तेरे प्यार मे… – Update 60 | FrankanstienTheKount

तेरे प्यार मे …. – Adultery Story by FrankanstienTheKount
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#60

कम्बल ओढ़े मैं कुर्सी पर बैठा सोच रहा था तमाम संभावनाओ के बारे में की चाची भी मेरे पास आकर बैठ गयी चाची ने कुछ मूंगफलिया दी मुझे और बोली- देख रही हूँ पिछले कुछ दिनों से चिंता सी है तेरे चेहरे पर क्या बात है

मैं- कुछ खास नहीं बस ऐसे ही

चाची- फिर भी तू बता सकता है मुझे.

मैं-पिताजी के कमरे की सफाई कौन करता है

चाची- कोई नहीं . क्या तुझे नहीं मालूम जेठ जी की इजाजत के बिना कोई नहीं आता जाता वहां पर.

मैं- आज बड़ी प्यारी लग रही हूँ

चाची- समझ रही हूँ तेरी इन बातो को पर तेरा काम अब कुछ दिन हो नहीं पायेगा, मासिक आया है मुझे.

मैं मुस्कुरा दिया और उठ गया वहां से

चाची- कहाँ चला

मैं- थोड़ी देर सोना चाहता हूँ मैं.

मैंने रजाई ओढ़ी और आँखे बंद कर ली. शाम को मैं चंपा के घर गया . वो सिलबट्टे पर मसाले पीस रही थी . मैंने भरपूर नजर डाली उस पर बाप से चुदाई करवा के गदरा तो गयी थी वो.

चंपा- तू बैठ मैं बस अभी आती हु

मैं- कोई नहीं .

मैंने छप्पर के बाहर चारपाई लगाई और बैठ गया.

मैं- घरवाले कहाँ गए.

चंपा- बापू खेत पर और माँ पड़ोस में आती ही होगी .

मैं- तुझसे कुछ कहना था

चंपा- हाँ

मैं- तू कैसी चुडिया पहनती है

चंपा- मै क्यों चूड़ी पहनने लगी. अभी मेरा ब्याह कहाँ हुआ

मेरे ध्यान में ये बात क्यों नहीं आई थी . मतलब वो जो भी थी शादीशुदा ही रही होगी.

चंपा- क्यों पूछ रहा है तू चूडियो के बारे में

मैं- छोड़ ये बता राय साहब मिले क्या तुझसे आज

चंपा- नहीं पर क्या बात है

मैं- कुछ नहीं वो कह रहे थे की तुझसे मिलना है उनको

चंपा ने मेरी तरफ देखा और बोली- माँ आ जाती है फिर चलती हूँ मैं

तभी चंपा के पिता घर आ गए. मैंने देखा उनके चेहरे पर थोड़ी हताशा थी . चंपा ने पानी पकडाया अपने पिता को वो मेरे पास बैठ गए.

मैं- क्या बात है काका कुछ परेशां हो .

काका- नहीं कुंवर कोई परेशानी नहीं

मैंने काका का हाथ पकड़ा और बोला- अपने बेटे से छिपाने लगे हो काका कोई तो गंभीर बात जरुर है .

काका- बेटा आज चंपा के ब्याह की तिथि पक्की हो गयी है . और इस बार की ही फसल खराब हो गयी है . वैसे इतना जुगाड़ तो है मेरे पास की बारात की रोटी-पानी हो जायेगा पर शेखर बाबु का परिवार संपन है . दान-दहेज़ की फ़िक्र है उनकी हसियत जैसा ब्याह नहीं किया तो समाज में बेइज्जती होगी.

मैं- काका इस बात की क्या चिंता आपको . बहन-बेटिया कभी माँ बाप पर बोझ नहीं होती चंपा के भाग्य में जो है वो लेकर जाएगी ये. आप जरा भी फ़िक्र मत करो मैं हूँ न.

काका- बेटा राय साहब के बड़े अहसान रहे है हम पर . चंपा के लिए इतना योग्य वर तलाशा उन्होंने हम तो अपनी चमड़ी की जुतिया भी राय साहब के लिए बना दे तो भी उनका अहसान इस जन्म में नहीं उतार पाएंगे.

मैं- कैसी बाते कर रहे है आप काका. मेरा बचपन इस घर में गुजरा है आपके दो बेटे है मैं और मंगू चंपा के ब्याह की आपको कोई चिंता नहीं करनी है . मैं और मंगू जितनी भी कमाई करते है उसका एक हिस्सा हम बचपन से इसी दिन के लिए ही जमा करते आये है . आप निश्चिन्त रहो .

