#34
रात को अचानक से जागा तो बदन पसीने से नहाया हुआ था बेशक पंखा चल रहा था बाहर आकर पानी पिया देखा की निर्मला आँगन में ही सोयी हुई पड़ी थी . एक बार फिर से मेरी नजर उसकी मादक गांड पर पड़ी और दिल में कसक सी उठ गयी मैं चाह कर भी अपनी ही नौकरानी को चोद नहीं पा रहा था
खैर, सुबह मैंने निर्मला के साथ ही नाश्ता किया वो मुझ को गाँव की बाते बता रही थी की अजित ने पुलिस में कोई शिकायत नहीं की थी अपने बाप की मौत को लेकर,
“तुमको सावधान रहना होगा वो बदला लेने की पूरी कोशिश करेगा ”
मैं- पता है मुझे देखो कितना समय टलता है वैसे मैं तुम्हे बताना चाहता हूँ की कल मेरे साथ क्या हुआ
मैंने उसे बताया की हवेली अब मेरे नाम पर है , निर्मला की आँखों में आश्चर्य था उसे यकीन नहीं हो रहा था .
निर्मला- पर आखिर वो है कहाँ
मैं- जल्दी ही तलाश कर लूँगा उसे.
निर्मला- जब ये बात जय सिंह को मालूम होगी तो कलेश बढेगा ही बढेगा , अर्जुन मुझे ऐसा लगने लगा है की तुम किसी बड़ी मुसीबत में फंसने वाले हो
मैं- मुझे भी ऐसा ही लगता है . वैसे रुपाली हवेली छोड़ने के बाद चाहती तो अपने मायके भी आ सकती थी क्या उसका दिल नहीं करता होगा यहाँ आने का
निर्मला- उसका कोई खास मोह नहीं था किसी से , क्या सरपंच जी के मरने की खबर उस तक नहीं पहुंची होगी वो अपने भाई को रोने तक नहीं आई
मैं- मैने भी सोचा था इस मुद्दे पर , और मेरी समझ से परे है की रुपाली को छिप कर रहने की क्या जरुरत है
निर्मला- मैं भी सोचती हूँ इस बारे में जबसे तुमने कहा की वो विदेश नहीं गयी तो बात उलझी उलझी सी लगती है .
मैं- मैं चाहता हूँ की तुम मेरे साथ हवेली चलो
निर्मला- मैं, मेरा वहां क्या काम
मैं- क्योंकि मैं वहां अकेला नहीं रहना चाहता
निर्मला- क्या तुम ये घर छोड़ कर जाना चाहते हो
मैं- क्या मालूम पर मैं इतना चाहता हूँ की अगली बार मैं जब वहां जाऊ तो तुम मेरे साथ चलो
मैंने उसकी चुचियो को निहारते हुए कहा
निर्मला- ठीक है अब तुम्हारा कहा टालने की मेरी हिम्मत कहाँ
मैं- मेरी गुजारिश समझो इसे
एक बार फिर से मैं टेप में रिकॉर्ड आवाजो को सुन रहा था और कई बार सुनने के बाद मैंने जाना की आवाज किसी एक औरत की नहीं थी बल्कि दो अलग अलग औरतो की थी . मेरी उत्सुकता मुझे एक बार फिर हवेली की तरफ खींच रही थी जब मैं वहां पहुंचा तो पाया की जय सिंह पहले से मोजूद था .
“तू यहाँ कैसे ” उसने सवाल किया
मैं- ये बात मैं तुझसे पूछता हूँ की मेरी मिलकियत में तूने पैर रखने की हिम्मत कैसे की
जय- क्या बकवास कर रहा है नशे में है क्या
मैं-नशा तो तेरा उतर जायेगा चूतिये जब तुझे मालूम होगा की इस हवेली का नया वारिस मैं हूँ रुपाली ठकुराइन ने इसे मेरे नाम कर दिया है .
मेरी बात सुन कर जय सिंह की आँखे और गांड एक साथ फट गयी .
“झूठ कहता है तू ” उसने कहा
मैंने जेब से वसीयत का कागज निकाला और उसके सामने कर दिया
मैं- अच्छे से पढ़ ले और फिर निकल यहाँ से
जय सिंह- मैं नहीं मानता इस कागज के टुकड़े को वैसे भी ताईजी लन्दन में है तूने फर्जी तरीके से हवेली हडपने की साजिश की है
मैं- ये कला तेरे बाप को बहुत अच्छी तरह से आती थी उसने ठाकुर की सारी जमीने ऐसे ही तो हडपी थी और फिर तेरी ताई जो लन्दन में उस से जाकर पूछ ले न वो तुझे सच बता देगी
जय- मेरे बाप का नाम इज्जत से ले
मैं- हवेली की चिंता छोड़ और अपने बाप को तलाश कर तुम लोगो को छोड़ कर न जाने कहा भाग गया वो . कहीं उसने ये तो नहीं सोचा की क्या फायदा ऐसी बावली गांड औलाद के साथ रहने का .
