना चाहता है बना पर घर तो वो ही रहेगा.
मैं- आपके मन को समझता हूँ पर मेरी मजबुरिया है
भैया- रिश्तो में मज़बूरी नहीं मजबूती की जरुरत होती है छोटे. अभिमानु अभी इतना कमजोर नहीं हुआ है की उसके जीते जी उसके भाई को कहीं और बसना पड़े.
मैं- क्या कह रहे है आप भैया, मेरे यहाँ रहने से क्या आपका और मेरा रिश्ता कमजोर हो जायेगा कदापि नहीं .
भैया- तो फिर ऐसी क्या वजह है जो तूने इतना बड़ा निर्णय ले लिया.
मैं-कोई नहीं समझता मेरे मन की , मैं राय साहब के नाम के बोझ को नहीं ढोना चाहता भैया. उस घर में मेरा दम घुटता है , अपनी मर्जी से जहाँ जी नहीं सकता वहां रहने का क्या फायदा .
मैंने भैया को सच बता दिया.
भैया- नाखून कभी उंगलियों से अलग नहीं हो सकते छोटे, तुझे क्या लगता है कितना आसान है ऐसे भागना . भागना यदि कोई समाधान होता तो मैं बरसो पहले तेरी राह पर चल पड़ा होता.
मैं- काश आप समझ सकते
भैया- काश तू समझ पाता छोटे.
तभी मैंने भाभी को आते देखा और हमारी बात बंद हो गयी.
“क्या बाते हो रही है ” भाभी ने पूछा
भैया- तुम्हारा देवर घर छोड़ना चाहता है
भाभी- जानती हूँ , जनाब को इश्क हुआ है ब्याह करना चाहते है हमारे देवर जी
भैया ने हम दोनों को देखा और बोले- हाँ तो कोई बड़ी बात नहीं है , इस उम्र में इश्क नहीं करेगा तो कब करेगा , करवा देते है ब्याह, छोटे तू मुझे लड़की के परिवार के बारे में बता मैं अभी जाकर रिश्ते की बात कर आता हूँ और तू चाहेगा जभी कर देगे .
भाभी- बताओ देवर जी अपने भैया को कौन है वो जिसने मेरे देवर पर जादू किया हुआ है , कहाँ की है , किसकी बेटी है
भाभी के व्यंग्य को खूब पहचाना मैंने
मैं- नहीं जानता भैया .
भैया- जानता नहीं और बात इतनी आगे बढ़ गयी .पर कोई बात नहीं तू बता देना उस से पूछ कर .
मैं- जी
भाभी- भाभी पूछना क्या है जी, देवर जी के साथ हम अभी चलते है उसके घर जब देवर जी ने पसंद कर लिया है तो हमें भी पसंद है आज ही रोक देते है उसे.
भैया- हाँ ये भी ठीक कहा.
मैं- उसकी जरुरत नहीं है भैया.
भैया- भई बिना परिवार से मिले कैसे हो पायेगी ब्याह की बात .
मैं- जब समय आएगा तब मैं बता दूंगा आपको
भैया- जैसा तू चाहे मेरे भाई.
भैया खेतो की दूसरी तरफ चले गए जहाँ मंगू ट्रेक्टर चलाना सीख रहा था .
भाभी- बताया क्यों नहीं अपने भाई को उसके बारे में
मैं- बता दूंगा
भाभी- बताओ तो सही मैं भी देखना चाहती हूँ अपने आशिक देवर को .
मैं- मार लो ताने तुम्हे ख़ुशी मिलती है तो
भाभी- मेरी ख़ुशी के भला क्या ही मायने है .
मैंने भाभी की बात पर ध्यान नहीं दिया और ट्रेक्टर की तरफ चल दिया. शाम तक हम सब उसे ही चलाना सीखते रहे. रात को मैं मलिकपुर की तरफ जा ही रहा था की जंगल में ही मुझे परकाश मिल गया.
मैं- बढ़िया हुआ तू यही मिल गया
प्रकाश- तेरी ही राह देख रहा था मैं .
मैं- तो देर किस बात की
प्रकाश- तेरी जिद है तो ये भी सही.
अगले ही पल हम गुत्थम गुत्था हो गये. उसके वार को मैंने सर झुका कर बचाया और उसकी कमर में हाथ डाल कर उसे पटकने की कोशिश की पर बन्दे की पकड़ मजबूत थी . उसने मेरे पैर में अडंगी लगाई मैंने फिर से उसका पैर पकड़ा और हवा में उछाल दिया पर वो भी खिलाडी था .
