“क्या हुआ ” उसने कहा
मैं- वो पार्सल
वो-कौन सा पार्सल
मैंने उसका जवाब नहीं दिया बल्कि देखने लगा इधर उधार उस दिन आपाधापी में वो पार्सल इधर ही छूट गया था और फिर पुजारी के कमरे में मुझे वो मिल ही गया. बेसब्री से मैंने उसको खोला और खोल कर कोई खास ख़ुशी हुई नहीं मुझे . पार्सल में एक चाबी थी बस
“क्या है ये ” पूछा लाडली ने
मैं- पता नहीं , एक वकील देकर गया था बोला की अमानत है . एक चाबी भला कैसी अमानत हो सकती है .और मैं तो ये भी नहीं जानता की ये कहाँ की है .
“तुम्हे दी गयी है तो कोई न कोई बात होगी ही इसमें ” उसने कहा
मैं उस से पहले की उसे कुछ कह पाता उसकी सहेली ने उसे पुकारा और तब मुझे मालूम हुआ की उसका नाम चांदनी है . जाते जाते उसने मुड कर मुझे देखा और आगे बढ़ गयी . रह गया मैं अकेला उस चाबी को देखते हुए . बापू ने मरते मरते हवेली कहा था और अब ये चाबी, अजीब इतेफाक था ये की जैसे ही वकील ने चाबी मुझे दी उसके कुछ बाद ही बापू की गाड़ी में आग लग गयी. कुछ न कुछ तो झोल जरुर हुआ था . ऐसा कौन दुश्मन हो गया जो इतना बड़ा काण्ड कर देगा . मेरे मन में ये सवाल भी था की क्या सरपंची के चुनाव के लिए ये सब किया गया , ऐसा करना होता तो कभी भी कर सकते थे . मैंने अपना गणित लगाना शुरू किया , इधर दिन बीत रहे थे चुनाव में अब जायदा समय नहीं था .
जब मैं घर आता तो निर्मला मुझे मिलती, उसका बदन मुझे अपनी तरफ खींचता पर मैं बात नहीं कर पाता था उससे. वो रोज घर आती, खाना बनाती, साफ़ सफाई करती और चली जाती. मैंने खेतो पर जाना भी कम कर दिया था . मैं घंटो शमशान में बापू की बिखरी राख को देखता . हवेली और चाबी दो चीजो ने मुझे उलझा कर रख दिया था . एक दोपहर निर्मला नलके पर कपडे धो रही थी उसने अपना लहंगा घुटनों पर किया हुआ था जिस से मुझे उसकी जांघो का कुछ हिस्सा दिख रहा था . और छातिया तो हमेशा के जैसे ब्लाउज की कैद से आजाद होना चाहती थी . वो भी जानती थी की मैं उसे निहार रहा हूँ.
मैं-तुम बापू को कब से जानती हो .
निरमला- जबसे इस गाँव में आई हूँ पहले मेरी सास यहाँ पर काम करती थी अब मैं करती हूँ . हमारी रोजी-रोटी खेती बाड़ी सब इसी घर की बदोलत है .
मैं- क्या लगता है अजीत का परिवार बापू की हत्या करवा सकता है क्या
निर्मला- नहीं, उस परिवार के साथ सियासी मतभेद ही थे उसके आलावा तो सब ठीक ही था ब्याह-शादियों में भी आना जाना था तो लगता नहीं और फिर इस बार हवा भी उनके पक्ष में थी .
निर्मला कपडे रस्सी पर टांकने के लिए उठी तो मेरी निगाह उसकी मोटी गांड पर पड़ी. क्यों न हो कामुक ये औरत इसका बदन था ही इतना रसीला. मैंने सोचा .
मैं- मुझे तेरी मदद की जरुरत है बदले में तुझे जो चाहिए वो मैं दूंगा.
निर्मला- कैसी मदद और मुझे क्या दोगे.
