♡ एक नया संसार ♡
अपडेट…………《 24 》
अब तक,,,,,,
“मुझे माफ कर दे…माफ कर दे मुझे।” विराज ने निधि को अपने सीने से अलग करके अपने दोनो हाथ जोड़ कर कहा__”ये मैं क्या कर रहा था गुड़िया? अपने इन्हीं हाॅथों से अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी अपनी गुड़िया का गला दबा रहा था मैं। मुझे माफ कर दे गुड़िया, मुझसे कितना नीच काम हो गया…तू तू मुझे इस सबके लिए कठोर से भी कठोर सज़ा दे गुड़िया।”
“भइयाऽऽ।” निधि का दिल हाहाकार कर उठा, उसने एक झटके से विराज को खुद से चिपका लिया। बुरी तरह रोये जा रही थी वह। वह जानती थी कि ये जो कुछ भी हुआ उसमें विराज की कहीं कोई ग़लती नहीं थी। वो तो बस एक गुबार था, जो इस प्रकार से निधि को ही विधी समझ कर उसके अंदर से फट पड़ा था।
जाने कितनी ही देर तक यही आलम रहा। निधि अपने भाई को शान्त कराती रही। शराब के नशे में विराज वहीं निधि की गोंद में सिर रख कर सो गया था। निधि बड़े प्यार से उसके सिर के बालों पर उॅगलियाॅ फेरती जा रही थी। उसकी नज़रें अपने भाई के उस चेहरे पर जमी हुई थी जिस चेहरे पर इस वक्त संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी।
‘आप चिन्ता मत कीजिए भइया, आपकी ये गुड़िया आपको इतना प्यार करेगी कि आप संसार के सारे दुख सारे ग़म भूल जाएॅगे। आप मेरी जान हैं और मैं आपकी जान हूॅ। इस लिए आज से आपकी खुशी के लिए मैं वो सब कुछ करूॅगी जिससे आपको खुशी मिले। ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
अब आगे,,,,,,,,
विराज को लगभग चार घंटे बाद होश आया। निधि की गोद में सिर रखे वह उसी तरह लेटा हुआ था। उसके सिर पर निधि का हाॅथ था और वह खुद भी वहीं पर यूॅ ही सो गई थी। दोनो ही नहीं जानते थे कि जिस शिप में वो दोनो इस वक्त थे वह कहाॅ से कहाॅ घूमते हुए पहुॅच गया था।
विराज को जब होश आया तो उसने अपने सिर को निधि की गोद में टिका हुआ पाया। उसने देखा कि उसकी जान उसके सिर पर अपना हाॅथ रखे यूॅ ही सो गई थी। उसके खूबसूरत चेहरे पर संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी। विराज को उस पर बड़ा प्यार आया। वह आहिस्ता से निधि की गोद से उठा और फिर निधि को बड़ी ही आसानी से अपनी बाजुओं में उठा लिया। पास में ही एक तरफ रखे सोफे पर उसने निधि को आहिस्ता से लिटाया। उसके बाद वह खुद भी उसके चेहरे के समीप ही बैठ गया और अपनी गुड़िया को सोते देखने लगा। कुछ देर यूॅ ही देखने के बाद वह झुका और निधि के माथे पर आहिस्ता से चूॅमा फिर उठ कर बाथरूम की तरफ बढ़ गया।
विराज के जाते ही निधि ने मुस्कुराते हुए पट से अपनी आॅखें खोल दी। कुछ पल जाने क्या सोचती रही फिर उसने बहुत ही धीमे स्वर में कहा__”आपको तो ये भी नहीं पता जान जी कि किस किसी लड़की के माथे पर नहीं बल्कि उसके होंठो पर किया जाता है। लेकिन आप चिन्ता मत कीजिए….आप ये भी जानने लगेंगे…मैं सब बताऊॅगी न आपको, हाॅ नहीं तो।” ये कह कर वह हॅस पड़ी फिर सहसा शर्मा भी गई वह। अपने दोनो हाथों द्वारा तुरंत ही अपना चेहरा छुपा लिया उसने।
कुछ देर बाद विराज जब बाथरूम से वापस आया तो उसने अपनी गुड़िया को अपने ही हाथों अपने चेहरे को छुपाये हुए पाया। उसे लगा गुड़िया अभी भी उसके लिए दुखी है, इस लिए वह तुरंत ही उसके पास पहुॅचा और फर्स पर उसके घुटनों के पास बैठ गया।
“तू दुखी मत हो गुड़िया।” विराज ने अपने हाॅथों द्वारा निधि के चेहरे से उसके हाॅथों को हटाते हुए कहा__”मैं तुझसे वादा करता हूॅ कि अब से मैं खुद को दुखी नहीं करूॅगा। उसकी यादों पर तो मेरा कोई ज़ोर नहीं है लेकिन अब उसकी यादों से मैं खुद को विचलित नहीं करूॅगा।”
“ये तो बहुत अच्छी बात है भइया।” निधि ने कहा__”उस लड़की को याद करके अपने दिल को क्यों तकलीफ़ देना जिसे प्यार की परिभाषा का ज्ञान ही न हो।”
“तू सही कह रही है गुड़िया।” विराज के चेहरे पर एकाएक ज़लज़ले के से भाव आए, बोला__”लेकिन इसका हिसाब तो मैं उससे लूॅगा गुड़िया। उसे मेरे साथ इस खिलवाड़ को करने की सज़ा ज़रूर मिलेगी मेरे हाथों। ऐसा हाल करूॅगा उसका कि फिर किसी के साथ ऐसा करने की हिम्मत भी नहीं करेगी वो।”
“क्या आपका ऐसा करना मेरा मतलब है कि उसे सज़ा देना उचित है भइया?” निधि ने कहा__”उसने जो किया उसे उसका फल भगवान खुद ही दे देगा। आपने उससे सच्चा प्यार किया था, इस लिए आप उसके लिए अपने मन में ऐसा विचार कैसे रख सकते हैं??”
