UPDATE – 6
इसी उत्तेजना मे मैंने दीदी का सर थोडा जोर से रगड़ दिया.
आह आराम से भैया दीदी बोली.
मुझ पर तो मानो नशा सा हो गया,
मुझे याद आने लगा रिशू दीदी को कैसे देख रहा था.
मुझे वो बैंक वाला आदमी भी याद आ गया.
मुझ पर वासना छाने लगी और मैंने दीदी के बालो को उठा कर अपने लंड पर डाल लिया
और एक हाथ से उनके बालो को अपने लंड से रगड़ने लगा
और दुसरे हाथ से उनका सर सहलाता रहा.
अरे दोनों हाथो से कर न. दीदी अपनी बंद आँखों को खोलते हुए बोलीं.
फिर मैंने उनके सर को थोडा पीछे करके अपने लंड पर भी लगाया
और मैं झड़ने ही वाला था की मम्मी रूम में आ गयी.
क्या बात है बड़ी सेवा कर रहा है बहन की. मम्मी बोली.
मेरा सारा मज़ा किरकिरा हो गया.
सच में माँ ये बहुत अच्छी मालिश कर रहा है. दीदी हँसते हुए बोली.
चलो दोनों जल्दी से नीचे आ जाओ खाना लग गया है.
दीदी ने जुड़ा बांध लिया और उठ गयी. मैंने अपने पर कण्ट्रोल किया
और दीदी के साथ नीचे चला गया.
पिछले कुछ दिनों से मेरा दीदी के लिए बदलता नजरिया मुझे बहुत परेशान कर रहा था.
अब वो मुझे अपनी बहन नहीं एक जवान लड़की लगने लगी थी.
यह सब बाते मेरी ग्लानी को बढ़ा रही थी. मुझे लगता था ये पाप है.
पर मै ये भी सोचता था की अगर दीदी के साथ कोई और ऐसा करे
जिसका दीदी से सिर्फ लंड चूत का रिश्ता हो.
मुझे वो बैंक वाला गन्दा आदमी याद आ जाता था.
रिशू का दीदी को हवस से घूरना याद आ जाता था
मेरी तो छुट्टिया चल रही थी पर दीदी के पेपर होने वाले थे
तो वो पूरा दिन अपने रूम में बैठ कर पढ़ती रहती थी.
एक दिन मैं घर का कुछ सामान लेने घर के सामने वाली दुकान पर गया था.
लौटते हुए मैंने देखा की एक आदमी मेरे घर की दीवार पर पेशाब कर रहा है.
इसको मैंने एक-दो दिन पहले भी यहाँ पेशाब करते देखा था.
मैंने सोचा जल्दी से ऊपर जाकर इसके ऊपर पानी फेक देता हूँ.
तभी मैंने देखा वो बार बार ऊपर देख रहा है.
मेरी नज़र ऊपर गयी और मैंने देखा की दीदी अपने रूम के खिड़की में से देख रही है.
मैं जब ऊपर गया तो दीदी अपने रूम में नहीं थी
और वो आदमी भी जा चूका था. मुझे लगा क्या ये आदमी रोज़ यहाँ आता है
और दीदी इसको खिड़की से देखती है.
अगले दिन मैं उसी टाइम पर धीरे से दीदी के रूम में गया और
दरवाजे की ओट से मैंने देखा की दीदी खिड़की के पास खड़ी थी
और टीशर्ट के ऊपर से अपनी एक चूची को दबा रही थी
और उनके दुसरे हाथ में जो पेन था उसे वो अपनी चूत के पास गोल गोल घुमा रही थी
और लगातार खिड़की से नीचे देख रही थी. उनका चेहरा वासना से लाल हो गया था.
फिर दीदी थोडा आगे की तरफ हुई और
उन्होंने अपना निचला हिस्सा दीवार से रगड़ना शुरू कर दिया.
ये सब देख कर मैंने भी अपना लंड बाहर निकाल लिया
और मैं भी मुठ मरने लगा. चूँकि घर पर कोई और नहीं था

तो मुझे पकडे जाने का डर नहीं था.
