♡ एक नया संसार ♡
अपडेट……..《 59 》
अब तक,,,,,,,,
“ये तो बहुत ही अच्छा किया है आपने।” अजय सिंह के चेहरे पर एकाएक ही रौनक आ गई___”इसका मतलब ये हुआ कि हम पूरी तरह से हारे नहीं हैं। बल्कि बाज़ी अभी भी हमारे हाॅथ में हैं।”
“बिलकुल।” चौधरी ने मुस्कुरा कर कहा___”बस जासूस के फोन आने की देर है। जैसे ही उसका फोन आया और उसने हमें बताया वैसे ही हम यहाॅ से चल पड़ेंगे।”
“वाह चौधरी साहब।” अजय सिंह के चेहरे पर खुशी की चमक आ गई___”मानना पड़ेगा आपको। आपने भी ऐसा कारनामा कर रखा है जिसके बारे में वो लोग सोच भी नहीं सकते हैं।”
अजय सिंह की बात पर चौधरी बस मुस्कुरा कर रह गया। कुछ देर उन दोनो के बीच और भी कुछ बातें हुईं उसके बाद अजय सिंह चौधरी से इजाज़त लेकर उसके आवास से अपने गाॅव हल्दीपुर के लिए निकल लिया। चौधरी ने उसे जाने के लिए अपनी एक जीप दे दी थी।
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अब आगे,,,,,,,
आदित्य के साथ जब मैं नीचे आया तो देखा ड्राइंग रूम में केशव जी बैठे थे। हम दोनो को देखते ही उनके होठों पर मुस्कान उभर आई। उसके बाद उन्होंने मुझसे नीलम के बारे में पूछा तथा ये भी कहा कि वो खुद उसे देखना चाहते हैं। अतः मैं उन्हें अपने साथ ऊपर नीलम के कमरे में ले गया। कमरे में पहुॅच कर उन्होंने सबके सामने ही नीलम को देखा और फिर बड़े प्यार से उससे उसकी तबीयत का पूछा। उनके पूछने पर नीलम ने भी बड़ी शालीनता से अपनी तबीयत के बारे में उन्हें बता दिया। उसके बाद वो कमरे से बाहर आ गए और मेरे साथ ही नीचे आ गए। नीचे आकर मैं आदित्य के साथ बैठा ही था कि रितू दीदी भी आ गईं।
“उस जासूस का क्या हुआ मौसा जी?” नीचे आते ही रितू दीदी ने केशव जी की तरफ देखते हुए भावहीन स्वर में पूछा___”क्या आप उसे पकड़ने में कामयाब हुए?”
“हमारी किस्मत बहुत अच्छी थी रितू बेटा।” केशव जी ने कहा___”जिसके तहत वो हमारे हाॅथ लग गया। मेरा वो आदमी जिसने हमें उसके बारे में फोन पर बताया था उसका नाम निरंजन वर्मा है। उसने बड़ी बहादुरी का काम किया है। उसने मुझे बताया कि अगर उस जासूस की बाइक के अगले पहिये की हवा न निकली होती तो वो हमारे हाथ न लगता।”
“ये आप क्या कह रहे हैं मौसा जी?” रितू दीदी के साथ साथ हम सब भी हैरान हो गए, फिर दीदी ने कहा___”उस जासूस की बाइक की वजह से वो हमारे हाॅथ लगा है?”
रितू की इस बात पर केशव जी ने निरंजन और उस जासूस की सारी राम कहानी बताई। सारी बात सुनने के बाद हम तीनों ही चकित रह गए थे। कुछ देर तक कोई कुछ न बोला।
“ये तो बड़े ही आश्चर्य की बात है मौसा जी।” मैने सोचने वाले भाव से कहा___”उस जासूस की बाइक के अगले पहिए में हवा नहीं थी इस लिए वो उतने समय तक वहाॅ रुका रहा। आपका वो आदमी भी वाकई में बड़ा काम का साबित हुआ। उसने उस जासूस को पकड़ने में अपनी जान तक दाॅव पर लगा दी। वरना अगर वो जासूस हाॅथ से निकल जाता तो यकीनन हमारे लिए बहुत बड़ा संकट हो सकता था।”
“बेशक।” केशव जी ने कहा___”अगर उसके बारे में हमें पता न चलता तो वो हमारा पीछा करता ही रहता और फिर जब उसे तुम लोगों के इस ठिकाने का पता चल जाता तो वह तुरंत ही मंत्री को सब कुछ बता देता। उसके बाद मंत्री क्या करता इसका तुम बखूबी अंदाज़ा लगा सकते हो।”
“अब इस मंत्री का खेल खत्म करना ही पड़ेगा।” सहसा रितू दीदी ने कठोर भाव से कहा___”मेरी चेतावनी के बावजूद इसने इतना बड़ा दुस्साहस किया और हमारे पीछे किसी जासूस को भी लगाया। अब तो इसका किस्सा खत्म करना ही पड़ेगा। बहुत हो गया अब।”
“मेरा भी यही ख़याल है दीदी।” मैने कहा___”कम से कम इससे इसकी तरफ से तो हम बेफिक्र हो जाएॅगे और फिर खुल कर तथा बेझिझक बड़े पापा से मुकाबला कर सकेंगे।”
“सही कहा तूने।” रितू दीदी ने कहा___”किन्तु उससे पहले हमें उस जासूस से मिलना भी होगा। उसे हम ऐसे ही नहीं छोंड़ सकते हैं। उसका भी कोई न कोई इंतजाम करना पड़ेगा हमें।”
“मेरे ख़याल से उसे हम तब तक अपने पास रखते हैं जब तक कि मंत्री का किस्सा खत्म नहीं हो जाता।” सहसा आदित्य कह उठा___”उसके बाद हम उसे छोंड़ सकते हैं। जब मंत्री ही नहीं रहेगा तो वो किसके लिए हमारे पीछे लग कर जासूसी करेगा?”
“आदी की बात एकदम करेक्ट है दीदी।” मैने कहा__”ऐसा ही करना चाहिए हमें।”
“आपका क्या कहना है मौसा जी?” रितू दीदी ने सहसा केशव की तरफ देखते हुए कहा___”ये तो सच है कि हम उस जासूस को मौजूदा हालात में छोंड़ नहीं सकते हैं और ना ही उसे जान से मारने का सोच सकते हैं। क्योंकि वो निर्दोष है। उसने वही किया है जो एक जासूस को करना चाहिए था। ये उसका पेशा ही है, अतः आप भी अपनी राय दीजिए कि क्या किया जाए?”
“देखो मैं तो एक ही बात जानता हूॅ बेटा।” केशव जी ने कहा___”कि ऐसे हर उस आदमी को खत्म कर दो जिससे हमें किसी प्रकार के ख़तरे का अंदेशा हो। किन्तु मामला चूॅकि एक जासूस का है इस लिए उसे खत्म करना ग़लत होगा। अतः मैं भी आदित्य की बात से सहमत हूॅ। यानी कि उसे तब तक यहाॅ कैद करके रखा जाय जब तक कि मंत्री का कल्याण नहीं हो जाता। मगर,
“मगर क्या मौसा जी?” रितू दीदी के माथे पर शिकन उभरी।
“मगर मुझे एक बात समझ नहीं आई।” केशव जी ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा___”और वो ये कि जब मंत्री के खिलाफ़ तुम्हारे पास ऐसा डायनामाइट जैसा सबूत है तो उसे अब तक छोंड़ क्यों रखा था तुमने? जबकि होना तो यही चाहिए था कि उसे तुरंत ही कानून की चपेट में ले लिया जाता।”
“आपका सोचना बिलकुल सही है मौसा जी।” रितू दीदी ने कहा___”किन्तु मंत्री को अब तक छोंड़े रखने के दो कारण थे। पहला ये कि उसे एहसास कराना था कि जब उसके खुद के बच्चों के साथ बहुत बुरा होता है तब कैसा महसूस होता है? दूसरा कारण ये कि उसके संबंध ऐसे ऐसे लोगों से हैं जिनकी पूर्ण जानकारी हमारे पास अभी भी नहीं है। ये तो लगभग सब जानते हैं कि वो कैसे कैसे ग़ैर कानूनी धंधा करता है किन्तु पुलिस के पास उसके खिलाफ़ ऐसे कोई सबूत नहीं हैं जिसकी वजह से उसे गिरफ्तार किया जा सके। मेरे पास भी उन वीडियोज के अलावा और कुछ नहीं है। मैं चाहती थी कि ये वाला मामला निपट जाने के बाद मंत्री के खिलाफ मौजूद उन सबूतों का पता करूॅगी। यही वजह थी कि मंत्री के मैटर को इतना लम्बा खींचना पड़ा। किन्तु अब ऐसा लगता है कि मंत्री को सबक सिखाना ही पड़ेगा। उसके सामने खुल कर जाना ही पड़ेगा और फिर उसकी ऑखों में ऑखें डाल कर उसे बताना पड़ेगा कि वो हमारा कुछ नहीं कर सकता है जबकि हम चाहें तो उसका कुछ भी कर सकते हैं।”
“ओह आई सी।” केशव जी ने कहा___”तो ये बात है। ठीक है फिर, जैसा तुम्हें बेहतर लगे वैसा करो। किन्तु हाॅ उससे पहले चलो उस जासूस से भी तो मिल लो तुम लोग। संभव है कि उससे भी कोई महत्वपूर्ण जानकारी मिल जाए।”
केशव जी की इस बात से हम सब सोफों से उठ कर खड़े हो गए और फिर केशव जी के साथ ही बाहर की तरफ चले गए। बाहर आकर हम सब केशव जी की कार में बैठ गए। आदित्य केशव जी के बगल में आगे की सीट पर बैठ गया था जबकि मैं और रितू दीदी पिछली सीट पर बैठ गए थे। हम सबके बैठते ही केशव जी ने कार को आगे बढ़ा दिया।
लगभग पाॅच मिनट बाद ही केशव जी ने कार को एक मकान के पास ले जाकर रोंका। कार के रुकते ही हम सब कार से बाहर आ गए। हम सबकी नज़र उस मकान पर पड़ी जिसके सामने के पोर्च पर एक लकड़ी का तखत रखा हुआ था और उसमे चार साॅवले रंग के आदमी बैठ कर ताश खेल रहे थे। कार की आवाज़ से ही उनका ध्यान हमारी तरफ गया था। जिससे उन चारों ने ताश खेलना बंद करके तखत से उतर गए थे।
हम तीनों केशव जी के पीछे पीछे मकान के पोर्च में आ गए। पोर्च में रुक कर केशव जी ने अपने एक आदमी से कहा सब ठीक है न? जवाब में आदमी ने बड़े अदब से हाॅ में सिर हिलाया। उस आदमी की हाॅ देख कर केशव जी मकान के अंदर की तरफ बढ़ चले। उनके साथ हम तीनों भी बढ़ चले थे।
ये मकान यूॅ तो पक्का ही था किन्तु इसकी हालत देख कर तथा केशव जी की छवि देख कर यही लगता था कि इस मकान पर केशव जी अपने आदमियों को रखते थे। या फिर उनके रहने की जगह ही यही थी। हलाॅकि सोचने वाली बात तो ये भी थी कि केशव जी का कैरेक्टर ऐसा क्यों था कि उनके अंडर में ऐसे ऐसे लोग थे और उनका हर कहा भी मानते थे? इस बारे में हम सबके दिमाग़ में सवाल तो उभरा था किन्तु केशव जी से इस बारे में पूछने का या तो समय ही नहीं मिला था हमें या फिर हम उनकी निजी ज़िंदगी में कोई हस्ताक्षेप ही नहीं करना चाहते थे। हमारे लिए यही बहुत था कि वो हमारी मदद कर रहे थे।
मकान के अंदर भी कुछ लोग नज़र आए हमें जो कि अलग अलग जगहों पर इस वक्त खड़े दिख रहे थे। बाहर से अंदर आते ही सबसे पहले एक छोटा सा हाल था उसके बाद दोनो तरफ तीन तीन कमरे बने हुए थे। सामने की तरफ ऊपर के फ्लोर में जाने के लिए चौड़ी सीढ़ी थी। उस सीढ़ी के अगल बगल भी एक एक कमरा था। केशव जी के साथ हम तीनो सीढ़ी के दाहिने साइड वाले कमरे की तरफ बढ़ गए।
केशव जी के कहने पर ही एक आदमी ने उस कमरे का ताला खोला और फिर उसके बाद दरवाजा भी खोला। ये देख कर हमें समझते देर न लगी कि केशव जी इस मामले में काफी होशियारी से काम ले रहे थे। ख़ैर कमरे के अंदर हम सब दाखिल हुए तो बाॅए साइड ही दीवार से सट कर खड़े उस जासूस पर हमारी नज़र पड़ी। उसके दोनो हाॅथ ऊपर की तरफ एक साथ मोटी रस्सी से बॅधे थे। इतना ही नहीं उसके मुख पर एक टेप भी चिपका हुआ था ताकि वह चीखे चिल्लाए न। उसके दोनो हाॅथ तो ऊपर की तरफ रस्सी से बॅधे हुए थे ही साथ ही उसके दोनो पैर भी अलग अलग दिशा में फैले हुए रस्सी से बॅधे थे।
ये कमरा अंदर से एकदम खाली था। जासूस की स्थित देख कर ये समझना ज़रा भी मुश्किल नहीं था कि केशव जी ने उसका तगड़ा इंतजाम किया था। उसे इस हालत में देख कर मैं केशव जी की समझदारी का कायल हो गया।
“आपने तो मेहमान का बहुत अच्छे तरीके से स्वागत कर रखा है मौसा जी।” मैंने जासूस की तरफ एक नज़र डालने के बाद केशव जी से कहा___”ख़ैर कोई बात नहीं। इनके मुह से ज़रा ये टेप तो हटाइए। इन महानुभाव की मनमोहक आवाज़ सुनने का बहुत दिल कर रहा है।”
