#44
खिड़की से आती धुप मेरी आँखों पर पड़ रही थी कपडे पहन कर मैं निचे आया तो देखा की निर्मला बाहर सीढियों पर बैठी थी .
मैं- यहाँ क्यों बैठी हो
निर्मला- अजीब सी घुटन है और अब जब यही रहना है तो क्यों न कुछ सामान ले लिया जाए
मैं- पहले ही सारी व्यस्व्था कर चूका हूँ मैं रसोई में जाकर तो देखो
निर्मला- मेरे पास दुसरे कपडे नहीं है
मैं- यहाँ पर बहुत से कपडे है जो भी पसंद आये पहन लो उसमे क्या है फिलहाल मुझे कुछ काम है मैं थोड़ी ही देर में लौट आऊंगा
निर्मला- अर्जुन मैं अकेली नहीं रह पाउंगी यहाँ पर
मैं- बस थोड़ी देर में लौट आऊंगा तक़रीबन आधे घंटे में वैसे भी हवेली में कोई आता जाता नहीं तब तक तुम खाना बना लेना
मैंने निर्मला को समझाया और लाल मंदिर के लिए निकल गया . एक बार फिर मैंने अपने मांस से भोग लगाया और गाँव की तरफ मुड गया चंदा कुछ मजदुर ले आई थी पर उसकी मौत के बाद से कोई आया नहीं था ,और जैसा की मुझे उम्मीद थी मजदूरो ने मना ही किया बाज़ार से निर्मला के लिए कुछ ले ही रहा था की चांदनी ने मुझे आवाज दी .
“अर्जुन ”
मैंने उसकी तरफ देखा और अपने कदम आगे बढ़ा दिए
“अर्जुन रुक तो सही ” उसने मेरे पास आते हुए कहा
मैं- काश रुक पाता
वो- ऐसे क्यों बोल रहा है तू
मैं- थोडा सा जल्दी में हूँ लाडली, तुझसे फिर मिलूँगा
चांदनी- थोड़ी देर तो रुक ऐसी भी क्या जल्दी जो अपनी लाडली के लिए समय नहीं तेरे पास
मैं- तेरे लिए तो पूरी जिन्दगी है लाडली पर मुझे ऐसा कुछ मिला है जो तेरी मेरी जिन्दगी बदल देगा
चांदनी की आँखों में चमक सी आ गयी बड़ी धूर्तता से उसने अपने उत्साह को रोका और बोली- ऐसा क्या है अर्जुन
मैं- मुझे मालूम हो गया है की ठाकुर शौर्य सिंह का सोना कहाँ पर है
चांदनि- कहाँ है अर्जुन
मैं- तुझे ले चलूँगा वहां पर जल्दी ही
मैंने चांदनी को असमंजस में छोड़ा और वहां से निकल कर हवेली आ गया . निर्मला नए कपड़ो में बड़ी प्यारी लग रही थी इतनी प्यारी की एक बार फिर से वो मेरे बिस्तर पर थी. चांदनी को मैंने जान बूझ कर वो डोर पकड़ाई थी जिस पर उसका चलना जरुरी था . बेशक निर्मला मेरे साथ थी पर दिमाग में चांदनी का धोखा ही चल रहा था दो बार की घमासान चुदाई ने मेरी हड्डियों को हिला दिया थाकुछ देर के लिए नींद सी आ गयी . आँख खुली तो मैंने एक बार फिर से निर्मला को बिस्तर पर नहीं पाया .उठ ही रहा था की मेरे पैर में ब्रा उलझ गयी मैं उसे उठा कर बेड पर फेंक ही रहा था की मेरे हाथ रुक गए मेरी नजर ब्रा के साथ में लगी पट्टी पर पड़ी जिस पर ब्रांड का नाम लिखा था और न जाने क्यों मेरी आँखों में चमक सी आ गयी मैंने तुरंत अलमारी खोली और मुझे इसी ब्रांड के ढेरो कच्छी ब्रा के जोड़ी मिली. मैंने अपना माथा पीट लिया
“हवेली के राज हवेली में ही छिपे है ” चंदा की कही बात मेरे दिमाग में गूंजने लगी . मैं निचे आया इधर उधर देखा कहीं पर भी कोई नहीं था पूरी हवेली को छान मारा सिवाय मेरे वहां पर कोई भी नहीं था . और ये ख़ामोशी मुझे खटक रही थी क्योंकि इस ख़ामोशी के निचे वो शोर दबा था जो शायद इस हवेली की चूले हिला देने वाला था .
