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#33

एक बार फिर से मैं हवेली में मोजूद था . कहानी किसी एक किरदार की हो तो समझने में आसानी होती है पर यहाँ कहानी परतो में थी, टुकड़े बिखरे हुए थे पर काण्ड चूँकि हवेली में हुआ था इसलिए माना जा सकता था की कडिया भी यही बिखरी हुई होंगी. मैंने इस बार तेज ठाकुर के कमरे में नजर घुमानी शुरू की , ऐसा नहीं था की मैं पहले नहीं आया था इस कमरे में पर जबसे मुझे मालूम हुआ था की चंदा का पति तेज का पिछलग्गू था तो मेरी उत्सुकता जाग उठी थी .

शराब की बोतले मैंने एक तरफ रखी . तेज की अलमारी में ज्यादा कुछ नहीं था पर क्या सच में ऐसा था , अलमारी के अंदरखाने मुझे एक छोटा सा टेप रिकार्डर मिला जिसमे एक कसेट पड़ी थी .प्ले बटन दबाया पर चला नहीं , सेल ख़तम हो चुके थे. मैंने तुरंत कदम बाहर की तरफ बढ़ाये पर तभी मेरी नजर निचले कमरे के दरवाजे पर पड़ी, मुझे यकीन था की मैंने दरवाजा बंद किया था पर अभी दरवाजा खुला हुआ था , पीछे से कोई तो जरुर आया होगा.

उत्सुकता वश मैं कमरे में पहुंचा तो देखा की कुछ सामान बिखरा सा हुआ था शायद किसी ने मेरे जाने के बाद तलाशी ली होगी पर उस धुल भरी मेज पर एक लिफाफा बड़े सलीके से रखा हुआ था . जैसे ही मैंने लिफाफे को खोला मेरे होश उड़ गए. वो महज एक कागज का टुकड़ा नहीं था बल्कि वो एक वसीयत थी जो मेरे लिए छोड़ी गयी थी.

“आज के बाद इस हवेली का एक मात्र वारिस अगर कोई होगा तो सिर्फ और सिर्फ अर्जुन सिंह होगा ” बार बार मैं ये शब्द पढ़े जा रहा था और निचे जो लिखा था उस एक शब्द ने मेरे मन में इतनी हलचल मचा दी थी की मैं बता नहीं सकता .

“रुपाली ”

जैसा की पासपोर्ट वाली घटना से मैं जान ही गया था इस वसीयत ने मुहर लगा दी थी की रुपाली कभी लन्दन गयी ही नहीं थी . तो क्या रुपाली खुद हवेली में आई थी या फिर ये कोई जाल था मेरे लिए पर अगर जाल था तो मैंने खुद इस जाल में फंसने का सोचा और सबसे पहले हवेली के बाहर लटके उस ताले को तोड़ दिया. ये जानते हुए भी की जय सिंह से पंगा होगा इस बात को लेकर पर किसे परवाह थी .

सेल खरीदने के बाद मैंने टेप को चालू किया कुछ देर घिर्र घिर्र होती रही और फिर आवाज आई

“सी आह आः आह ” मद्धम आवाजे ये किसी औरत की थी जो चुदाई के समय मस्ती में चूर थी . कुछ देर ये आवाजे आती रही और फिर बात आगे बढ़ी .

“, बार बार मेरा यूँ आना मुमकिन नहीं है ” औरत ने कहा

“क्या करू तुमसे दूर रहना भी तो मुमकिन नहीं ” ये किसी आदमी की आवाज थी

औरत- पास भी तो नहीं रह सकती किसी को भी मालूम हुआ तो आग लग जाएगी

आदमी- मुझे परवाह नहीं अगर तुम साथ देने का वादा करो तो

औरत- ये नहीं हो सकता

उसके बाद काफी देर तक कोई आवाज नहीं आई. मैं टेप को बंद करने ही वाला था की एक बार फिर से घिर्र घिर्र हुई .

“मुझसे अब और नहीं होता कभी कभी लगता है की जान दे दू ” औरत ने कहा

आदमी- जान देना किसी समस्या का हल नहीं होता

औरत-तो क्या करूँ मैं कब तक घुटती रहूँ

आदमी-मैं जल्दी ही कुछ न कुछ करूँगा

औरत- ये जगह मिलने के लिए ठीक नहीं है, मुझे लगता है की भूषण को शक हो गया है

आदमी- हम्म

उसके बाद एक बार फिर से शायद चुदाई शुरू हो गयी थी आगे कुछ खास नहीं था . मैंने कसेट को दूसरी साइड से चलाया

“तो मैं क्या करू, अगर तुम मेरी प्यास नहीं बुझा सकते तो मेरा क्या दोष है ” औरत की आवाज आई

“तड़क ” ये थप्पड़ की आवाज थी

“थप्पड़ मार कर तुम अपनी मर्दानगी साबित नहीं कर सकते ” इस बार औरत की आवाज में तल्खी थी

कुछ टूटने की आवाज आई शायद कांच का गिलास रहा होगा

“भैया, जश्न की तैयारिया हो गयी है सब आपका इंतजार कर रहे है ”

उसके बाद कोई आवाज नहीं आई. आगे की कसेट पूरी खाली थी . बहुत देर तक मैं उस कसेट को बार बार सुनता रहा समझता रहा तेज किसी की जासूसी कर रहा था और मेरा अनुमान था की तेज रुपाली की जासूसी कर रहा होगा,जिस प्रकार कर वार्तालाप था और चंदा ने कहा था की पुरुषोत्तम नपुंसक था तो हो सकता था की रुपाली का चक्कर किसी और से चल रहा हो और तेज इस बात को जान गया हो.

कुलदीप के कमरे में मुझे ब्रा मिली थी तो क्या रुपाली अपने देवर से चुदती थी . हवेली का राज हवेली में ही मिलेगा मुझे पूरा विश्वास था . खैर दिन बीत रहा था रैना आने को बेक़रार थी तो मैं गाँव की तरफ चल दिया. दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था एक बार फिर मैं रात को बापू के सामान को चेक कर रहा था अगर वो कामिनी से प्यार करता था तो कुछ तो सबूत मिले सोचते हुए मैं सामान को इधर उधर फेंक रहा था की मुझे एक चाबी मिली और उस चाबी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया क्योंकि ये चाबी हो न हो उसी चाबी की जुड़वाँ थी जो मुझे वकील ने दी थी . तो क्या उस वकील को बापू ने ही भेजा था सोचते हुए मेरी आँख सी लग गयी .

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