मेरी बात पर केशव जी मुस्कुराए और फिर राणे के मुख से टेप निकाल दिया। टेप के हटते ही राणे गहरी गहरी साॅसें लेने लगा। यद्यपि टेप तो सिर्फ उसके मुख पर ही चिपकाया गया था, साॅस लेने के लिए उसकी नाॅक तो खुली ही थी।
“हाॅ तो मिस्टर डिटेक्टिव।” मैने उस जासूस के बिलकुल पास आते हुए कहा___”आप इज्ज़त से खुद ही सब कुछ बताएॅगे या फिर मुझे आपके मुख से कुछ भी उगलवाने के लिए कोई दूसरा हथकंडा इस्तेमाल करना पड़ेगा? हलाॅकि मुझे उम्मीद है कि आप खुद ही सब कुछ बता देंगे। क्योंकि आप जासूस हैं और आपको पता है कि ऐसी परिस्थितियों में क्या होता है? ख़ैर, मैं आपकी जानकारी के लिए बता दूॅ कि जिस मंत्री के लिए आप जासूसी कर रहे थे वो इस प्रदेश का निहायत ही घटिया ब्यक्ति है। ऐसा कोई कुकर्म तथा ऐसा कोई जुर्म नहीं है जो वो करता न हो। यहाॅ तक कि दूसरों की बहू बेटियों के साथ ग़लत तो करता ही है साथ ही उनका सौदा भी करता है। मैं ये सब बातें आपसे इस लिए बता रहा हूॅ ताकि आपको भी पता होना चाहिए कि आप जिसके लिए हमारा बेड़ा गर्क करने चले हैं वो कैसा इंसान है? अपने ज़मीर को जगाइये जासूस महोदय। जीवन में रुपया पैसा कमाने के लिए और भी कई अच्छे रास्ते हैं। जासूस का मतलब ये नहीं होता कि आप किसी के लिए भी काम करना शुरू कर दें। बल्कि उस ब्यक्ति के लिए काम करें जिसे आप समझते हों कि ये अच्छा ब्यक्ति है तथा इसे किसी बुरे इंसान ने सताया है।”
मेरी ये बातें सुन कर वो जासूस कुछ न बोला। बस मेरी तरफ देखता रहा। उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे एकाएक ही वह किन्हीं विचारों के आधीन हो गया हो। मैं कुछ देर तक उसे देखता रहा।
“आपको पता है ये कौन हैं?” मैने रितू दीदी की तरफ इशारा करके उस जासूस से कहा___”ये मेरी बड़ी बहन हैं और पुलिस में इंस्पेक्टर हैं। इन्होंने जब ये जाना कि कानूनन ये मंत्री के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सकती हैं तो इन्होंने कानून को अपने हाॅथ में ले लिया।इन्होंने इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं की कि इसके लिए इन्हें कानून खुद कठोर सज़ा दे सकता है तथा अगर ये मंत्री जैसे राक्षस इंसान के पकड़ में आ गईं तो मंत्री इनका क्या हस्र कर सकता है। कहने का मतलब ये कि अपनी जान को जोखिम में डाल कर इन्होंने मंत्री के खिलाफ बिगुल बजाया हुआ है। सिर्फ इस लिए कि इस प्रदेश से मंत्री दिवाकर चौधरी जैसे लोगों की गंदगी दूर हो सके तथा ऐसे लोगों से मासूम व निर्दोष जनता को निजात मिल सके। रुपया पैसा सबकी ज़रूरत है जासूस महोदय किन्तु उससे बढ़ कर अपनी जान भी प्यारी होती है। हम सब सच्चाई की राह पर चलने वाले वो इंसान हैं जिनके सिर पर क़फन बॅधा हुआ है।”
“ये सब तुम क्या बातें सुना रहे हो दोस्त।” सहसा आदित्य ने कहा___”क्या तुम समझते हो कि तुम्हारी इन बातों से इस जासूस के विचार बदल जाएॅगे। नहीं भाई, इन्हें तो सिर्फ पैसों से मतलब हैं। इन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि प्रदेश में आम इंसानों के साथ क्या अत्याचार हो रहा है? मैं तो कहता हूॅ कि इससे कुछ पूछना ही बेकार है। हमारे पास जो भी सबूत मंत्री के खिलाफ है उसी के आधार पर हम उसे धर लेंगे।”
“आप लोग क्या जानना चाहते हैं मुझसे?” सहसा जासूस गंभीर भाव से बोल पड़ा___”पूछो, मैं सब कुछ बताने को तैयार हूॅ। मुझे भी इस बात का अंदेशा है कि मंत्री के खिलाफ़ खुद पुलिस विभाग गुप्त रूप से लगा हुआ है। मुझे पता है कि मंत्री तथा उसके साथी बहुत ही अपराधी किस्म के इंसान हैं। तुमने मुझे एहसास करा दिया है कि वाकई मैं ग़लत ब्यक्तियों का साथ दे रहा था। तुमने बिलकुल सही कहा भाई कि जीवन में पैसा ही सब कुछ नहीं होता है।”
“तो फिर बताइये।” मैने मन ही मन हैरान होते हुए कहा___”कि मंत्री ने आपको किस किस काम के लिए हमारे पीछे लगाया था?”
“आप लोगों ने मंत्री को तथा उसके साथियों को इस लायक छोंड़ा ही नहीं है कि वो खुद इस मामले में कोई ऐक्शन ले सके।” जासूस ने कहा___”इस लिए उसने इस काम के लिए मुझे हायर किया। एक और महत्वपूर्ण बात है जो कि तुम्हारे लिए जानना बेहद ज़रूरी है। वो बात ये है कि मंत्री आपके ताऊ अजय सिंह के साथ भी मिला हुआ है। मैं अजय सिंह के ही पीछे लगा था और उसी का पीछा करते हुए मैं आज उस जगह पहुॅचा था जहाॅ तुम्हारा और अजय सिंह का आमना सामना हो रहा था। मैने उस सबकी सूचना फोन द्वारा मंत्री को दी थी। मंत्री को मैने कहा भी था कि वो अगर चाहें तो इस मौके पर खुद भी आकर तुम लोगों के साथ कुछ भी कर सकते हैं। मगर मंत्री ने शायद ये सोच कर इसके लिए बाद में मना कर दिया कि संभव है कि उस सूरत में तुम्हारे द्वारा उसके बच्चों का कुछ अहित हो जाता। इस लिए उसने मुझसे बस यही कहा कि मैं तुम लोगों के पीछे लग कर तुम्हारे ठिकाने का पता करूॅ। जैसे ही मेरे द्वारा उसे तुम लोगों के ठिकाने का पता चल जाता वैसे ही वो अपने दलबल के साथ तुम लोगों के ठिकाने पर धावा बोल देता।”
हरीश राणे की बात सुन कर हम सब बुरी तरह हैरान रह गए थे। हम सब ये जान कर चौंके थे कि अजय सिंह मंत्री से मिला हुआ है। इस तरफ तो हमने सोचा ही नहीं था और यकीनन ये हमारी सबसे बड़ी ग़लती भी थी। ख़ैर अब तो जासूस द्वारा हमें इस बात का पता चल ही चुका था।
“एक और बात।” तभी राणे ने फिर कहा___”जब मैने मंत्री से फोन पर बात की थी तो ये सवाल भी उभरा था कि संभव है कि अजय सिंह उसे धोखा दे रहा हो। क्योंकि उसने मंत्री को बताए बिना ही तुम सबको पकड़ने के लिए वो सब किया था। जबकि मंत्री से हुई दोस्ती के अनुसार उसे उस सबके बारे में मंत्री से बताना चाहिए था। इस बात पर मंत्री ने कहा था कि अगर अजय सिंह सचमुच उसे धोखा दे रहा है तो वो उसे इसके लिए सज़ा ज़रूर देगा। किन्तु अगर उसने ये सब ये सोच कर किया है कि बाद में वो हमें अपने भतीजे को तथा अपनी बेटी को हमारे सामने ले आएगा और अपनी दोस्ती का प्रमाण देगा तो यकीनन हम उसे जेल से भी छुड़ाएॅगे। मंत्री की इस बात से तुम लोग समझ सकते हो कि अजय सिंह जेल से उसके द्वारा छूट भी सकता है। अगर ये कहूॅ तो भी ग़लत न होगा कि वो अब तक छूट ही गया होगा।”
“ऐसा कैसे कह सकते हो तुम?” केशव जी ने पूछा।
“सीधी सी बात है।” राणे ने कहा___”बात चाहे जो भी हो किन्तु मंत्री एक बार अजय सिंह से मिलना ज़रूर चाहेगा और मिल कर ये भी जानना चाहेगा कि उसने वो सब कारनामा उसको बिना बताए कैसे अंजाम दिया था? क्या इसके पीछे उसकी गद्दारी थी या फिर कुछ और? मंत्री की इस बात पर अजय सिंह ज़रूर यही कहेगा कि वो ये सब करके अपने भतीजे और अपनी बेटी को उसके सामने ले आकर उसे सरप्राइज के रूप में तोहफा देना चाहता था। किन्तु ऐसा हो न सका। अजय सिंह की ये बात सुन कर मंत्री को भी लगेगा कि अजय सिंह वास्तव में उसके लिए ये सब पाक़ भावना से करना चाहता था। अतः ये सोच कर मंत्री उसे जेल से ज़रूर छुड़ाएगा। जिस समय मैने उसे फोन पर अजय सिंह को पुलिस द्वारा ले जाने के बारे में बताया था। उस समय और अब के समय के बीच कई घंटों का फर्क़ हो चुका है। इस लिए ये संभव है कि अब तक मंत्री ने अजय सिंह को जेल से छुड़ा ही लिया होगा।”
“हम भी तो यही चाहते हैं जासूस महोदय।” मैने मुस्कुराते हुए कहा___”कि वो जेल से छूट कर फिर से बाहर आ जाए और इसी लिए रितू दीदी ने उसके छूट जाने का इंतजाम भी किया हुआ था।”
“क्या मतलब।” हरीश राणे बुरी तरह चौंका___”भला तुम लोग ऐसा क्यों चाहते हो? बात कुछ समझ में नहीं आई। ये सब क्या चक्कर है?”
“मंत्री को और अजय सिंह को अगर जेल में सड़ाना ही होता।” मैने कहा___”तो ये काम तो हम बहुत पहले ही कर चुके होते। मगर ऐसा किया नहीं क्योंकि इनके गुनाहों की सज़ा हम अपने तरीके से ही देना चाहते हैं। रितू दीदी ने पुलिस कमिश्नर से जब पुलिस प्रोटेक्शन की बात की तभी ये तय हो गया था कि अजय सिंह को सबके साथ पकड़ कर ले तो जाएॅगे मगर उस पर कोई केस नहीं बनाया जाएगा। केस न बनने से अजय सिंह का जेल से छूट जाना आसान ही हो जाना था। वरना आप खुद सोचिए जासूस महोदय कि उसने तो अपनी ही बेटी को जान से मारने की कोशिश की थी वो भी एसीपी के रिवाल्वर से। उस सूरत में तो वो लम्बे से नप सकता था। एसीपी रमाकान्त शुक्ला तो गुस्से में आकर अजय सिंह पर केस बनाने के लिए तैयार भी हो गया था किन्तु कमिश्नर साहब ने इसके लिए उसे मना कर दिया। वरना अगर केस बन जाता तो मंत्री इतनी सहजता से अजय सिंह को छुड़ा न पाता। उसकी पहुॅच का भी कोई असर न होता। क्योंकि एसीपी कोई मामूली ब्यक्ति नहीं था। उसे केन्द्र से भेजा गया है, इस लिए उसके काम में किसी की भी दखलअंदाज़ी नहीं चलती।”
“अगर ऐसी बात है।” राणे ने कहा___”तो फिर वो इस सबके लिए राज़ी कैसे हो गया? मेरे कहने का मतलब ये है कि जैसा कि तुमने कहा कि एसीपी को केन्द्र सरकार ने भेजा है तथा उसके काम में कोई हस्ताक्षेप भी नहीं कर सकता तो फिर ये कैसे हो गया कि उसने अजय सिंह पर कमिश्नर के मना कर देने पर केस ही नहीं बनाया? जबकि उसे तो इस मामले में शख्त से शख्त कार्यवाही ही करनी चाहिए थी।”
“वो यहाॅ शख्त कार्यवाही के लिए ही आया था।” रितू दीदी ने हस्ताक्षेप किया___”किन्तु कमिश्नर साहब ने उसे यहाॅ के सारे हालातों के बारे में बताया, ये भी कि कैसे मैं अपने ही माॅ बाप के खिलाफ हूॅ और कैसे मंत्री का काम तमाम करने के काम पर लगी हुई हूॅ? सारे हालातों पर ग़ौर करने के बाद वो इसके लिए तैयार हो ही गया। दूसरी बात ये भी थी कि उसे यहाॅ भेजा ही इस लिए गया है कि वो मंत्री जैसे लोगों की गंदगी को इस प्रदेश से मिटा सके और ये काम तो मैं कर ही रही हूॅ। उसे तो इस प्रदेश की गंदगी मिटाने से मतलब है फिर चाहे वो किसी भी तरीके से मिटाई जाए।”
“ओह तो ये बात है।” राणे को जैसे सब कुछ समझ आ गया था, फिर बोला___”किन्तु शुरू में मैने महसूस किया था कि मैने जब मंत्री और अजय सिंह के एक होने की बात बताई तो तुम सब उस बात से हैरान हो गए थे। इसका मतलब ये हुआ कि तुम लोगों को इस बात का अंदेशा तक नहीं था कि अजय सिंह और मंत्री आपस में मिले भी हो सकते हैं?”
