#20
चंदा की कही बात का बोझ बहुत था इतना ज्यादा की मैंने अपने घुटनों को कांपता हुआ महसूस किया. कुछ देर ख़ामोशी रही पर उस ख़ामोशी को तोडना अब जरुरी था
मैं- मैं कैसे नहीं जानता इस बात को
चंदा- क्योंकि अब कुछ बचा ही नहीं न हवेली, न रुपाली न कोई और . बस एक तुम ही हो जो पुराणी मिटटी खोद रहे हो .
मैं- जानती तो तुम बहुत कुछ हो न हवेली के बारे में पर बताओगी नहीं
चंदा- जितना जानती हूँ बताया तुमको और मैं कसम उठा सकती हूँ की मैं बिलकुल नहीं जानती की रुपाली ठकुराइन और कामिनी के साथ क्या हुआ आज वो दोनों है तो कहाँ है , बस इतना जरुर कहूँगी की तुम इस खोज में अकेले नहीं हो तुमसे पहले कोई और भी है जो उनको तलाश रहा है
मैं- कौन
चंदा- चांदनी
मैं- किसलिए
चंदा- शायद उसे भी लगता है की वो हवेली की असली वारिस है
मैं- लगने की क्या बात है , हवेली उसकी ही तो है
चंदा- यही तो बात है तुमको भी लगता है की हवेली चांदनी या उसके भाई की है पर हकीकत में हवेली की एक मात्र हक़दार, उसकी वारिस अगर कोई है तो वो है रुपाली ठकुराइन जो पिछले सोलह साल से गायब है वसीयत में उनका नाम है और वसीयत को बदलने की शक्ति रखने वाला इन्सान खुद कोमा में पड़ा है , नियति के अजीब रंग है .
मैं- देखो चंदा , न जाने क्यों मुझे लगता है की तुम इस कहानी की मजबूत कड़ी हो वो कड़ी जो इस कहानी के हर लम्हे में मोजूद थी , जिसने अपनी आँखों से इस कहानी को देखा है अगर तुम सच में मेरी मदद करोगी तो मैं तुम्हे बहुत कुछ दे सकता हूँ
चंदा- हंसी आती है तुम्हारी इस नादानी पर , न जाने तुम लोगो को क्यों लगता है की पैसे से हर चीज पाई जा सकती है . हवेली के चप्पे चप्पे से वाकिफ हूँ मैं अगर मुझे धन की चाह होती तो आज भी कहाँ कहाँ गड्डी पड़ी है मुझसे बेहतर कौन जानता है .
मैं- तो क्या चाहिए तुमको
चंदा- मैं बस जीना चाहती हूँ अपने हिस्से की शांति चाहिए मुझे
मैं- अक्सर शांति की तलाश उनको ही रहती है जिनका बहुत कुछ अशांति ने छीन लिया हो
चंदा- मेरे पास है ही क्या जो कोई छीन लेगा. ले देकर गरीब के पास इज्जत ही तो होती है जो तुम जैसे रसूखदारों के बिस्तर पर पड़ी रहती है .
मैं- कुछ घाव बहुत गहरे होते है जो आत्मा पर पड़ते है चंदा , हवेली में कुछ तो ऐसा हुआ था जिसने तुम्हारे मन में नफरत के बीज बो दिए . बेशक तुम ठाकुरों का बिस्तर गर्म कर रही थी पर हवेली के नौकरों की जेबे हमेशा भरी रहती थी . न जाने क्या रोक रहा है तुम्हे मुझे वो सब बताने को
चंदा- जिस चीज के बारे में मैं जानती ही नहीं वो कैसे बता दू तुमको .
मैं- ठाकुर इन्दर और कामिनी क्या सच में एक दुसरे से प्यार करते थे
चंदा- नहीं जानती,
मैं- हवेली की नौकरानी से ये बात छुपी भी तो नहीं रह सकती न
चंदा- मैं नहीं जानती , ठाकुर इन्दर सिंह और कामिनी दोनों स्वभाव से एक दुसरे के बहुत विपरीत थे, इन्दर का ज्यादातर समय पुरुषोत्तम के साथ शिकार खेलने में बीतता था , जबकि कामिनी ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती थी , बहुत कम बाहर निकलती थी कभी कभी खेतो की तरफ घुमने जाती थी पर कभी कभी .
मैं- कामिनी की डायरी में शायरिया लिखी थी , मतलब साफ़ था उसके दिल में कुछ तो था किसी के लिए
चंदा- जवान लड़की थी हो सकता है . बाप भाइयो के रुतबे तले दबा उसका मन उड़ना चाहता होगा.
मैंने सर हिला कर चंदा की बात का समर्थन किया . उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और झोपडी से बाहर निकल गयी . मैं चाह कर भी चंदा के किरदार को समझ नही पा रहा था . दूसरी तरफ मैं सोच रहा था की ठाकुर इन्दर सिंह ने मुझे क्यों पाला , क्या मैं सच में कामिनी और उनका बेटा हो सकता हूँ . इस कहानी में भला मेरा क्या रोल था .
मैंने हवेली में जाने का विचार त्यागा और वापिस से अपने घर आ गया . मैंने एक बार फिर से सरपंच जी के सामान की तलाशी लेने का सोचा, डायरी में जो फ़ोन नम्बर था वो इसलिए था की दोनों परिवार आपस में रिश्तेदार थे. पर अगर रुपाली इस घर की बेटी थी तो फिर कमसेकम यहाँ पर उसकी कोई तो तस्वीर होनी चाहिए थी न , मैं उस चेहरे को तलाश कर रहा था जो कैसा दीखता था मैं जानता ही नहीं था .
तलाशी में मेरी नजर एक ऐसी चीज पर पड़ी जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया , एक पुराणी तस्वीर के पीछे अख़बार की एक कटिंग को गोंद से चिपकाया गया था जिस पर छपी खबर की तारीख ने मेरे दिमाग में दर्द कर दिया .

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