दीदी भी जल्दी जल्दी अपना निचला हिस्सा दीवार से रगड़ने लगी
और अपनी कड़क हो चुकी चूचियों को जोर से दबाने लगी.
आह हह आ इसस दीदी की हलकी से आवाज़ मेरे कानो में आई
और मेरे लंड ने पानी निकाल दिया.
शायद दीदी भी झड गयी थी और वो आकर बेड पर लेट गयी
और मैं जल्दी से घर से बाहर आ गया.
मैंने देखा की वो आदमी पेशाब करके जा रहा था.
ये सिलसिला कुछ दिन तक चला फिर उस आदमी ने वहा आना बंद कर दिया.
अब मेरा मन कहीं नहीं लगता था दिमाग में सिर्फ सेक्स ही घूमता रहता था.
मैं चाहे जितनी भी कोशिश करता
दिमाग इन सबसे हटाने के लिए पर कही न कहीं से घूम कर बात वही आ जाती थी
और इसका एक बड़ा कारण रिशू भी था.
उसी ने मेरे अन्दर हवस का शैतान जगाया था.
रश्मि दीदी के बारे में मेरा नजरिया और गन्दा होता जा रहा था.
मुझको अब लगने लगा था की दीदी अपनी मदमस्त जवानी लुटाने को बेताब है.
और इसी दौरान एक दिन दीदी ने मुझसे कहा की उन्हें कॉलेज से एक असाइनमेंट मिला है
जिसमे उन्हें झोपड़ पट्टी वाले इलाके का एक सर्वे करना है
और उन्हें साफ़ सफाई के बारे में जागरूक करना है.
उनकी पार्टनर शहर के दुसरे हिस्से के ५० घरों में जाएगी
और हमारे घर के पास वाले इलाके में दीदी को ५० घरों में जाना था.
दीदी ने कहा तुम मेरे साथ चलना.
अगली सुबह 9 बजे मैं और दीदी सर्वे के लिए निकल पड़े.
दीदी ने उस दिन ब्लैक रंग का सूट पहना था और जूडा बंधा हुआ था.
काले रंग के कपड़ो में दीदी का गोरा बदन क़यामत बरपा रहा था.
थोड़ी ही देर में हम स्लम एरिया में पहुच गए.
हर तरफ गंदगी फैली हुई थी. गन्दी नालिया टूटी सड़के.
हवा में बदबू. ज्यादातर घर खाली पड़े थे,
उनमे रहने वाले लोग अपने अपने काम पे चले गए थे.
सड़क पर जो मर्द दिख रहे थे वो दीदी को भूखी नज़रो से देख रहे थे.
एक आदमी जो सड़क के किनारे चरस पी रहा था
दीदी को देख कर बोला, अरे कहा जा रही है मेरी जान… मेरे पास आ जा.
बेहेन्चोद रण्डी की क्या गांड है. अरे मस्त कर दूंगा अपने लंड से.
हम उसकी बात को इगनोर करके आगे बढ़ गए.
अनपढ़ जाहिल लोगो से वैसे भी हम क्या उम्मीद करते.
खैर कुछ घरों में औरते थी जिनसे दीदी ने बात की.
कुछ ने हमारी मदद की और कुछ ने नहीं की.
ये सब करते करते दोपहर के 2 बज गए पर अभी भी ५० घर पूरे नहीं हुए.
दीदी कितना घूमना पड़ेगा. मैं थक गया हूँ. मैं दीदी से बोला.
ओह मोनू मैं भी बहुत परेशान हो गयी हूँ.
ये लोग तो ठीक से बात ही नहीं करते.
तभी मैंने जो देखा तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी.
सामने से वही बैंक वाला गन्दा आदमी चला आ रहा था.
हमारे पास आकर वो रुक गया. और दीदी की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए बोला
किसी ने सही कहा है, जब उपरवाला देता है तो छप्पर फाड़ के देता है
आज जुए में १०००० रूपए जीता और अब आप से मुलाकात हो गयी.
पहचाना मैडम? कुछ याद आया. आप आज यहाँ कैसे.

