#25
“अर्जुन छोड़ दे अजित को ” चांदनी ने चीखते हुए कहा.
मैं तो बस उसे देखते ही रह गया समझ ही नही पाया की हो क्या रहा है . लम्बे लम्बे डग भरते हुए वो मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी .
“इतनी जुर्रत करने की सोची भी कैसे तुमने ” उसने सख्त आवाज में सवाल किया
मैं- ये बात इनसे ही पूछती तो बेहतर रहता
चांदनी- मैं तुझसे पूछ रही हूँ अर्जुन
मैं- इस हरामजादे से ही पूछ लेती न
मैंने फिर से अपना पैर दे मारा अजित के टूटे घुटने पर
“अर्जुन ” चांदनी ने मुझे जोर से धक्का देकर पीछे कर दिया
मैं- इस नीच के लिए इतनी हमदर्दी क्यों चांदनी . इस दो कौड़ी के आदमी के लिए तूने मुझे धक्का दिया
चांदनी- दो कौड़ी का नहीं है ये , इनमे से एक मेरा भाई है जिसे तूने मारा है और दूसरा …………..
वो खामोश हो गयी .
मैं- दूसरा क्या
वो कुछ नहीं बोली
मैं- दूसरा क्या
चांदनी- दूसरा मेरा मंगेतर है ,
पल भर में ही उसने पैरो के निचे से जमीन छीन ली थी .
“क्या कहा तूने ” मैंने सवाल किया
चांदनी- वही जो तूने सुना , अजित सिंह मंगेतर है मेरा
मैं- बहुत बढ़िया बहुत ख़ुशी की बात है ये लाडली, तू भी क्या याद करेगी जा लेजा इनको बख्श दी इनकी जिन्दगी . रे लाडली तेरी आँखों में आंसू देकर अगर जिए तो क्या ख़ाक जिए जा खुश रह .
मैंने अपना हाथ चांदनी के सर पर रखा और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गया देखा ही नहीं की पीछे क्या छूट गया देखते भी कैसे पीछे टूटे सपनो का ढेर जो पड़ा था .शरीर की चोटों की किसे परवाह थी पर मन पर जो जख्म लगा था न उसका दर्द बहुत था .
“इतना बड़ा काण्ड करने की भला क्या ही जरुरत आन पड़ी थी , तुम न तो पञ्च हो न सरपंच और न ही तुम्हारा कुछ भी लेना देना है उस गाँव से , अजित ने जो किया उसकी सजा उसे जरुर मिलेगी , उसका बाप सरपंच है मैं पंचायत बुलाने वाली हूँ अजित पांव पकड़ कर माफ़ी मांगेगा ” निर्मला ने मेरी मरहम पट्टी करते हुए कहा
मैं-माफ़ी की जरूरत नहीं है मैं चाहता तो एक पल में मार देता उसको पर बात ही ऐसी थी की खुद को रोकना पड़ा
निर्मला- क्यों
मैं- बस समझ लो की किसी का कहा नहीं टाल सका मैं.
निर्मला- दुश्मनी की आग इतनी आसानी से नहीं बुझेगी अब ये , गाँव तो पहले भी दो हिस्सों में था पर जिस आग को सरपंच बुझाते बुझाते सरपंच जी खुद झुलस गए मैं नहीं चाहती तुम भी उसी आग में झुलसो. हम सब कहीं और चले जायेंगे ये सब छोड़ कर
मैं-अपनी मिटटी को छोड़ कर कहाँ जायेंगे इस गाँव में बचपन बिताया है , उस गाँव में अपने होने का कारण तलाशना है बदनसीब होते है वो लोग जिन्हें अपना घर गाँव छोड़ना पड़ता है .मैं कौन हु माँ बाप कौन थे किसे पता ले देकर ये गाँव ही तो पहचान है इसे भी छोड़ दिया तो कैसे जी पाएंगे और फिर वो दुश्मनी ही क्या जिसे निभाया न जाये. अभी तो शुरुआत हुई है आग जो सीने में लगी है चाहू तो ज़माने में लगा दू पर ये जमाना भी तो मार ही है न न .
