#7
मेरे सामने एक बड़ा सा जानवर खड़ा था जिसकी बिल्लोरी आँखे मुझे घूर रही थी . कड़ाके की ठण्ड में ऊपर से लेकर निचे तक मैंने पसीने को बहते हुए महसूस किया. सियार नहीं सियार तो नहीं था ये . उसकी ऊंचाई किसी भैंस के पाडे जितनी थी , हे भगवान् ये तो भेड़िया था . हूकते हुए वो मुझे देखे जा रहा था और मैं उसे .
एक एक पल बड़ी मुश्किल से बीत रहा था . किसी भी पल वो हमला कर सकता था मैंने अपनी साइकिल हाथो में उठा ली ताकि वो लपके तो तुरंत उस पर दे मारू. पर ऐसा करने की नौबत नहीं आई . वो मुड़ा और जंगल की तरफ भाग गया. मैंने चैन की सांस ली.
सांसो को दुरुस्त करने के बाद मैं उस स्थान पर पहुँच गया जहाँ हमें हरिया मिला था . धरती पर पड़े पत्ते मेरे जूतों के निचे आकर चुर्र चुर्र कर रहे थे . चाँद की रौशनी में मैं घूम घूम कर कुछ ऐसा तलाश रहा था जिस से मालूम हो की हरिया के साथ हुआ क्या था . घूमते घूमते मैं वन देवता के पत्थर के पास तक पहुँच गया . ये एक बड़ा सा पत्थर था जिसे वन देवता के रूप में गाँव वाले पूजते थे, ये एक तरह की हद थी इंसानों के , इसके आगे गाँव वाले कभी भी जंगल में नहीं जाते थे . क्योंकि अन्दर के जंगल में जानवरों का राज था , एक तरह की सीमा थी ये इंसानों और जानवरों की .
कच्ची सड़क से मैं करीब तीन कोस अंदर आ गया था पर कुछ भी ऐसा नहीं मिला. हार कर मैंने ये सोचा की शायद हरिया ने भी उसी भेडिये या वैसे ही किसी जानवर का खौफ खाया हो .दिल को बस इसी ख्याल से तसल्ली दी जा सकती थी .
“देवर जी , देवर जी उठो जल्दी ” भाभी ने लगभग मुझे बिस्तर से घसीट ही लिया था .
“आन्ह क्या हुआ भाभी सोने दो न ” मैंने बिना आँखों को खोले ही प्रतिकार किया
भाभी- हरिया की मौत हो गयी है
ये सुनते ही मेरी नींद तुरंत गायब हो गयी .
“कब कैसे ” मैंने एक ही सांस में पूछ डाला
भाभी- कल रात , प्राण त्याग दिए उसने
जब तक मैं हरिया के घर पहुंचा लगभग गाँव जमा हो चूका था . रोना पीटना मचा था . मेरा मन द्रवित हो गया . मुझे देख कर मंगू मेरे पास आया.
मैं- मंगू इसके कातिल को मैं सजा दूंगा जरुर
मंगू- दिल पर मत ले भाई, ये तो किस्मत थी ये हमें मिल गया वर्ना जंगल में लाश कितने दिन पड़ी रहती कब जानवर खा जाते किसे मालूम होता.
मैं- एक इन्सान की जान गयी है मंगू और तू ऐसी बाते कर रहा है
मंगू- ऐसा पहली बार तो नहीं हुआ है भाई. गाय-बैल. बकरिया और कभी कभी इन्सान भी जंगल में गायब होते रहते है . कभी गाँव वाले जानवरों का शिकार करते है कभी जानवर गाँव वालो का .
एक हद तक मंगू की बात सही थी पर मुझे बस एक बात खटक रही थी , नजाकत देखते हुए मैंने चुप रहना मुनासिब समझा.दोपहर तक उसको चिता दे दी गयी थी . नहा धोकर मैं मंगू के घर गया तो एक बार फिर से चंपा से मुलाकात हो गयी . गहरे गुलाबी रंग के सूट में ताजा गुलाब लग रही थी वो . मुझे देख कर वो भी मुस्कुराई . अचानक से कल रात की बात मुझे याद आ गयी .
