हवेली – Update 38 | Adultery Story

दिलजले - Adultery Story by FrankanstienTheKount
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#38

“भूषण ही था न वो ” मैंने फिर से कहा

चंदा मेरे पास आई और बोली- तुम्हे कैसे पता

मैं-भूषण के जले हुए सामान में से एक तस्वीर बच गयी थी जिसमे वो तेरी बेटी के साथ है और उस तस्वीर को देख कर कोई भी समझ सकता है पर उसमे भूषण अकेला नहीं था

चंदा- और कौन था

मैंने अपनी जेब से वो पुरानी तस्वीर निकाल कर चंदा के हाथ में रख दी और चंदा की आँखे अविश्वास से फट गयी .

चंदा- नहीं नहीं नहीं

मैं- तस्वीरे झूठ नहीं बोलती इन्सान बोलते है . हवेली में चुदाई का खेल खुले आम चल रहा था और उसमे तुम और तुम्हारा पति भी शामिल हो गए बात जब बिगड़ी जब तुम्हारी बेटी को भी इस खेल में उतरना पड़ा

पर मेरी दिलचस्पी अब ये है की भूषण किसे चोदता था .

चंदा- किसी को नहीं वो तो नफरत करता था हवेली के लोगो से

चंदा की बात सामने पड़ी तस्वीर को झुठला रही थी क्योंकि तस्वीर में चंदा की लड़की नंगी पुरुषोत्तम की गोद में बैठी थी और उसके हाथ में भूषण का लंड था .

“अक्सर आँखों देखा भी झूठ हो जाता है भूषण की बीवी को खूब रगड़ते थे ये लोग , कुलदीप तो घंटो अपने कमरे में रखता था उसे. कहते है की एक दिन अत्याचार से तंग होकर वो कहीं चली गयी पर सच ये है की जब इन लोगो का उस से जी भर गया तो उन्होंने उसे मार कर दफना दिया ” चंदा ने कहा

मैं-तू इतने विस्वास से क्यों कह रही है ये

चंदा- क्योंकि जिस रात भूषण की बीवी को मारा गया उस रात मैं हवेली में थी , भूषण उस रात सरिता देवी के साथ उसके मायके गया हुआ था . मैं ये सच कभी नहीं जान पाती अगर उस रात मैं रुपाली के साथ न होती .

मैं- रुपाली के साथ .

चंदा- रुपाली की वजह से ही तो मैं हवेली में आई थी. कुलदीप ने भूषण की बीवी के सर पर वार किया था

मैं- रुपाली ने कुछ नहीं किया

चंदा- वो बहुत गुस्से में थी उसने कुलदीप पर हाथ भी उठा दिया था बात बहुत बढ़ गयी थी. ठाकुर को बीच बचाव करना पड़ा था . उस रात के बाद रुपाली और कुलदीप में कभी कोई बात नहीं हुई. तीनो भाइयो में सबसे ज्यादा मादरचोद अगर कोई था तो वो कुलदीप ही था .

मैं- ऐसा भी तो हो सकता है की भूषण ने ही अपनी बीवी की मौत का बदला लेने के लिए सबको मार दिया हो .

चंदा- शुरू में तो मैंने भी ऐसा ही सोचा था पर अफ़सोस की भूषण उस रात हवेली में नहीं था .

मैं- तो कहा था वो

चंदा- लाल मंदिर में

चंदा की बात ने मेरे होश उड़ा दिए.

मैं- पर वो वहां क्या कर रहा था .

चंदा- अपने बेटो की लम्बी उम्र के लिए ठाकुर ने पूजा रखवाई थी भूषण उसकी तैयारियों में ही लगा था .

पूरी दोपहर मैं कड़ीयो को जोड़ने की कोशिश करता रहा , कैसी पूजा थी वो. अवश्य ही पुरुषोत्तम और चंदा के पति की तकरार की वजह चंदा की बेटी रही होगी या फिर मामला यूँ हो सकता था की चंदा का पति हवेली की किसी औरत को चोद रहा हो उसे मालूम था की तीनो औरतो में से कोई तो चुदक्कड है और उसी का बदला लेने के लिए पुरुषोत्तम ने चंदा की बेटी को रगडा हो .

कुलदीप के कमरे में मिली ब्रा से इतना तो तय था की वो बुरी नजर रखता था कामिनी या फिर रुपाली पर . पर ये लाल मंदिर का क्या पंगा था ठाकुर और डेरे वाला मंगल दोनों जुड़े थे उस जगह से पर क्यों. क्या दोनों को मंदिर से एक ही चीज चाहिए थी और वो चीज क्या रही होगी जिसके लिए दोनों खून की नदिया बहाने से नहीं घबराये. और भूषण को इतने साल बाद कोई क्यों मारेगा. इतने साल का इन्तजार जबकि हवेली के ढहने के बाद कातिल जब चाहे उसे मार सकता था, मतलब भूषण कुछ तो ऐसा जान गया था जो कातिल भी उस से जानना चाहता हो.

आँख जब खुली तो चारो तरफ घोर अँधेरा छाया हुआ था . एक बार तो मैं घबरा गया सन्नाटे को देख कर पर सांसे दुरुस्त हुई तो समझा की मैं हवेली में हु और रात को मैं यहाँ नहीं रहना चाहता था. चंदा की झोपडी की तरफ जाते हुए मैं लाल मंदिर के पास से गुजरा तो देखा वहां से धुआ निकल रहा है इतनी रात को यहाँ धुआ कौन होगा सोचते हुए मैं सीढिया चढ़ कर मंदिर के प्रांगन में पहुँच गया . खंडित मूर्ति सुलगी हुई थी और आग वहां से तालाब की तरफ जा रही थी मैं वहा गया तो मैंने जो देखा मैं देखता ही रह गया .