निर्मला ने आगे कुछ नहीं कहा पर उसके माथे पर पड़े बल बता रहे थे की वो गहरी चिंता में पड़ गयी थी . रात को अचानक से आते शोर की वजह से मेरी नींद टूट गयी , बदन दर्द से झूझते हुए मैं कमरे से बाहर आया तो देखा की फोन बज रहा था , मैंने उठाया
“कौन है ” मैंने पुछा पर उधर से कोई आवाज नहीं आई .
“अरे बोलो न यार कौन है ” मैंने पुछा
“तू ठीक है न अर्जुन ” चांदनी की आवाज जैसे मेरी रूह में उतर गयी
मैं- पहले से बहुत बेहतर हु मैं पर तूने फोन क्यों किया
चांदनी- मैं नहीं करुँगी तो कौन करेगा
मैं- फ़ोन रख दे लाडली रात बहुत हुई सो जा हसीं सपने तेरा इंतज़ार कर रहे होंगे.
वो- वो सपने ही क्या जिनमे तू साथ न होगा
मैं- आज जो हुआ उसके बाद भी तू ये कहती है अरे सकूं तो तब मिलता जब तू दौड़ कर लिपट जाती भरे गाँव के सामने मुझसे . मेरे जख्मो को करार आ जाता पर तूने , तूने दिल तोड़ दिया लाडली
वो- तूने भी तो ठीक नहीं किया न अर्जुन मेरे भाई को मारा तूने
मैं- तेरा ये उलाहना सर माथे पर पर तुझे बता देना था की तेरा मंगेतर है अजित
चांदनी- मेरी सुन तो सही
मैं- फ़ोन रख दे लाडली
मैंने फ़ोन कट कर दिया और वापिस से बिस्तर पर आकर लेट गया . अगली सुबह जब मेरी आँख खुली तो मैंने देखा की बिस्तर के सामने कुर्सी पर बैठी पद्मिनी चाय की चुसकिया ले रही थी . उसे देखते ही मैं सब कुछ भूल बैठा
मैं- तुम यहाँ कैसे और मेरा पता किसने दिया तुम को
पद्मिनी- मुझे तो आना ही था इतना काण्ड कर के कोई चैन की नींद कैसे सो सकता है देखना जो था .
मैं- अब जब तुम सामने हो तो क्या ही कहे . मैं आवाज नहीं उठाता तो कोई और उठाता जुल्म सहना भी उतना ही गुनाह है जितना की जुल्म करना
पद्मिनी- तो तुमको समाज का ठेकेदार बनना है तुम भी सोहरत का झंडा उठाना चाहते हो
मैं- नहीं मैं चाहता हूँ की समाज में सब को बराबरी का हक़ मिले.समाज को कोई मैं कोई तू न रहे समाज में हम सब रहे .
पद्मिनी-इन खोखली बातो के सपनो में मत जी अर्जुन , मेरा एक सवाल है जिसका जवाब चाहिए बस
मैं- पूछ न फिर
पद्मिनी- यहाँ नहीं वहां चल जहाँ ये सवाल बना
मैं- कहाँ
पद्मिनी- उसी मंदिर जहाँ तूने काण्ड किया है
मैंने अपनी जीप ली और पद्मिनी के साथ एक बार फिर से लाल मंदिर आ गया . वो मुझे लगभग खींचते हुए सीढियों तक ले गयी और तालाब की तरफ इशारा करते हुए बोली- ये तालाब एक रात में ये तालाब तूने कैसे बना दिया .
मैं- तेरी तमन्ना थी न मैंने कर दी पूरी
पद्मिनी ने लगभग मेरा गिरेबान पकड़ लिया और गुर्राते हुए बोली- बाते नहीं अर्जुन , बता कैसे किया तूने ये
मैं- नाराज क्यों होती है बस खोदना शुरू किया और खोदता चला गया सुबह ये ऐसा था
पद्मिनी के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी थी .उसका मुह खुला का खुला रह गया
मैं- क्या हुआ तेरे चेहरे का रंग क्यों उड़ गया
पद्मिनी- तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था अर्जुन नहीं करना चाहिए था
मैं- पर क्यों
पद्मिनी – क्योंकि जो भी ये तालाब खोदेगा उसकी नियति में यही मरना लिखा है ……………………..

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