“कमिश्नर साहब ने फोन पर मुझे ये ज़रूर बताया था।” रितू दीदी ने कहा___”कि मंत्री ने उन्हें फोन किया था तथा फोन पर वो ऐसे सवाल जवाब कर रहा था जैसे ये जानना चाहता हो कि पुलिस गुप्त रूप से कहीं उसके पीछे तो नहीं लगी हुई है। उसने बातों बातों में इस बात को भी पूछा था कि हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह को पुलिस पकड़ कर ले गई है तो ये सब क्या चक्कर है? उसने कमिश्नर से घुमा फिरा कर ये भी कहा कि सुना है कि अजय सिंह की बेटी पुलिस में है और अपने बाप के खिलाफ भी है। मंत्री के पूछने पर कमिश्नर साहब ने यही कहा कि ये सब पारिवारिक मामला है अतः उन्हें इस बारे में ज्यादा पता नहीं है। कहने का मतलब ये कि ये तो समझ में आया कि मंत्री ने कमिश्नर से अजय सिंह का ज़िक्र किया मगर उसकी बातें ऐसी थी कि उससे इस बात का अंदेशा उस वक्त मुझे न हो पाया था कि वो अजय सिंह से वास्तव में मिला हुआ ही हो सकता है। दूसरी बात ये कि मेरे मुखबिरों ने भी ऐसी किसी बात का ज़िक्र नहीं किया। जबकि मैने तो दोनो के ही पीछे मुखबिर लगाए हुए थे।”
“कमाल की बात है।” राणे मुस्कराया___”कैसे मुखबिर थे जो ये भी न पता लगा सके कि अजय सिंह और मंत्री कब कहाॅ किससे मिलते हैं? जैसा कि तुमने बताया कि तुमने इन दोनो के पीछे मुखबिर लगाया हुआ था तो ये कैसे हो सकता है कि तुम्हारे मुखबिरों को इन दोनो की गतिविधियों का पता ही न चल सके? अजय सिंह के पीछे लगा हुआ मुखबिर बड़ी आसानी से पता लगा सकता था कि वह कब कहाॅ जाता है? यानी अगर वो मंत्री से मिलने उसके आवास पर जाता तो क्या ये सब उस मुखबिर ने अपनी ऑखों से नहीं देखा होता? इसका तो यही मतलब हुआ कि तुम्हारे मुखबिरों ने अपना काम इमानदारी से किया ही नहीं बल्कि तुम्हें धोखे में ही रखा।”
राणे की इस बात से रितू दीदी तुरंत कुछ बोल न सकीं थी। मैने भी हैरानी से उनकी तरफ देखा था। रितू दीदी के चेहरे पर कई तरह के भाव आए और चले भी गए। सहसा उनके चेहरे पर कठोर भाव उभर आए।
“यकीनन ऐसा ही है।” फिर उन्होंने गहरी साॅस लेकर कहा___”मेरे मुखबिरों ने अपना काम सही से नहीं किया। इसके लिए उन्हें कठोर दंड ज़रूर मिलेगा। दोनो तरफ की घटनाओं से इस बात की तरफ मेरा ध्यान भी नहीं गया। दूसरी बात मुझे अपने मुखबिरों से इस बात की उम्मीद भी नहीं थी कि वो कमीने ऐसी लापरवाही करेंगे।”
“चलो कोई बात नहीं रितू बेटा।” सहसा केशव जी ने कहा___”माना कि तुम्हारे मुखबिरों ने इस काम में थोड़ी नहीं बल्कि बहुत ही ज्यादा लापरवाही दिखाई किन्तु इससे हमें नुकसान तो नहीं हुआ न? अतः इस बात को छोंड़ो और अब ये सोचो की आगे क्या करना है?”
“मैं भी ये कहना चाहता हूॅ कि।” रितू दीदी के बोलने से पहले ही राणे बोल पड़ा____”अब आप लोगों को भी मुझे यहाॅ से जाने देना चाहिए। आप लोगों को मैने पूरी इमानदारी से सारी बातें सच सच बता दी हैं। अतः अब मुझे इस तरह यहाॅ कैद करके रखने का तो कोई मतलब नहीं बनता न।”
“ज्यादा होशियारी दिखाने की कोशिश मत करो जासूस महोदय।” मैने कहा___”माना कि आपने हमें सारी बातें सच सच बता दी हैं। मगर मौजूदा हालात में इसके बावजूद हम आपको यहाॅ से जाने नहीं दे सकते। क्योंकि इतना तो हम भी सोच सकते हैं कि आपने ये सब ये सोच कर बता दिया हमे कि सब कुछ सुनने के बाद हमें यही लगे कि अब आप हमारे ही हक़ में हैं और हमारा किसी भी तरह का नुकसान नहीं कर सकते हैं। इस लिए हम आपको छोंड़ देंगे। जबकि यहाॅ से छूटते ही आप पुनः अपना रंग बदल सकते हैं और हमारा काम तमाम करवा सकते हैं। इस लिए जासूस महोदय आपको छोंड़ देने का काम तो फिलहाल हम किसी भी सूरत में नहीं कर सकते। अतः आप अपने दिमाग़ से छूटने का ख़याल निकाल दें। किन्तु हाॅ हम ये वादा करते हैं कि यहाॅ आपको कोई तक़लीफ नहीं होने देंगे और जैसे ही मंत्री का काम तमाम हो जाएगा वैसे ही आपको भी यहाॅ से आज़ाद कर दिया जाएगा।”
“सबसे पहली बात तो तुम मुझे जासूस महोदय कहना बंद करो।” राणे ने कहा___”मेरा नाम हरीश राणे है। अतः मुझे राणे कह कर संबोधित कर सकते हो। दूसरी बात तुम बेवजह ही ये शक कर रहे हो कि यहाॅ से चूटते ही मैं ऐसा वैसा कुछ कर दूॅगा। मेरा यकीन करो यंग मैन, मुझे रियलाइज हो चुका है कि मैं जो कुछ भी अब तक मंत्री के लिए कर रहा था वो उचित नहीं था। मुझे पता है कि मंत्री और उसके सभी साथी जुर्म व अपराध करने वाले महान पापी हैं। इस लिए अब मैं उनके लिए कोई काम नहीं करूॅगा। बल्कि यहाॅ से छूटने के बाद मैं वापस अपने शहर लौट जाऊॅगा।”
“हो सकता है कि आपकी बातें सच ही हों मिस्टर राणे।” मैने कहा___”मगर चूॅकि आप एक जासूस हैं अतः आप भी समझ सकते हैं कि मौजूदा हालात मैं हम आपको छोंड़ देने का जोखिम नहीं उठा सकते। इस लिए आप इसके लिए हमे माफ़ करें और यहीं रहें।”
मेरी बात सुन कर राणे बेबस भाव से मुझे देखता रह गया। फिर एकाएक ही उसके होठों पर मुस्कान उभर आई, बोला___”सही कहते हो भाई। मैं समझ सकता हूॅ कि ऐसे हालात में तुम मुझे यकीनन छोंड़ देने का जोखिम नहीं उठा सकते। ख़ैर कोई बात नहीं, जैसा तुम्हें अच्छा लगे करो। और हाॅ मेरी तरफ से बेस्ट ऑफ लक इसके लिए।”
राणे की ये बात सुन कर हम सब मुस्कुराए और फिर केशव जी के इशारे पर एक आदमी ने पुनः राणे के मुख में टेप चिपका दिया। उसके बाद सभी आदमियों को कुछ ज़रूरी हिदायतें दे कर हम सब वहाॅ से बाहर की तरफ चल पड़े।
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उधर अजय सिंह जब हवेली पहुॅचा तो शाम के चार बज चुके थे। अजय सिंह को प्रतिमा ड्राइंग रूम में ही बैठी मिली थी। उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वो अपने पति के लिए कितनी चिंतित व परेशान थी। उसने अपनी वकील दोस्त अनीता ब्यास से फोन पर बात की थी। अनीता के पूछने पर उसने संक्षेप में कुछ बातें बताई थी उसे। उसकी उस दोस्त ने उसे आश्वस्त किया था कि वो चिंता न करे, वो उसके पति को छुड़ाने की पूरी कोशिश करेगी। उसने प्रतिमा से कहा था कि वो शाम को उससे मिलने भी आएगी।
इधर अजय सिंह जैसे ही ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ तथा प्रतिमा के बगल वाले सोफे पर बैठा वैसे ही कहीं खोई हुई प्रतिमा का ध्यान अजय सिंह की तरफ गया। उसे पहले तो यकीन नहीं हुआ किन्तु फिर एकाएक ही उसके चेहरे पर पहले हैरानी के भाव उभरे उसके बाद तुरंत ही खुशी के भावों ने उसका मुरझाया हुआ चेहरा ताज़े खिले गुलाब की मानिन्द खिला दिया।
“ओह अजय तुम आ गए।” खुशी से फूली न समाती हुई प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा था किन्तु तुरंत ही उसके चेहरे पर हैरानी व उलझन के भाव भी उभर आए, बोली___”मगर तुम वहाॅ से आ कैसे गए अजय? तुम्हें तो पुलिस का वो एसीपी गिरफ्तार करके ले गया था न? फिर तुम पुलिस से छूट कर आ कैसे गए? क्या पुलिस ने तुम्हें यूॅ ही छोंड़ दिया या फिर तुमने कुछ ऐसा वैसा किया है?”
“मैने कुछ भी ऐसा वैसा नहीं किया है प्रतिमा।” अजय सिंह ने सपाट लहजे में कहा___”बल्कि मुझे मंत्री जी ने पुलिस से ज़मानत पर छुड़ाया है। मगर…।”
“मगर क्या अजय??” प्रतिमा के माॅथे पर बल पड़ा।
“यही कि मंत्री का तो नाम ही है कि उसने मुझे पुलिस से छुड़ाया है।” अजय सिंह ने सोचने वाले भाव से कहा___”सच तो ये कि पुलिस मुझे खुद ही छोंड़ देना चाहती थी।”
“ये..ये क्या कह रहे हो तुम?” प्रतिमा हैरान___”भला पुलिस तुम्हें क्यों छोंड़ना चाहेगी? और….और ऐसा भला तुम कैसे कह सकते हो?”
“बेवकूफी भरे सवाल मत करो प्रतिमा।” अजय सिंह ने नाराज़गी के साथ कहा___”साधारण मामला होता तो सोचा भी जा सकता था कि पुलिस ने मामूली बात पर पकड़ा और फिर छोंड़ भी दिया। किन्तु ये मामला साधारण नहीं था। मैने एसीपी का रिवाल्वर छीन कर उसके सामने ही नीलम को गोली मारी थी। इस लिए इस अपराध के लिए तो मुझे लम्बे से नप जाना चाहिए था। मुझ पर साफ साफ अटेम्प्ट टू मर्डर का केस लगता। तुम अच्छी तरह जानती हो कि इस केस के तहत मेरा कानून से छूटना उस सूरत में तो नामुमकिन ही था जबकि उस संगीन अपराध का चश्मदीद गवाह खुद एसीपी ही था। इतने बड़े अपराध के बावजूद वो मंत्री मुझे बड़ी आसानी से छुड़ा लाया। वो साला समझता होगा कि ये सब उसके रुतबे तथा दबदबे का कमाल है जबकि ऐसा है नहीं। बल्कि सच्चाई यही है कि पुलिस खुद चाहती थी कि मैं सहजता से छूट जाऊॅ। इसका मतलब ये भी हुआ कि उस संगीन अपराध के लिए एसीपी ने मुझ पर कोई केस ही नहीं बनाया है।”
“बात तो तुम्हारी यकीनन सौ पर्शेन्ट सही है।” प्रतिमा के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे___”किन्तु सवाल ये है कि पुलिस ऐसा क्यों चाहेगी कि तुम उसकी गिरफ्त से आसानी से छूट जाओ? दूसरी बात, अगर पुलिस को तुम्हें इस तरह सहजता से छोंड़ ही देना था तो उस वक्त उसने तुम्हें गिरफ्तार ही क्यों किया था?”
