#27
गली के बीचो बीच एक सियार खड़ा था जो मुझे देखते ही उच्छल कर चबूतरे पर चढ़ गया और मेरे पास आकर बैठ गया . अपने पंजो को बार बार धरती पर रगड़ कर वो कुछ इशारा सा कर रहा था और फिर वो गली में आगे की तरफ चला गया मैंने लाठी का सहारा लिया और उसके पीछे पीछे हो लिया . जल्दी ही मैं एक बार फिर से गाँव के बाहर उस रस्ते पर था जो जंगल की तरफ जाता था . मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था . सियार न जाने कहाँ गायब हो गया था . चलते चलते एक बार फिर मैं उस जगह पर था जहाँ से ये सब शुरू हुआ था .
“कबीर ” अंधेरो में से किसी ने मेरा नाम पुकारा और मैंने तुरंत ही इस आवाज को पहचान लिया .
“निशा , कहा हो तुम ” मैंने जवाब दिया
निशा- तुम्हारे पास ही हूँ.
अचानक से ही वो मेरे सामने आ गयी .
निशा- कैसे हो तुम
मैं- बढ़िया तुम्हे देख कर और बढ़िया
निशा मुस्कुराई .
मैं- ऐसा लग रहा है जैसे मुद्दतो बाद मिले है
निशा- मुद्दतो बाद ही तो मिल रहे है .कोशिश तो थी की पन्द्रह दिन बाद ही मुलाकात होती पर देखो एक बार फिर हम यहाँ है .
मैं- हाँ तो ठीक ही हैं न , मुलाकाते होती रहनी चाहिए न .वैसे तुम्हे परेशानी न हो तो मेरे कुवे पर चले . ठण्ड बहुत है वहां आराम रहेगा.
निशा- क्यों नहीं .
कुवे पर आकर मैंने अलाव जलाया और कमरे का दरवाजा बंद कर लिया .
निशा- ऐसे क्या देख रहा है
मैं- क्यों न देखू ऐसे, इस चेहरे से मेरी नजर हटती ही नहीं
निशा- उफ्फ्फ ये बहाने तारीफों के .
मैं- बता नहीं सकता कितनी शिद्दत से तुमसे मिलना चाहता था .
निशा- ये चाह भी न कमाल ही हैं न एक इन्सान को डायन के दर्शनों की इतनी गहरी अभिलाषा और एक डायन के तस्सवुर में इन्सान का अक्स. हे नियति तेरे खेल निराले.
मैं- एक डायन इन्सान की दोस्त नहीं हो सकती क्या
निशा- हो सकती क्या हो गयी है दोस्त, तभी तो अपने अँधेरे तुमसे बाँट रही है .
मैंने देखा की निशा के चेहरे पर वो नूर नहीं था .
मैं- कुछ थकी थकी सी लगती हो
निशा- उजालो में जाने की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है न
मैं- बताओ कुछ अपने बारे में
निशा- क्या बताऊ मैं वो अँधेरा हूँ जिसका कोई उजाला नहीं
मैं- अंधेरो में जला एक दिया ज़माने भर को रौशनी की नयी दिशा दिखा सकता है .
निशा- मेरे अँधेरे इतने गहरे है की रौशनी ने भी उम्मीद छोड़ दी है . जब से तुमसे मिली हूँ बाते करने लगी हूँ
मैं- तुम बाकि लोगो में घुल-मिल नहीं सकती क्या
निशा- ये इंसानी कौम बड़ी मतलब परस्त होती है कबीर. अपने फायदे के लिए तो ये किसी के आगे भी झुक जाते है और काम होने के बाद मैं कौन तो खामखा. तूने देखा नहीं कैसे लोग पागल है पीर-फकीरों के पीछे मैं पूछती हूँ भला किसलिए .
मैं- सहमत हूँ पर तुम चाहो तो लोगो के मन में जो डायन के प्रति जो सोच है वो बदल सकती हो . तुम उन्हें बता सकती हो की डायन वैसी नहीं जो वो सोचते है . डायन वैसी होती है जो मेरे सामने है
निशा- जैसे हर इन्सान एक जैसा नहीं होता वैसे हर डायन भी सामान नहीं होती . हो सकता है की मैं तुम्हारे प्रति नरम हु बाकि दुनिया के लिए क्रूर .
मैं- मैं जिस डायन को जानता हूँ वो कभी क्रूर नहीं हो सकती ये मेरा मन कहता है
निशा- मन बावरा होता है
उसने मेरे काँधे पर सर रखा और मैंने उसके ऊपर कम्बल डाल दिया . अलाव की अलख चिटकती रही . जब आँख खुली तो मैंने खुद को अकेले पाया. भोर होने में थोड़ी ही देर थी मैं वापिस गाँव के लिए चल दिया. घर पहुंचा तो चाची जाग चुकी थी . मैंने बहाना बनाया की टहलने चला गया था . पर उनकी आँखे बता रही थी की वो सहमत नहीं थी मेरी बात से.
“ये किसके ख्याल है जो अब तुम्हे मालूम भी नहीं होता की कोई आया है ” भाभी ने चाय का कप मेरे पास रखते हुए कहा .
मैं- भाभी कब आई आप
भाभी- वो ही तो हमने पूछा की आहट तक भूल गए हो हमारी तुम
मैं- क्या भाभी आप भी
भाभी- हम सोचते है की चंपा के ब्याह के बाद तुम्हारा नम्बर भी लगा ही दे
मैं- शायद हम इस बारे में बात कर चुके है भाभी
भाभी- बाते तो होती ही रहेंगी तुम बताओ कैसी लड़की पसंद आएगी तुम्हे
मैं- सुबह सुबह क्यों मेरी टांग खींच रही है आप
भाभी- कोई तो होगा ख्याल तुम्हारा अब यूँ ही तो नहीं कोई खोया रहता .
मैं- भाभी सुनना चाहती हो तो सुनो मुझे डायन पसंद है .
मेरी बात सुन कर भाभी के हाथो में जो चाय का कप था वो निचे गिर गया . भाभी की आँखों में दहशत देखि मैंने और मुझे समझ आया की गलती हो गयी है
मैं- मैं मजाक कर रहा था भाभी, मुझे भला किसी को पसंद करने की क्या जरूरत है जब आप हो इस काम के लिए. आप ले आना आपकी ही परछाई कोई
मैंने माहौल को हल्का करने की कोशिश की . तभी पिताजी की आवाज आई तो मैं उनके पास चला गया.
पिताजी- कबीर हम काम के सिलसिले में बाहर जा रहे है आने में कुछ वक्त लगेगा पर इसका मतलब ये मत समझना की तुम्हे छूट रहेगी मनमर्जी की समझ रहे हो न
मैंने हाँ में सर हिलाया.
पिताजी- दूसरी बात चंपा को लेकर मलिकपुर जाना वहां का सुनार हमारा पुराना जानकार है वो जो भी पसंद करे वो गहने बनाने का कहना सुनार को . न जाने कब शेखर बाबु के यहाँ से ब्याह का संदेसा आ जाये गहने बनाने में समय तो लगेगा ही .
मैंने फिर से हाँ में सर हिलाया.
पिताजी- सबसे महत्वपूर्ण बात ये हमारा गाँव है इसका हर परिवार हमारा अपना परिवार है . इसकी सुरक्षा हमारा दायित्व है रात को चोकिदारी टूटनी नहीं चाहिए.
मैं- जी वैसा ही होगा.
दोपहर होते होते पिताजी चले गए . भैया-भाभी के साथ थे मैंने मौका सही समझा और चाची को पकड़ लिया………