“मैं जानता हूॅ गुड़िया कि प्यार में बदले की ऐसी भावना या विचार रखना उचित नहीं है।” विराज ने कहा__”लेकिन किसी को आईना दिखाना तो सर्वथा उचित है न। वही करना चाहता हूॅ मैं।”
“ठीक है आपको जो अच्छा लगे वो कीजिये भइया।” निधि ने कहा__”शायद इससे आपके दिल को सुकून मिल जाए।”
“माफ़ करना गुड़िया।” विराज ने खेद भरे स्वर में कहा__”मैं तुझे यहाॅ किस लिये लाया था और क्या हो गया। लेकिन तू फिक्र मत कर, अभी तो बहुत समय है। चल हम दोनो अब इस टूर का आनन्द लेते हैं।”
“कोई बात नहीं भइया।” निधि ने प्यार भरे लहजे में कहा__”आपसे बढ़ कर मेरे लिए कुछ भी नहीं है। आप मेरी जान हैं, और जब मेरी जान ही खुश नहीं रहेगी तो भला मैं कैसे किसी चीज़ से खुश रह सकती हूॅ?”
“तू और तेरी ये बातें।” विराज ने मुस्कुरा कर कहा__”मेरी समझ से बाहर हैं गुड़िया।”
“ऐसा क्यों?” निधि ने विराज की तरफ गौर से देखते हुए कहा था।
“कभी कभी मुझे ऐसा लगा करता है जैसे तेरे अलावा भी तुझ में कोई और कैरेक्टर है जो कुछ और कहने लगता है।” विराज ने कहा__”कुछ ऐसा कहने लगता है जो मेरी समझ में ही नहीं आता।”
“अच्छा, ऐसा आपको क्यों लगता है भइया?” निधि ने धड़कते दिल से कहा__”कि मेरे अंदर कोई और भी कैरेक्टर है जो कुछ और ही कह डालता है?”
“पता नहीं गुड़िया।” विराज ने कहा__”कभी कभी लगता है जैसे तू अब मेरी वो गुड़िया नहीं रही जो हर चीज़ को अपनी मधुर व चुलबुली बातों से हस कर उड़ा देती थी बल्कि अब तू बड़ी हो गई लगती है। इतनी बड़ी कि तेरी बातों में अब किसी रहस्य तथा किसी दूसरे ही अर्थ का आभास होता है जो समझ से परे होता है।”
निधि अपलक देखती रह गई विराज को। उसके दिल की धड़कने अनायास ही बढ़ गई थी। उसे समझ में न आया कि वो क्या जवाब दे???
“मैं सच कह रहा हूॅ न गुड़िया?” उसे चुप देख विराज ने कहा__”ऐसी ही बात है न तुझ में?”
“पता नहीं भइया।” निधि ने सिर झुका कर कहा__”जाने क्यों ऐसा लगता है आपको, जबकि ऐसी तो कोई बात ही नहीं है।”
“चल कोई बात नहीं गुड़िया।” विराज ने निधि के चेहरे को अपने दोनो हाॅथों में लेते हुए कहा__”पर तू इतना समझ ले कि तेरा ये भाई तुझसे बहुत प्यार करता है और तुझे हमेशा खुशियों से चहकती व फुदकती हुई ही देखना चाहता है।”
विराज की बातें सुन कर निधि की आॅखें भर आई। उसके दिल में भावना का एक तीब्र भूचाल सा आ गया। उसी भावना के वशीभूत होकर वह विराज से लिपट गई। विराज के सीने में चेहरा छुपाए हुए ही बोली__”पर ये तभी संभव है जब आप भी खुश रहेंगे। अगर आप किसी बात से दुखी होंगे तो मैं भी दुखी हो जाऊॅगी।”
“ऐसा क्यों भला?” विराज ने कुछ सोचते हुए पूछा था।
“क्योंकि मैं आपसे प्या….।” निधि कहते हुए अचानक ही रुक गई। उसे एकाएक ही ध्यान आया था कि वह ये क्या बोलने वाली थी। उसकी हालत पल भर में ख़राब हो गई। दिल की धड़कने इतनी तीब्र हो गई उसकी धमक कनपटियों में स्पष्ट सुनाई देने लगी थी। उसने तुरंत ही बात को सम्हालते हुए बड़ी मुश्किल से कहा__”क्यों कि आप हमारे लिए सब कुछ हैं भ भइया…अगर आप ही इस तरह दुखी रहेंगे तो हम माॅ बेटी कैसे खुश रह सकेंगे भला?”