“कमाल है।” अजय सिंह ने हैरानी से प्रतिमा की तरफ देखा, फिर बोला___”ये सब तुम पूछ रही हो प्रतिमा? जबकि तुम तो छोटी सी छोटी बात को पकड़ कर उलझी हुई बातों को सुलझाने में माहिर हो।”
“हाॅ मगर।” प्रतिमा ने कहा___”तब जब मन में तुम्हारे प्रति ऐसी चिंता नहीं होती। हलाॅकि सोच तो मैं अभी भी सकती हूॅ। किन्तु तुम खुद ही बता दो तो क्या बुराई है?”
“ये तो साबित हो चुका है कि।” अजय सिंह ने कहा___”विराज मुझसे कानूनी रूप से कोई बदला नहीं लेना चाहता। क्योंकि अगर उसे इस तरीके से लेना ही होता तो वो ये काम पहले ही कर लेता। यानी कि मेरे खिलाफ उसके पास जो सामान है उसे वो पुलिस को सौंप देता और बता देता कि ये सब उसके ताऊ यानी कि मेरा है। बस खेल खत्म। किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। मतलब साफ है कि वो जो कुछ भी करेगा अपने तरीके से तथा अपने बलबूते पर करेगा। नीलम व सोनम को यहाॅ से ले जाने वाला वाक्या जब सामने आया तो उसे बखूबी पता था कि हम उसके मंसूबों को नाकाम करने की जी तोड़ कोशिश करेंगे। ये सोच कर उसने भी अपने पक्ष को मजबूत किया। रितू ने उसे सुझाव दिया होगा कि अगर इसके बावजूद उसका पलड़ा कमज़ोर पड़ता है तो उस सूरत में वो पुलिस का सहारा लेगी। पुलिस फोर्स के आ जाने से सारा मामला ही उलट जाएगा और फिर वो बड़ी आसानी से नीलम व सोनम को अपने साथ ले जाएॅगे और कोई कुछ कर भी नहीं पाता। ऐसा हुआ भी। किन्तु उसे ये उम्मीद नहीं थी कि इस सबके बीच नीलम को मेरे द्वारा गोली भी मार दी जाएगी। उनका मकसद तो इतना ही था कि पुलिस के आने के आने के बाद जब मैं और मेरे आदमी कुछ नहीं कर पाएॅगे तो वो बड़े आराम से नीलम व सोनम को ले जाएॅगे और मेरे माॅथे पर एक और हार व नाकामी की मुहर लगा जाएॅगे। किन्तु नीलम को गोली लगने से मामला थोड़ा बिगड़ गया। उसे लगा कि सबके साथ मुझे गिरफ्तार तो होना ही था और फिर बाद मुझे छोंड़ ही दिया जाना था, किन्तु नीलम को गोली मार देने से केस बन जाने वाली बात हो गई थी। केस बन जाने की सूरत में मेरा पुलिस से छूटना मुश्किल हो जाता। जो कि विराज हर्गिज़ भी नहीं चाहता था। तब उसने रितू से कहा होगा कि वो कुछ ऐसा करे कि मुझ पर कोई केस ही न बने। उस सूरत में फिर जब कोई मुझे ज़मानत पर छुड़ाने आएगा तो मैं आसानी से छूट जाऊॅगा। विराज के इस सुझाव को या यूॅ कहो कि उसकी इस इच्छा को रितू ने तुरंत मान लिया होगा और फिर उसने ऐसा ही कोई इंतजाम कर दिया होगा। जिसका नतीजा ये निकला कि बाद में मंत्री मुझे बड़ी आसानी से छुड़ाने में कामयाब हो गया। दैट्स आल।”
“ओह तो ये बात है।” प्रतिमा ने कहा___”वैसे कमाल की बात है कि आज तुम्हारा दिमाग़ भी काफी शार्प साबित हुआ जो इतनी बारीकी से ये सब सोचा और इस सबका जूस निकाल कर भी रख दिया। मगर….।”
“अब क्या हुआ??” अजय सिंह बोल पड़ा।
“तुमने नीलम को जान से मारने की कोशिश क्यों की अजय?” प्रतिमा ने सहसा गंभीर होकर कहा___”उसने तो हमारे साथ ऐसा वैसा कुछ भी नहीं किया था। उस वक्त भी उसने तुमसे उस लहजे में सिर्फ इसी लिए बात की क्योंकि तुमने उससे बात ही ऐसे गंदे तरीके से की थी। तुम खुद सोचो अजय कि तुमने जीत के अहंकार तथा आवेश में आकर कितना ग़लत ब्यौहार किया था। सबके सामने तुम्हें अपनी ही बेटी से उस तरीके से बात नहीं करनी चाहिए थी। क्योंकि इसका असर हमारे ही आदमियों पर पड़ेगा। वो सोचेंगे कि जो इंसान सबके सामने अपनी ही बेटी के साथ ऐसी अश्लीलता और ऐसी कूरता कर सकता है वो वास्तव में कितना घटिया होगा। हाॅ अजय, इससे हमारी ही इमेज ख़राब होती है। कोई भी सभ्य लड़की ये बर्दाश्त नहीं कर पाएगी कि सबके सामने उसका ही बाप उससे ऐसी अश्लीलता से बात करके उसे जलील व शर्मसार करे।”
“यकीनन सच कह रही हो तुम।” अजय सिंह ने गहरी साॅस लेकर कहा___”बाद में मुझे भी एहसास हुआ कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। मगर उस वक्त हालात ही ऐसे बन गए थे कि मैं आपे से बाहर हो गया था। एक तो मैं उस हरामज़ादे की बातों से तथा उसे देख कर पागल हुआ जा रहा था जिसने अब तक मुझे शिकस्त ही दी थी। साला ऐसे ऐसे डाॅयलाग बोल रहा था कि मेरे अंदर उन डायलाग को सुनकर उन्हें सहने की शक्ति ही नहीं बची थी। मुझे लग रहा था कि उस हराम के पिल्ले को कैसे भी करके खत्म कर दूॅ और ऐसा होता भी अगर वहाॅ पुलिस फोर्स न आ गई होती तो। मैं अंदर ही अंदर एक और हार व नाकामी से पागल व ब्यथित हुआ जा रहा था ऊपर से मेरी दोनो बेटियों ने सामने आकर जो कुछ कहा उसने मेरे गुस्से को और भी बढ़ा दिया था। रही सही कसर नीलम ने सबके सामने मुझे थप्पड़ मार कर पूरी कर दी थी। बस उसके बाद मैंने अपना आपा खो दिया और वो सब कर बैठा। तुम खुद अंदाज़ा लगा सकती हो प्रतिमा कि उस वक्त मैं किस मानसिक हालत में रहा होऊॅगा?”
“चलो ये सुन कर अच्छा लगा कि तुम्हें नीलम को गोली मारने वाली बात पर अपनी ग़लती का एहसास हुआ।” प्रतिमा ने कहा___”किन्तु क्या तुम्हारे मन में ये विचार भी उठा है कि तुम्हें एक बार नीलम का हाल चाल जान लेना चाहिए? कुछ भी हो आख़िर वो है तो हमारी बेटी ही।”
“नहीं प्रतिमा।” अजय सिंह का चेहरा एकाएक कठोर हो गया, बोला___”मेरे लिए मेरी दोनो बेटियाॅ अब मर चुकी हैं। इस दुनियाॅ में अब तुम्हारे और हमारे बेटे के अलावा मेरा कोई नहीं है। एक बात और आज के बाद तुम मुझसे उन दोनो के बारे में कोई भी बात नहीं करोगी। ये मेरी पहली और आख़िरी वार्निंग है।”
“मर्द कभी नहीं समझ सकता एक औरत की पीड़ा को।” प्रतिमा ने सहसा भारी स्वर में कहा___”मगर मुझे तुमसे उम्मीद थी अजय कि तुम मेरी पीड़ा को समझोगे।”
“कहना क्या चाहती हो तुम?” अजय सिंह ने अजीब भाव से प्रतिमा की तरफ देखा।
“तुम जानते हो अजय कि मैं आज भी तुमसे उतना ही प्यार करती हूॅ जितना पहले करती थी।” प्रतिमा ने कहा___”और मैं जाने कितनी बार तुम्हें अपने बेपनाह प्यार का सबूत भी दे चुकी हूॅ। तुम्हारे सिर्फ एक इशारे पर मैं पराए मर्द के नीचे खुशी खुशी लेट गई। कभी इसके लिए तुमसे शिकायत नहीं की और ना ही तुमसे नाराज़ हुई। तुम्हारी हर खुशी में मैने अपनी खुशी देखी। तुम्हारी तरह सबके लिए कठोर भी बन गई। मगर मैं एक औरत के साथ साथ एक माॅ भी हूॅ अजय। औलाद चाहे जैसी भी हो वो अपनी माॅ के लिए सबसे सुंदर व सबसे अनमोल होती है। मुझे अब तक इतनी ज्यादा तकलीफ़ नहीं हुई थी किन्तु इस हादसे से हुई है। मैं मानती हूॅ कि मेरी दोनो बेटियों ने हमारे खिलाफ जा कर ग़लत किया है मगर जब ये सोचती हूॅ कि उन दोनो ने ऐसा क्यों किया तब इस क्यों के जवाब को सोच कर ही दिल दहल जाता है। आख़िर अपने सामने तो इस सच्चाई को हमें भी मानना ही पड़ेगा न कि हमने अपनी ही बेटियों के साथ तथा बाॅकी सबके साथ ग़लत सोचा और ग़लत किया भी।”
“इन सब बातों को कहने का क्या मतलब है?” अजय सिंह ने कहा___”और….और आज अचानक ये बातें ही क्यों? नहीं प्रतिमा, अब इन सब बातों को सोचने का कोई मतलब नहीं है और सोचना भी नहीं। क्योंकि अब बात बहुत आगे निकल चुकी है। अब तो इसका फैसला दो पक्षों में से किसी एक पक्ष के खत्म हो जाने पर ही होगा। उसके पहले तो कुछ हो ही नहीं सकता। इसके पहले तो ये था कि मैंने ये सब अपने बीवी बच्चों के लिए किया किन्तु अब ये भी है कि जिन चीज़ों की ख्वाहिश थी उसे हर हाल में पूरा करना है। अगर मेरे द्वारा वो सब बरबाद हुए हैं तो उनके द्वारा मेरा भी तो बहुत कुछ नुकसान हुआ। इस लिए अब ऐसी बातें अपने ज़हन में मत लाओ। ख़ैर छोंड़ो, मुझे भी ज़रा फ्रेश होना है। एक बात और, चिंता की कोई बात नहीं है। विराज भले ही मुझे शिकस्त देकर चला गया है मगर बहुत जल्द उसका भी किस्सा खत्म होने वाला है। क्योंकि मंत्री ने उसके पीछे जासूस लगाया हुआ है। वो जासूस बहुत जल्द उसके ठिकाने का पता मंत्री जी को देगा उसके बाद मंत्री विराज के ठिकाने पर धावा बोल देगा। उस साले विराज के साथ साथ तुम्हारी दोनो बेटियों का भी खेल खत्म हो जाएगा।”
ये सब कहने के बाद अजय सिंह उठा और अंदर कमरे की तरफ बढ़ गया। जबकि उसकी बातें सुनने के बाद प्रतिमा पहले तो हैरान हुई फिर सामान्य हो कर बैठी रही। चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते रहे।
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उस वक्त रात के दो बज रहे थे।
गुनगुन स्थित मंत्री दिवाकर चौधरी के बॅगले के पिछले भाग पर जहाॅ कि अशोक व देवदार जैसे पेड़ लगे हुए थे दो काले साए अॅधेरे में छिपे खड़े थे। दोनो के ही जिस्मों पर काला स्याह लबादा था। यहाॅ तक कि दोनो के चेहरे तथा हाॅथ तक काले कपड़ों से ढॅके हुए थे। चेहरे व सिर पर चढ़े काले मास्क से सिर्फ उनकी ऑखें ही झाॅक रही थी या फिर ये भी कि जब वो दोनो बात करने के लिए मुह खोलते तो उनके दाॅत चमक उठते थे। कहने का मतलब ये कि वो दोनो ही सिर से लेकर पाॅव तक काले किन्तु चुस्त दुरुस्त कपड़ों से ढॅके हुए थे।
बॅगले के चारो तरफ बाउण्ड्री वाल थी जिसमें थोड़ी थोड़ी दूरी पर रोशनी के लिए मध्यम साइज के एलईडी बल्ब लगे हुए थे। बाउण्ड्री वाल के अंदर तथा बाहर दोनो तरफ हाॅथों में गन लिए गार्ड्स भी खड़े नज़र आ रहे थे। रात के इतने समय भी वो सब मुस्तैदी से खड़े थे। उन सभी के जिस्मों पर भी काले ही कपड़े थे तथा सिर पर काली कैप थी।