काका ने मुझे अपने सीने से लगा लिया और मेरे सर को पुचकारने लगे. उस दिन मैंने जाना था की बाप होना दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता है . मेरी नजर चंपा पर पड़ी जो दहलीज पर खड़ी भीगी आँखों से हमें ही देख रही थी . कुछ देर बाद मैं चंपा के घर से निकला और गली में आ गया.

“कबीर रुक जरा ”चंपा ने पीछे से आवाज दी तो मैं रुक गया . वो दौड़ते हुए आई और मेरे आगोश में समां गयी.

मैं- अरे क्या कर रही है , कोई देखेगा तो क्या सोचेगा

चंपा- परवाह नहीं मुझे . लगने दे मुझे सीने से तेरे

मैं- पागल मत बन

चंपा ने मेरे माथे को हौले से चूमा और वापिस चली गयी. मैं सोचने लगा इसके मन में क्या आया. मैं वापिस हुआ ही था की मेरी नजर वैध जी के घर के खुले दरवाजे पर पड़ी. मैं उधर हो लिया . देखा की वैध जी अन्दर बैठे दवाइया कूट रहे थे.

मैं- कैसे है वैध जी.

वैध- ठीक हूँ कुंवर . कैसे आना हुआ

मैं- इधर से गुजर रहा था सोचा मिलता चलू

मैंने गौर किया कविता की मौत के बाद घर पर इतना ध्यान दिया नहीं गया था और देता भी कौन .

मैं- वैध जी भाभी के जाने के बाद आप अकेले रह गए . आपको किसी प्रकार की समस्या हो तो मुझे बताना .

वैध- नहीं कुंवर सब ठीक है . मुझे बूढ़े की भला क्या जरूरते हो सकती है दो रोटियों के सिवाय उसकी भी अब चिंता नहीं मंगू रोज सुबह शाम खाना दे जाता है .

जिन्दगी में पहली बार मुझे मंगू पर गर्व हुआ .

मैं- आप शहर क्यों नहीं चले जाते या फिर रोहतास को यहाँ बुला लो ऐसी भी क्या कमाई करनी जिसमे परिवार संग ही न रह पाए.

वैध- रोहतास की तो बहुत इच्छा है वो हमें ले जाना चाहता था पर मुझे शहर की आबो हवा रास नहीं मेरी वजह से ही कविता बहु को यहाँ रहना पड़ा पर आज सोचता हूँ तो की काश हम शहर चले गए होते तो वो जिन्दा होती.

मैं- जाने वाले चले जातेहै पीछे यादे रह जाती है पर इतनी रात को भाभी जंगल में करने क्या गयी थी

वैध- इसी यक्ष प्रश्न ने मेरा जीना हराम किया हुआ है. मैं हैरान हु सोच सोच कर बेटा

मैं- वैध जी आप को जरा भी परेशां नहीं होना. आप अकेले नहीं है रोहतास शहर में है पर यहाँ भी आपका परिवार है हम लोग है आपके साथ .

वैध की बूढी आँखों में पानी आ गया. थोड़ी देर बाद मैं वहां से उठ कर कुवे की तरफ चल दिया. सवाल अब भी मेरे मन में था की जंगल में कविता क्या कर रही थी उस रात. ? कविता की मौत अगर जंगल में हुई तो उसकी मौत की वजह भी जंगल में ही होगी मैंने इस बात पर गौर किया और संभावनाओ पर विचार करते हुए मैं कुवे पर पहुँच गया. इस जंगल में कुछ तो ऐसा था जो छिपा हुआ था या जिसे छुपाया गया था .

मंगू से मिलने आई होगी कविता ये विचार ही निरर्थक था क्योंकि मंगू से मिलने के लिए उसके घर से जायदा सुरक्षित कुछ नहीं था . जब घर में चुदाई हो सकती थी तो बाहर खुले में रिस्क क्यों लेगी वो . दूसरा महत्वपूर्ण सवाल ये था की क्या कविता के मंगू के अलावा किसी और से भी सम्बन्ध हो सकते थे . इस शक का ठोस कारण था मेरे पास क्योंकि उस रात पहली हरकत में ही कविता ने लगभग मेरा लंड चूस ही लिया था .

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