मैं-जिस दिन बापू वाला हादसा हुआ उसी दिन मुझे एक आदमी मिलने आया था कहता था की वकील हूँ और उसके पास मेरी कोई अमानत है
“वकील ”निर्मला ने शंकित स्वर में कहा
मैं- उसने तो यही कहा था .
निर्मला- पूछा नहीं क्या अमानत थी
मैं- बताऊंगा तो हंसोगी तुम मुझ पर , वो अमानत एक चाबी थी बस एक साधारण सी चाबी.
“तुम्हारी मदद करू क्या कपडे सुखाने में ” मैंने निर्मला से कहा क्योंकि धुप बहुत तेज थी
निर्मला ने मेरी तरफ देखा और कंधे उचकाए. मैंने उसके पीछे खड़ा हो गया और उसे गीले कपडे पकडाने लगा. वो जल्दी जल्दी सुखाने लगी. ऐसा करते हुए बार बार मेरा तन उसे छूने लगा. कुछ वो गीली थी उसके बदन से आती खुसबू किसी नशे से चढने लगी मुझ पर.
“कैसी चाबी थी वो ” उसने कहा
मैं- शायद किसी छोटे ताले की .
तभी उसके हाथ से कपडा फिसल कर निचे गिर गया वो उसे उठाने को झुकी और उसकी गांड की चौड़ाई मेरी आँखों के सामने आ गयी. वो थोडा सा पीछे को होकर उठी और उसकी गांड मेरे अगले हिस्से से रगड खा गयी . जैसे ही उसका बदन मेरे बदन से छुआ, बिजली सी दौड़ गयी बदन में . वो पलटी और मेरे सामने खड़ी हो गयी, करीब इतना थी की उसकी छातिया मेरे सीने से लगभग रगड खाने ही लगी थी .
“मरते वक्त बापू ने किसी हवेली का जिक्र किया था ” मैंने उसके गालो पर अपनी साँस छोड़ते हुए कहा . जैसे ही मैंने हवेली कहा निर्मला दो कदम पीछे हट गयी .
मैं- तुम जानती हो हवेली के बारे में .
निर्मला- नहीं, नहीं जानती.
उसने बाकी कपडे सुखाये और फिर बोली- रात को आउंगी अब
मैं- लखन को भी लाना कुछ जरुरी बात करनी है .
उसने हाँ में सर हिलाया और चली गयी.रह गया मैं अकेला. मैंने कमरा खोला और बापू का सामान देखने लगा. एक तरफ सरपंची का रिकार्ड रखा था, एक संदूक में जमीनों के कागज थे, उसके पास ही हिसाब-किताब था पैसो के लेनदेन का . तिजोरी में नोटों की गड्डी पड़ी थी जिनको गिनने की मैंने जरा भी कोशिश नहीं की . बापू हवेली की बात करता था हम तीन कमरों के घर में रहते थे . बेशक सरपंच था वो , पर ठाठ नहीं था . कुछ तो छिपाया था मुझसे क्या अब यही तलाश करना था .
रात को लखन और निर्मला आये तो मैंने उन्हें अपनी इच्छा बताई की चूँकि अब मैं अकेला था तो मैंने उनसे कहा की वो इस घर में ही रहने को आ जाये, कुछ सुचकाने के बाद आखिर वो मान गए. मेरे लिए ये अच्छा था क्योंकि इनसे मैं घुला-मिला हुआ था और इनके रहने से अकेलापन भी नहीं रहता . जब निर्मला खाना लेकर आई तो मैं छत पर बैठा तारो को देख रहा था . वो मुंडेर पर बैठ गयी और मैं खाना खाने लगा.
मैं- तुमने खाया खाना
निर्मला- बाद में खा लुंगी.
मैं- तुम जानती हो न हवेली के बारे में
निर्मला- मैं दूध लाती हूँ
मैं- तुम जानती हो न हवेली के बारे में
निर्मला- दूध मीठा लोगे या चीनी डालू
मैं- तुम जानती हो न हवेली के बारे में
निर्मला- कोई हवेली नहीं है …….. न थी ना है.

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