निधि ने भले ही अपनी समझ में बात को सम्हाल लिया था किन्तु उसके पहले अधूरे वाक्य ने ही सारी सच्चाई स्पष्ट कर दी थी। विराज ने पूछा ही इस तरह था कि जल्दबाजी और बेध्यानी में उसके मुख से वो निकल गया था जो वर्षों से उसके दिल में पनप रहा था। विराज ये सुन कर तथा ये जान कर बुरी तरह हिल गया था कि उसकी जान उसकी गुड़िया उससे प्यार करती है। यही वो बातें थी जो द्विअर्थी होती थी और विराज को समझ में नहीं आती थी। किन्तु आज संयोगवश सब कुछ सामने आ गया था। निधि खुद ही बेख़याली में बोल गई थी।
अपने भाई को खामोश जान कर निधि को झटका सा लगा। उसे समझते देर न लगी कि सब गड़बड़ हो चुका है। मतलब उसका भाई उसके पहले ही अधूरे वाक्य को सुन कर समझ चुका है कि उसकी सच्चाई क्या है। बात को सम्हालने की उसकी कोशिश बेकार हो चुकी थी। हालत ये हो गई उसकी कि अपने भाई से नज़र मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी अब। भाई के सीने में चेहरा छुपाए वह वैसी ही खड़ी रही। उसे लग रहा था कि ये ज़मीन फटे और वह पाताल तक उसमे समाती चली जाए। मगर चाह कर भी तो वह ऐसा न कर सकी। उसके होंठ घबराहटवश बुरी तरह थरथरा रहे थे।
वातावरण में अजीब सी शान्ति छा गई थी। काफी देर तक यही आलम रहा। दोनो में से कोई भी कुछ न बोल रहा था। विराज तो जैसे वहाॅ था ही नहीं बल्कि किसी गहरे ख़यालों के समंदर में डूबा हुआ नज़र आ रहा था। बार बार उसके ज़ेहन में यही बात गूॅज रही थी कि उसकी गुड़िया उसकी अपनी बहन उससे प्यार करती है।
“भ भइया।” सहसा निधि ने हिम्मत जुटा कर तथा विराज के सीने से अपना चेहरा उठा कर विराज की तरफ देखते हुए धीमे स्वर में कहा__”क्या बात है…आप एकदम से चुप क्यों हो गए? क्या मुझसे कोई ग़लती हो गई? अगर ऐसा है तो मुझे माफ़ कर दीजिए प्लीज़।”
विराज के कानों में निधि की जब ये बातें पड़ीं तो वह ख़यालों के गहरे समुद्र से बाहर आया। वस्तुस्थित का आभास होते ही उसने निधि की तरफ अजीब भाव से देखा। निधि खुद भी उसी की तरफ देख रही थी किन्तु सीघ्र ही उसकी नज़रें झुक गईं। जाने क्यों अपने भाई की आॅखों से आॅखें न मिला सकी वह। कदाचित् इस लिए कि उसके दिल का भेद उसके भाई के सामने खुल चुका था।
“आज का पिकनिक टूर यहीं पर खत्म हो चुका गुड़िया।” सहसा विराज ने सपाट भाव से कहा__”अब हम वापस घर चल रहे हैं।”
इतना कह कर विराज ने निधि को खुद से अलग किया और बाहर की तरफ चल दिया। निधि को जाने क्यों ऐसा लगा जैसे उसका सब कुछ लुट गया है, उसके सीने में बड़ा तेज़ दर्द उठा। आॅखों के सामने अॅधेरा सा छा गया। ऐसा लगा जैसे वह अभी गश खा कर वहीं फर्स पर गिर पड़ेगी। लेकिन अंतिम समय में उसने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाल लिया। दिल में उमड़ते हुए जज़्बातों में प्रबलता आ गई जिसकी वजह से उसकी रुलाई फूट गई। वह जी जान से विराज की तरफ दौड़ी और पीछे से विराज की पीठ से लिपट कर ज़ार ज़ार रोने लगी।
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“ये तुम क्या कह रहे हो हरिया?” अजय सिंह बुरी तरह चौंका था__”तुमने अच्छी तरह पता किया तो है न ?”
