#18
आँख खुली तो मैंने देखा की मेरे ऊपर कम्बल पड़ा था. निचे चाची और चंपा सो रही थी . मेरी नजर घडी पर पड़ी रात के दो बज रहे थे . मुझे महसूस हुआ की खाना खाना है . चंपा और चाची दोनों गहरी नींद में सोयी पड़ी थी . उन्हें जगाना उचित नहीं था पर किसी न किसी को तो रसोई खोलनी ही थी . मैं रसोई में गया और अपने लिए खाना निकाला . मैं वापिस ऊपर आ ही रहा था की कुछ आवाजो ने मेरा ध्यान खींच लिया. मैंने देखा हमारा दरवाजा हमेशा की तरह खुला ही पड़ा था .
“इसे बंद क्यों नहीं करते ” मैंने अपने आप से कहा और थाली को रख कर दरवाजे की तरफ चल दिया.मैं दरवाजे को बंद कर ही रहा था की कुछ गीला गीला सा मेरे हाथ पर लगा. ओस समझ कर मैंने उसे अपनी शर्ट से साफ़ किया और फिर कुण्डी लगा कर वापिस आ गया. मैंने शांति से अपना खाना खाया और अपने कमरे में आकर सो गया.
अगला दिन बड़ा खूबसूरत था , धुंध इतनी घनी थी की मुझे छज्जे से निचे आँगन नहीं दिख रहा था . ओस की वजह से सब कुछ इतना गीला गीला था की जैसे रात में बारिश हुई हो. मैं निचे गया तो चाची से मुलाकात हो गयी .
चाची- सही समय पर उठे हो चाय बन ही रही है .
मैं- हाथ-मुह धोकर आता हूँ
मैंने शाल को उतार कर चाची को दिया और नलके की तरफ जा ही रहा था की चाची ने मुझे टोक दिया.
चाची- ये तेरी शर्ट पर क्या लगा है
मैं- क्या लगा है
कहते हुए मैंने देखा इ शर्ट पर लाल निशान थे . तभी मुझे ध्यान आया की शर्ट से मैंने रात को हाथ साफ़ किया था . मेरे दिमाग में घंटिया सी बजने लगी. चाची मुझे ही देख रही थी .
मैं- कुछ लग गया होगा.
मैं तुरंत दरवाजे के पास गया देखा की कुण्डी पर भी सुर्ख लाल रंग चिपका हुआ था और मुझे कोई ताज्जुब नहीं था ये समझने में की ये खून है. मेरा माथा ठनका दरवाजे पर खून कैसे आया जबकि किसी को भी कोई चोट नहीं लगी थी . सोचते हुए मैंने दरवाजे को साफ़ किया और शर्ट को धोने के लिए डाल दी.
चाय पीते हुए मेरी आँखे एक बार फिर से चाची की कटीली जवानी को निहार रही थी कौन कह सकता था की ये पैंतीस बरस की ये गदराई हुई औरत ना विधवा थी न सुहागन. खिले हुए ताजा गुलाब पर जैसे ओस पूरी रात बरसी हो चाची का यौवन ठीक वैसा ही था .
चाची- क्या देख रहा है ऐसे
मैं- बड़ी प्यारी लग रही हो तुम.
चाची- ये तो तू रोज ही कहता है
मैं- सच ही तो कहता हूँ मैं
चाची- मेरी तारीफ छोड़ और जा भाभी के लिए नाश्ता ले जा. बहुरानी से कहना की उसे निचे आने की जरुरत नहीं है वो आराम ही करे.
मैं नाश्ता लेकर गया . भाभी खिड़की से बाहर देख रही थी .
भाभी- देवर जी तुम ये क्यों लाये
मैं- सारे घर का भार आप पर हैं , इतना तो मेरा भी फर्ज है न भाभी .
भाभी मुस्कुराई.
मैं- अब तबियत कैसी है
भाभी- बेहतर है .
तभी बाहर से गाड़ी की आवाज आई . मैंने देखा भैया सहर से लौट आये थे तो मैं दौड़ के उनके पास गया .
मैं- लड़का कैसा है भैया
भैया- डॉक्टर के पास कोई तोड़ नहीं है . खून की बोतले चढ़ती है और उसका शरीर निचोड़ लेता है . डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए है . पिताजी ने सुचना भिजवाई थी की कोई ओझा आने वाला है तो हम लड़के को गाँव ले आये है वो ही अब कुछ समाधान करेगा.
मैं- आपको क्या लगता है
भैया- मेरे आदमियों ने बहुत तलाश की जंगल में . आसपास के तमाम इलाको में पर हाथ खाली ही रहा . रात को आस पास के गाँवो के मोजिज लोगो की सभा होगी जिसमे देखेंगे की क्या निष्कर्ष निकलता है . मैं बहुत थका हु, खाने को कुछ है तो ले आओ मैं सोऊंगा थोड़ी देर.
दोपहर होते होते ओझा भी गाँव आ पहुंचा . अपने दो चेलो संग. पिताजी ने उसके रहने-सहने की व्यवस्था पहले ही करवा दी थी . ओझा ने जलपान करने के बाद अपना स्थान बना लिया . एक छोटी सी पूजा करने के बाद उसने अपनी कार्यवाही शुरू की . न जाने क्या पढ़ रहा था वो कभी इधर देखता कभी उधर फिर उसने पंच के लड़के को देखा . उसकी नब्ज़ टटोली उसकी काली पड़ गयी आँखों में देखा और शांत हो गया.
“कुछ तो बोलिए महाराज ” पंच ने आग्रह किया
ओझा- ये लड़का तीन दिन के भीतर मर जायेगा.
ओझा ने जैसे ही कहा पंच के परिवार का रोना-पीटना शुरू हो गया. माहौल गमजदा हो गया .
पिताजी- महराज कोई तो उपाय होगा.
ओझा- इस मुर्ख ने स्वयं अपना खून अर्पित किया है . इसने वचन दिया है रक्त की बूँद बूँददेने का वचन की पालना हो रही है .
ओझा की बात तमाम लोगो के सर के ऊपर से गयी.
“किसको रक्त देने का वचन दिया है इसने ” मैंने ओझा से पूछा
ओझा ने जवाब देने में बहुत समय लिया तब तक उसकी नजरे मुझ पर जमी रही फिर वो बोला-लालच, कामना व्यक्ति के सबसे बड़े शत्रु है . इसके हालात भी कुछ ऐसे रहे होंगे की ये सच और झूठ का फर्क नहीं कर पाया और जीवन-मृत्यु के फेर में उलझ गया .
मैं- पर किसको वचन दिया इसने ये तो बताओ
ओझा-धीरज रखो. समय आने पर मालूम हो जायेगा. मैं इसकी मृत्यु नहीं टाल पाऊंगा . कोई भी नहीं टाल पायेगा पर मैं गाँव की सुरक्षा के उपाय जरुर करूँगा. गाँव वाले मेरे बनाये नियमो का पालन करेंगे तो मेरा वचन है सुरक्षित रहेंगे. मैं गाँव की हद को कील दूंगा.
गाँव वालो को ओझा के आश्वासन ने राहत तो मिली पर लड़के मी मौत हो ही जाएगी इस से दुःख भी था . पिताजी ने कुछ समय बाद सबको जाने के लिए कहा और खुद भी चले गए मैं भी वहां से निकल ही रहा था की ओझा ने मुझे रोक लिया.
ओझा- रुको कुंवर
मैं- जी कहिये.
ओझा- उसने तुम्हे क्यों छोड़ दिया……………

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