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#35

मैं मंगू के साथ बाहर गया तो देखा की नाचने गाने वाली वो लडकिया और उनके साथ दो आदमी थे जिनकी हालत ठीक नहीं लग रही थी . मुझे देखते ही वो लोग मेरे कदमो में गिर गए और रोने लगे.

मैंने उन्हें उठाया और पूछा की क्या हुआ .

आदमी जिसका नाम लाखा था .

लाखा- कुंवर साहब, आपके जाने के बाद चौधरी रुडा के आदमियों ने हम लोगो को बहुत मारा . ये लडकिया आपके साथ नाची थी देखिये इनका क्या हाल किया है .

उस आदमी ने लडकियों की पीठ मुझे दिखाई जो कोड़ो की मार से उधड गयी थी.

लाखा- आप ही इन्सान करो हमारा. बिना किसी कसूर के हमें ये सजा क्यों मिली .

मैं- लाखा तू आज रात मेरे साथ चलेगा और उस आदमी को पहचान लेना जिसने इन की पीठ पर कोड़े मारे है मैं तुझसे वादा करता हूँ उसकी खाल उतार कर लाऊंगा इस कृत्य के लिए.

“मंगू इन लोगो को वैध जी के पास लेकर जा इनका इलाज करवा और जो भी मदद हमसे हो कर इनकी .” मैंने मंगू को निर्देश दिया.

मंगू- हो जायेगा पर भाई, कल क्या हुआ था और तूने क्या किया

मैंने मंगू को सारी बात बताई .

मंगू- रुडा बहुत नीच किस्म का आदमी है . मलिकपुर के लोगो को कीड़े-मकोडो से जायदा कुछ नहीं समझता है वो . लोगो को ब्याज में पैसा देता है और फिर जो चूका नहीं पाता उनकी बहन-बेटिया भरपाई करती है पैसो की. उस से पंगा लेना उचित नहीं

मैं- हमें किसकी फ़िक्र . झांट नहीं समझता मैं उसे .

मंगू- भाई, कुछ भी करने से पहले अभिमानु भाई से बात कर लेते है एक बार

मैं- छोटी मोटी बातो के लिए उनको क्या परेशां करना

मंगू- पर जब उनको मालूम होगा तो हम पर ही नाराज होंगे सो पहले बताना ठीक रहेगा.

मैं- तू फिलहाल इनको वैध जी के पास लेकर जा और जब तक मैं न कहूँ ये बात किसी को भी मालूम नहीं हो .

मंगू कुछ कहना चाहता था पर फिर चुप हो गया. दुश्मनी मुझसे करनी थी तो मुझ पर वार करते इन गरीबो पर क्या जोर दिखाया . मैं अपनी योजना बनाने लगा रुडा के आदमियों को सरे आम मारना ठीक नहीं था उस से रंजिश और पक्की होती . क्या पता वो ऐसा ही हमला मेरे अपनों पर कर दे तो . मन में ये विचार भी था.

लाखा ने मुझे बताया की जिस आदमी ने उन्हें मारा था उसका नाम दारा था और वो रोज रात को ताड़ी की दूकान पर जरुर जाता था . मैंने तमाम बातो पर विचार किया और अंत में लाखा को भी हटा दिया क्योंकि मैं नहीं चाहता था की बाद में उस पर भी कोई मुसीबत आ जाये.

तय समय पर मैं छिपते छिपाते मलिकपुर की ताड़ी की दूकान पर नजर रखे हुए था . दारा बहुत देर तक ताड़ी पीते हुए वही किसी से बाते करता रहा फिर वो वहां से चल दिया मैं दबे पाँव उसका पीछा करने लगा. गाँव को पार करके वो जंगल की तरफ चल दिया.

“ये भोसड़ी का जंगल में क्या करने जा रहा है ” मैंने सोचा क्योंकि इतनी रात में जंगल में भला कोई क्यों जायेगा. कोई आधा किलोमीटर या उसके आस पास जाने के बाद वो ऐसी जगह पहुंचा जहाँ पर कुछ खानाबदोश रहते थे . मैंने देखा की दारा ने एक आदमी को कुछ पैसे दिए और एक तम्बू में घुस गया . मौका देख कर मैं भी उस तरफ गया . तम्बू में एक औरत थी शायद वो पैसे लेकर चुदाई करवाती होगी क्योंकि तम्बू में रास लीला चल रही थी .

फिर कुछ देर बाद वो औरत तम्बू से निकल कर बाहर चली गयी . मैंने तम्बू में झांककर देखा की दारा नग्न अवस्था में पलंग पर पड़ा था. मेरे लिए यही मौका था उसे अगवा करने का. मैं तम्बू में घुस गया और अपने हाथो से उसका मुह भींच लिया दारा तडपने लगा पर मैं जानता था की शांतिपूर्वक अगवाई के लिए एकमात्र यही मौका था . जैसे तैसे मैंने उसे बेहोश किया और उसके नग्न बदन को काँधे पर लाद कर वहां से न जाने किस दिशा में चल दिया.

