#41
मैं- ये धागा तो मैंने ऐसे ही बाँध लिया था . दुकान से लिया था
मेरा ऐसा कहते ही भाभी ने खींच कर एक तमाचा मारा मुझे
चाची- बहुरानी ये क्या कर रही हो तुम
भाभी- चाची, मैं करू तो क्या करू आपके सामने भी ये झूठ पे झूठ बोले जा रहा है . मुझे तो शर्म आ रही है की मेरी परवरिश इतनी नालायक कैसे हो गयी .
चाची- कबीर , सच बता ये धागा तुझे किसने दिया
मैं- मामूली से धागे के पीछे पड़ गए हो आप लोग आखिर क्या फर्क पड़ता है इस धागे से
चाची- फर्क पड़ता है
मैं- तो तुम ही बताओ क्या है ऐसा इस धागे में
भाभी- ये डाकन का धागा है . इसे मनहूसियत माना जाता है
भाभी के चेहरे को देख कर ऐसा लग रहा था की बस रो ही पड़ेगी .
भाभी- सच सच बता तुझे कैसे मिला ये
मैं- कहा न दूकान से ख़रीदा था शहर गया जब . हो सकता है की ये कुछ मिलता जुलता धागा हो
भाभी- मेरी आँखे धोखा खा सकती है , चाची की आँखे धोखा खा सकती पर क्या पुजारी भी झूठा है
मैं- मुझे नहीं मालूम
भाभी- तू समझ नहीं रहा नादान . अब तो मुझे और यकीन हो गया है की वो सारे पाप तू उसके वश में होकर ही कर रहा है
मैं- तिल का ताड़ मत बनाओ भाभी . ऐसा वैसा जो भी तुम सोच रही हो कुछ भी नहीं है .
चाची- बहुरानी हमें घर चल कर बात करनी चाहिए.
घर आकर भी भाभी का रोना-धोना चालू ही रहा . दिल तो किया की भाभी का मन रखने के लिए इस धागे को उतार कर फेंक दू पर निशा ने इतने मान से ये धागा दिया था इसे उतार देता तो उसकी तोहीन होती अब करे भी तो क्या करे. जब कुछ नहीं सूझा तो मैंने रजाई ओढ़ी और सो गया . न जाने कितनी देर तक भाभी का रुदन चला होगा.
दोपहर को ही उठा फिर मैं . खाना खाके डॉक्टर की दवाई ली . घर से बाहर निकला ही था की मंगू मिल गया वो जाल और काँटा लिए जा रहा था .
मैं- अरे कहाँ
मंगू- बड़े भैया ने कहा की आज शाम के लिए मछली पकड़ लाऊ
मैं- चल मैं भी चलता हूँ .
हम दोनों गाँव के जोहड़ पर आ गए .
मंगू ने जाल फेंका और हम बाते करने लगे.
मंगू- कन्धा कब तक ठीक होगा
मैं- थोडा समय लगेगा तब तक तू थोडा खेतो का काम देख लेगा न
मंगू- ये भी कोई कहने की बात है .
मैं- मंगू यार मैं क्या सोचता हूँ अपनी उम्र के लड़के साले किसी न किसी को पटाये तो होंगे ही .वो लाली भी आशिक पाले हुई थी . अपनी जिन्दगी में कोई ऐसी आएगी या फिर घरवाले जब ब्याह करेंगे तभी कुछ हो पायेगा.
मंगू- गाँव में दो तीन चालू औरते तो है जिनके बारे में कहा जाता है की वो आशिकी करती है पर जब से लाली वाला काण्ड हुआ है न तब से इस मामले में ख़ामोशी सी ही है .
मैं- तुझे नहीं लगता की हमें भी कोई दे दे तो हम भी थोडा मजा कर ले.
मंगू- भाई तुझे तो फिर भी कोई न कोई दे ही देगी मैं तो किसान हूँ मेरी तरफ कौन देखेगी .
मैं- भोसड़ी में मैं भी तेरे साथ ही खेती करता हूँ न .
मंगू- पर तू राय साहब का बेटा है
मैं- तो राय साहब के नाम से कोई भी चुद जाएगी मुझसे
मंगू- ऐसा नहीं है पर तू कोशिश करेगा तो कोई न कोई फंस ही जाएगी.
मैं मंगू को बातो में लगा कर उस से कुछ उगलवाना चाहता था पर वो सहज था मेरे साथ . मुझे चाची की बात याद आ रही थी .
मैं- मंगू तू किसी ऐसी को मिले जो देने को तैयार हो तो मुझे मिलवा देना
मंगू- अरे ये भी कोई कहने की बात है भाई .
बात करते करते मंगू ने जाल में मोटी मछलिया फंसा ली और हम वापिस आ गए. मेरे मन में एक ही सवाल था की क्या उस रात कविता मंगू से मिलने तो नहीं गयी थी जंगल में . पर इतना दूर जाने की क्या जरुरत थी मंगू कविता के घर में घुस जाता वैध को तो कुछ मालूम वैसे भी नहीं होना था . इस सवाल ने मुझे परेशान कर दिया.
तमाम सवालो के बीच एक राहत थी की पिछले कुछ दिनों से मामला शांत था कोई नया हमला नहीं हुआ था हालाँकि भाभी ऐसा मानती थी की निगरानी की वजह से मैं कुछ कर नहीं पा रहा हूँ. रात को एक बार फिर मैं चाची के साथ अकेला था बिस्तर पर . चाची मुझ पर झुकी हुई मेरे होंठ चूस रही थी और मेरे नंगे लंड को हाथ में लेकर मसल रही थी .
मैं- आराम से कंधे में दर्द न हो जाये
चाची- थोडा दर्द सहना सीख
मैं- ज़ख्म ताजा है न इसलिए
चाची -कोई बात नहीं जब तू पूरी तरह ठीक हो जायेगा तब ही करेंगे
मैं- और अभी जो ये खड़ा होकर झूल रहा है इसका क्या .
चाची- मैं क्या जानू इसके बारे में
मैं- और जो तुम्हारी जांघो के बिच छुपी है उसके बारे में तो जानती हो न
चाची- अश्लील बहुत हो गया है तू
मैं- मजा आता है न गन्दी बाते करने में
मैं दिलो जान से चाची की लेना चाहता था पर ये साला हाथ उपर हो नही पाता था पट्टियों की वजह से अजीब ही समस्या थी . चाची लिपट कर मुझसे सो गयी . सर्दी में गर्म औरत पास हो तो चुदाई न भी हो तब भी मजा आता ही है .
न जाने कितनी रात बीती थी दरवाजे पर ही अजीब दस्तक से मेरी आँख खुल गयी . इतनी रात को कौन होगा सोचते हुए मैंने दरवाजा खोला तो देखा की चबूतरे पर सियार बैठा था . मुझे देखते ही वो लपक कर आया और मेरे सीने पर अपने पंजे रख दिए
मैं- आहिस्ता से , चोट लगी है न
वो चबूतरे से कूदा और गली में सडक के बीचो बीच खड़ा हो गया . मैं समझ गया .
मैं- आता हु
मैंने कम्बल ओढा और दरवाजे को इस तरह से बंद किया की लगे अन्दर से बंद है मैं जानता था की मुझे कहाँ जाना है . दो गली पार करके मैं आगे हुआ ही था की एक चीख ने मुझे हिलाकर रख दिया . कोई भागते हुए मेरी तरफ आया और जोर से मुझ से लिपट गया ……………………….

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