“ये बचकानी हरकते कबीर , कच्चे हो तुम ” उसने मेरा उपहास उड़ाया
मैं- तेरा नाश टल सकता है वकील मुझे बस वो चौथा हिस्सा दे दे.
वकील- तेरी औकात नहीं है उसे पाने की उसे समझने की .
मैंने उसकी बाहं पकड़ी और उसे एक पेड़ के तने पर दे मारा . पर उसकी फुर्ती बेमिसाल थी . उसने लकड़ी का एक टुकड़ा उठा कर मेरी पीठ पर दे मारा. कांटो से मेरी शर्ट उधड गयी .
“सिर्फ एक बार और कहूँगा बता दे मुझे उस चौथे हिस्से के बारे में ” मैंने कहा
वकील- दम है तो पूछ कर दिखा.
मैं मामले को लम्बा नहीं खींचना चाहता था . क्योंकि मैं चाहता नहीं था ये सब करना पर ये चूतिये का बच्चा मुझे मजबूर कर रहा था . मैंने उसके घुटने पर लात मारी उसके गिरते ही मैंने उसे धर लिया. उसका मुह खून सन चूका था मेरे लगातार पड़ते मुक्को की वजह से . तभी उसने पलटी और अब पाला उसकी तरफ था.
मैंने उसे अपने ऊपर से फेंका और जो लकड़ी उसने मेरी पीठ पर मारी थी वो उठा ली. बिना सोचे समझे मैंने उसकी रेल बनानी शुरू की . पर वो साला घाघ था इस खेल को समझता था . जैसे ही मैं उस पर हावी होता वो मेरे ख्याल तोड़ देता. ताजे खून की महक मुझ पर नशा सा करने लगी थी . एक उन्माद सा चढ़ रहा था मुझ पर. यही वो पल था जहाँ मुझे रुकना था क्योंकि यहाँ से आगे बढ़ता तो फिर मेरे हाथो से कुछ ऐसा हो जाना था जो मैं नहीं करना चाहता था .
मैंने उसे पटका और पीठ मोड़ कर चल दिया . पर उस बहन के लोडे को भी चुल मची थी .
“क्या हुआ बच्चे , इतने में ही हार मान ली . जब गांड में दम न हो तो पंचायत में नेता नहीं बनना चाहिए ” उसने पीछे से कहा.
मैं- साले बक्श रहा हूँ तुझे , मैं नहीं चाहता की तेरी मौत हो मेरी वजह से
वकील- तू क्या मारेगा मुझे, तेरी औकात ही क्या है . मर्द वो होते है जो सामना करते है तू तो साले पीठ दिखा गया .
मैं- मुझे वो कागज चाहिए . एक कागज के टुकड़े के लिए क्यों मरता है तू
वकील-तुझे क्या लगा था तू मेरे घर जायेगा उस रंडी के साथ मुझे खबर नहीं होगी.
मैं- गया था फिर जाना पड़ा तो फिर जाऊंगा
मैने गुस्से से वकील के पेट में लात मारी. एक मुक्का और दिया साले को .
“रुक जाओ दोनों , ये क्या तरीका है ” इस आवाज को सुनते ही मेरे होश उड़ गए. मेरा बाप सामने से आ रहा था .
राय साहब- जानवरों की तरह लड़ रहे हो शर्म लिहाज है की नहीं .
मैं- इसकी ही इच्छा थी की मरम्मत करू मैं इसकी
पिताजी- लानत है हमारी औलाद ये घटिया हरकते कर रही है .
प्रकाश- ये वसीयत के चौथे हिस्से को देखना चाहता है
पिताजी- तो दिखा देते इसे. एक कागज के टुकड़े के लिए खून बहाया जा रहा है क्या ही कहे तुम दोनों से . प्रकाश तुम घर जाओ और मरहम पट्टी करो और तुम हमारे साथ आओ अभी .
“हम अभी जिन्दा है , हमारे नौकरों पर जोर चलाने की जगह तुम्हे हमारे पास आना चाहिए था, तुमको चौथा हिस्सा देखना है न आओ हमारे साथ हम तुम्हारी इच्छा पूरी करते है ” पिताजी ने मुझे कार में बिठाया और मैं उनके साथ चलते हुए एक ऐसी जगह पर आ पहुंचा जो मेरे ख्यालो से भी परे थी.

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