अध्याय 62
शबनम की आँखो में आंसू था और होठो में मुस्कुराहट,ये वो पल होता है जब कोई खुसी में नही आनन्द में हो ,दिल खुशी होठो में चमक रही थी और आंखो से मोती बनकर टपक रही थी,नयनो के अंदर बस प्यार ही प्यार दिखाई दे रहा था,उसका हाथ मेरे सर को सहला रहा था और मैं उसकी गोद में अपना सर टिकाए हुए किसी स्वर्ग की सैर में था,
“शबनम क्या तुम भी मुझसे प्यार करती हो ..”
मैं उसके गोद में कुछ और ही धंस गया था
शायद उसके होठो की मुसकान और भी चौड़ी हो गई हो,
“कोई शक है क्या ???”
“लेकिन मैं तो तुम्हारी बहन का पति हु “
“तो …”
“तो क्या तुम्हे पता नही क्या की मैं क्या कहना चाहता हु ..”
“शायद ये हमारे खून में ही है देव…मेरी और काजल की माए भी तो एक ही लड़के के प्यार में थी जो की उनका पति नही था…”
वो खुलकर हँस पड़ी ,मैंने अपना चहरा ऊपर कर उसकी ओर देखा आज वो कुछ और ही छटा बिखेर रही थी ,चहरा दमक रहा था,उज्जवल काया में कोई दाग ही नही था,आज मैंने उसके त्वचा के उस रंग को गौर किया वो सच में मलीना के गुणों से भरी हुई थी लेकिन थोड़ी यूरोपियन थोड़ी भारतीय,वक्त ने उसके भारतीय गुणों को ज्यादा उजागर किया था,वो शर्माती हंसती हो लाल हो जाया करती थी ,मानो खून उतर आया हो,गोल गोल गालो और भरे हुए जिस्म के कारण वो बहुत मस्तानी लगा करती थी लेकिन आज उसकी मासूमियत भी उसके चहरे से टपक रही थी,उसके कमीज से छलकते हुए उसके दो उजोर अपने पूरे सबाब में मुझे उसका चहरा देखने से रोकते थे,और उसके जांघो में भरा हुआ मुलायम मांस आज मेरा तकिया था ..
उसके हँसने पर एक पंक्ति में जमे हुए उसके चमकदार दांत और किसी ताजा सेब से लाल चमकदार मसूड़े मेरे दिल की गहराइयों में बस गए थे…
मेरी नजर बस उसपर जम ही गई ,वो इससे शर्मा सी गई थी ,
उसके गुलाबी लेकिन भरे हुए होठ ऐसे फड़कने लगे थे जैसे जैसे किसी जाम से मदिरा छलक रही हो ..
मुझसे और सब्र नही हो पाया मैं उठा और उसके होठो के सबाब को अपने होठो में भर ही लिया ,वो दोहरी हुई लेटती गई और आखिर में उसका जिस्म मेरे बांहो में था ,वो चंचल सी शोख हसीना आज किसी समर्पण की देवी सी मेरे बांहो में कैद थी …
मेरा शरीर उसके शरीर के ऊपर था और हमारे होठो एक दूजे के होठो पर शिद्दत से छाए हुए थे,कोई बेताबी कोई बेचैनी कोई भी जल्दबाजी दिल में नही थी ,एक सुकून था उसके इन मय के प्यालों में जिसे मैं शिद्दत से पीना चाहता था ,पूरी तरह से पूरी तृप्ति होने तक ,,…
वो अपना हाथ मेरे बालो में फंसा कर मेरा साथ दे रही थी ,ऐसा लगा जैसे आज मैं किसी और ही शबनम के साथ था ,वो शबनम जो मुझे प्यार करती है ,
और ये प्यार जिस्मनी नही था ,ऐसा लगा जैसे उसके रूह से आती हुई कोई प्यार की लहरे मेरे मन के किसी कोने को भिगो रही थी ,
वो एक अजीब सा सुख दे रही थी ,हर अहसास में वो जिंदा सी लगी ,किसी भी तरह का दिखावा और मुर्दापन नही था,मैं तो बस डूब ही जाना चाहता था और मैं डूब ही गया,ना जाने कितने देर तक हम बस एक दूजे के ही होठो को पीते रहे ,
ना जाने कब हमारी आंखों ने पानी छोड़ दिया,ये भावनाओ का शैलाब सा आ गया था जिसे हम दोनो ही रोकना नही चाहते थे और रोके भी क्यो…
उसके जिस्म की गर्मी और नरमी ने मुझमें हवस की कोई आग नही जलाई थी ,मेरा हाथ उसके पुष्ट जांघो को सहला रहा था लेकिन अभी भी हम बस उसी अज्ञात दरिया में डूबे हुए थे जिसमे से बाहर निकल पाना मुश्किल हो रहा था,उसने मुझे कस रखा था और मैं उसके मखमली जिस्म में हाथ फेर रहा था,
पता नही क्यो ऐसा लगा की अब हमारे जिस्म के बीच कपड़ो की दूरियां भी नही होनी चाहिए,मैंने ही पहल की और उसने साथ दिया ,हम कब नंगे हुए हमे पता ही नही था,
दोनो का बदन तप रहा था,सांसे तेज थी और मेरे लिंग में भी कसावट थी लेकिन दुविधा ,और उतावलापन अब भी नही था ,ना ही मैंने उसके अंदर जाने के लिए कोई मेहनत की ना ही उसने मुझे अपने अंदर लेने के लिए कुछ किया ,
हमारा जिस्म बस एक दूसरे में रगड़ खा रहा था और थोड़ी भी दूरी बेहद ज्यादा लग रही थी ,यू ही उसके होठो गालो को चूमता जा रहा था,वो भी कभी मेरे ऊपर आ कर मेरे शरीर को चूमती थी ,उसके बाल फैल गए थे और वो साक्षात काम की देवी का रूप लग रही थी,मोहक इतनी की आंखे जो जम गई तो फिर नजर किनारे ही नही हो पा रही थी,फैले हुए काले लंबे बाल और गोरे जिस्म में हल्की हल्की पसीने की बूंदे,नंगा जिस्म चमक रहा था और पसीने से थोड़ा भीग कर नरमी का अहसास दे रहा था ,वो मेरे कमर में बैठी थी और उसके गद्देदार कूल्हे का नरम अहसास मैं अपने लिंग पर कर पा रहा था ,
फिर भी कोई उतावला पन नही था..
बस उसके रूप को मोहित होकर देखे जा रहा था,वो झुकी और फिर से हमारे होठ एक दूजे में मिल गए ,कहने को कोई बात नही रह गई थी था तो बस अहसास …
गीले योनि में कब मेरा लिंग फिसल गया इसकी भनक भी नही लगी ,थोड़ी रगड़ होने लगी और रगड़ से उठाने वाले सुखद अहसास ने हमे घेर लिया लेकिन फिर भी दिल में सुकून की एक गहरी छाया थी जो हट नही पाई,लिंग और योनि के संगम ने भी हमारे मन को विचलित नही किया था ,बस एक दूसरे का हो जाने के अहसास में हम डूबे हुए थे ,ना जाने कितनी देर ना जाने कितने घंटे…
बस यू ही रहे ….

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