मैं हवेली से निकलने ही वाला था की मेरी नजर तहखाने वाले कमरे पर पड़ी उसका दरवाजा खुला था जबकि मुझे याद था की जाते समय मैंने ठीक से बंद कर दिया था किसने खोला होगा सीढिया उतरते हुए निचे पंहुचा तो जो देखा देख कर मैं हैरान रह गया आँखे फटी की फटी ही रह गयी उस लम्बी सी मेज पर निर्मला लेटी हुई थी और उस पर जो चढ़ा हुआ था यकीन तो नहीं था पर आँखों को झूठा भी तो नहीं कहा जा सकता था था .
“बहुत बढ़िया तो ये सब नाटक था ठाकुर साहब, सोलह साल से कोमा में पड़े रहने का नाटक ” मैंने जोर से कहा . मुझे देखते ही दोनों अलग हो गए ठाकुर ने अपने कपडे पहन लिए और मुझे घूरने लगा. निर्मला ने अपनी सलवार बाँधी और दोनों एक दुसरे को देख कर मुस्कुराए
“तो ये है तुम्हारी सच्चाई निर्मला या फिर रुपाली ठकुराइन देर तो लगी तुम्हे समझने को पर समझ ही गया तो वो सारी बाते सच थी पर मैं ठाकुर साहब आपसे जानना चाहूँगा की ये नाटक किसलिए क्यों एक आदमी सोलह साल से बेहोशी का नाटक कर रहा था जबकि उसे ऐसा करने की कोई खास जरुरत नहीं थी तुम दोनों चाहते तो इसी हवेली में साथ रह सकते थे किस की हिम्मत थी जो रोक सकता ” मैंने कहा
“साँस ले लो अर्जुन . मैं तो हमेशा से ही तुम्हारे आस पास थी हालाँकि मेरी उत्सुकता है की तुमने कैसे पहचाना मुझे क्योंकि ये बिलकुल भी आसान नहीं था ” रुपाली ने अपने गले पर चाकू फेरना शुरू किया मुझे लगा की कहीं वो अपनी गर्दन तो नहीं काटने वाली और फिर उसने अपनी खाल सी उतार दी ये कोई नकाब था जिस से चेहरा बदला था और आज पहली बार मैं रुपाली ठकुराइन को देख रहा था उसके असली चेहरे के साथ .
रुपाली- हैरानी किसलिए अर्जुन
मैं- मुझे पहले ही समझ जाना चाहिए था , रुपाली के लिए सबसे सुरक्षित जगह उसके मायके से ज्यादा कोई नहीं थी जहाँ उसकी पूरी मदद की उसके भाई ने . और इस नकाब के छलावे में कोई भला कैसे ही पहचान पाता बहुत खूब . पहले मुझे कुछ समझ नहीं आया था की क्यों भला घर के फ़ोन से चांदनी के घर बात होती है पर ये बाते तो एक बहु अपने प्रेमी ससुर से करती थी जबकि मैं सोचता रहा की इन्दर सिंह कामिनी से बाते करने के लिए वो नम्बर नोट किया होगा.
रुपाली – तुम्हारी बात सही भी है और गलत भी
मैं- कैसे
रुपाली – बताती हूँ पर तुमने कैसे पहचाना की निर्मला ही रुपाली है
मैं- आदमी कभी कभी चाह कर भी अपनी कुछ आदतों को नहीं छिपा पाता किस्मत देखो मैं तुम्हे यहाँ लाया और तुम्हारी ब्रा ने भेद खोल दिया तुम आज भी उसी ब्रांड की ब्रा पहनती हो जो बरसो पहले पहनती थी
रुपाली मुस्कुरा पड़ी .
मैं- ठाकुर साहब तो वो क्या जरुरत थी जिसकी वजह से आपको बेहोशी का नाटक करना पड़ा.

Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.