गीतिका घाघरे के अंदर पूरी नंगी थी जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, मै तो एक दम से मस्त हो गया और न जाने कहा से मेरे हांथो में इतनी ताकत आ गई की मैंने गीतिका को और ऊपर करते हुए उठा दिया और गीतिका की चुत वाला हिस्सा मेरे मुह के सामने आ गया।
मैने अपनी आँखे बंद कर ली और गीतिका की चुत को अपने मुह पर दबाने लगा, लेकिन घाघरे का अगला हिस्सा चुत को ढके हुए था और मै गीतिका की बुर को
सूँघने की कोशिश कर रहा था, और फिर अचानक मैंने अपने मुह को गीतिका की चुत के ऊपर दबाते हुए उसकी फुली चुत को घाघरे के ऊपर से ही पप्पी लेनी
शुरु कर दी, तभी गीतिका के मुह से आवाज निकली यस और मैंने जब ऊपर देखा तो उसके हाथ में आम आ चूका था।
गीतिका : भैया अब उतारो भी लेकिन आराम से मैंने गीतिका पर पकड़ ढिली की और वह धीरे धीरे निचे की तरफ फ़िसलने लगी, जब वह निचे फ़िसलने लगी तो पहले उसका नंगा पेट मेरे मुह के सामने आया और मैंने भरपूर उसके नंगे पेट पर अपने होठो को फेरा और फिर जब वह और निचे सरकी तो उसके मोटे मोटे दूध मेरे
मुह के सामने आ गये।
लेकिन मुझे यह ध्यान नहीं था की गीतिका जब और निचे सरकेगी तो मेरा खड़ा लंड उसकी चुत को रोक लेगा और जैसे ही गीतिका की चुत मेरे लंड के पास पहुची लंड से उसकी बुर घिस गई और मेरे डण्डे की वजह से शायद गीतिका की फाँके एक बार खुल कर बंद हो गई या फिर उसके भग्नाशे से मेरे लंड
का घर्षण हो गया और गीतिका के मुह से आह जैसे शब्द निकल पड़े और गीतिका अब जमीन पर खड़ी थी।
उसकी नजर मेरी नज़रो से बच कर मेरे खड़े लंड
पर जा रही थी जो धोती के अंदर से तम्बू बनाये खड़ा था और गीतिका के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान फैल गई थी लेकिन उसका चेहरा कुछ लाल हो गया था और
सच कहु तो गीतिका मुझे बहुत चुदासी चुत नजर आ रही थी उसका चेहरा देख कर ही लग रहा था की उसकी बुर जरुर लंड के लिए पानी छोड़ रही होगी, फिर भी मै जानना चाहता था और ऊपर से वह अपनी चड्डी भी पहन कर नहीं आई थी मतलब उसके अंदर कुछ चल जरुर रहा था, गीतिका ने उस आम को चुसना शुरू कर दिया और मै उसके रसीले होठो को देखने लगा फिर जब उसने मेरी ओर नजरे उठा कर देखि तो उसकी नशीली आँखे ऐसी लग रही थी जैसे कह रही हो की भइया अपनी बहन की कुंवारी चुत में अपना मस्त लंड पेल दोगे क्या।

