हवेली – Update 16 | Adultery Story

दिलजले - Adultery Story by FrankanstienTheKount
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हवेली

Update 16

कुछ देर बाद निर्मला आई तो मैं कमरे से बाहर आया, हमारी नजरे मिली और ग्लानी के मारे मेरी नजरे झुक गयी .

“कल जो किया उसके लिए मैं शर्मिंदा हूँ ” मैंने कहा

निर्मला- क्या हुआ था कल मुझे तो याद नहीं .

वो ऊपर छत की तरफ चली गयी मैं उसके पीछे गया.

“कुछ चीजो का कोई मलाल नहीं होना चाहिए ” उसने कहा

मैं- मलाल करना एक संकेत होता है वर्ना वो चीजे दोहराई भी जा सकती है .

निर्मला ने कुछ जोरो से साँस ली , लगा की ब्लाउज के बटन उस दबाव को सही ही नहीं पाएंगे

निर्मला- जीवन अस्थिर होता है , जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जो बस हो जाता है हालातो पर जोर नहीं चलता. हालात रजा को रंक बना देते है . हालात जीवन को न जाने किस दिशा में मोड़ दे कौन जाने .

मुझे लगा के एक पल के लिए निर्मला कहीं खो सी गयी हो. पर तुरंत ही उसने बदली- अजित सिंह गाँव वालो के साथ ठीक नहीं कर रहा है उसने वादा किया था की पुराने कर्ज माफ़ करेगा पर वो गाँव वालो की जमीने अपने नाम कर रहा है , सुनने में आया है की गाँव में शराब की फैक्ट्री लगाएगा. ऐसा हुआ तो गाँव मुश्किल में पड़ जायेगा.

मैं- मैं बात करूँगा उस से . वैसे तुम बापू के बहुत करीब थी . तुम उनके बारे में कुछ बता सकती हो मुझे , उनके निजी जीवन के बारे में

निर्मला- तुमको ऐसा क्यों लगता है की मैं सरपंच जी को उस तरह से जानती हु.

मैं- बस लगता है .

निर्मला- सरपंच जी के अहसान रहे है मुझ पर उन्होंने मुझे ठिकाना दिया . उन्होंने काम दिया जीवन जीने की राह दिखाई. नौकर होते हुए भी बराबर का दर्जा दिया हम तो कभी भी उनके अहसान चूका ही नहीं पाएंगे.

मैं- कुछ ऐसा जो मुझे जानना चाहिए मतलब बापू के कौन दोस्त थे , किन किन लोगो के साथ उठाना बैठना था

निर्मला- बहुत लोग थे ऐसे तो

मैं- मेरी बात समझो निजी दोस्त, क्या बापू ठाकुर शौर्य सिंह के भतीजे का दोस्त था .

निर्मला- मुझे नहीं लगता ऐसा कुछ था .

मैं- बापू की मौत कोई दुर्घटना नहीं थी उनका क़त्ल हुआ था और कातिल को मैं पकड कर ही रहूँगा हर हाल में

तभी पड़ोस से कोई औरत निर्मला को बुलाने आई तो हमारी बात अधूरी रह गयी मैं सोचने लगा की फिर बापू की डायरी में वो नम्बर क्यों था . अगले दिन मैं फिर से चंदा की झोपडी में पहुँच गया . मैंने उसे झोला दिया

चंदा- क्या है ये

मैं- खोल कर देखो

जैसे ही चंदा ने झोला खोला , नए कपडे देख कर वो हैरान हो गयी.

चंदा- इसकी क्या जरुरत थी

मैं- नहीं थी फिर भी रख लो.

उसने झोला ऊपर खूँटी पर रखा और बोली- खाना खाओगे अभी बनाया ही है

मैं- भूख नहीं है अभी तो वैसे मैंने सुना है की जय सिंह ठाकुरों की बची सारी जमीन बेच रहा है

चंदा- बचा ही क्या है जो बेचेगा. मालिक के नाम जो भी जमीन थी उसे तो तुम कल देख ही आये होगे, बंजर जमीन कोई क्यों खरीदेगा. सारा माल तो जय सिंह के बाप ने हडप लिया था . ले दे कर एक हवेली ही बची है वो भी ये इसलिए नहीं बेच सकते की वो रुपाली ठकुराइन के नाम है . हादसे से कुछ दिन पहले ही वसीयत रुपाली के नाम करवा दी गयी थी .

मैं- तुम को कैसे मालूम

चंदा- मैं वहीँ पर थी , मेरे सामने ही वकील आया था

मैं- क्या नाम था उसका

चंदा- नहीं जानती . हमारी इतनी हिम्मत कहाँ थी सवाल कर सके वो तो मैं चाय लेकर गयी थी तब ठाकुर साहब और वकील की बाते सुन ली थी .