“जी हाॅ मालिक।” हरिया नाम का एक आदमी जो कि अजय सिंह का ही आदमी था बोला__”मैने अच्छी तरह पता किया है। आपके छोटे भाई कल ही यहाॅ से बम्बई के लिए निकल गए थे। उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को कल ही उदयपुर भेज दिया था। मेरे एक खास आदमी ने अपनी आॅखों से उनको जाते हुए देखा था। उसी ने बताया कि छोटी मालकिन(करुणा) के भाई उनके साथ ही थे।”
अजय सिंह ये सब जान कर बुरी तरह भिन्ना गया। उसने तो सोचा था कि अभय के जाते ही वह करुणा को उठवा लेगा और उसे अपने नये फार्महाउस पर रखेगा। उसके बाद वह जिस तरह चाहेगा करुणा के गदराए हुए व मादक से जिस्म का मज़ा लूटेगा। किन्तु हरिया की इस ख़बर ने उसके सभी अरमानों पर पानी नहीं फेरा था बल्कि बाल्टी भर पेशाब कर दिया था। उसे इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी कि उसका छोटा भाई अभय इतना शातिर दिमाग़ निकलेगा जो इतना आगे का सोच कर अपना खेल खेल जाएगा।
अजय सिंह चाहता तो करुणा को उसके मायके से भी उठवा सकता था किन्तु उस सूरत में बहुत बड़ा बवाल हो जाता। इस लिए अब वह अपने हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था। करुणा नाम की खूबसूरत चिड़िया अब उसके हाॅथ से निकल गई थी।
अजय सिंह ने सोचा था कि अभय के पीछे अपने आदमियों को लगा देगा किन्तु वो भी न कर सका वह। क्योंकि उसे पता ही न चल पाया था कि अभय सिंह ने कब क्या किया था?
“तुम पता करो हरिया।” फिर उसने कुछ सोचते हुए कहा__”अभय मुम्बई जा चुका है या नहीं?”
“वो तो कल ही यहाॅ से चले गए थे मालिक।” हरिया ने कहा__”और आज तो वो बम्बई पहुॅच भी गए होंगे।”
“अरे बेवकूफ कल वो मुम्बई कैसे जा सकता है?” अजय सिंह ने हुड़की दी__”शाम से पहले तक तो वो यहीं था, और शाम को भला कौन सी ट्रेन इस शहर से मुम्बई जाती है। वह तो दोपहर को जाती है। मतलब साफ है कि अभय कल नहीं आज गया होगा मुम्बई।”
“ये तो मैने सोचा ही नहीं मालिक।” हरिया ने सिर झुका कर कहा__”छोटे मालिक अगर आज गए होंगे तो कल ही पहुॅचेंगे बम्बई। अब हम क्या करें मालिक?”
“अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है हरिया।” अजय सिंह ने कहा__”ये तो तुम्हें भी मालूम है कि हमारे कुछ आदमी मुम्बई में ही हैं जो विराज और उसकी माॅ बहनों की खोज में लगे हुए हैं। हम अपने उन आदमियों को फोन करके कह देंगे कि वो अभय पर नज़र रखें। अभय कल मुम्बई पहुॅचेगा। मुम्बई में जैसे ही वह ट्रेन से उतरेगा वैसे ही हमारे आदमी उसके पीछे लग जाएंगे।”
“ये तो बहुत बढ़िया आइडियवा है मालिक।” हरिया ने इंग्लिश की माॅ बहन एक करते हुए कहा__”छोटे मालिक जहाॅ जहाॅ जाएॅगे हमारे आदमीं भी उनके पीछे जाएॅगे।”
“अब तुम जाओ हरिया।” अजय सिंह ने कहा__”हम भी किसी ज़रूरी काम से बाहर जा रहे हैं।”
“ठीक है मालिक।” कहते हुए हरिया चला गया वहाॅ से।
अजय सिंह ने मोबाइल निकाल कर मुम्बई में स्थित अपने आदमियों को फोन लगाया। अपने आदमियों को सारी बातें समझाने के बाद उसने फोन काट दिया।
अभी वह इस सबसे फारिग़ ही हुआ था कि सामने से उसकी इंस्पेक्टर बेटी रितू आती हुई दिखी। अजय सिंह उसे देख कर बस आह सी भर कर रह गया। पुलिस की चुस्त दुरुस्त वर्दी में उसकी बेटी ग़ज़ब ढा रही थी। जिस्म का एक एक उभार साफ नज़र आ रहा था। अजय सिंह की आॅखें एकटक रितू के सीने पर टिकी हुई थी। जहाॅ पर रितू के सीने के दो ठोस किन्तु बड़े बड़े वक्ष उसके चलने के कारण एक रिदम पर ऊपर नीचे कूद से रहे थे।
अजय सिंह अपनी बेटी के वक्षों को ललचाई नज़रों से देख ही रहा था कि तभी अंदर से आती हुई प्रतिमा की नज़र अजय सिंह पर पड़ी। अपने पति को अपनी ही बेटी के बड़े बड़े पर्वत शिखरों को ललचाई नज़रों से देखते देख वह मन ही मन कह उठी ‘उफ्फ अजय तुम कभी नहीं सुधर सकते।’
“अरे…तुम अभी तक यहीं बैठे हो?” प्रतिमा ने तुरंत ही अजय सिंह का ध्यान भंग करने की गरज से कहा__”तुम तो कह रहे थे कि शहर जाना था?”
अजय सिंह चौंका, उसने तुरंत ही अपनी बेटी पर से नज़रे हटा ली। कुछ पल के लिए उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभरे जैसे इस सबसे वह बेहद शर्मसार हुआ हो किन्तु फिर अगले ही पल खुद को सम्हाल कर बोला__”ह हाॅ हाॅ बस निकल ही रहा हूॅ मैं।”
तब तक रितू भी आकर वहाॅ पर रखे एक सोफे पर लगभग पसर सी गई। अपने सिर से पुलिस की कैप उतार कर तथा हाथ में लिए पुलिस रुल को उसने एक तरफ रख दिया और फिर अपनी माॅ की तरफ देखते हुए कहा__”माॅम एक कप काॅफी मिलेगी क्या??”