एक तो इस इलाके में मैं अनजान था ऊपर से रात का वक्त कुछ दूर चलने पर मुझे एक पगडण्डी दिखी तो मैं उस पर ही चल दिया . आस पास घने झंखाड़ थे . धीरे धीरे वो पगडण्डी गायब हो गयी और मेरे कानो में हिलोरे लेटे पानी की आवाज आई . थोडा और आगे बढ़ने पर मैं समझ गया की मैं कहाँ हूँ. मैं निशा के काले मंदिर के ठीक पीछे पहुँच गया था .

जंगल की अजीब भूलभुलैया . मेरे काँधे पर एक बेहोश आदमी था और मैं डायन के ठिकाने पर वो मुझे देखती तो क्या समझती . खैर मैं दारा को लेकर प्रांगन में आया तो देखा की सब कुछ शांत था निशा की उपस्तिथि के कोई निशान नहीं . तभी दारा को होश आने लगा. तो मैंने उसे निचे पटक दिया. खुद को ऐसी हालत में और सामने मुझे पाकर उसे समझ नहीं आया की क्या हुआ है .

दारा- कौन है तू और मैं कहाँ हु

मैं- मैं वो हु जिसने कल सूरजभान की गांड तोड़ी थी और आज तेरी

दारा- अच्छा तो तू है वो . पर ये कायरो जैसी हरकत क्यों की गांड में दम था तो आमने सामने लड़ता

मैं- तेरी गांड में तो इतना दम है की तूने मासूम नाचने वालो की पीठ पर कोड़े मारे. तू मर्द होता तो मुझे तलाश करता . नामर्द सूरजभान की संगत में रह रह कर तू भी हिजड़ा हो गया .

दारा- तेरा ही काम तमाम करना था मुझे और देख मेरी किस्मत तू मुझे खुद से मिल गया .

मैं- तो देर किस बात की आजा फिर.

दारा मेरी तरफ लपका पर मैं तैयार था मैंने झुक कर अपना बचाव किया और उसके पैरो में टांग लगा दी . वो गिरा गिरते ही मैं उसकी पीठ पर कूद गया वो डकारा मैंने उसका हाथ मोड़ दिया. कट की आवाज आई और दारा की जोर की चीख उस काले मंदिर में गूंजने लगी.

“तेरे पापो का घड़ा भर गया है दारा. जितने कोड़े तूने उन मजलूमों को मारे थे उनका हिसाब लूँगा . तेरी पीठ की खाल उतारूंगा मैं .” मैंने कहा मैंने अपनी जेब से एक चाकू निकाला और दारा के कंधे के थोडा निचे कट लगाया . दारा चीखने लगा. एक तो वो दारू के नशे में था ऊपर से हाथ टुटा हुआ कब तक प्रतिरोध करता मेरा. मेरी उंगलिया उसके खून से सनने लगी. मुझे पक्का विश्वास था की इस शांत रात में दारा की चीखे दूर तक सुनी जाएँगी अगर को सुनने वाला हुआ तो .

मैं- क्या हुआ खुद पर बीत रही है तो दर्द हो रहा है . मजलूमों की चीखे सुन कर तो तुझे मजा आता है

दारा- चौधरी सहाब इसका बदला जरुर लेंगे.

मैं- माँ चोद देंगे तुम्हारे चौधरी की . जैसे जैसे मैं उसकी पीठ काट रहा था मुझे अजीब सा सुकून मिल रहा था . मेरा दिल रुकने को किया ही नहीं यहाँ तक की मैंने उसकी पीठ से हड्डिया तक काट दी . रक्त की ताजा महक में मैं ऐसा खोया की कब दारा के प्राण निकल गए मालूम ही नहीं हुआ. जब होश किया तो मैं दारा के खून से भीगा हुआ निशा के ठिकाने पर बैठा था . पर ये सब यही नहीं रुकना था . मैंने दारा की लाश को वापिस लादा और पगडण्डी से होते हुए मलिकपुर पहुच गया .

एक जूनून जैसे मुझे प्रेरित कर रहा था ये सब करने को . सारा गाँव ठण्ड की चादर में दुबका हुआ था . सब कुछ इतना शांत था की कई बार मुझे मेरे ही कदमो से डर लगा. मैंने गाँव के बीचोबीच दारा की कटी फटी लाश को रखा और फिर वापिस मुड गया .

कबीर जिसने थोड़े दिन पहले तक एक मच्छर भी नहीं मारा था उसने आज एक क़त्ल कर दिया था परिस्तिथि चाहे जो भी रही हो. मैं आज सच में एक कातिल बन गया था मैं चाहे खुद को झूठी तसल्ली देता की उन मजलूमों का बदला लिया मैंने पर सच तो ये ही था की मैंने एक क़त्ल कर दिया था . और इस पाप की आगे जाकर न जाने क्या कीमत चुकानी थी कौन जाने………………..

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