मैं- दिखने में कैसा था वो वकील

चंदा- भद्दा सा मोटा सा सर के बाल उड़े हुए .

चंदा ने जो विवरण दिया था वो रमेशा चंद से मिलता था पर कचहरी में उस नाम का कोई नहीं था . वो सकता था की उसने फर्जी नाम से मुलाकात की हो . मैंने एक बार फिर से कचहरी जाने का सोचा.

मैं- मेरे साथ हवेली चलोगी.

चंदा – कभी नहीं

मैं- क्यों

चंदा- क्योंकि हवेली मनहूस है . जो भी वहां पर जाता है लौट कर नहीं आता . जो हवेली उसमे रहने वालो का खून पि गयी वो दुसरो को कैसे बक्शेगी मैं तुमसे भी कहती हूँ अर्जुन तुम्हारा जो भी उद्देश्य है उसे छोड़ दो. हवेली किसी की नहीं हुई तुम्हे भी वहां कुछ नहीं मिलेगा .तुम अपनी पहचान तलाशने आये हो , इतनी बड़ी बात तुमने मुझको बताई. अर्जुन तुम्हारी पहचान हवेली से नहीं है उस बाप से है जिसने तुझे अपना नाम दिया.

मैं- फिर भी

चंदा- सच तुम्हारी आँखों के सामने है अर्जुन ,और वो बहुत घिनोना है . इतना घिनोना की तुम्हारी आत्मा तक पुकार उठेगी, तुम भी जानते हो तुम दो तरह से हवेली से जुड़ सकते हो या तो तुम रुपाली के बेटे हो या फिर कामिनी के और दोनों ही सुरत में तुम एक नाजायज औलाद हो. रुपाली एक विधवा थी और कामिनी बिन ब्याही .

पलक झपकते ही चंदा ने मुझे ऐसा आइना दिखा दिया था जिसमे सच को देखना आसान नहीं था .

“जीवन अस्थिर होता है , जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जो बस हो जाता है हालातो पर जोर नहीं चलता. तुम चाहो तो यही पर सब कुछ भूल कर उसी जिन्दगी में लौट सकते हो जो आजतक जीते हुए आये हो पर अगर कीचड़ में उतरना ही है तो फिर क्या सुनना क्या कहना . हवेली ने किसी को सुख नहीं दिया तुम अपने हिस्से का दुःख वहां तलाश सकते हो . ” चंदा ने कहा और झोपडी के पीछे चली गयी .



एक बार फिर से मैं हवेली में मोजूद था हवाओ से, इन दीवारों से पूछने के लिए की ऐसा क्या देखा था इन्होने, ऐसा क्या हुआ था . मैंने एक ताले को तोडा और अन्दर दाखिल हुआ , ये बहुत सुन्दर कमरा था . टेबल पर रखी तस्वीर से ही मालूम हो गया था की ये कुलदीप ठाकुर का कमरा है. हर चीज इतनी नजाकत से रखी गयी थी पर सावधानी के साथ भी अलमारी में ताला था . टेबल की ड्रावर भी लॉक्ड थी .गद्दे को पलट कर देखा कुछ नोटों के सिवाय कुछ नहीं .

“चाबिया क्यों नहीं है ” मुझे कोफ़्त सी होने लगी थी . अलमारी के ऊपर कुछ डिब्बे रखे थे जूतों के मैंने उनको देखा . कुलदीप की हर चीज रईसी दिखाती थी चूँकि वो विदेश में रहता था इसलिए. एक जूते के डिब्बे में मुझे चाबी मिली. मैंने अलमारी में लगा कर देखि , किस्मत से खुल गयी.अलमारी में कपडे थे, कपूर की महक आज भी बरक़रार थी . विदेशी रुपयों के बण्डल. दुसरे खाने में तरह तरह की घडिया थी , इत्र थे . तीसरे खाने में मुझे अश्लील चित्रों भरी किताबे मिली और एक काले रंग की कच्छी जो सिल्क की थी . मैने उसे बिस्तर पर रखा और देखने लगा. कच्छी की एलास्टिक के पास अंग्रेजी में एल लिखा हुआ था . मैंने महसूस किया की इसे पहनने वाली औरत की गांड मोटी रही होगी. पम्प हाउस में मुझे ब्रांडेड ब्रा मिली थी और कुलदीप के कमरे में कच्छी और इस पुरे गाँव में दो ही औरते थी जो ब्रांडेड सामान का इस्तेमाल कर सकती थी , रुपाली या फिर कामिनी…………………

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