“अभी लाई बेटी।” कहते हुए प्रतिमा वापस पलट गई और किचेन की तरफ चली गई।
“लगता है मेरी बेटी के सीने में काम और जिम्मेदारी का बोझ बहुत ही ज्यादा है।” अजय सिंह ने पुनः रितू के सीने की तरफ एक नज़र डाल कर कहा था।
“सीने पर?????” रितू ने चकरा कर कहा__”काम और जिम्मेदारी का बोझ तो कंधों पर होता है ना डैड??”
“ओह हाॅ हाॅ बेटी।” अजय सिंह बुरी तरह हड़बड़ा गया। उसके चेहरे पर घबराहट के भाव भी उभरे किन्तु फिर तुरंत ही सम्हल कर बोला__”यू आर राइट….अब्सोल्यूटली राइट।”
“डैड कल से शिवा कहीं नज़र नहीं आ रहा?” रितु ने पहलू बदलते हुए कहा__”और ना ही चाचा चाची जी वगैरा कहीं नज़र आ रहे हैं?”
“शिवा तो शहर में है बेटी।” अजय ने राहत की साॅस लेते हुए कहा__”बाॅकियों का मुझे पता नहीं। सब अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं। कहीं आने जाने के लिए वो किसी से पूछना ज़रूरी नहीं समझते। ख़ैर तुम बताओ, तुम्हारे केस का क्या हुआ? मेरा मतलब है कि क्या ये पता चल सका कि हमारी फैक्टरी में किसने बम्ब फिट किया था?”
“नहीं डैड।” रितू ने कहा__”बड़ा ही पेंचीदा मामला है। इस मामले में कुछ भी पता नहीं चल सका कि वो कौन था? हाॅ इतना जरूर पता किया कि फैक्टरी के गेट के बाहर मौजूद गार्ड झूठ बोल रहा था। दरअसल जिस रात ये हादसा हुआ था उस रात गेट पर एक ही गार्ड था और वो भी चौबीस घंटे की ड्यूटी पर। इस लिए रात में वह गेट के बाहर रखी कुर्सी पर बैठा बैठा ही ऊॅघ रहा था। इसके बाद उसने ये बताया कि उसे ये आभास हुआ कि कोई चीज़ उसकी नाॅक के पास लाई गई थी। जिसके असर से उसे पता ही नहीं चला कि वह कब बेहोश हो गया था? उसके बाद तब उसे होश आया जब फैक्टरी में लगी आग से अफरा तफरी मची हुई थी। यकीनन जो चीज़ उसके नाॅक के पास लाई गई थी वह क्लोरोफाॅम डाला हुआ कोई रुमाल रहा होगा या फिर खुद क्लोरोफाॅम की बाॅटल। इस हादसे से वह गार्ड बहुत ज्यादा डर गया था इसी लिए शुरू में उसने यही कहा था कि वह रात भर जागता रहा था और उसके सामने कोई भी ऐसा ब्यक्ति नहीं आया था जो फैक्टरी के अंदर गया हो।”
“तो फिर क्या फायदा हुआ तुम्हारे द्वारा केस को रिओपन करने से?” अजय सिंह ने रितू की तरफ अजीब भाव से देखते हुए कहा__”आख़िर क्या नतीजा निकला बेटी? वरना जिस तरह से तुमने इस केस को रिओपन किया था उससे तो यही ज़ाहिर हो रहा था कि इस बार कोई न कोई सुराग़ ज़रूर पुलिस के हाथ लगेगा। दूसरी बात ये भी मुझे पता चली थी कि इस केस के रिओपन होने के तुरंत बाद ही रातों रात शहर के सारे पुलिस डिपार्टमेन्ट का तबादला कर दिया गया था। सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ था?”