चंपा- सही समय पर आये हो . मैं चाय बना ही रही थी .
मैं- चाय के साथ कुछ खाने को भी ले आ और मंगू कहा है
चंपा- चक्की पे गया है आता ही होगा.
मैं चारपाई पर लेट गया . आँखों में नींद की खुमारी थी . तुरंत ही चंपा चाय और मट्ठी ले आई.
चंपा- लगता है रात को नींद नहीं आई.
मैं- लगता है की किसी ने मेरी नींद चुरा ली है
चंपा- किसकी इतनी हिम्मत हो गई जो मेरे होते हुए ये कर सके , नाम बता उसका , खबर लेती हूँ
मैं- अरे तू भी न क्या से क्या सोच लेती है . मैं बस सो नहीं पाया था टेंशन के मारे
चंपा- कहो तो टेंशन दूर कर दू, मौका भी है
मैं- तुझे बस ये सब ही सूझता है क्या
चंपा- देख कबीर, बचपन से तू साथ रहा है तू चाहे मेरे बारे में कुछ भी सोच मैंने तुझे अपना माना है . तू चाहे तो मुझसे अपनी परेशानी बता सकता है
मैंने चाय की चुस्की ली . उसे देखते हुए मुझे नंगी चंपा ही दिख रही थी .उसने भी मेरी नजरो को ताड़ लिया.
चंपा- आजत तेरी नजरे कुछ और देख रही है मुझमे.
मैं- छोड़, ये बता कल खेत में पानी पूरा हो गया .
चंपा-लगभग. एक खेत बचा है बस . आज हो जायेगा
मैं- तू आराम करना आज मैं देख लूँगा वैसे भी कल थक गयी होगी तू.
चंपा- हाँ थक तो गयी ऊपर से कड़ाके की ठण्ड पर काम भी जरुरी है .
मैं- सुन चंपा तू आज भी चाची के साथ खेत पर जाना मुझे कुछ जरुरी काम है मैं घर से ये कहके निकलूंगा की मैं जा रहा हूँ चाची के साथ पर जाएगी तू. समझी न
चंपा – पर तू कहाँ जायेगा.
मैं- भरोसा है मुझ पर
चंपा- खुदसे ज्यादा
मैं- तो फिर इतना काम करना मेरा और हाँ याद से कमरे का बल्ब बुझा लेना …
जैसे ही मैंने ये बात कही चंपा के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी. मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला- मुझे भरोसा है तुझ पर . पर कल जो मैंने देखा कोई और नहीं देखे . तुम दोनों मान हो मेरा.
चंपा- तू कल था वहां पर फिर आवाज क्यों नहीं दी.
मैं- फिर वो जरुरी काम कैसे करती तुम . वैसे एक बात कहूँ हद से ज्यादा खूब सूरत है तू . तेरा पति किस्मत वाला ही होगा.
बुरी तरह से शमाते हुए चंपा मेरे सीने से लग गयी . काफी देर तक मंगू नहीं लौटा तो मैं वापिस घर चला गया . वहां जाकर देखा की पिताजी कुछ गाँव वालो के साथ बाते कर रहे थे . मैं सीधा भाभी के पास चला गया .
भाभी- कुछ पता चला
मैं- अभी नहीं पर जल्दी ही मालूम कर लूँगा.
भाभी- आराम कर लो थोडा .
हम बाते कर ही रहे थे की तभी चाची आ गयी मुझे देखते ही बोली- कल कहाँ थे तुम .
“इसको भाभी के सामने ही पूछनी थी ये बात ” मैंने मन ही मन कहा
मैं- पिताजी को लाने के बाद खेत पर पहुँच तो गया था चाची
चाची- तो फिर मुझे याद क्यों नहीं है
मैं- उम्र हो गयी है तुम्हारी चाची , भाभी चाची के बादाम बढ़ा दो अरे चाची जब तुम और चंपा आराम कर रही थी तभी तो आया था मैं .
मेरा इतना कहते ही चाची की गांड फट गयी और भाभी शंकित निगाहों से मुझे देखने लगी.

