हवेली – Update 29 | Adultery Story

दिलजले - Adultery Story by FrankanstienTheKount
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#29

पासपोर्ट को हाथो में लिए मैं सोच में डूब चूका था , रुपाली लंदन नहीं तो फिर कहा गयी पर इस कहानी में रुपाली अकेली नही थी जिसका अता पता नहीं था, कामिनी और ठाकुर का भतीजा भी तो गायब थे, क्या ये तीनो आपस में मिले हुए थे या फिर इन तीनो की अलग ही खिचड़ी पकी हुई थी . मैंने पासपोर्ट और वसीयत को वापिस से बैग में रखा और तहखाने की अच्छे से तलाशी लेने लगा. एक एल्बम मिला मुझे जिसमे ठाकुर परिवार के सभी सदस्यों की तस्वीरे थी पर कुछ तस्वीरे गायब थी और मुझे पूरा विश्वास था की वो तस्वीरे रुपाली की ही रही होंगी क्योंकि इस हवेली में उसकी ही कोई निशानी मोजूद नहीं थी .

भूषण इस हवेली का एकलौता वफादार जिसे कोई मार जाता है वो भी ठीक तब जब वो मुझे हवेली की अंदरूनी बाते बताने को राजी हो जाता है , मतलब साफ़ था कोई मुझ पर नजर रखे हुए था कोई हर लम्हा जानता था की मैं क्या कर रहा हूँ क्या मालूम उसी कोई ने ये बैग यहाँ पहुँचाया हो ताकि मैं आसानी से ये समझ सकू की रुपाली लन्दन नहीं गयी पर वो कोई कौन था . वो जो भी था इतना तो जरुर था की वो मुझे मोहरा बना कर रुपाली तक पहुंचना चाहता हो पर किसलिए ये सवाल और मेरे लिए खड़ा हो गया था .

रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी जब मैं अपने घर पहुंचा तो सब कुछ अँधेरे में डूबा था , मैंने अपनी शर्ट उतार कर फेंकी और अपने ज़ख्मो को सहलाते हुए ऊपर जाने लगा तो निर्मला की आवाज ने मेरे कदमो को रोक लिया .

“अपने ही घर में अगर चोरो की तरह आना पड़े तो समझ लेना चाहिए की खुद से भागने में बड़ी तकलीफ हो रही है ”

निर्मला के पायजेब की झंकार गूंजने लगी जब तक की वो मेरे पास नहीं आ गयी इतना पास की एक बार फिर उसकी भारी छातिया मेरे सीने पर दस्तक देने लगी .

“अब ये घर, घर रहा भी तो नहीं ” मैंने कहा

“जहाँ दो लोग रहते है वो घर हो जाता है ” उसने अपने सांसे मेरे होंठो पर छोड़ते हुए कहा.

मैं- पर न जाने मेरा घर कहा है

मैं आगे जाने को बढ़ा पर वो हिली भी नहीं .

“अजित के साथ हुई मार पिटाई ने माहौल को गर्म कर दिया है आज उसका बाप आया था और कह कर गया है की दुबारा से ऐसी घटना हुई तो अंजाम बुरा होगा .” निर्मला बोली

मैं- और तुमने सुन लिया कहा क्यों नहीं की अर्जुन को अंजाम की परवाह नहीं

निर्मला- अर्जुन दुश्मनी की आग को बढ़ाना ठीक नहीं वैसे भी सरपंच जी के जाने के बाद तुम्हारी हालत पहले जैसी नहीं , और फिर गाँव वालो का क्या है जिन लोगो के लिए तुम ये दुश्मनी पाल रहे हो वो लोग मौका आने पर साथ खड़े नहीं होंगे.

मैं- कोई बात नहीं मैं तो अपने उसूलो के लिए खड़ा रहूँगा न .

निर्मला- जिदंगी की ठोकर में सबसे पहले उसूल ही बिखरते है

मैं- तुमको जायदा पता है क्या

निर्मला- हाँ

मैंने उसे रस्ते से हटाया और ऊपर जाकर सोने की कोशिश करने लगा पर नींद भी जैसे दुश्मन हुई पड़ी थी . मेरे लिए दो दो जगह की पहेलियो को सुलझाना मुश्किल हो रहा था एक तो घर की और दूसरा हवेली की पर क्या सच में ऐसा था नहीं मैं गलत सोच रहा था ये दोनों परेशानिया तो एक ही थी जब सरपंच जी रुपाली के भाई थे तो हवेली से नाता अपने आप जुड़ना था , कडिया मेरे आस पास ही तो थी बस जरुरुत थी उन्हें जोड़ने की . मैं तुरंत निचे आया निर्मला सो रही थी . उसकी पीठ मेरी तरफ थी , साडी में उसकी उभरी हुई गांड क्या क़यामत लग रही थी . मैं जानता था की जब वो किसी और से चुद सकती थी तो मुझे भी दे सकती है पर न जाने क्यों मेरी हिम्मत नहीं होती थी उसके पास जाने की .

कांपते हाथो से मैंने निर्मला के नितम्बो पर हाथ रखा और हलके से उसे सहलाया उसके बदन ने जुम्बिश ली .पल भर में ही मैंने अपने बदन में उत्तेजना की लहर महसूस की . साँस लेने से उसका सीना बार बार ऊपर निचे हो रहा था , पसीने से भीगी उसकी नाभि , लरजते होंठ इस से पहले की मैं उन्हें चूम ही लेता बाहर से किसी के जोर जोर से किवाड़ पीटने की आवाज आने लगी मैं दौड़ कर गया और जैसे ही दरवाजा खोला वो मेरी बाँहों में झूल गया .

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