“ये सवाल तो मेरे लिए भी सोचने का विषय बना हुआ है डैड।” रितू ने सोचने वाले भाव से कहा__”मुझे खुद ये बात समझ में नहीं आ रही कि गृह मंत्री ने शहर के सारे पुलिस विभाग का रातों रात तबादले का आदेश किस वजह से दिया था? अगर हम ये सोचें कि इसकी वजह ये है कि पिछली बार फैक्टरी के केस में पुलिस ने अपनी पूरी ईमानदारी से तहकीकात नहीं की थी बल्कि ग़लत रिपोर्ट तैयार की थी तो भी ये इतनी बड़ी वजह नहीं हो सकती कि इसकी वजह से शहर के सारे पुलिस विभाग का इस तरह तबादला कर दिया जाए। पिछली रिपोर्ट पर ऊपर से इंक्वायरी भी हुई थी। जिसमें पुलिस के उस अफसर ने ये बयान दिया था कि ऐसी रिपोर्ट बनाने के लिए आपने कहा था क्यों कि आप नहीं चाहते थे कि इसकी वजह से आपकी इज्जत नीलाम हो जाए। ख़ैर, आपके कहने पर उस अफसर ने भले ही ग़लत रिपोर्ट बनाई थी लेकिन इसके लिए उसे ज्यादा से ज्यादा सस्पेंड किया जा सकता था मगर ऐसा नहीं हुआ बल्कि शहर का सारा पुलिस विभाग ही बदल दिया गया। यही वो बात है डैड जिसने दिमाग़ का दही किया हुआ है।”
“हम्म…यकीनन।” अजय सिंह ने गहन सोच के साथ कहा__”बात तो वाकई बड़ी ही चक्करदार है बेटी। और सबसे बड़ी समस्या तो ये है कि इस बारे में गृहमंत्री से पूछा भी नहीं जा सकता।”
तभी प्रतिमा हाथ में ट्रे लिए हुई आई। उसने काफी का कप रितू को दिया और चाय का एक कप अजय सिंह को और चाय का ही एक कप खुद लेकर वहीं सोफे पर बैठ गई।
“क्या बातें हो रही हैं बाप बेटी के बीच?” प्रतिमा ने मुस्कुरा कर कहा था।
अजय सिंह ने संक्षेप में उसे बता दिया। सुन कर प्रतिमा ने कहा__”ये तो सचमुच बड़ी सोचने वाली बात है। इस केस में आख़िर ऐसा क्या था जिसके लिए खुद गृहमंत्री को भी हस्ताक्षेप करना पड़ा? इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने रातो रात शहर के सारे पुलिस विभाग का तबादला भी कर दिया था।”
प्रतिमा की इस बात के बाद वहाॅ पर सन्नाटा छा गया। कोई कुछ न बोला, कदाचित् इस लिए कि किसी के पास इसका कोई जवाब नहीं था। ये अलग बात थी सबके मन में ये बात गहन रूप से विचाराधीन थी।
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“नहीं…प्लीज़ रुक जाइये…आप इस तरह कैसे जा सकते हैं?” निधि ने रोते हुए कहा था__”हम तो पिकनिक टूर पर आए थे न, फिर इतनी जल्दी ये टूर कैसे समाप्त हो जाएगा? और….और ये अचानक क्या हो गया है आपको जो ये कह रहे हैं कि हम अब घर चलेंगे???”
“मुझे कुछ नहीं हुआ है।” विराज ने अजीब भाव से कहा__”हम घर जा रहे हैं बस और कोई बात नहीं।”
ये कह विराज ने निधि को अपनी पीठ पर से अलग कर आगे बढ़ने के लिए कदम बढ़ाया। किन्तु ज्यादा दूर जा नहीं सका वह। क्योंकि उसके कानों में तुरंत ही निधि का करुणायुक्त वाक्य टकराया__”आपको मेरी कसम है अगर आपने एक क़दम भी आगे बढ़ाया तो मैं अपनी जान दे दूॅगी। मुझे बताइये कि आख़िर क्या हो गया है ऐसा जिसकी वजह से आप अचानक ही इस तरह का बर्ताव करने लगे। अगर मुझसे कोई ग़लती हो गई है तो आप उसके लिए मुझे जो चाहे सज़ा दे दीजिए….मुझे आपकी हर सज़ा मंजूर है। लेकिन अपने प्रति आपकी ऐसी बेरुखी मैं सह नहीं सकती।”
“मेरी इस बेरुखी की वजह तुम अच्छी तरह जानती हो।” विराज ने एक झटके में पलट कर कहा था__”तुम जानती हो कि किस वजह से मेरा बर्ताव अचानक ही बदल गया है। अगर नहीं जानती तो इस तरह रोती नहीं और ना ही मुझे अपनी कसम देती।”
निधि देखती रह गई विराज को। उसे तुरंत कोई जवाब न सूझा था। आॅखों में आॅसू लिए वह बड़ी मुश्किल से अपने दिल के जज़्बातों को काबू में करने की नाकामयाब कोशिश कर रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो विराज से क्या कहे?
“तुम ऐसा कैसे कर सकती हो गुड़िया?” उसे चुप देख विराज ने कहा__”क्या एक बार भी तुम्हें ये ख़याल नहीं आया कि तुम ये क्या कर रही हो? क्या एक बार भी ये नहीं सोचा कि मैं तुम्हारा सगा भाई हूॅ? क्या एक बार भी नहीं सोचा कि जो रिश्ता तुम बना रही हो वो भाई बहन के बीच नहीं हो सकता? क्यों गुड़िया, क्यों किया ऐसा?”
“मुझे माफ कर दीजिये।” निधि की रुलाई फूट गई, बोली__”मैंने जान बूझ कर ये सब नहीं किया। ये तो बस हो गया। कब कैसे मुझे खुद पता नहीं चला। आप यकीन कीजिए भइया, मैने ये नहीं किया। आप तो जानते हैं न कि कोई किसी से जान बूझ कर या सोच समझ कर प्यार नहीं करता बल्कि लोगों को किसी खास ब्यक्ति से प्यार खुद ही हो जाता है। और उसे स्वयं इस बात का पता नहीं चल पाता। वैसा ही मेरे साथ हुआ है भइया।”
“लेकिन ये ग़लत है मेरी गुड़िया।” विराज ने कहा__”क्या तू नहीं जानती ये बात?”