बॅगले का मुख्य दरवाजा जो कि खालिश स्टील का ही था। उस दरवाजे के पास भी दोनो तरफ गनमैन तैनात थे। ख़ैर हम बात कर रहे थे उन दो रहस्यमय सायों की। ये दोनो ही साए क़रीब दस मिनट से उन पेड़ों के पास अॅधेरे में छिपे खड़े थे। बारह फीट ऊॅची बाउण्ड्री वाल को दोनो ने बड़ी ही दक्षता से लाॅघ लिया था। जिसके लिए उन्हें रस्सी की मदद लेनी पड़ी थी। उनकी चारो ऑखें बड़ी बारीकी से चारो तरफ का अध्ययन कर रही थीं। दोनो ने एक बात नोट की कि जितने भी गनमैन वहाॅ तैनात थे वो सब अपनी जगह पर ही कायम थे। यानी वो सब अपनी पोजीशन नहीं बदलते थे। सिर्फ दो ही ऐसे गनमैन थे जो हर पाॅच मिनट में इस तरफ आते थे और फिर इधर उधर सरसरी सी नज़र डाल कर वापस लौट जाते थे।
बाउण्ड्री वाल से बॅगले की इमारत की दूरी लगभग बीस फुट थी। नीचे ज़मीन पर चारो तरफ विदेशी घाॅस उगी हुई थी। बाउण्ड्री वाल की तरफ ही ये सारे पेड़ लगे हुए थे। हलाॅकि बीच बीच में ऐसे छोटे छोटे पौधे भी लगे हुए थे जो अक्सर बाग़ों की शोभा बढ़ाने के उपयोग में आते थे। किन्तु ये पौधे दो तरफ ही दिख रहे थे। सामने की तरफ विदेशी घाॅस तो थी ही साथ ही बीचो बीच सफेद मारबल लगा हुआ था जो कि मुख्य दरवाजे तक था।
इस बार जब वो दोनो गनमैन आकर वापस लौटे तो उन दोनो सायों की नज़रें आपस में मिलीं और फिर दोनो ही बारी बारी पेड़ के पास से निकल कर बड़ी तेज़ी से इमारत की दीवार की तरफ उस हिस्से की तरफ बढ़े जहाॅ पर लगभग पंद्रह फुट की ऊॅचाई पर एक शीशे की खिड़की थी तथा उस खिड़की के सामने ही छोटी सी बालकनी थी। खिड़की पर देखने से ऐसा प्रतीत होता था जैसे अंदर अॅधेरा हो। बालकनी में भी स्टील की रेलिंग लगी हुई थी। ये हिस्सा बॅगले के बाएॅ साइड था।
बालकनी के नीचे पहुॅचते ही एक साए ने तुरंत ही अपने हाॅथ में ली हुई रस्सी को एक हाॅथ से गोल गोल घुमाया और फिर तेज़ी से ऊपर की तरफ उछाल दिया। रस्सी बड़े वेग से लहराती हुई ऊपर की तरफ गई और रेलिंग के ऊपरी भाग से ऊपर उठ कर वापस नीचे की तरफ आने को हुई तो वो रेलिंग के दूसरे हिस्से से पर फॅस गई। हलाॅकि रस्सी के छोर पर लगे लोहे के मामूली से राॅड से आवाज़ हुई किन्तु वो आवाज़ बहुत धीमी हुई थी। क्योंकि वो राॅड स्टील में लगने के साथ ही नीचे से ऊपर की तरफ उठा तो वो बीच से निकल कर नीचे दीवार पर टकरा गया था।
“जल्दी करो।” दूसरे साए ने धीमी आवाज़ में उस पहले साए से कहा जिसने रस्सी को ऊपर बालकनी की तरफ उछाला था, बोला___”हमें पाॅच मिनट से पहले ऊपर पहुॅचना होगा। वरना वो दोनो गनमैन फिर से इधर आ जाएॅगे।”
“बस हो ही गया है।” पहले साए ने ऊपर देखते हुए अपने एक हाॅथ को हल्का सा झटका दिया। परिणामस्वरूप दीवार के पास ही झूल रहा वो मामूली सा राॅड तेज़ी से नीचे सरका और कुछ ही पलों में पहले वाले साए के हाॅथ में आ गया। राॅड के हाॅथ में आते ही उसने दूसरे साए की तरफ देख कर बोला___”गो।”
पहले साए की बात सुनते ही दूसरा साया तेज़ी से आगे बढ़ा और रस्सी के दोनो भागों को पकड़ कर पहले उसे हल्का सा अपनी तरफ खींचा। जैसे चेक कर रहा हो कि सब ठीक है कि नहीं। उसके बाद वो दोनों हाॅथों से रस्सी को थोड़ा और ऊपर से पकड़ा और फिर झूल गया। कुछ ही पलों में वो रस्सी में झूलता हुआ ऊपर बालकनी के पास पहुॅच गया। नीचे खड़ा पहला साया चारो तरफ देख रहा था। तभी ऊपर पहुॅच गए साये ने रस्सी को झटका दिया तो नीचे खड़े साए ने उसकी तरफ देखा। ऊपर पहुॅच चुके साए ने हाॅथ के इशारे से उसे ऊपर आने को कहा।
उसका इशारा मिलते ही पहला वाला साया भी रस्सी को पकड़ कर ऊपर झूलते हुए कुछ ही पलों में पहुॅच गया। उसके पहुॅचते ही दूसरे साए ने रस्सी को ऊपर खींच लिया। तभी पहले वाले साए ने नीचे देखा, वो दोनो गन मैन इसी तरफ आ रहे थे। ये देख कर दोनो साए वहीं बालकनी पर बैठ कर छिप गए। थोड़ी ही देर में उन्होंने देखा कि वो दोनो गन मैन वापस जा रहे हैं तो ये दोनो भी उठ गए।
“चलो अब काम पर लग जाओ।” दूसरे साए ने धीमी आवाज़ में कहा___”किन्तु सावधानी से।”
“जो हुकुम।” पहले साए ने अदब से सिर को हल्का सा खम करते हुए धीमी आवाज़ में कहा।
पहले वाले साए ने पलट कर खिड़की को देखा। उस खिड़की पर शीशा लगा हुआ था तथा दो पल्लों की खिड़की थी। पहले साए ने खिड़की में हाॅथ लगा कर उसे अंदर की तरफ हल्के से पुश किया तो कुछ न हुआ। मतलब साफ था खिड़की के दोनो पल्ले अंदर से बंद थे।
“ये अंदर से बंद है।” पहले वाले साए ने पलट कर दूसरे साए से कहा___”शुकर है कि हम काॅच काटने वाला हीरा लेकर आए थे, लाओ उसे।”
“ऐसे काम के लिए।” दूसरे साए ने धीरे से कहा___”ऐसी चीज़ की ज़रूरत तो पड़ती ही है।”
दूसरे साए ने कहा और अपने काले लबादे से हीरा निकाल कर पहले वाले साए के हाथ में दे दिया। हीरा लेकर पहला साया वापस मुड़ा और दाहिने पल्ले में एक हाॅथ जमा कर हीरे से पल्ले पर लगे शीशे को खास तरीके से काटना शुरू कर दिया। उसके दूसरे हाॅथ में एक अजीब सी चीज़ थी जो कि शीशे से ही चिपकी हुई थी। कुछ ही देर में शीशे का एक आयताकार टुकड़ा कट गया। पहले साए ने अपने दूसरे हाॅथ को अपनी तरफ बहुत ही सावधानी से खींचा। नतीजा ये हुआ कि वो कटा हुआ टुकड़ा उस अजीब सी चीज़ से चिपका हुआ अपनी जगह से बाहर आ गया।
अभी पहला साया उस टुकड़े को खींचा ही था कि दूसरे साए ने धीरे से कहा कि जल्दी से किन्तु सम्हल कर बैठ जाओ, क्योंकि नीचे वो दोनो गन मैन इस तरफ वापस आ गए हैं। अगर हम दोनो बालकनी में खड़े रहेंगे तो संभव है कि वो ऊपर देखें और फिर उनकी नज़र हम दोनो पर पड़ जाए। साये की बात सुन कर दोनो ही वहीं पर दुबक कर बैठ गए थे। ख़ैर कुछ ही देर बाद जब वो दोनो गन मैन वापस चले गए तो ये दोनो साए भी उठ कर खड़े हो गए।
पहले वाले साए ने काॅच का वो टुकड़ा बैठे समय ही बालकनी में एक तरफ रख दिया था। अतः अब उसने खिड़की के कटे हुए हिस्से में अपना दाहिना हाॅथ सावधानी से डाला और फिर अंदर से ही नीचे की तरफ लाकर उसने खिड़की की कुण्डी को तलाशा और उसे ऊपर उठा कर खोल दिया। उसके बाद उसने अंदर से ही दूसरे पल्ले की कुण्डी को भी खोल दिया। साये को अंदर की तरफ पर्दा लगा होने का भी पता चला। ख़ैर, अपना हाॅथ सावधानी से बाहर निकाल कर उसने खिड़की के दोनो पल्लों को अंदर की तरफ पुश किया तो हल्की सी आवाज़ हुई किन्तु दोनो ही पल्ले अंदर की तरफ खुले न। पहले साये को समझते देर न लगी कि पल्लों के अंदर की तरफ ऊपर भी कुण्डियाॅ हैं जो कि बंद हैं। अतः साए ने फिर से उसी कटे हुए भाग से अंदर हाथ डाला और फिर ऊपर हाॅथ करके ऊपर की कुण्डी को नीचे की तरफ हल्के से खिसका दिया। ऐसा ही उसने दूसरे पल्ले पर भी किया।
थोड़ी ही देर में खिड़की के दोनो पल्ले अंदर की तरफ पुश किये जाने से खुलते चले गए। ये देख कर दोनो सायों के होठों पर मुस्कान उभर आई। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि खिड़की के अंदर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि अॅधेरा था। हलाॅकि खिड़की में अंदर की तरफ पर्दे लगे होने की वजह से भी अॅधेरे का आभास हो सकता था। अतः पहले साए ने पल्ले खोलने के बाद अॅधेरे में डूबे पड़े कमरे की तरफ अपने कान लगा दिया। कदाचित इस लिए कि वो अंदर की किसी भी चीज़ की आहट को सुन सकें। किन्तु अंदर से कोई भी बारीक से बारीक आवाज़ नहीं आ रही थी। मतलब साफ था कि कमरा पूरी तरह खाली था। उसमें किसी भी आदमी का कोई वजूद नहीं था।
पहले साए ने एक छोटी सी पेंसिल टार्च अपने लबादे से निकाली और कमरे के अंदर की तरफ एक हाॅथ से पर्दे को हटा कर उसे रौशन किया। पेंसिल टार्च के प्रकाश का हल्का सा फोकस कमरे के अंदर की हर चीज़ पर साए के द्वारा हाॅथ से घुमाने पर घूमने लगा। कमरे के बाएॅ तरफ ही एक आलीशान बेड नज़र आया। उसके कुछ ही फाॅसले पर दो सोफे रखे नज़र आए। खिड़की के नीचे लगभग तीन फुट की दूरी पर कमरे का फर्स था जिसमें बेहतरीन टाइल्स लगी हुई नज़र आई। सारी चीज़ों को देखने के बाद पहला साया आराम से पर्दा हटा कर खिड़की के रास्ते कमरे में आ गया। उसके बाद दूसरा साया भी आ गया।
कमरे में आते ही दूसरे साए ने खिड़की के दोनो पल्ले बंद किये और फिर सावधानी से पर्दा खींच दिया। उसके बाद पेंसिल टार्च की मदद से ही हर जगह को बारीकी से देखने लगे। दीवार पर लगी पेंटिंग्स से ही पता चला कि ये कमरा मंत्री के बेटे सूरज चौधरी का है। दीवार पर कई जगह उसकी खुद की भी फोटो लगी हुई थी साथ ही कई जगह ऐसी पेंटिंग्स भी लगी हुई थी जो कि लड़कियों व औरतों की नग्नता को उजागर कर रही थी।
“ज़रा चेक करो कि कमरे का दरवाजा अनलाॅक है या नहीं।” दूसरे साए ने धीरे से कहा___”और अगर अनलाॅक है तो तुम यहाॅ से उस कमरे में जाने की कोशिश करो जो कमरा खुद मंत्री का हो। वहाॅ जा कर बारीकी से हर चीज़ को देखो। इस वक्त मंत्री अपने इस आवास पर नहीं है। किसी ज़रूरी काम से बाहर गया हुआ है। फिर भी ज़रा सावधानी से काम लेना। अब जाओ।”
दूसरे साए की बात सुन कर पहला साया कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजे के पास पहुॅच कर उसने दरवाजे के हैण्डल को पकड़ कर घुमाया मगर वह घूमा नहीं। इसका मतलब कमरा बाहर से लाॅक था। बात भी जायज़ थी, मंत्री का बेटा तो यहाॅ था नहीं इस लिए मंत्री ने या फिर उसके किसी कर्मचारी ने इस कमरे को बाहर से लाॅक कर दिया होगा। ख़ैर, दरवाजे को लाॅक जान कर वो साया पलट कर दूसरे साए के पास आया और उसे बताया कि दरवाजा बाहर से लाॅक है। उसकी बात सुन कर दूसरे साए ने अपने लबादे से निकाल उसके हाॅथ में कोई चीज़ दी।
