#36
वो रात एक पल के लिए भी चैन नहीं मिला . निशा में और मुझमे क्या फर्क रह गया था मैं सोचता रहा . वो एक डायन और मैं इन्सान होकर भी लहू का प्यासा बन गया था . अब मेरी समझ में आ रहा था नियति का खेल. बेशक कारण कोई भी रहा हो पर एक इन्सान को मार देना . मैने ये भी गौर किया की इस वक्त जो ग्लानी हो रही थी उस वक्त वहशियत बन गयी थी जब मैंने दारा की खाल उतारी थी .
अगले दी मैंने निर्णय किया की चाहे जो भी हो जाये मैं इसे एक बुरा सपना समझ भुलाने की कोशिस करूँगा. और आगे से किसी भी हालत में पंगा तो करना ही नहीं है . सुबह मैं एक बार फिर से गाँव में गया . इस बार वैध मुझे मिला मैंने उस को बताया की कंधे का जख्म देखे. उसने जख्म को साफ़ किया और पट्टी कर दी. वैध के घर पर कविता की याद आई तो मन दुखी हो गया .
आँखों में रात की नींद थी , मैंने चाची के पास खाना खाया और रजाई ओढ़ कर सो गया .दोपहर बाद जागा तो देखा की चाची और चंपा अनाज पीस रही थी मैंने चाय के लिए बोला और चंपा के पास बैठ गया .
चंपा- क्या बात है , दिन में सो रहा है राते कहाँ काली कर रहा है तू
मैं- अरे थोड़ी तबियत ख़राब सी लग रही थी ऊपर से कुवे पर अकेले नींद नहीं आती .
चंपा- तुझसे फिर कुछ कहूँगी तो फिर तू कोई और बहाना बना देगा. मेरा तो कुछ कहना सुनना ही बेकार है .
मैं- काश तू समझ पाती
चंपा- काश तू समझा पाता
मैं- छोड़ ये बता तू मलिकपुर चलेगी या नहीं सुनार के पास
चंपा- कबीर हम इस बारे में बात कर चुके है वैसे भी चाची-भाभी ने मुझे इतना दिया है की वो संभालना ही मुश्किल होगा. तूने भी जिद ही पकड़ ली है . जिद की जगह मुझे पकड़ता तो भी कुछ सोचती
मैं- तुझे हमेशा बस ये ही खुमारी रहती है . मान ले मैं तेरे साथ कर भी लू तो क्या हो जायेगा.
चंपा- करता ही तो नहीं तू निर्मोही.
मैं- मेरी अपनी मजबुरिया है चंपा तू नहीं समझ पायेगी.
तभी चाची चाय लेकर आ गयी और हमें कप थमाते हुए बोली- कबीर, मैंने बहुरानी से बात की थी और उसे बता दिया है की तू अब मेरे साथ रहेगा. मैंने उसे बताया की अकेले वहां तेरा हाल कैसा है
मैं- मैंने मना किया था न चाची
चाची- तू हमारी औलाद है तुझे अपने से दूर रख कर हम चैन से कैसे रह सकते है सोचा कभी तूने.
मैं- पर भाभी …….
चाची- क्या भाभी भाभी हमसे वो है हम उस से नहीं है . ये मत भूलना की घर में पहला हुकुम मेरा है
मैं- सही कहा पर हमारे बीच जो एक तल्खी है वो और बढ़ेगी यहाँ रहने से.
चाची- और तेरे यहाँ न रहने से हमें जो कष्ट होगा उसका क्या अंदाजा
मैंने फिर कुछ नहीं कहा तभी वहां पर भैया आ गए.
भैया- छोटे मेरे भाई .
भैया ने मुझे आगोश में भर लिया.
मैं-छोड़ो भैया , कन्धा दुखता है
भैया- चाय पी ले फिर मेरे साथ आ जरा कुछ बात करनी है .
मैंने सोचा क्या हुआ , क्या बात करनी है इनको . कहीं इनको दारा वाली बात मालूम तो नहीं हो गयी. खैर मैंने कप रखा और भैया के साथ बाहर गली में आ गया .
भैया- तेरा सूरजभान से क्या पंगा हुआ
मैं- कुछ, कुछ नहीं भैया .
भैया- तुझे क्या लगता है मुझे तेरी खबर नहीं. सूरजभान मेरी पहचान वाला है मैं संभाल लूँगा तू फ़िक्र मत कर. पर ये ध्यान रखना की हम रायसाहब के बेटे है , उनको दुनिया बड़ा मानती है हमें ऐसा कुछ नहीं करना है जिस से उनकी साख ख़राब हो.
मैं- जी भैया
भैया- मैं समझता हूँ इस चढ़ती उम्र में जोश ज्यादा रहता है पर जोश के साथ होश रखना भी जरुरी है भाई, छोटी सी बात थी कोई कुछ कह भी दे तो अगर उसे अन्सुना करने से कोई घटना टलती है तो बेहतर है न. रही बात रुडा की तो देख तेरे आगे कोई मुझे मारेगा तो क्या तू चुप बैठेगा नहीं न बस बेटे को पिटते देख गर्म हो गया होगा . मैं देख लूँगा इस मामले को पर कभी तुझे रुडा या सूरजभान मिले तो हंस से गले लगाना
मैं- जैसा आप कहे भैया.
भैया ने मेरे सर पर हाथ रखा और बोले- दिवाली के कुछ ही दिन बचे है . गाँव में सबके घर कपडे-मिठाई पहुचाने में देर नहीं होनी चाहिए . ये लोग खुश रहेंगे तो हम भी खुश है . सबको साथ लेकर चलना है हमें .
भैया के जाने के बाद मैं वापिस मुड़ा तो देखा की चंपा दहलीज पर खड़ी मुस्कुरा रही थी .
मैं- क्या हुआ तुझे
चंपा- कुछ नहीं , बाजरे की खिचड़ी बना रही हूँ तू खायेगा क्या
मैं- बाजरे का चूरमा बना दे मेरे लिए . मुद्दत हुई तेरे हाथ का कुछ खाए
चंपा- अरे कमीने, कल ही तो घी में दबा के रोटिया जो पेली थी वो किसी डायन ने बनाई थी क्या .
तुरंत ही चंपा को अपनी भूल का अंदाजा हुआ वो अन्दर गयी और दरवाजो पर पानी लाकर डाला.
मैं- वो तेरे इस टोटके से नहीं रुकने वाली उसने आना होगा तो आ ही जाएगी.
चंपा- तुझ को बड़ा पता है ऐसे बोल रहा है जैसे उस से गहरा नाता है तेरा
मैं- तू देखेगी , एक दिन इसी दहलीज पर उसे लेकर आऊंगा तेरे सामने
चम्पा- मुह तोड़ दूंगी तेरा मैं, बनवा ले अब चूरमा उसी से मैं तो चली .
मैं- अरे नाराज क्यों होती है
चंपा मेरे पास आई इतना पास की उसकी तनी हुई छतिया मेरे सीने से रगड़ खाने लगी. उसके होंठ जैसे मेरे होंठो को छू ही गए थे .
“ऐसे ही नहीं तुझे किसी को सौंप दूंगी , पहले जांच-परख करुँगी फिर देखूंगी ” उसने कहा और मुझे धक्का देकर अन्दर भाग गयी . मैं उसे देखता रहा ………. की तभी मेरी नजर ऊपर छजे पर पड़ी भाभी की आंखे हमें ही घूर रही थी .

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