हवेली – Update 37 | Adultery Story

दिलजले - Adultery Story by FrankanstienTheKount
Reading Mode

#37



मैं – तो फिर अभी जान लेते है

पद्मिनी- तुझ पर विस्वास कैसे कर लू मैं

मैंने उसका हाथ अपने सीने पर रखा और बोला- मेरा मत कर इन धडकनों का विस्वास तो कर ये तो झूठी नहीं .

पद्मिनी- दूर क्यों नहीं चला जाता तू मुझसे

मैं- पास भी तो नहीं आने देती हु

पद्मिनी- समझता क्यों नहीं तू

मैं- समझाती क्यों नहीं फिर तू

पद्मिनी- कितनी बार कहूँ तुझसे की तेरा मेरा साथ नहीं दुश्मनी है

मैं- तो फिर इस दुश्मनी की आग पर पानी क्यों नहीं डाल देती तू . अब हवेली का वारिस मैं हूँ मुझे मार कर तेरा बदला पूरा हो सकता है .

पद्मिनी- जरुर मारूंगी पर अभी तू मेरा पीछा छोड़ मुझे कहीं जाना है

मैं- फिर लाल मनदिर जा रही है न तू तालाब में गोता लगाने

पद्मिनी- सुन अर्जुन एक बात का ध्यान रखना पानी में जो भी है उसका किसी से जिक्र नहीं करना बरसो से वो दबा हुआ था तूने तालाब बना कर ठीक नहीं किया गाँव के लोग जब जब पानी में जायेंगे उनका लालच उनको मौत की तरफ ले जायेगा और उन मौतों का जिम्मेदार तू रहेगा.

मैं- मैंने तो बस तेरी इच्छा पूरी करी थी तुझे तालाब चाहिए था मैंने बना दिया

पद्मिनी – नियति के इसी इशारे को मैं समझ नहीं पा रही हूँ ,

मैं- तो फिर सब कुछ नियति पर क्यों नहीं छोड़ देती

पद्मिनी- मैं अपनी नियति खुद लिखूंगी

मैं- चल न मेरे साथ हवेली

पद्मिनी- मुझे काम है

मैं चाह कर भी उसे नहीं रोक पाया और हवेली की तरफ चल दिया, चंदा मुझसे पहले वहां पहुँच चुकी थी कुछ मजदुर बगीचे को साफ़ कर रहे थे . मैंने उसे अन्दर आने को इशारा किया और आगे बढ़ गया कुछ देर बाद वो भी अन्दर आ गयी .

चंदा – क्यों बुलाया

मैं- तू रुपाली को कितना जानती थी

चंदा- कितनी बार पूछना है तुमको ये

मैं- जब तक तू मुझे सच नहीं बता देती

चंदा- सच जैसा कुछ नहीं होता दुनिया में हमारी आँखे जो देखती है वो ही सच होता है

मैं- तो तेरी आँखों ने क्या देखा था . रुपाली के इस घर में किस से अवैध सम्बन्ध थे

चंदा- सब को पता है फिर मुझसे क्यों पूछता है

मैं- क्योंकि तू पूरी बात नहीं बताती मुझे, मैं तुझसे पूछ रहा हूँ की रुपाली के ठाकुर शौर्य सिंह के आलावा और किस से सम्बन्ध थे .

मेरी बात सुन कर रुपाली का मुह खुला का खुला रह गया

चंदा- ये क्या कह रहे हो तुम

मैं- क्यों तुझे नहीं पता

चंदा- कसम से नहीं पता. ठाकुर के आलावा वो किसी और के साथ भी थी

मैं- क्या रुपाली जानती थी की कामिनी और इन्दर सिंह एक दुसरे से प्यार करते थे

चंदा- कह नहीं सकती , कामिनी बहुत अजीब लड़की थी ,हमेशा गुमसुम रहती थी बहुत कम बात करती थी कमरे से बहुत कम निकलती थी पर जब भी निकलती तो खेतो पर ही जाती थी

मैं- कहीं ऐसा तो नहीं था की उसके भाई लोग ही पेल रहे थे उसको

मेरी बात सुन कर चंदा ने मुह पर हाथ रख लिया और बोली- हाई दैया ये क्या कह रहे हो तुम

मैं- क्यों ऐसा नहीं हो सकता क्या , हवस कोई रिश्ते नहीं देखती चूत बस चूत होती है चाहे किसी की भी हो तूने ही तो कहा था न हो सकता है की कामिनी के भाई ही उसका शोषण करते हो इसलिए वो गुमसुम रहती हो

चंदा- अगर ऐसा होता तो ठाकुर साहब अपने बेटो को कब का मार देते उनके लिए इज्जत से बढ़ कर कुछ नहीं था

मैं- वो इज्जत जिसे इन चारदीवारियो में तार तार किया जा रहा था . वैसे तेरी एक बेटी थी न चंदा ,कहाँ है वो आजकल

चंदा- तुझे क्या लेना देना मेरी बेटी से

मैं- इस हवेली से तो लेना देना था न तेरी बेटी का .तू लाख छिपा इस बात को पर इस हवेली को छोड़ने की वजह कोई और नहीं बल्कि तेरी बेटी थी न .

चंदा के चेहरे पर असमंजस के भाव उभर आये .

मैं- उस रात का सच तू जानती है चंदा अपनी बेटी की वजह से तू छुपा कर रखे हुए है पर एक बात समझ की सोलह साल बीत गए है तेरे सिवा इस दुनिया में एक भी ऐसा इन्सान नहीं जिसे इस बात से कोई फर्क पड़ा हो की तेरी बेटी जिन्दा है या मर गयी उसके साथ क्या हुआ किसने चोद दिया उसे एक ने दो ने या फिर ………..

“मैं नहीं जानती वो कहाँ है उसके साथ क्या हुआ जिन्दा है भी या मर गयी उस शाम जब मैं घर पहुंची तो वो वहां नहीं थी ” चंदा ने गहरी साँस लेकर कहा .

मैं- गायब हो गयी

चंदा- हाँ, गायब हो गयी .जैसे वो कभी थी ही नहीं आखिरी बार उसको किसने देखा कोई नहीं जानता कोई बताने वाला नहीं की वो किस रस्ते गयी जमीं खा गयी या फिर आसमान जश्न की काली रात में उधर हवेली के दिए बुझ गए और इधर मेरे घर की रौशनी चली गयी.

मैं- कहीं ऐसा तो नहीं की तेरी बेटी और ठाकुर के बेटो का कुछ लफड़ा हो

चंदा- होता तो भी क्या कर लेती मैं

मैं- बातो को घुमाने से कोई फायदा नहीं होता चंदा , मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ की तेरे दिल में बदले की ऐसी आग लगी है जिसमे तू इस दुनिया को झुलसा दे तो भी तुझे चैन नहीं आएगा. मैं तेरी मद्दद करना चाहता हूँ पर अफोसोस है की तुझे भरोसा नहीं मुझ पर

चंदा- भरोसा बहुत खोखला शब्द है अर्जुन

मैं- खोखला भरोसा ही कर के तो देख

चंदा ने पीठ मोड़ी और अपने कदम हवेली से बाहर की तरफ बढ़ा दिए

“तेरी बेटी को बर्बाद करने वाला कोई और नहीं बल्कि भूषण था ”

चंदा के कदम अचानक से रुक गये

Please complete the required fields.




Comments

Leave a Reply