पद्मिनी के हाथ में एक बेहद पुराना कागज था जो शायद खत रहा होगा मैंने तो ऐसा ही माना था जिस पर लिखा था मैं शाम को हर हाल में लाल मनदिर में तुम्हारा इंतज़ार करुँगी .
“कहाँ मिला ये तुमको ” मैंने कहा
पद्मिनी- ये डायरी मुझे कमरे में लैंप के पास मिली इसी में से
डायरी को देखा मैंने ये वही डायरी थी जिसमे शायरिया लिखी हुई थी पर शायद मैं इस खत को देख नहीं पाया था .
मैं- क्या लगता है किसने लिखा होगा ये खत
पद्मिनी- ये निर्भर करता है की खत किसके लिए लिखा गया था घर से बाहर का ही कोई रहा होगा जिसके लिए लिखा गया , घर वालो को भला क्यों खत लिखेगा कोई
बात में दम था .
“पर लाल मंदिर ही क्यों, ” मैंने कहा
पद्मिनी- तुम्हे अब तक तो समझ जाना चाहिए की हवेली और मंदिर का गहरा ताल्लुक रहा है तुम्हे उस कारण की तलाश करनी चाहिए
मैं- मुझे लगता है की ये गुरुर और नफरतो की कहानी है
पद्मिनी- मुझे लगता है की ये अधूरी हसरतो की कहानी है इस ख़त को देखो , क्या मालूम हवेली में इश्क का पौधा खिला हो और रसूखदारों के घरो में अयाशी की बेले तो चढ़ती है पर मोहब्बत के पत्तो को कुचल दिया जाता है , फ़िलहाल के लिए ये मान लेते है की कामिनी किसी से प्रेम करती थी .
मैं- वो ही क्यों
पद्मिनी- क्योंकि अक्सर बगावत ऐसे ही होती है
मैं- तुम्हे बड़ा पता है तुमने भी कभी की है क्या बगावत
पद्मिनी- तुम्हारे साथ यहाँ खड़ी हूँ ये बताने के लिए काफी है
मैं- क्या हो तुम तुम्हे समझना बहुत मुश्किल है
पद्मिनी- मैं भी नहीं समझ पा रही इस बात को अर्जुन, तुम खुद को हवेली का वारिस समझते हो और मैं हवेली के कुल का नाश करना चाहती हूँ ये कैसा नाता बनाया है नियति ने और मैं हैरान हूँ अपने आप से की क्यों मैं तुम्हारे साथ हूँ
मैं- तू जाने और तेरी नियति जाने . मैं बस इतना कहूँगा की अगर तू कभी मुझे मारे तो मेरी आँखों में देखते हुए मारना. जब तू मुझे मारे तो आहिस्ता से छुरी को मेरे कलेजे में उतारना जल्दी मत करना ,तुझे देखते हुए मरेंगे तो सकून रहेगा. मैं मेरी जान अभी तेरे पास गिरवी रख दू पर मेरी एक इल्तिजा अगर तू माने तो
पद्मिनी कुछ पल मुझे देखती रही और बोली- क्या
मैं- जब तक वो दिन आयेगा तब तक तू उदास नहीं रहेगी, बड़ी बेकार लगती है तू उदास चेहरे के साथ .
पद्मिनी ने पीठ मोड़ ली “नजरे झुका के जा रही हो ” मैंने कहा
“जाना ही पड़ेगा , थोड़ी देर और रुकी न तो …….. ” पद्मिनी ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी और जिस रस्ते से हम अन्दर आये थे उधर बढ़ गयी .मैंने रोका नहीं उसे. एक बार फिर मैं हवेली के कमरों की तलाशी लेने लगा. कुलदीप के कमरे से मुझे जो ब्रा मिली थी उसने मुझे उलझन में डाला हुआ था वो ब्रा या तो रुपाली की थी या फिर कामिनी की और यदि ऐसा था तो कुलदीप के मन में क्या खुराफात थी भाभी को उस नजर से देखा जा सकता था पर कोई अपनी ही बहन की ब्रा को अपने कमरे में क्यों रखेगा छुपा कर .
“पुरुषोत्तम नपुंशक था ” चंदा के कहे शब्द मेरे मन में गूंजने लगे, क्या रुपाली अपनी हवस मिटाने देवर के पास जाती होगी . रुपाली कौन थी वो कैसी थी वो उसे देखने की इतनी तलब हो गयी थी की लगा कहीं दीवाना न हो जाऊं मैं. ख़त लिखने वाली जाना चाहती थी लाल मंदिर और चुदाई होती थी खेत में अजीब बात थी यहाँ पर एक कहानी नहीं पूरा झमेला था . अँधेरा होने लगा था हवेली से निकल जाने के लिए मैं निकल रहा था की मेरी नजर रसोई के पास उस जगह पर पड़ी जिस पर शायद मैंने ध्यान नहीं दिया था . लोहे का छोटा दरवाजा जिस पर केवल कुण्डी थी . मैंने कुण्डी खोली निचे जाने को सीढिया थी जिन पर धुल जाले लगे थे . एक तरफ होता अँधेरा दूसरा मेरे मन की उत्सुकता मैंने उत्सुकता पर ध्यान दिया और जालो को हाथो से हटाते हुए मैं निचे उतरता गया .
कमरा न ज्यादा बड़ा था न ज्यादा छोटा , अँधेरा होने की वजह से मैं कुछ खास नहीं देख पा रहा था पर यहाँ पर सामान बहुत भरा हुआ था तभी मेरे हाथ से कुछ टकराया और कमरा रौशनी से नहा गया . अचानक हुई रौशनी से मेरी आँखे कुछ लम्हों के लिए चुंधिया गयी पर इस से ये तो मालूम हुआ की आज भी हवेली में बिजली थी और हम चुतिया इतने दिनों से बटन की तरफ देख ही ना रहे थे .
कमरे में एक बड़ी सी मेज थी , दो अलमारिया रखी थी . एक तरफ चित्रकारी का सामान पड़ा था एक तरफ बहुत से कपडे पड़े थे . हैरानी की बात ये की दोनों अलमारी खाली थी . एक तरफ कुदालिया रखी थी . हवेली में कुदाली का क्या काम सोचते हुए मैंने एक पुराने चमड़े के बैग को देखा और जब उसे खोला तो उसमे से मुझे जो चीज मिली उसने मुझे हैरान और परेशान कर दिया .
वो चीज बेशक एक कागज़ का टुकड़ा थी पर उसका मोल बहुत था वो ठाकुर शौर्य सिंह की वसीयत थी जिसमे उन्होंने हवेली को रुपाली के नाम कर दिया था पर बात सिर्फ यही तक होती तो भी कोई बात नहीं थी असली परेशानी का कारन तो वो पासपोर्ट था जिस पर रुपाली ठकुराइन का नाम लिखा था . अब पासपोर्ट यहाँ था तो इसका मतलब साफ़ था रुपाली कभी लन्दन गयी ही नहीं कहानी इतनी आसान भी नहीं थी खेल तो कभी रुका ही नहीं था ………………….

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