“मैं जानती हूॅ कि ये ग़लत है।” रितु ने नज़रें झुका कर किन्तु भारी स्वर में कहा__”ये भी जानती हूॅ कि देश समाज भाई बहन के बीच इस रिश्ते को कभी मान्यता नहीं दे सकता बल्कि ऐसे रिश्ते को पाप समझ कर ऐसा रिश्ता रखने वाले को गाॅव समाज से बहिस्कृत कर देता है। इसी लिए मैने कभी आपके सामने ये ज़ाहिर नहीं होने दिया कि मेरे दिल में आपके लिए क्या है? मैने अकेले में खुद को लाखों बार समझाया कि मुझे अपने दिलो दिमाग़ से आपके प्रति ऐसे ख़याल निकाल देना चाहिए क्यों कि ये ग़लत था। मगर मेरा दिल खुद के द्वारा लाखों बार समझाने के बाद भी मेरी नहीं सुनता। मैं क्या करूॅ भइया….हाय कितनी बुरी हूॅ मैं और कितनी बद्किस्मत भी हूॅ कि जिससे मुझे जीवन में पहली बार दिलो जान से प्यार हुआ वो मेरे भाई हैं तथा एक ही माॅ की कोख से जन्में हैं। मेरे दिल ने जिनकी अटूट चाहत व हसरत पाल बैठा वो उसे कभी मिल ही नहीं सकते।”
कहते कहते निधि वहीं फर्स पर असहाय अवस्था में बैठ कर ज़ार ज़ार रोने लगी। जाने कब से उसके दिल में ये गुबार बाहर निकलने के लिए मचल रहा था। आज उस गुबार ने दिल की कैद से बाहर निकल आने का जैसे रास्ता ढूॅढ़ लिया था। हमेशा हॅसती खेलती व शरारतें करने वाली निधि आज जैसे इस सबके बाद दुख का दर्पण बन गई थी। जिस दिन उसे इस बात का एहसास हुआ था कि उसे अपने ही भाई से प्यार हो गया है उस दिन वह खूब रोई थी। क्योंकि वह इस बात को भली भाॅति जानती और समझती थी कि ये ग़लत है। अपने ही भाई को अपना महबूब बना लेना कतई उचित नहीं है। इस संबंध को समाज निम्न दृष्टि से देखता है। उसने इस बारे में अपने आपको बहुत समझाया था। सबके सामने उसी तरह हॅसती मुस्कुराती रहती किन्तु अपने कमरे में रात की तन्हाई में जब उसका मन भटकते हुए अपने भाई तक पहुॅच जाता तो सहसा उसको झटका सा लग जाता था। धड़कने रुक सी जाती उसकी और ये ख़याल उसे पल में रुला देता कि ये उसके दिल ने क्या कर दिया? वह रात रात भर इस बारे में सोचती रहती और भावना व जज़्बातों के भॅवर में खुद को रुलाती रहती। दिल के हाॅथों मजबूर हो चुकी थी वह। छोटी सी इस ऊम्र में उसके दिल ने ये कैसा रोग़ लगा लिया था, और लगाया भी था तो किसका…..खुद अपने ही भाई का? जो उसका कभी हो ही नहीं सकता था।
उस दिन तो वह बहुत रोई थी जिस दिन उसे ये पता चला था कि उसका भाई किसी ऐसी लड़की से प्यार करता है जिसने उसके भाई को सिर्फ इस लिए दुत्कार कर छोंड़ दिया है कि अब वह धन दौलत वाला नहीं रहा। इस बात ने निधि के दिल में जाने क्यों जलन पैदा कर दी थी उस वक्त। लेकिन वहीं इस बात से उसके मन को थोड़ा राहत भी हुई थी कि वह लड़की अब उसके भाई को छोंड़ कर उसके जीवन से जा चुकी है। निधि खुद से ये सवाल करती कि उसको इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि उसके भाई के जीवन से कोई लड़की जा चुकी है या नहीं। पर दिल के किसी कोने से उसे ये आवाज़ भी आती कि ‘बहुत फर्क पड़ता है….राज सिर्फ मेरे हैं’
अपने दिल की इस आवाज़ को सुन कर उसके रोंगटे खड़े हो जाते। उसका मन मयूर नाचने लग जाता था। मगर जब उसे इस बात का बोध होता कि वो जिसे प्यार करती है तथा जिसको अपना बनाने की हसरत रखती है वो तो उसका सगा भाई है जिसे वो किसी भी कीमत पर अपना नहीं बना सकती तो उसका दिल बैठ जाता। ये एहसास उसे एक ही पल में ज़िन्दा लाश में तब्दील कर देता। उसके अंदर एक हूक सी उठती और फिर आॅखों से मानो गंगा जमुना बहने लग जातीं। उसे लगता कि इस दुनिया में उससे ज्यादा कोई दुखी नहीं है।