पहले साए ने पेंसिल टार्च की रोशनी में उस चीज़ को देखा तो अनायास ही उसके होठों पर मुस्कान उभर आई। दरअसल वो चीज़ “मास्टर की” थी। फिर क्या था, मास्टर की लेकर पहला साया तुरंत दरवाजे के पास गया और दरवाजे पर लगे हैण्डिल के कीहोल में उस मास्टर की को डाला और विपरीत दिशा में घुमा दिया। नतीजा ये हुआ कि दरवाजा अनलाॅक हो गया। ये देख कर वो साया एक बार फिर मुस्कुराया और फिर दरवाजे को अपनी तरफ सावधानी से खींचा। दरवाज़े के बाहर गैलरी थी जो कि एलईडी ट्यूब लाइट तथा बल्बों के प्रकाश से रौशन थी।
बाहर बल्बों का प्रकाश देख कर साया अपनी जगह रुक गया। कदाचित वो सोचने लगा था कि रोशनी में वो आगे कैसे बढ़े? किन्तु शायद बढ़ना ज़रूरी था। अतः उसने दरवाजे से अपना सिर बाहर निकाल कर गैलरी के दोनों तरफ देखा। गैलरी पूरी तरह सुनसान पड़ी थी। हलाॅकि गैलरी बहुत लम्बी नहीं थी, बल्कि कुछ ही दूरी पर वो विपरीत दिशा में मुड़ गई थी। साये ने कुछ देर सोचने में लगाया और फिर बड़ी सावधानी से दरवाजे से बाहर गैलरी में आ गया। सनसान गैलरी पर सावधानी से चलते हुए वो मोड़ तक आ गया। मोड़ पर ठिठक कर उसने दूसरी तरफ की किसी भी आहट को सुनने के लिए दीवार के किनारे की तरफ अपना कान सटा दिया।
थोड़ी ही देर में वह अपनी जगह से हिला और गैलरी के मोड़ पर मुड़ गया। किन्तु थोड़ी ही दूर जाने के बाद उसे वापस लौटना पड़ा क्योंकि आगे गैलरी समाप्त थी। आगे कोई रास्ता नहीं था। साये को समझ आ गया कि वह दूसरी तरफ आ गया है। तभी तो उसे यहाॅ पर कहीं कोई दूसरे कमरे का दरवाजा नहीं दिखा था। ख़ैर, वापस उसी जगह आकर वह दूसरी साइड वाली गैलरी की तरफ बढ़ चला। आठ दस कदम चलने के बाद ही उसे अंदर की तरफ वाली बालकनी की रेलिंग नज़र आई। रेलिंग के पास पहुॅच कर उसने देखा कि बालकनी दोनो तरफ थी लगभग बीस कदम की दूरी पर उसे नीचे जाने के लिए सीढ़ियाॅ नज़र आई। रेलिंग के दूसरी तरफ नीचे काफी बड़ा ड्राइंगरूम नज़र आया। अपने स्थान पर खड़ा साया कुछ देर तक कुछ सोचता रहा फिर वह बाएॅ साइड की तरफ बढ़ चला। कुछ ही दूरी पर उसे एक और गैलरी नज़र आई। उसने गैलरी की तरफ देखा तो उसे एक कमरे का दरवाजा नज़र आया। दरवाज़ा देख कर वह तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ा। थोड़ी ही देर में वो दरवाजे के पास पहुॅच गया। दरवाजे के हैण्डिल को पकड़ कर उसने उसे घुमाया तो पता चला कि वो लाॅक है। ये देख कर उसने फौरन ही अपने लबादे से वो मास्टर की निकाली और की होल में चाभी डाल कर घुमा दिया। दरवाजा हल्की सी आवाज़ के साथ खुल गया।
उसने बहुत ही आहिस्ता से दरवाजे को अंदर की तरफ पुश किया तो पता चला अंदर अॅधेरा है। साया कुछ देर तक किसी तरह की आवाज़ को सुनने की कोशिश करता रहा मगर कोई आवाज़ उसे अंदर की तरफ से सुनाई नहीं दी। ये महसूस कर उसने लबादे से पैंसिल टार्च निकाली और उसके प्रकाश को कमरे के अंदर की तरफ फोकस किया। फोकस जिस चीज़ पर पड़ा वो बेड था। किन्तु बेड पर कोई इंसान सोया हुआ नज़र न आया। साया बेख़ौफ अंदर दाखिल हो गया। कमरे के अंदर हर चीज़ को उसने पैंसिल टार्च की रोशनी में देखा। मगर उसे ऐसा कुछ नज़र न आया जिसे शायद उसे तलाश थी।
लगभग दस मिनट बाद वह कमरे से वापस बाहर आ गया। अभी वह दरवाजे से बाहर निकला ही था किसी से टकरा गया। किसी दूसरे ब्यक्ति के होने की आशंका से ही वह बुरी तरह हड़बड़ा गया। किन्तु जैसे ही टकराने वाले पर उसकी नज़र पड़ी तो सामान्य हो गया। टकराने वाला वो दूसरा साया था जो उसके साथ ही यहाॅ इस तरह आया था।
“क्या हुआ?” उस दूसरे साये ने धीमी आवाज़ से पूछा___”कुछ मिला क्या??”
“नहीं।” पहले वाले ने कहा___”अभी तो यही नहीं पता चल रहा कि मंत्री का निजी कमरा कौन सा है? वो यहाॅ ऊपर है या फिर नीचे है।”
“पता तो करना ही पड़ेगा।” दूसरे साए ने कहा___”मंत्री के परिवार में उसके दो बच्चे ही हैं। बीवी कुछ साल पहले ही ईश्वर को प्यारी हो चुकी है। ख़ैर, इस वक्त क्योंकि मंत्री अपने आवास पर नहीं है इस लिए ये बॅगला अंदर से खाली ही है। बाहर गनमैन तैनात हैं। हमें जल्द से जल्द मंत्री के कमरे को ढूॅढ़ना होगा।”
“ठीक है।” पहले वाले ने कहा___”मैं नीचे की तरफ चेक करता हूॅ।”
“ओके।” दूसरे वाले ने कहा___”अगर तुम्हें या मुझे मंत्री का कमरा मिलता है तो तुरंत फोन पर मिस काल देना है। फोन बाइब्रेशन पर है अतः बाइब्रेशन से ही पता चल जाएगा। अब जाओ तुम।”
दूसरे साए की बात सुन कर पहला साया सीढ़ियों की तरफ तेज़ी से बढ़ गया। आख़िर काफी मसक्कत के बाद मंत्री का कमरा मिल ही गया। मंत्री का कमरा नीचे ही था। पहले साये ने दूसरे साये को फोन पर मिस काल देकर सूचित कर दिया। थोड़ी ही देर में वो दोनो मंत्री के कमरे में थे।
मंत्री चूॅकि बॅगले में नहीं था इस लिए बॅगले के अंदर कोई था ही नहीं। बॅगले के बाहर गनमैन ज़रूर तैनात थे किन्तु उनमें से किसी को भी इस बात का अंदेशा नहीं था कि बॅगले के अंदर दो चोर बड़ी सफाई से उनकी ऑखों में धूल झोंक कर घुस चुके हैं। ख़ैर, दोनो सायों ने मंत्री के कमरे में जाकर सबसे पहले तो दरवाजे को अंदर से बंद किया उसके बाद जिस काम के लिए आए थे उस काम में लग गए। कमरे में पहले से ही नाइट बल्ब जल रहा था। किन्तु पहले वाले साए ने तेज़ रोशनी के लिए मेन बल्ब भी जला दिया। अब कमरे में तेज़ प्रकाश था तथा कमरे में रखी हर चीज़ स्पष्ट नज़र आने लगी थी।
दोनो ने बहुत ही बारीकी से हर चीज़ को देखना शुरू कर दिया। दोनो के हाव भाव से ऐसा लग रहा था जैसे वो इस काम में काफी माहिर हों। लगभग बीस मिनट की मेहनत के बाद वो दोनो ही इस तरह एक दूसरे के पास खड़े हो गए जैसे किसी चीज़ के न मिलने से बेहद चिंतित व परेशान हो गए हों।
“लगता है यहाॅ कुछ नहीं है।” पहले साए ने धीमी आवाज़ से कहा___”मंत्री ने उन चीज़ों को ज़रूर किसी ऐसी जगह छुपाया होगा जहाॅ पर वो चीज़ें किसी बाहरी आदमी को किसी सूरत में न मिल सकें।”
“वो चीज़ें ऐसी हैं भी नहीं जो इतनी आसानी से हमें मिल जाएॅगी।” दूसरे साये ने कहा___”ऐसी चीज़ों को तो हर इंसान सात तिज़ोरियों के अंदर ही छुपा कर रखता है। इस लिए हमें ऐसी ही किसी जगह को तलाश करना होगा जहाॅ पर हमारी नज़रें पड़ी तो हों किन्तु हमने उस जगह को अंजाने में नज़रअंदाज़ कर दिया हो।”
“हाॅ ये भी सही कहा।” पहले साए ने इधर उधर नज़रें घुमाते हुए कहा___”तो ठीक है एक बार फिर से हम हर जगह बारीकी से चेक करते हैं। संभव है कि इस बार हमारे हाॅथ कुछ लग ही जाए।”
पहले साए की बात सुन कर दूसरे साए ने सहमति में सिर हिलाया और फिर से वो हर जगह का बारीकी से मुआयना करने में लग गया। कमरे में मौजूद हर चीज़ बेसकीमती थी। फिर चाहे वो मंत्री का बेड हो, सोफे हों, फर्श में बिछा कालीन हो या फिर दीवारों पर लगी पेंटिंग्स।
पहला साया बेड के दाहिने साइड की दीवार की तरफ देख रहा था। उस दीवार पर हर दीवार की तरह ऊॅचाई पर पेंटिंग्स लगी हुई थी किन्तु पेंटिंग्स के नीचे दीवार पर नीचे से लगभग छः फुट की ऊॅचाई पर ऐसे नक्काशी की गई थी जैसे किसी बड़े से आदम कद शीशे के फ्रेम पर खूबसूरत नक्काशी की हुई होती है। दरअसल दीवार पर वो एक फ्रेम जैसा ही कुछ बना हुआ था। किन्तु फ्रेम के अंदर का भाग खाली था। यानी कि उसमें कोई चित्र वगैरह नहीं बना हुआ था। बल्कि ऐसा लगता था जैसे कि किसी बड़ी सी चीज़ का सिर्फ फ्रेम बना दिया गया हो। पहला साया दीवार में बने उस खाली फ्रेम को बड़े ध्यान से देखने लगा। एकाएक ही उसकी ऑखें सिकुड़ीं। उसने तुरंत ही दीवार के इधर उधर किसी खास चीज़ की तलाश में अपनी नज़रें दौड़ाईं।
दीवार पर बने उस फ्रेम के बाईं तरफ एक मध्यम साइज़ की पेंटिंग लगी हुई थी। पहला साया जाने क्या सोच कर उस पेंटिंग की तरफ बढ़ा। पेंटिंग के पास पहुॅच कर उसने अपने एक हाॅथ से पेंटिंग के फ्रेम को पकड़ कर बाईं तरफ किया। पेंटिंग के निचले भाग के बाईं तरफ होते ही जो चीज़ नज़र आई उसे देख कर साये की ऑखें पहले तो हैरत से फटीं फिर एकाएक ही उनमें चमक आ गई। उसने तुरंत ही पलट कर दूसरे साये को धीमी आवाज़ देकर अपने पास बुलाया।
दूसरे साये के पास आते ही उसने उस साये को भी पेंटिंग के पीछे दीवार पर नज़र आ रही उस चीज़ को दिखाया। दरअसल वो चीज़ एक छोटे से कम्प्यूटर के माॅनीटर जैसी थी। ऊपरी तरफ दीवार से चिपकी हुई स्क्रीन और स्क्रीन के नीचे कीबोर्ड। स्क्रीन के ऊपरी भाग पर दो कलर की बत्तियाॅ थीं। जिनमें से एक हरी तथा दूसरी लाल कलर की थी। लाल कलर वाली बत्ती इस वक्त रौशन थी। स्क्रीन पर लिखा था “प्लीज इन्टर योर पासवर्ड”।
“मुझे लगता है कि।” पहले साए ने धीमे स्वर में कहा___”ये किसी ऐसी जगह के लिए है जहाॅ पर जाने के लिए इसमें सबसे पहले पासवर्ड डालना पड़ता है।”
“बिलकुल ठीक कहा तुमने।” दूसरे साये ने दीवार पर इधर उधर नज़र दौड़ाते हुए कहा____”किन्तु यहाॅ पर ऐसा तो कुछ नज़र नहीं आ रहा जिससे ऐसा प्रतीत होता हो कि यहाॅ से कहीं दूसरी जगह जाने का कोई रास्ता हो।”
“ज़रा इस चीज़ को देखिए।” पहले साए ने दाहिनी तरफ दीवार पर नज़र आ रहे उस खाली फ्रेम की तरफ इशारा करते हुए कहा___”इस दीवार पर ये छः फीट ऊॅचा तथा साड़े तीन फीट चौड़ा फ्रेम भला किस उद्देश्य से बनवाया गया होगा? अगर ये मान कर चलें कि ये दीवार पर महज शोभा बढ़ाने के लिए बनवाया गया है तो फिर इसी तरह के सेम फ्रेम दो तरफ की दीवारों पर भी बने होने चाहिए थे। एक तरफ तो कमरे का दरवाजा है। अतः उस तरफ ना भी बनवाया जाता तो कोई बात न थी। किन्तु ऐसा फ्रेमनुमा डिजाइन सिर्फ इसी एक तरफ की दीवार पर क्यों बनवाया गया हो सकता है?”