जय- जल्दी ही मरेगा तू
मैं- कोशिश कर के देख लेना पर फिलहाल के लिए निकल यहाँ से
तभी मेरी नजर चंदा पर पड़ी जो दूर खड़ी हमें देख रही थी . जय सिंह पैर पटकते हुए जैसे ही गया मैं चंदा के पास पहुँच गया .
मैं- क्या देख रही थी
चंदा- लकडिया लेने जा रही थी तुम लोगो को झगड़ते देखा तो रुक गयी .
मैं- सुन मुझे कुछ मजदूरो की जरुरत है हवेली की साफ़ सफाई करवानी है इन झाड़ियो को कटवाना है
चंदा अपनी आँखों को चौड़ी किये मुझे देखती रही .
मैं- सुन रही है न तू
चंदा- क्या सच में रुपाली ठकुराइन लौट आई है
मैं- हाँ कल रात वो इसी हवेली में मेरे साथ थी . और जल्दी ही यही आके रहेगी .
चंदा- मैं अभी जाती हूँ और मजदूरो का इंतजाम करवाती हूँ.
उसके जाने के बाद मैं एक बार फिर से तेज के कमरे में आ गया. मुझे कसेट को एक बार और सुनने के बाद मुझे कुछ कुछ समझ आने लगा था मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और उंगलियों ने उस चाबी को महसूस क्या , मैं जान गया था की मेरी मंजिल कहाँ पर है . एक बार फिर से मैं खेतो में बने उस कमरे में मोजूद था और मुझे पूरा यकीं था की टेप में रिकॉर्डिंग यही पर की गयी थी . क्योंकि मैंने वहां पर दो कसेट और तलाश ली थी जो दिवार में छिपाई गयी थी .
“मुझे लगता है की कोई मुझे नहाती हुई देखता है ” औरत ने कहा
आदमी- तुम्हारा वहम होगा इतनी हिम्मत किसकी होगी
औरत- मैंने महसूस किया है
आदमी- किस पर शक है तुम्हे
औरत- समझ नहीं आता ये जगह भी सुरक्षित नहीं रही मिलने के लिए आज के बाद हम लाल मंदिर के पीछे मिला करेंगे और तुम इतनी जिद मत किया करो
आदमी- मैं क्या करू तुम हो ही ऐसी की मैं खुद को रोक नहीं पाता मेरी नजरे बस तुमको देखना चाहती है संगमरमर से भी ज्यादा खूबसूरत हो तुम दिल करता है की बस तुम्हारे अन्दर खोया रहूँ. तुम्हारा ये हुस्न, मैं कभी कभी सोचता हूँ की क्या वो तुम्हारी प्यास नहीं बुझा पाता
औरत-मुझे डर लगता है कहीं उसको पता न चल जाये वैसे भी वो तुमको पसंद नहीं करता
आदमी- तुम अगर साथ दो तो मैं उसे रस्ते से हटा दू
औरत- पागल हुए हो क्या हम दोनों की लाशे भी नहीं मिलेंगी कभी
कुछ देर ख़ामोशी छाई रही और फिर चुदाई की आवाजे आने लगी
“मेरी मज़बूरी का फायदा मत उठाओ तुम ”औरत ने कहा
आदमी- कोई मज़बूरी नहीं है तुम खुद आती हो मेरे पास क्योंकि जो सुख तुमको मेरे निचे मिलता है वो कोई और नहीं दे सकता . तुम खुद अपनी टाँगे खोलने की इच्छा रखती हो वर्ना मजाल जो तुम्हारी तरफ नजरे उठा कर भी देख सकू
औरत- फिर भी ये गलत है
आदमी- गलत तो वो भी था ,
औरत- ये आखिरी बार है इसके बाद मैं कभी नहीं आउंगी यहाँ पर
कमरे की दो चाबिया थी जिनमे से एक औरत और दूसरी आदमी के पास रही होगी पर एक चाबी बापू के पास मिली थी जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था की इन्दर सिंह क्या यहाँ पर किसी की चुदाई करता था या फिर कोई और ही खेल चल रहा था .

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