निधि को इस तरह ज़ार ज़ार रोते देख विराज तड़प कर रह गया। आख़िर थी तो उसकी बहन ही। ऐसी बहन जिसकी आॅखों में आॅसू का एक कतरा भी वह नहीं देख सकता था। हालातों ने भले ही अपना चेहरा बदल लिया था और ये बता दिया था कि उसकी बहन के मन में वो जाने कब से एक महबूब बन कर बैठा हुआ था लेकिन वह तो अभी भी यही समझता था न कि निधि उसकी बहन ही है। जिसको वह किसी भी तरह दुख में नहीं देख सकता। इस लिए इसके पहले जो उसने बेरुखी का आवरण धारण कर लिया था उस आवरण को उसने सीघ्र ही दरकिनार कर दिया और तुरंत ही झुक कर फर्स पर बैठी रो रही अपनी बहन को उसके दोनो कंधों से पकड़ कर हौले से उठाया और अपने सीने से लगा लिया।
“बस कर अब।” विराज ने भर्राए हुए गले से कहा__”तू जानती है ना कि मैं तेरी आॅखों में आॅसू का एक कतरा भी नहीं देख सकता। इस तरह रो कर क्यों मेरे हृदय को चोंट पहुॅचा रही है गुड़िया? चल अब शान्त हो जा।”
“मुझे माफ़ कर दीजिए भइया।” निधि ने विराज के सीने से लगे हुए कहा__”लेकिन ये सच है कि मैं आपसे बेइंतहा प्यार करती हूॅ और आपके बिना एक पल भी जीने का सोच भी नहीं सकती। मैं जानती हूॅ भइया कि ये ग़लत है पर आप मेरी बेबसी को भी समझिये। आप मेरे मन मंदिर में इस हद तक बस चुके हैं कि अब मैं ही क्या बल्कि खुद भगवान भी मेरे मन मंदिर से आपको नहीं निकाल सकता। आप मेरे नहीं हो सकते और ना ही मैं आपको इस बात के लिए मजबूर करूॅगी कि आप मेरे हो जाइये। बस एक ही विनती है आपसे कि आप मुझे ये नहीं कहेंगे कि मैं आपसे प्यार का रिश्ता न रखूॅ, क्योंकि ये मेरे बस में नहीं है भइया।”
“ये हमारे भाग्य की कैसी विडम्बना है गुड़िया?” विराज ने अत्यंत गंभीर होकर किन्तु दुखी भाव से कहा__”मैं समझ सकता हूॅ तेरे दिल की हालत को क्योंकि मैं उस हालत से आज भी गुज़र रहा हूॅ। मगर ज़रा हम दोनो भाई बहन के नसीब का खेल तो देखो…जिसको मैने टूट कर चाहा उसने मुझे सिर्फ इस लिए ठुकरा दिया कि मैं रुपये पैसे वाला नहीं रहा था और जिसे तुम टूट कर चाहती हो वो तुम्हारा हो ही नहीं सकता। ये प्यार मोहब्बत क्यों ऐसी होती है? इसके नसीब को क्यों इस तरह का बना दिया है भगवान ने कि ये जिस किसी से होगी वो उसका हो ही नहीं सकेगा? क्यों ऐसी मोहब्बत बनाई बनाने वाले ने? क्या सिर्फ इस लिए कि मोहब्बत करने वाले अपने महबूब के विरह में जीवन भर तड़पें??”
“शायद इसी लिए राज।” निधि ने कहीं खोए हुए कहा था। उसे इस बात का आभास ही नहीं था कि वह अपने बड़े भाई को उसके नाम से संबोधित कर ये कहा था। जबकि…
“र राज..???” विराज बुरी तरह चौंका था। उसने निधि को खुद से अलग कर उसके चेहरे की तरफ हैरानी से देखा।
“क क्या हुआ भइया??” निधि चौंकी, उसको कुछ समझ न आया कि उसके भाई ने अचानक उसे खुद से अलग क्यों किया।
“क्या बताऊॅ??” विराज ने अजीब भाव से उसे देखते हुए कहा__”सुना है इश्क़ जब किसी के सर चढ़ जाता है तो उस ब्यक्ति को कुछ ख़याल ही नहीं रह जाता कि वह किससे क्या बोल बैठता है?”
“आप ये क्या कह रहे हैं?” निधि ने उलझन में कहा__”मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा?”
“अरे पागल तूने अभी अभी मुझे मेरा नाम लेकर पुकारा है।” विराज ने कहा__”हाय मेरी बहन प्रेम में कैसी बावली और बेशर्म हो गई है कि अब वो अपने बड़े भाई का नाम भी लेने लगी।”
“क क्याऽऽ????” निधि बुरी तरह उछल पड़ी। हैरत और अविश्वास से उसका मुॅह खुला का खुला रह गया। फिर सहसा उसे एहसास हुआ कि उसके भाई ने अभी क्या कहा है। उसका चेहरा लाज और शर्म से लाल सुर्ख पड़ता चला गया। नज़रें फर्स पर गड़ गईं उसकी। छुईमुई सी नज़र आने लगी वह। उसे इस तरह खड़े न रहा गया। कहीं और मुह छुपाने को न मिला तो पुनः वह विराज से छुपक कर उसके सीने में चेहरा छुपा लिया अपना। विराज को ये अजीब तो लगा किन्तु अपनी बहन की इस अदा पर उसे बड़ा प्यार आया। जीवन में पहली बार वह अपनी बहन को इस तरह और इतना शर्माते देखा था।

