#66
मैंने देखा वकील परकाश एक गाँव वाले के साथ उलझा हुआ था. उसका गिरेबान पकड़ा हुआ था .
रमा- रोज का तमाशा है ये इधर कोई न कोई किसी न किसी से उलझा रहता है
पर मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा था .
मैं- रसूखदार लोगो को शोभा नहीं देता ऐसे राह चलते हुए ये ओछी हरकते करते हुए .
प्रकाश ने मुझे देखा और बोला- कुंवर साहब आप यहाँ
मैं- हमें तो आना ही था , यहाँ के नशे की बड़ी तारीफ सुनी थी .
प्रकाश ने एक नजर रमा पर डाली और बोला- नशा तो मशहूर है यहाँ का
मैंने रमा से हमारे लिए दारू लाने को कहा और हम थोडा दूर बैठ गए.
मैं- और वकील साहब वसीयत का काम कहाँ तक पहुंचा
वकील – बड़ी जल्दी है आपको हिस्सा लेने की
मैं- हमारे दो ही शौक है जमीने और जिस्म . जितने मिले उतने थोड़े
वकील-ये बात तो है , वैसे पसंद उम्दा है आपकी
वकील ने रमा को देखते हुए कहा
मैं- हमें आपकी हसरतो का भान भी है वकील साहब , आपकी ये इच्छा हम पूरी कर सकते है पर वो कहते हैं न हर चीज की एक कीमत होती है
वकील- और वो कीमत क्या है
मैं- बहुत छोटी कीमत. बस आपको बताना होगा की वसीयत के चौथे कागज में क्या लिखा है .
मेरी बात सुनकर वकील का नशा एक पल में ही उड़ गया वो आँखे फाड़े मुझे देखने लगा.
मैं- मेरे लिए काम करो मुह्मांगे पैसे और नए जिस्म जब तुम चाहो
वकील- कुंवर साहब, वसीयत के सिर्फ तीन हिस्से है आप जितना जल्दी इस बात को समझ ले बेहतर होगा.
मैं- देखो परकाश, जीवन जो हैं न बड़ा अनिश्चित है न जाने कब क्या हो जाये आज हम यहाँ बैठे है कल हम हो न हो. तो क्या ही फायदा इन सब चीजो का तुम हमारे पारिवारिक वकील हो तुम्हारा फर्ज है हमें हर वो जानकारी देना जिसकी हमें जरूरत है .
वकील- आप मुझे धमका रहे है
मैं- तुम्हे ऐसा लगता है तो ये ही सही पर जो जानकारी हमें चाहिए वो हम लेकर रहेंगे चाहे उसके लिए हमें तुम्हारी खाल ही क्यों न उधेद्नी पड़े.
मैंने अपना गिलास होंठो से लगाया.
वकील- ये बात राय साहब को मालूम होगी तो आप मुशकिल में आ जायेंगे
मैं- ये बात राय साहब को मालूम हुई तो तुम मुश्किल में आ जाओगे. आखिर ऐसी क्या वजह थी जो वसीयत के कागज लेकर तुम जंगल में गए थे राय साहब से मिलने.
प्रकाश के माथे पर पसीना उभर आया. उसने एक ही साँस में अपना गिलास खाली कर दिया और बोला- मेरा यकीन कीजिये
मैं- यकीन है बस तुम बता दो की उस चौथे टुकड़े में क्या लिखा था .
वकील- ऐसा कोई कागज नहीं था .
प्रकाश उठ खड़ा हुआ और जाने लगा.
“सुना है की रुडा की बेटी पर नजर है तुम्हारी ” मैंने थोडा जोर से कहा .
प्रकाश के कदम रुक गए वो एक पल पीछे मुड़ा और फिर तेज कदमो से वहां से नो दो ग्यारह हो गया. जितना मैंने समझा था उस से ज्यादा घाघ था ये . अगले दिन मैं जब मैं घर पहुंचा तो देखा की चंपा रसोई में थी . मैंने उसे छत पर आने को कहा . थोड़ी देर में वो मेरे सामने थी .