“यकीनन तुम्हारी बात में प्वाइंट है।” दूसरे साए ने दीवार पर बने उस फ्रेम की आकृति को गौर से देखते हुए कहा___”अगर इस स्क्रीन से ये पता चलता है कि ये किसी चीज़ के लिए पासवर्ड माॅग रहा है तो ये भी हो सकता है कि यहाॅ पर कोई ऐसी जगह हो सकती है जहाॅ जाने के लिए हमें इसमें पासवर्ड डालना होगा। इसका मतलब ये हुआ कि यहाॅ पर कहीं कोई दूसरी जगह भी है जहाॅ जाने का रास्ता बना होगा। जोकि फिलहाल हमें नज़र नहीं आ रहा। हलाॅकि ऐसा भी हो सकता है कि ये माॅनीटर सिस्टम किसी और ही चीज़ के लिए हो।”
“बिलकुल हो सकता है।” पहले साए ने कहा___”किन्तु इस कमरे में ऐसे खास सिस्टम का उपयोग भला किस चीज़ के लिए हो सकता है? मुझे लगता है कि ये इलेक्ट्रिक सिस्टम लगाया ही इस लिये गया है कि इसके माध्यम से ही हमें कहीं जाने का रास्ता नज़र आए। कहने का मतलब ये कि अगर हम इस स्क्रीन पर सही पासवर्ड डाल दें तो मुमकिन है कि किसी जगह जाने का रास्ता नज़र आ जाए या फिर रास्ता ही बन जाए। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि कुछ और ही हो जाए।”
“हाॅ ये सही कहा तुमने।” दूसरे साए ने कहने के साथ ही दीवार पर बने उसी फ्रेम की तरफ पुनः देखा___”कहीं ऐसा तो नहीं कि ये फ्रेम ही वो रास्ता हो। बेशक ऐसा ही हो सकता है क्योंकि ये फ्रेम नीचे फर्श से ऊपर की तरफ है। दूसरी बात इसका साइज बिलकुल वैसा ही है जैसे किसी दरवाजे का होता है। वरना सोचने वाली बात है कि अगर ऐसा कोई फ्रेम सिर्फ कमरे की शोभा बढ़ाने के लिए बनाया गया होता तो ये फर्श से लगा हुआ नहीं होता बल्कि फर्श से एक या दो फीट की ऊॅचाई से बना हुआ होता। तीसरी बात ये बनाया ही इस तरह गया है कि आम इंसान इसे देख कर यही समझेगा कि ये सिर्फ एक फ्रेम ही है जो कि कमरे की शोभा बढ़ाने के लिए एक तरफ की दीवार पर बनाया गया है।”
“इसका मतलब कि ये साबित होता हुआ नज़र आ रहा है कि ये फ्रेम कहीं जाने का दरवाजा ही है।” पहले साये ने कहा___”और ये तभी खुलेगा जब हम इस इलेक्ट्रिक सिस्टम में पासवर्ड डालेंगे?”
“करेक्ट।” दूसरे साये ने कहा____”अब सवाल ये है कि इसका पासवर्ड क्या होगा?”
“इसका कीबोर्ड बिलकुल वैसा ही है जैसे किसी कम्प्यूटर का होता है।” पहले साये ने उस स्क्रीन से लगे ही कीबोर्ड की तरफ देखते हुए कहा___”इसका पासवर्ड किसी के नाम से अथवा किन्हीं संख्याओं से भी हो सकता है।”
“बेशक हो सकता है।” दूसरे साए ने कहा___”और ये हमारे लिए काफी चिंता का विषय भी हो गया है। क्योंकि अगर हमें इसका सही पासवर्ड न मिला तो ये दरवाजा नहीं खुलेगा। मुझे पूरा यकीन है कि इस दरवाजे के पार ही ऐसी वो जगह है जहाॅ पर हमें वो चीज़ें मिल सकती हैं जिसके लिए हम यहाॅ आए हैं। हलाॅकि ये सिर्फ हमारा अंदेशा ही है कि यहाॅ पर कोई दरवाजा हो सकता है जहाॅ पर जाने के लिए ये इलेक्ट्रिक सिस्टम लगाया गया है। ऐसा भी हो सकता है कि इसका उपयोग इसके अलावा भी किसी और चीज़ के लिए हो। किन्तु एक बार चेक तो करना ही चाहिए हमें। संभव है कि वैसा ही हो जैसे का हमें अंदेशा है।”
“कुछ भी हो सकता है। मगर चेक तो यकीनन करना ही पड़ेगा। ख़ैर, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इसका पासवर्ड यहीं कहीं मौजूद हो?” पहले साये ने कहा___”मेरे कहने का मतलब है कि इसका पासवर्ड मंत्री ने आलमारी में ही कहीं छुपा कर रखा हुआ हो। मैं ऐसा ये सोच कर कह रहा हूॅ कि जब ये सिस्टम लगवाया गया होगा तब इसका सबकुछ नया नया ही रहा होगा। शुरू शुरू में किसी भी चीज़ का पासवर्ड हमें इतना जल्दी याद नहीं होता और अगर याद हो भी गया तो उसके भूल जाने के चान्सेस ज्यादा रहते हैं। ऐसा हम सबके साथ होता है। इस लिए ऐसा मुमकिन है कि जैसे हम किसी चीज़ का पासवर्ड अलग से लिख कर उसे सम्हाल कर रख लेते हैं वैसे ही मंत्री ने भी किया हो।”
“सही कहा तुमने।” दूसरे साये ने कहा___”ऐसा हो सकता है। मंत्री ने इसका पासवर्ड यहीं कहीं छुपा कर रखा होगा। अतः हम कमरे में रखी इन आलमारियों की तलाशी लेते हैं।”
दूसरे साये की बात सुन कर पहले साये ने हाॅ में सिर हिलाया और फिर दोनो ही कमरे में रखी तीन तीन आलमारियों की तरफ बढ़े। उन तीन आलमारियों में एक अनलाॅक थी जबकि बाॅकी की दो आलमारियाॅ लाॅक थी। दोनो ने एक एक लाॅक आलमारी को सम्हाल लिया। मास्टर की से दोनो आलमारियों को अनलाॅक किया और फिर उसके अंदर तलाशी अभियान शुरू कर दिया।
दोनो ही आलमारियों में कई तरह के काग़जात भरे पड़े थे। जिन्हें उलट पलट कर वो दोनो ही साये बारीकी से देख रहे थे। किन्तु उन कागजातों में उन्हें उस सिस्टम का पासवर्ड जैसा कुछ न मिला। आलमारी के अंदर ही एक और लाॅकर था जोकि बंद था। उन दोनों ने उन लाॅकरों को भी मास्टर की से खोला। अंदर वाले लाॅकर्स में काफी सारी ज्वेलरी तथा बैंक की काॅपी पासबुक वगैरह थी तथा काफी सारे नोटों के बंडल भी थे।
तभी दूसरे साये को उस लाॅकर से कुछ मिला जिसे उसने लाॅकर से बाहर निकाला। वो एक डायरी थी। दूसरे साये ने उस डायरी को खोल कर उसके हर पेज को बारीकी से देखना शुरू कर दिया। उसमें काफी कुछ चीज़ें लिखी हुई थी। काफी सारे पेज़ देखने के बाद सहसा एक पेज पर साये की नज़र ठहर गई।
“मिल गया।” साये के मुख से ज़रा ऊॅची आवाज़ निकल गई। मारे खुशी के उसे होश ही नहीं रह गया था कि वो दोनो इस वक्त मंत्री के बॅगले में चोर की हैंसियत से आए हुए हैं। वो तो शुकर था कि बॅगले के अंदर कोई था नहीं वरना उसकी इस आवाज़ से ज़रूर किसी न किसी को पता चल जाता। ख़ैर उसकी आवाज़ से और तो किसी को पता न चला किन्तु पहला साया ज़रूर चौंक कर उसकी तरफ देखने लगा था। दूसरे साये को भी तुरंत ही ख़याल आ गया था कि खुशी के आवेश में उसके मुख से कुछ ज्यादा ही ऊॅची आवाज़ निकल गई थी। दोनो ही कुछ देर अपनी साॅसें रोंके खड़े रहे।
पहला साया दूसरे वाले के पास आया और फिर उसकी तरफ देख कर बोला___”बाहर जो गनमैन तैनात हैं उन्हें यहाॅ बुलाना है क्या?”
