हवेली – Update 24 | Adultery Story

दिलजले - Adultery Story by FrankanstienTheKount
Reading Mode

#24

“मेरे जोर की आजमाइश मत कर जय सिंह . कहीं ऐसा न हो की तुझे अफ़सोस करने में देर हो जाये ” मैंने दांत पीसते हुए कहा

जय सिंह- देर तो हो चुकी है

अगले ही पल मैंने दुनाली को ऊपर की तरफ मोड़ दिया और ठीक तभी धायं की आवाज से प्रांगन गूँज उठा, गाँव वालो में अफरा तफरी मच गयी , पर मेरे कदम नहीं डगमगाए मैंने दुनाली को छीन कर फेंक दिया और एक लात मारी जय सिंह को वो मिटटी में जाकर गिरा .

“तेरी ये मजाल कुत्ते ” जय सिंह फिर से मेरी तरफ लपका पर मैंने फिर से उसे एक लात मारी और उसका गिरेबान उठा कर खड़ा किया

“चाहूँ तो तेरी गांड में लकड़ी डाल कर तेरे मुह से बाहर निकाल दू पर मैं ये टकराव नहीं चाहता ,माना की तेरा गुरुर है तू उस खानदान का वारिस है जिसने अपने पसीने और लहू से गाँव को सींचा है पर तेरे पास मौका है महान बन जा , तेरे पुरखो ने इसको बर्बाद किया है उनके गुनाहों का प्रायश्चित कर ले ” मैंने उसके कान में कहा

“मैं भी अपने पुरखो के रस्ते पर चलूँगा मैं भी तेरे लहू से इस धरा को सींच दूंगा. ” जय सिंह ने मुझे धक्का दिया और इस से पहले की मैं उसका प्रतिकार कर पाता पीछे से किसी ने मेरे सर पर वार किया और मेरे सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो गयी . मुझे बस इतना याद रहा की कुछ गीला गीला सा बहते हुए मेरे गालो तक आया हो .

“धाड़ ” एक और हुए वार ने मेरे पैर डगमगा दिए पर इस से पहले की घुटने टिक जाते मैंने पीछे मुड कर डबडबाई आँखों से देखा की हाथ में लाठी लिए अजित सिंह खड़ा था

“पीठ पर वार किया तूने सीने पर खायेगा ” मैने अजित सिंह की लाठी को पकड़ा और उसे धक्का दिया पर सर बुरी तरह से चकरा रहा था .

“अर्जुन तूने जय सिंह को अकेला समझने की भूल कैसे की कम से कम देख तो लेता की उसकी दोस्ती किस से है ” अजित ने मुझ पर वार किया

मैं- कुत्तो का झुण्ड चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो सपनो में भी वो शेरो का शिकार नहीं कर सकते

“तेरा ये वहम भी दूर कर देंगे हरामजादे , आज सारा गाँव देखेगा की हमारे सामने सर उठाने का अंजाम क्या होगा ” जय सिंह ने मेरे मुह पर जोरदार मुक्का मारा .

जय सिंग ने हंटर निकाल लिया और एक के बाद एक मुझ पर वार करने लगा. मेरी शर्ट के चीथड़े हवा में उड़ने लगे. मुझे थोडा समय चाहिए था दो बराबर के लडको से इस हालत में लड़ना मुझे भारी पड़ रहा था , तभी निचे जाती सीढियों से मेरा पैर टकराया और मैं लुढ़कते हुए तालाब में जा गिरा. एक पल मुझे लगा की जैसे लहरों ने मुझे जकड लिया हो मेरा गला घोंट दिया हो पर मैने महसूस किया की किसी चीज से मैं टकराया हूँ और मेरी चेतना जागृत हो गयी . लहरों को चीरते हुए मैं वापिस लौट आया . खांसते हुए मैंने अपने हाथ पत्थरों की सीढियों पर टिकाये और गहरी सांसे लेने लगा. ऊपर आते हुए मैंने एक लड़के का गमछा खींच कर अपने सर पर बाँधा

“अजित सिंह मैंने बहुत कोशिश की तुझे माफ़ करने की सरपंच जी की मौत का जो तूने उपहास उड़ाया मैं पी गया वहां भी मैं गाँव के लिया खड़ा था यहाँ भी पर आज मैं तुझसे कहता हूँ तेरे सारे अपराध आज पुरे हुए कल ही किसी ने मुझसे कहा था की ये धरा प्यासी है रक्त का आह्वान करती है ये धरा और देख आज तेरी किस्मत तुझे यहाँ ले आई ,” मैंने कहा

अजित- अभी भी गुरुर नहीं टुटा तेरा, वैसे तूने ठीक कहा आज किस्मत मुझे यहाँ ले आई बचपन से नफरत करते आया हूँ तुझसे आज ये नफरत ख़त्म हो जाएगी .

मैं- आजा फिर . मुद्दा तो बहुत छोटा था पर ये भी सही .

मैंने अजित सिंह के हाथ की उंगलियों को उमेठ दिया और उसकी चीख निकल पड़ी . जय सिंह मेरी तरफ लपका पर अब मैं सावधान था मैंने सर झुका कर उसको काँधे पर लिया और सीढियों की तरफ धकेल दिया , उसका सर सीढियों पर बने खम्बे से टकराया और वो लुढक गया . मैंने अजीत को धर लिया , जिस लाठी से उसने मुझे मारा था वो लाठी मैंने हाथ में उठा ली और अजित के हाथो पर वार किया

“कहा था न पीठ का हिसाब तेरी छाती देगी ” मैंने अजित के सीने पर लात मारी और उसे धरती पर गिरा दिया . मेरा पैर उसकी छाती पर था

मैं- देख साले तेरे गुरुर के साथ तू भी मेरे कदमो में है और मेरी भी जिद है की तेरे गुरुर के साथ साथ तुझे भी ख़ाक में मिला दू

मैंने जी भर कर लाठी के वार अजित की छाती पर करने शुरू किये अजित किसी भैंसे की तरह रंभाने लगा.

“तू भी आजा बहनचोद जय सिंह तेरी भी गांड आज तोड़ कर ही जाऊंगा ” मैं जय सिंह की तरफ लपका और उसके चूतडो पर लात मारी . फिर मैंने दुबारा से अजित को पकड लिया और उसके पैर को घसीटते हुए प्रांगन के बीचो बीच ले आया .

मैं- क्या कह रहा था तू अब बोल न साले

“कड़क ” आवाज आई और अजित की चीख इतना जोर से गूंजने लगी की वहां खड़े प्रत्येक व्यक्ति का कलेजा कांप गया . पलक झपकते ही अजित का पैर टूट गया .

मैं- न न न अभी ये मैदान मत छोड़ प्यारे, अभी तो शरूआत है जब तक तेरे प्राण न छूट जाये ये तड़प तेरी साथी बनी रहेगी .

मैंने उसके टूटे हुए घुटने पर लात मारी और उसकी चीख ने मेरी रूह को इतना सकूं दिया की क्या ही कहूँ पर बस कुछ पल के लिए क्योंकि तभी एक आवाज एक चीख मेरे कानो में टकराई

“अर्जुन , छोड़ देअजित को ” और मैं हक्का बक्का रह गया .

Please complete the required fields.




Comments

Leave a Reply