मैं- कहाँ ले गए थे तुझे राय साहब
चंपा- कहीं नहीं
मैं- बता भी दे वैसे भी अब छिपाने को कुछ नहीं है
चंपा- क्या सुनना चाहता है तू
मैं- जो तू छिपा रही है .
चंपा- मैंने तुझसे कुछ नहीं छिपाया
मैं- झूठी है तूने झूठ बोला की मंगू ने पेला तुझे जबकि तू किसी और के साथ सो रही है .
चंपा-मैंने पहले भी कहा था तुझे अब भी कहती हूँ मंगू करता है मेरे साथ
मैं- क्या वो बच्चा मंगू का था
चंपा- क्या फर्क पड़ता है अब
मैं- फर्क पड़ता है क्योंकि मेरी दोस्त मेरे बाप का बिस्तर गर्म कर रही है . मुझे दुःख होता है इस बात का
चंपा – देख कबीर तुझे जो सोचना है सोच, जो मानना है मान पर मैं नहीं चाहती की मेरी वजह से बाप-बेटो में तकरार हो .
मैं- सिर्फ इतना जानना है की कौन सी मज़बूरी में तू ये सब कर रही है
चंपा- कोई मज़बूरी नहीं है
मैं- कल तुझे चोदने ले गया था न मेरा बाप
चंपा- कल की क्या बात अब कल तो बीत गया आने वाला कल देख अब
मैं- दिल तो करता है तेरी ऐसी हालत कर दू की तो सौ बार सोचे. अरे तुझे क्या समझा था मैंने और तू इतना गिर गयी
चंपा- मैं अकेली नहीं हूँ जो गिरी हुई है ये दुनिया ही मादरचोद है कबीर.
मैं- ऐसी कैसी आग लगी थी तुझे जो दो दो लोग भी ठंडी नहीं कर पाए तुझे .
चंपा- तुझे जो कहना है कह ले.
मैं- तुझसे तो मैं क्या ही कहूँ , पर एक दिन आएगा जब राय साहब को उसी चौपाल पर नंगा करूँगा जहा न्याय की कसमे खाई जाती है .
निचे से भाभी ने चंपा को आवाज दी तो वो चली गयी . छत से गाँव के नज़ारे को देखते हुए मैं सोचने लगा कोई तो मजबूत सिरा मिले मुझे. दिल किया की राय साहब के कमरे की फिर से तलाशी ली जाये पर मेरा बाप ये मौका फिर नहीं देगा मुझे मैं जानता था .
मैंने भैया की गाड़ी आते देखा तो मैं निचे चला गया .
“कैसा है छोटे ” उतरते ही भैया ने पूछा मुझसे
मैं- नाराज हूँ
ये सुनकर भैया के कदम ठिठक गए .
भैया- फिर कभी ऐसा मत कहना मेरे भाई, तू नाराज होगा तो मेरा क्या होगा.
मैं- मेरे बारे में सोचते ही नहीं आप
भैया- तेरे बारे में नहीं सोचता मैं जानता है तू क्या कह रहा है
मैं- मेरे बारे में सोचते तो मेरे दुश्मन को सहारा नहीं दे रहे होते आप जिस दिन आपसे दूर चला जाऊंगा न उस दिन याद बहुत आएगी मेरी.
मेरी बात सुनकर भैया ने मुझे अपने सीने से लगा लिया. उनकी आँखों में आंसू भर आये- दुबारा तेरी जुबान पर ये शब्द नहीं आने चाहिए . तूने सोच भी कैसे लिया की तू मुझसे दूर चला जायेगा. तू मेरी दुनिया है छोटे
मैं- तो फिर मेरा भाई क्यों मेरे दुश्मन के साथ है
भैया- तू मेरा जिगर है छोटे और वो मेरा फर्ज……………………

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