“साॅरी।” दूसरा साया बोला___”मारे खुशी के याद ही नहीं रह गया था कि हम यहाॅ चोर बन कर आए हुए हैं। ख़ैर, ये देखो। हमें जिसकी तलाश थी वो इस डायरी में है। तुम्हारा कहना बिलकुल सही था कि मंत्री ने उस सिस्टम का पासवर्ड अलग से कहीं लिख कर छुपाया हुआ होगा।”
“तो फिर देर किस बात की है?” पहले साये ने धीमें स्वर में मुस्कुराते हुए कहा___”हमें यहाॅ पर आए हुए काफी समय हो गया है। इस लिए अब हमें जल्दी जल्दी अपने काम को अंजाम देना होगा। ऐसा न हो कि मंत्री वापस लौट आए यहाॅ। साला दुर्भाग्य को कोई नहीं जानता कि कब किसके सिर पर आ धमके।”
“सही कहा तुमने।” दूसरे साये ने कहा___”आओ फिर शुरू करते हैं।”
कहने के साथ ही दूसरा साया उस सिस्टम की तरफ बढ़ चला, उसके पीछे पीछे ही पहला साया भी बढ़ चला था। सिस्टम के पास पहुॅच कर दूसरे साये ने डायरी पर लिखे पासवर्ड को सिस्टम पर बड़ी सावधानी से डाला और फिर इंटर का बटन दबा दिया। इन्टर का बटन दबाते ही स्क्रीन के ऊपर लगी हरी बत्ती जल उठी साथ ही स्क्रीन पर “वैलकम” लिखा नज़र आया। ये देख कर वो दोनो साये अभी मुस्कुराये ही थे कि तभी उनके दाहिनी तरफ हल्की सी आवाज़ हुई। दोनो ने पलट कर उस तरफ देखा।
दीवार में जिस जगह वो फ्रेम बना हुआ था उसी फ्रेम के बीचों बीच से एक दरवाजा खुलता हुआ अंदर की तरफ जाने लगा था। वो एक ही पल्ले का मोटा सा दरवाजा था। जो बंद होने पर बिलकुल दीवार की तरह ही नज़र आता था। कुछ ही पलों में वो दरवाजा पूरा खुल कर दाहिने साइड हो गया। दरवाजे के उस तरफ अॅधेरा था जो कि इस तरफ के उजाले से थोड़ा दूर हो गया था। दोनो ही साये दरवाजे के पास आकर खड़े हो गए। दरवाजे से आगे लगभग तीन फीट पर फर्श था उसके बाद नीचे जाने के लिए सीढ़ियाॅ नज़र आ रही थीं।
“कमाल है।” पहला साया बोल पड़ा___”ये तो बेसमेंट लगता है। कोई सोच भी नहीं सकता था कि यहाॅ पर ऐसा कुछ हो सकता है।”
“ऐसे लोग।” दूसरे साये ने कहा____”ऐसे कामों के लिए ऐसी ही जगहों का ज्यादातर चुनाव करते हैं और इससे सेफ्टी भी रहती है। वरना खुद सोचो कि कोई दूसरा यहाॅ तक कैसे पहुॅच जाएगा? ख़ैर छोंड़ो, आओ इसके अंदर चलते हैं।”
“मुझे लगता है कि।” पहले साये ने कहा___”हम में से किसी एक को ही अंदर जाना चाहिए जबकि किसी एक को यहीं पर रहना चाहिए। क्योंकि ऐसा भी हो सकता है कि बाहर तैनात गनमैनों में से कोई बॅगले के अंदर ये सोच कर आ जाए कि एक बार अंदर की तरफ का हाल चाल भी देख लिया जाए। अतः अगर ऐसी वैसी कोई बात होती है तो कम से कम हम में से कोई एक यहाॅ रह कर उसे सम्हालने की कोशिश तो करेगा।”
“ये भी सही कहा तुमने।” दूसरे साये ने कहा___”तो ठीक है तुम यहीं रहो। इसके अंदर जाने का काम अब मेरा है।”
“ओके बेस्ट ऑफ लक।” पहले साए ने कहने के साथ ही अपने दाहिने हाॅथ का अॅगूठा दिखाया उसे___”लेकिन हाॅ ज़रा सम्हाल कर।”
दूसरे साये ने हाॅ में सिर हिलाया और दरवाजे के उस पार बढ़ चला। उस पार के फर्श पर आकर वह ठिठका और दोनो तरफ देखा तो उसे बाईं तरफ दीवार पर एक स्विच नज़र आया। उसने उस स्विच को पहले ध्यान से देखा उसके बाद उसने हाॅथ बढ़ा कर स्विच का बटन दबा दिया। परिणामस्वरूप सीढ़ियों के ऊपर लगी एक ट्यूबलाइट रौशन हो गई। अब वहाॅ पर काफी प्रकाश था।
दूसरा साया सामने की तरफ मुड़ कर बड़ी सावधानी से सीढ़ियों पर उतरता चला गया। जबकि कमरे में दीवार के पास ही खड़ा पहला साया उसे जाते हुए देखता रहा। उसके दिल की धड़कनें अनायास ही बढ़ गईं थी। उधर कुछ ही पलों में दूसरा साया सीढ़ियाॅ उतर कर बेसमेंट में पहुॅच गया। नीचे की लास्ट सीढ़ी से थोंड़ी ही दूरी पर दाहिनी तरफ की दीवार में एक और स्विच नज़र आया। साये ने उस स्विच का बटन ऑन कर बेसमेंट की लाइट जला दी। लाइट के जलते ही बेसमेंट में तीब्र प्रकाश फैल गया।
तीब्र रौशनी में बेसमेंट की हर चीज़ स्पष्ट नज़र आने लगी थी। किन्तु जिस खास चीज़ पर साये की नज़र पड़ी उसे देख कर उसकी ऑखें फटी की फटी रह गईं। बेसमेंट काफी बड़ा था। ऐसा लगता था जैसे ये कोई लम्बा चौड़ा हाल हो। चारो तरफ की दीवारों पर अलग अलग चीज़ों का क्रमशः स्टाक था यहाॅ। किन्तु सबसे खास चीज़ ये थी कि हाल के सामने अंतिम छोर के फर्स पर ही एक बड़ी सी ट्राली थी जिसके ऊपर दो हज़ार के तथा पाॅच सौ के नोटों के बंडल नीचे से ऊपर की तरफ रखे हुए थे। ये सब न्यू करेन्सी थी। जोकि पाॅलिथिन में बंद थी। इतने सारे रुपये को देख कर किसी की भी ऑखें फटी की फटी रह जातीं। उस ट्राली के आगे दीवार से सटे स्टील के खाॅचे बने हुए थे जिनके दो खाॅचों में चमचमाते हुए गोल्ड के बिस्किट रखे हुए थे। बिस्किट के वो दोनो ही खाॅचे पारदर्शी शीशे से बंद थे। बाॅकी के खाॅचों में लकड़ी के बाक्स थे। फर्श पर भी काफी सारे बाॅक्स रखे हुए थे।
ये सारी चीज़ें देख कर साये की ऑखें फटी हुई थी। किन्तु जल्द ही उसने खुद को मानो सम्हाला और आगे की तरफ बढ़ चला। लकड़ी के एक बाक्स के पास पहुॅच कर उसने बाक्स के ऊपर लगे लकड़ी के ही ढक्कन रूपी पटरे को पकड़ कर अपनी तरफ खींच कर उसे निकाला। ढक्कन के हटते ही बाक्स में रखी हुई जो चीज़ नज़र आई उसे देख कर साये की ऑखें एक बार पुनः हैरत से फैलीं। बाक्स में एक जैसी कई सारी गन रखी हुई थी। मतलब साफ था कि यहाॅ पर जितने भी ऐसे बाक्स थे उन सब में तरह तरह की गन्स ही थीं।
साये ने चारो तरफ नज़र घुमा कर बारीकी से देखना शुरू कर दिया। दाएॅ तरफ एक केबिन जैसा बना हुआ था। साया उस तरफ बढ़ गया। केबिन में पहुॅच कर उसने देखा कि ये एक छोटा सा केबिन है जिसमें एक तरफ ऊॅची सी मेज थी तथा मेज के ऊपर एक कम्प्यूटर रखा हुआ था। मेज में कई सारे दराज थे। साये ने एक एक करके सभी दराज को खोल कर देखा। उन सब में कई तरह की रसीद व काग़जात थे तथा कई सारी फाइलें भी थीं। साये ने उन सभी फाइलों को बारीकी से देखना शुरू कर दिया।
फाइलों में से कुछ फाइलों को उसने अलग करके एक तरफ रखा। उसके बाद उसने एक नज़र कम्प्यूटर पर डाली। कुछ देर तक वह उसे देखते हुए सोचता रहा। फिर वह अलग की हुई फाइलों को लेकर केबिन से बाहर आ गया। जैसा कि बताया जा चुका है कि बेसमेंट काफी बड़ा था। साया हर जगह जा जा कर बारीकी से देखने लगा। तभी एक तरफ उसे एक बड़ा सा दरवाजा नज़र आया। ये दरवाजा ठीक वैसा ही था जैसा कि बेसमेंट में आने के लिए उस कमरे में था। इस दरवाजे के बाईं तरफ वैसा ही एक और सिस्टम लगा हुआ था। जिसमें पासवर्ड डालने के लिए स्क्रीन पर “प्लीज इन्टर योर पासवर्ड” लिखा हुआ था। साये ने कुछ सोचते हुए अपने लबादे से एक छोटा सा मोबाइल निकाला और उसमें से हरा बटन दबाया। हरा बटन दबाते ही उसमें डायल काल की लिस्ट में एक ही नंबर दिखा जिसे उसने पुनः हरा बटन दबा कर डायल कर दिया। डायल करते ही मोबाइल को कान से लगा लिया उसने, कुछ ही सेकण्ड में दूसरी तरफ से काल रिसीव किया गया।
“यहाॅ पर वैसा ही एक और दरवाजा है।” काल रिसीव किये जाने पर साये ने तुरंत बिना किसी भूमिका के धीमे स्वर में कहा___”अतः तुम उस डायरी में देखो कि क्या इसका भी पासवर्ड उसमें है या फिर इन दोनो दरवाजों का एक ही पासवर्ड है। जल्दी से देख कर मुझे बताओ।”
उधर यकीनन पहला वाला साया ही था। दूसरे साये को अपने कान में कुछ देर सुरसराहट की आवाज़ आती रही उसके बाद कुछ कहा गया। जिसके जवाब में साये ने कहा___”ओह एक मिनट।”
कहने के साथ ही ये साया दरवाजे के बाएॅ साइड दीवार पर लगे सिस्टम के पास तेज़ी से गया। सिस्टम के पास पहुॅचते ही बोला___”हाॅ अब बताओ।”
उधर से शायद पहला वाला साया इस साये को पासवर्ड बता रहा था जिसे ये वाला साया उसके बताने के साथ ही कीबोर्ड पर अपनी एक उॅगली से पंच करता जा रहा था। थोड़ी ही देर में साये के द्वारा “इन्टर” का बटन दबाए जाते ही सिस्टम पर लगी हरी बत्ती जल उठी। बत्ती के जलते ही वो दरवाजा हल्की आवाज़ के साथ इस तरफ ही खुलता चला गया। दूसरी तरफ अॅधेरा था जोकि इधर की रौशनी से हल्का सा दूर हो गया। हल्की रोशनी होते ही सामने सींढ़ियाॅ नज़र आईं जो कि ऊपर की तरफ जा रही थी। साया उन सीढ़ियों को देख कर पहले कुछ देर कुछ सोचा फिर आगे बढ़ कर उन सीढ़ियों पर चढ़ता चला गया। सीढ़ी के ऊपर आकर उसने देखा कि सामने एक और दरवाजा है किन्तु ये दरवाजा लोहे का था। दरवाजे के निचले भाग की दरार में हल्की रोशनी दिख रही थी। मतलब साफ था दरवाजे के दूसरी तरफ कुछ और भी था किन्तु क्या? इस सवाल का जवाब तो उस तरफ पहुॅच कर ही मिल सकता था।
साये ने देखा कि दरवाजा इस तरफ से ही बंद है। क्योंकि मोटा सा ताला कुण्डे पर झूल रहा था। ऐसा ताला साये ने पहली बार ही देखा था। कुण्डे के पास ही एक छिद्र था, वो छिद्र ऐसा था जैसे कीहोल हो। यानी कि ये दरवाजा दो तरह से लाॅक था। साये ने झुक कर कीहोल से अपनी एक ऑख सटा दी। दूसरी तरफ काफी उजाला था तथा उस उजाले में ही उसे ऐसा नज़र आया जैसे उस तरफ कोई फैक्ट्री हो। कुछ लोग भी उस तरफ नज़र आए। जिनमें कुछ आम आदमियों के साथ साथ हाॅथों में गन लिए कुछ गार्ड्स भी थे।
उस तरफ का नज़ारा देख कर साये ने कीहोल से अपनी ऑख हटा ली। उसके बाद वह एक पल के लिए वहाॅ नहीं रुका बल्कि पलट कर वापस चल दिया। बेसमेंट में आकर उसने दरवाजे को बड़ी सावधानी से बंद किया। दरवाजा जैसे ही पूरा बंद हुआ वैसे ही बगल से दीवार पर लगे उस सिस्टम के स्क्रीन पर “डोर हैज बीन क्लोज्ड” लिखा नज़र आया और साथ ही ऊपर लगी लाल बत्ती जल उठी। लाल बत्ती के जलते ही स्क्रीन पर फिर से “प्लीज इन्टर योर पासवर्ड” लिख गया।
कुछ ही देर में बेसमेंट से चलता हुआ वो साया सीढ़ियों के पास आया और फिर सीढ़ियाॅ चढ़ते हुए कमरे में पहले वाले साये के पास आ गया। दरवाजे को बंद करने के बाद उसने पहले गहरी गहरी साॅसें ली। उसके बाद उसने पहले साए की तरफ देखा तो हल्के से चौंका।
“ये क्या है?” दूसरे साये ने पहले साये के हाॅथ में बैग देख कर पूछा।
“इसमें मंत्री का लैपटाॅप है।” पहले साये ने कहा___”ये मुझे इस बेड के नीचे बने बाक्स में मिला है। मैने इसे अभी देखा नहीं है। हो सकता है कि इसमें भी पासवर्ड वाला चक्कर हो इस लिए इसे हम अपने साथ ही ले चलेंगे।”
“ये बहुत अच्छा हुआ।” दूसरे साए ने कहा___”मंत्री के लैपटाॅप में भी काफी कुछ मसाला मिल सकता है। ख़ैर, इन फाइलों को भी इस बैग में डाल लो। उसके बाद हमें तुरंत यहाॅ से निकलना है। अब यहाॅ पर ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं है।”
“ठीक है।” पहले साए ने कहने के साथ ही बैग को बेड पर रखा और दूसरे साये से फाइलें लेकर बैग में डाल लिया।
उसके बाद ये दोनो ही शातिर चोर जिस तरह छुपते छुपाते हुए यहाॅ बड़ी होशियारी से आए थे वैसे ही यहाॅ से निकल भी गए। बालकनी से जब दोनो नीचे ज़मीन पर उतर आए तो बालकनी में इनकी वो रस्सी ही फॅस गई। वो तो शुकर था कि इस तरफ आने वाले वो दोनो गनमैन इस तरफ आए ही नहीं। वरना उन्हें बालकनी की रेलिंग से झूलती हुई ये रस्सी ज़रूर दिख जाती और ये दोनो भी। ख़ैर दोनो ने किसी तरह उस रस्सी को निकाल ही लिया और फिर उसी रस्सी के द्वारा बाउण्ड्री वाल के उस पार भी चले गए। थोड़ी ही देर में वो दोनो अॅधेरे का लाभ उठाते हुए कहीं गायब से हो गए।
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दोस्तो, आप सबके सामने मेगा अपडेट हाज़िर है। आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा।
आप सबकी प्रतिक्रिया का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।

