#37
एक रात और मैंने चाची की बाँहों में गुज़ार दी. सुबह ही मैं मंगू को लेकर हलवाई के पास गया और उस से पूछा की मिठाइयो का काम कितना बाकी है .
हलवाई- क्या बताऊ कुंवर, मेरा कारीगर न जाने कहाँ गायब हो गया है . वो होता तो बड़ी राहत रहती मुझे .
मैं- तो तुमने तलाश नहीं की उसकी
हलवाई- पिय्क्क्ड है , किसी और के साथ हो लिया होगा ऐसे की क्या तलाश करनी .
मैने मेरे मन में सोचा ये दुनिया बड़ी मादरचोद है .
मैं- कोई नहीं, दिवाली के दिन आये ही समझो मिठाई कम नहीं रहनी चाहिए
हलवाई- आजतक ऐसा हुआ है क्या कभी
मैं- ठीक है
फिर मैं और मंगू खेतो पर निकल गए. सरसों की फसल में तेजी होने लगी थी पर फिर भी हमने सोचा की दिवाली के बाद ही पानी देंगे इसको. गेहूं भी हमारे ठीक ही लग रहे थे . शाम तक हम लोग वही पर रहे . मैं मंगू के आगे कारीगर का जिक्र करना चाहता था फिर सोचा की मंगू चुतिया है . किसी और के आगे अंट शंट बक दिया तो मेर्रे लिए और मुसीबत हो जाएगी.
खैर त्यौहार सर पर था तो मैंने चाची के घर को पूरा साफ़ कर दिया. दरअसल पुताई के लिए भैया ने मना किया था वो चाहते थे की थोड़े दिन में चंपा का ब्याह होना ही है फिर ही करवा लेंगे. तमाम व्यस्तता के बीच एक चीज जो मुझे हताश कर रही थी वो थी मेरे लिंग की सूजन, जब जब मैंने मूतने जाता तो मैं उसे देखता . हालाँकि चाची कहती थी की ये चीज़ मोटी ही होनी चाहिए क्योंकि औरत को मोटे लंड से चुदने में अलग हो मजा आता है .
पर मुझे थोड़ी शर्मिंदगी होती थी क्योंकि ये साला झूलता ही रहता था इसका उभार अलग से ही दीखता था . चंपा कई बार इसकी तरफ इशारा करके मेरे मजे लेती थी. दूसरी समस्या थी मेरे कंधे का जख्म साला भर ही नहीं रहा था . हार कर मैंने भैया को बताया तो उन्होंने कहा की दिवाली के बाद वो मुझे शहर दिखायेंगे बड़े डॉक्टर को .
खैर इन्ही सब के बीच दिवाली का दिन भी आ ही गया. भैया ने हम तीनो को पैसे दिए नए कपडे दिए. भाभी ने मंगू और चंपा को तोहफे दिए . मैंने भाभी के पैरो को हाथ लगाया पर उनका हाथ मेरे सर प् र्नाही आया. ऐसी ये पहली दिवाली थी जो भाभी की नाराजगी के बीच मनाई जाने वाली थी .
इतना पराया कर बैठी थी वो मुझे , दिल में कसक तो बहुत थी कहना तो बहुत कुछ चाहता था मैं पर त्यौहार में खटास न हो जाए इसलिए मैं चुप ही रहा. भैया के साथ जाकर हम लोगो ने घर घर मिठाई बांटी. गाँव का माहौल थोडा ठीक नहीं था इसलिए इस बार आतिशबाजी नहीं की जाने वाली थी . बस दिए हो जलाने थे. रात को पूजा के बाद हमने गाँव भर में दियो की रौशनी कर दी. गाँव का स्कूल, मंदिर, डाकखाना. जोहड़ जो भी जहाँ भी जगह दिखी रौशनी करते गए.
दो दिए मैंने लाली और उसके प्रेमी के सम्मान में उस जगह पर जलाये जहाँ पर उन्हें फांसी दी गयी थी .तरह तरह की मिठाई, पकवान खाने पीने में ही आधी रात कब हो गयी मालूम ही नहीं हुआ के तभी मुझे याद आया की मैं कुवे पर और खेतो में दिए जलाना तो भूल ही गया.
मैंने एक झोले में दिए डाले और तेल का कनस्तर साइकिल पर बाँध लिया
चाची- अब कहाँ
मैं- खेतो पर तो दिए जलाये ही नहीं
चाची- रात बहुत हुई अब ठीक नहीं वहां जाना
मैं- चाची किसान का दूसरा घर खेत होते है . उस धरती माता का सम्मान नहीं किया तो ये भी गलत ही होगा न . तुम फ़िक्र मत करो मैं यूँ गया और यूँ आया .
चाची- मैं चलू साथ
मैं- नहीं कहाँ न बस गया और आया . देर नहीं करूँगा.
मैंने साइकिल उठाई और तेजी से गाँव से बाहर को निकल गया . जिस धरती से हम अनाज, सब्जिया ले रहे थे. जिस धरती को हम दूसरी माँ समझते थे इस त्यौहार में उसे कैसे अकेला छोड़ देते . मैं जब पगडण्डी से थोड़ी दूर था तो मैंने अपनी जमीन पर दूर से ही रौशनी देख ली थी और मैं हैरान हुआ . मैंने सोचा क्या मालूम भाभी आई हो यहाँ पर . जब मैं वहां पर पहुंचा तो देखा की दिए जुगनुओ जैसे फैले थे जहाँ तक मेरी नजर गयी झिलमिलाते दियो ने मन मोह लिया.
मैंने देखा कुवे की मुंडेर पर गोलाई में दिए जल रहे थे और वही पर सियार बैठा हुआ बड़ा गजब लग रहा था उस रौशनी में . मुझे देख कर वो पास आया और मेरे सीने से पंजे लगा दिए. उसका ये तरीका था गले लगने का. उसे देख कर मैं मुस्कुराया . मैं थोडा और आगे बढ़ा तो देखा की देहरी पर मेरी तरफ पीठ किये कोई बैठी थी और मैं एक पल में जान गया वो कौन थी ….
“निशा, तुम यहाँ ” मैंने कहा
निशा-और कौन होगा मेरे सिवा .
निशा उठ कर मेरे पास आई .उसे देखा , देखता ही रह गया . इतनी खूबसूरत आज से पहले वो कभी नहीं थी . आज उसने केसरिया लहंगा चोली पहना था
मैं- जोगन लग रही हो आज
निशा- जोग लगे जमाना हुआ
उसने एक दिया मेरे हाथ में रखा और बोली- बिना बताये आई तुम्हे परेशानी तो नहीं
मैं- इतना तो हक़ है तुम्हारा . ये सब तुम्हारा ही है कभी भी आ सकती हो. मुझे मालूम होता की तुम आओगी तो मैं पहले ही आया जाता
निशा- अब भी देर कहाँ हुई.
मैं- तू जब भी बुलाये मैं तो आऊंगा ही
निशा- ये बात है तो फिर इतना इंतजार क्यों करवाया
मैं- क्या बताऊ अब . वैसे मुझे किसी ने बताया नहीं की डायन त्यौहार मानती है
निशा- तूने डायन को जाना ही नहीं कभी . पहले तो कभी मनाया नहीं पर अब ये जरुर मनाएगी ये डायन. अंधेरो में मिला तू उजले की तरफ खींच रहा है मुझे.
वो मेरे पास आई उसने मेरे माथे को चूमा और एक नारंगी-लाल धागा मेरे हाथ में रख दिया.
मैं- क्या है ये …………

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