#68
मैं- क्या भैया किसी लड़की से प्रेम करते थे .
चाची- जहाँ तक मैं अभिमानु को जानती हूँ नहीं , छोटी उम्र से ही वो व्यापार संभाल रहा है. उसे किताबो का शौक रहा है . सबसे आदर से बोलना सबका ख्याल रखना परिवार को हमेशा से पहली प्राथमिकता रखना बस यही जिन्दगी है उसकी.
मैं- जहाँ तक मुझे याद है मैंने भैया को कभी पढ़ते नहीं देखा
चाची- तूने उसे देखा ही कहाँ है
बात तो सही थी चाची की मोजुदा हालातो को देखतेहुए मैं समझ सकता था इस बात की गहराई को .
मैं- कितनी बार भैया के कमरे में गया हूँ मैंने वहां भी किताबो का ढेर नहीं देखा.
चाची- क्योंकि तू उस अभिमानु को जानता है जिसे तू आज देखता है . मैं उस अभिमानु की बात कर रही हूँ जिसे मैंने कल देखा था .
मैं- उसी अभिमानु को जानना चाहता हूँ मैं
चाची- उसने किसी से प्यार किया होगा ये मैं नहीं जानती पर अब इन बातो का कोई मतलब नहीं है कबीर, हमेशा ये याद रखना अब उसकी ग्रहस्थी ही उसका सबकुछ हो. मैं जानती हूँ आजकल तू किसी खुराफात में है पर इतना याद रहे तेरी वजह से किसी का घर न उजड़े.
मैं- और जो तेरा घर उजड़ा पड़ा है उसका क्या . चाचा के बिना तू कैसे जी रही है कोई नहीं समझता सिवाय तेरे खुद के. आदमी मर जाये तो औरत समझ जाती है , जीवन से समझौता कर लेती है पर चाचा ऐसे गया की लौटा नहीं . आज तक तू नहीं जानती वो कहाँ है जिन्दा है भी या नहीं . तेरी गृहस्थी का क्या . इसका कोई जवाब क्यों नहीं मिलता.
चाची ने एक गहरी साँस ली और बोली- तू समझता है न मेरा दुःख तो तू ले आ उसकी कोई खबर . राय साहब और अभिमानु ने दिन रात एक कर दिया था तेरे चाचा की तलाश में पर किस्मत में लिखे को नहीं टाल पाए. मेरे नसीब में जुदाई लिखी है तो ये ही सही .
मैं- कोरी बाते है ये .राय साहब की मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिल सकता इस इलाके में और पिछले कुछ सालो से उनका भाई गायब है . क्या तुझे कभी हैरानी नहीं हुई इस बात की. मान ले कोई दुश्मन ने कुछ उल्टा-सीधा कर दिया चाचा के साथ तो भी क्या मेरे बाप को मालूम नहीं हुआ होगा. सोच कर देख, लाली और उसके प्रेमी को तलाशने में कितना ही वक्त लगा था फिर चाचा को क्यों नहीं तलाश कर पाया वो इन्सान.
चाची- तू मुझे जेठ जी के खिलाफ भड़का रहा है
मैं- मैं तुझे आइना दिखा रहा हूँ. इस घर की खामोश दीवारे चीखना चाहती है तू मेरी मदद कर जरा
चाची-रसोई की बगल में जो पेंटिंग लगी है उसके पीछे दरवाजा है . उस कमरे में देख ले तुझे कुछ मिले तो .
मैं- इस घर में ऐसा भी कोई कमरा है मुझे आज तक नहीं पता .
चाची- अभिमानु का कमरा था वो किसी ज़माने में .
मैंने चाची के होंठो को चूम लिया और लालटेन लेकर उस तरफ चल दिया. हमेशा की तरह दरवाजा खुला पड़ा था . सारा घर सन्नाटे में डूबा था . मैंने उस बड़ी सी पेंटिंग को हटाया . दरवाजा मेरे सामने था . कोई ताला नहीं लगा था सिवाय एक कुण्डी के जो जंग खाई थी . देखने से ही मालूम होता था की बरसों से इसे छुआ नहीं गया. चुर्र्रर्र्र की आवाज करते हुए दरवाजा खुला और मैं अन्दर गया. कमरे की हालत ठीक नहीं थी . चारो तरफ जाले लगे थे . सीलन थी मैंने मुह पर कपडा बाँधा और थोड़े जाले हटाये. सामने एक बड़ी सी मेज थी . कुछ कुर्सिया थी .
लालटेन की लौ थोड़ी और ऊंची की . कमरे में शेल्फ ही शेल्फ थी जिनमे किताबे सलीके से लगाई गयी थी. मैंने धुल साफ़ की . तरह तरह की किताबे थी.टेबल पर कोरे कागज पड़े थे.
“अभिमानु ठाकुर , क्या छिपाया है तुमने अपने अतीत में ” मैंने कहा .
कोने में एक अलमारी थी मैंने उसे खोला , जिसमे कुछ कागज रखे थे. मैंने उन्हें देखा , वो कागज नहीं थे वो खत थे.
“हो सकता है के बहार आये पर सरसों पीली न हो .