पद्मिनी को गले से पकड़ कर उठाया हुआ था उअर जिसने उसे उठाया था वो क्या था उसे देख कर मेरी आँखों ने उसे देखने मानने से मना कर दिया . आधा घोडा और आधा इन्सान ,एक हाथ से पद्मिनी को उठाये हुए और दुसरे हाथ से उस से कुछ छीनने की कोशिश कर रहा था .

छलांग लगाते हुए मैं वहां तक पहुंचा उस अजीब जानवर , क्या मालूम वो क्या था उस पर वार किया उसने जलती आँखों से मुझे देखा अपने खुरो से दुल्ल्त्ती मारी मुझे . इतने में पद्मिनी को मौका मिल गया उसने अपने पैरो से सीने पर वार किया और पकड़ से आजाद हो गयी .

“पद्मिनी तू ठीक है न ” मैंने पूछा

उसने आँखों से इशारा किया पर दिख रहा था की वो ठीक नहीं है उसकी हालत वैसी ही थी जैसा कुछ दिन पहले वो मुझे इन्ही सीढियों पर पड़ी मिली थी .

मैं- तू जो भी है पद्मिनी से दूर हट जा वर्ना अच्छा नहीं होगा तेरे लिए

वो-मैंने तो नहीं बुलाया तुम लोगो को , तुम खुद आये उसे लेने जो तुम्हारी नहीं है. दुसरो की अमानत में खयानत करना चोरी होती है और चोरी की सजा जरुर मिलती है .

मैं- नहीं जानता तुम क्या कह रहे हो पर पद्मिनी को जरा भी खरोंच लगी तो मैं न जाने क्या कर बैठूँगा तुम्हारे साथ

वो- पद्मिनी के पास मौके थे लौट जाने के पर ये नहीं मानी इसने चुनोती का आह्वान किया और अब या तो ये चुनोती को पूरा करे या फिर सजा पाए.

मैं- कैसी चुनोती

वो- अमानत में खयानत को रोकने के लिए हम यहाँ मोजूद है तब तक रहेंगे जब तक की असली मालिक आकर हमें दायित्व से मुक्त नहीं कर देता .

मैं- कैसा दायित्व

वो- हम नहारवीर महान रक्षक होते है तंत्र में कोई भी साधक जिसने हमें जीता हो वो अपने किसी भी सामान की सुरक्षा में हमें तैनात कर सकता है जब तक वो हमें मुक्त नहीं करता हम अपना काम करते रहेंगे

पद्मिनी- मैं वारिस हूँ , बाबा मंगल की

वो- अफ़सोस पर मंगल ने हमें कभी नहीं कहा की पद्मिनी उसकी वारिस होगी .

पद्मिनी- नहीं कहा तो कोई बात नहीं , आज रात मैं खुद को वारिस साबित करुँगी और उस मिथ को तोड़ दूंगी की नहारवीर से बढ़िया सुरक्षा पंक्ति कोई नहीं

वो- तुम्हारी चुनोती पहले से स्वीकार कर ली गयी है सामर्थ्य है तो उसका प्रदर्शन करो. वर्ना अपने प्राणों का त्याग कर दो

पद्मिनी- आओ फिर

मेरी ये बाते समझ से परे थी ऊपर से पद्मिनी का अहंकार इतनी घायल होने के बाद भी लड़ाई चाहती थी . एक बार फिर वो दोनों उलझ गए मैं अपनी तरफ से बहुत कोशिश कर रहा था पर मेरी कहाँ कोई कहानी थी उन दोनों के बीच में और फिर एक पल ऐसा आया जब सब कुछ थम गया पद्मिनी इतना जोर से सीढियों से टकराई की करीब चार-पांच सीढिया ऐसे बिखर गयी की जैसे वो कभी थी ही नहीं

नाह्र्विर आगे बढ़ा और उसने पद्मिनी के सीने पर अपना हाथ रख दिया उसकी सशक्त उंगलिया पद्मिनी के सीने में उतरने लगी माना की वो उसका कलेजा ही निकालना चाहता हो .

“रुको नाह्र्विर रुको विनती सुनो ” मेरी करुना भरी पुकार सुन कर वो रुका और मेरी तरफ देखा

मैं- दया करो क्रपालु, इस मुर्ख के प्राण बक्शो मैं वादा करता हूँ की आज के बाद ये तो क्या कोई भी इस तालाब की गहराई में नहीं उतरेगा , ये मेरी भूल थी जो मैंने इस तालाब को बनाया मैं अभी के अभी पाट दूंगा इसे.

वो- अर्जुन, नियम बड़े जटिल होते है या तो उन्हें ऐसे तोड़ो की फिर कभी वो नियम बन ही न पाये अधुरा छोड़ा तो बात बिगड़ेगी.

मैं- पद्मिनी के प्राण कैसे बचे

वो- या तो कोई और इस चुनोती को पूरा करे या फिर इसके प्राणों की जगह अपने प्राण दे अब मुझे तो तंत्र का क भी नहीं आता था और मैं हरगिज नहीं चाहता था की पद्मिनी की जान जाये तो मैंने वो फैसला लिया जो लेने से कोई भी दो बार सोचता

“तुम मेरे प्राण ले लो पर पद्मिनी को कुछ नहीं होना चाहिए ” मैंने कहा

नाहर्वीर – इतना बड़ा बलिदान किसलिए

मैं- तुम नहीं समझोगे , श्याद मैं प्रेम करता हु इस से और प्रेम से बड़ी शक्ति क्या है इस जहाँ में .

“जैसी इच्छा तेरी, ” नहार्वीर ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने साथ तालाब की गहराई में ले कर चल दिया.

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