हो सकता है की बारिश आये पर धरती गीली न हो
पर ये नहीं हो सकता मेरी जान की तेरी याद आये और ये आँखे गीली न हो ” मन ही मन मैंने शायरी की दाद दी.
कागज पर धुल थी वक्त की मार ने उसे पुराना कर दिया था पर उस पर लिखे शब्द आज भी उतने ही कारगर थे जितना किसी ज़माने में रहे होंगे. कुछ और पन्ने थे जिन पर बस शायरिया ही लिखी थी . किस तरह के खत थे ये जिनमे केवल शायरियो के माध्यम से ही बाते हो रही थी. मेरा भाई गजब था ये मैंने उस रात जाना था.
तमाम बाते ये तो पुख्ता कर रही थी की भैया की जिदंगी में कोई लड़की थी , पर क्या वो रुडा की बेटी थी अब ये मालूम करने की बात थी. लड़की थी तो कोई तस्वीर भी रही होगी उसकी जरुर. मैंने सब कुछ देख मारा हर एक किताब का पन्ना पलटा की कही उनमे तो कुछ नहीं छिपाया गया. पर हाथ कुछ नहीं लगा. सुबह होने में थोड़ी ही देर थी और भाभी जल्दी जाग जाती थी मैंने कमरे से निकलने का सोचा दरवाजे के पास पहुंचा ही था की जालो में कैद मुझे कुछ दिखा इस हिस्से पर . मैंने कपडे से उसे साफ़ किया देखा की ये एक तस्वीर थी . ….
खेतो पर पहुंचा तो पाया की हरिया कोचवान की बीवी सरला पहले ही वहां आ चुकी थी . मैंने मंगू से कहा की अब से ये हमारे साथ ही काम करेगी उसे काम समझा दे और हर शाम उसे बिना किसी देरी के मजदूरी का भुगतान करे. कुवे की मुंडेर पर बैठे बैठे मैं बस उस तस्वीर के बारे में ही सोचता रहा . आखिर क्या खास बात थी उस तस्वीर में जो उसे दिवार पर जगह दी गयी थी .
चूँकि आज घर से खाना आया नहीं तो मैंने मंगू को घर भेज दिया खाना लाने के लिए और सरला को अपने पास बुलाया .
मैं- भाभी , मैं तुमसे दो चार बात पूछ सकता हूँ क्या
सरला- जी कुंवर जी
मैं- तुम गाँव में सबको जानती होगी
उसने हाँ में सर हिलाया
मैं- क्या तुम किसी रमा को जानती हो जो कुछ साल पहले अपने गाँव में रहती थी .
सरला- जानती हूँ
मैं- वो गाँव क्यों छोड़ गयी
सरला- उसके पति की मौत हो गयी थी .कोई सहारा नहीं था एक दिन मालूम हुआ की वो गाँव छोड़ गयी.
मैं- खेती करके वो अपना पेट पाल सकती थी फिर ऐसा क्या हुआ जो उसे गाँव छोड़ना पड़ा.
सरला- मैं नहीं जानती कुवर.
मैं- क्या मैं तुम पर पूर्ण विश्वास कर सकता हूँ
सरला- तुमने ऐसे समय पर मुझे और मेरे परिवार को थामा है जब हम टूट चुके थे. तुम्हारा अहसान है मुझ पर मैं हमेशा वैसा ही करुँगी जो तुम कहोगे.
मैं- बढ़िया .
हम बात कर ही रहे थे की तभी मैंने मंगू और भाभी को आते देखा . मंगू के जल्दी आने का मतलब ये ही था की भाभी उसे रस्ते में मिल गए. भाभी ने एक नजर सरला पर डाली और बोली- ये यहाँ क्या कर रही है
मैंने भाभी को बताया की इसे काम पर रखा है .
भाभी ने हम सबको खाना परोसा . खाने के बाद मैंने भाभी से साथ आने को कहा और हम टहलने चल दिए.
भाभी- क्या बात है
मैं- क्या आपके और भैया के बीच सब ठीक चल रहा है
भाभी चलते चलते रुक गयी और बोली- तुम्हे क्या लगता है
मैं- आप बताओ न
भाभी- सब ठीक है
मैं- क्या वो आपसे प्रेम करते है
भाभी- बेशुमार मोहब्बत , इतनी की कोई सोच न सके.
मैं- क्या आप जानती है की भैया ब्याह से पहले किसी लड़की के प्यार करते थे .
भाभी- जानती हूँ . बिलकुल जानती हूँ
मैं- ये जानते हुए भी आपको कोई शिकायत नहीं
भाभी- मुझे भला क्यों शिकायत होगी. अभिमानु जैसे पति किस्मत वाली को ही मिलते है .
मैं- हो सकता है की वो आज भी उसी को चाहते हो .
भाभी- वो आज भी उसी को चाहते है देवर जी.
भाभी की आंखो की चमक ने मेरे विश्वास को कमजोर कर दिया. क्या औरत है ये अपने पति की बुराई को भी हंस कर स्वीकार कर रही है .
मैं- फिर भी तुम उनके साथ हो क्यों……………

