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अध्याय 34

“केशरगढ़ के महल उस खण्डर में जाकर के क्या करोगे साहब “

उस छोटे से और भद्दे से आदमी ने कहा ..

“तुझे क्या करना है तू चल रहा है की नही “

मैंने उसे घूरा ,ये गाइड के रूप में मुझे दिया गया था ये हमे पूरा केसरगढ़ घुमाने वाला था,”

“अरे साहब नाराज क्यो होते है छलिए छलिए लेकिन वँहा घूमने लायक कोई जगह नही है “

मैंने उसे फिर से घूरा क्योकि मेरी बहने उसकी बात को सीरियसली ले सकती थी लेकिन मुझे डॉ ने वही मिलने को कहा था,

“तू चल ना यार क्या नाम है तुम्हारा “

“छेदीलाल छिछोरे “

“क्या हा हा हा “निशा जोरो से हँस पड़ी ,पूर्वी के साथ साथ मैं भी मुस्कुरा उठा ,

“ये कैसा नाम है छिछोरे ??”

लेकिन उस शख्स ने हमारी बात का बिल्कुल भी गुस्सा नही किया जैसे उसे पता ही हो की हम ऐसा ही कुछ रिएक्ट करेंगे ,

“वो क्या है सर मैं छ को छ बोलता हु “

उसने अपने बड़े बड़े सड़े हुए दांत हमे दिखाए

“वो तो सभी छ को छ ही बोलते है “

पूर्वी बोल पड़ी

“नही मेडम आप समझी नही मैं छ को छ बोलता हु “

हम सभी कन्फ्यूज़ थे तभी एक स्टाफ वाले ने हमे देख लिया ,

“सर वो ये कह रहा है की वो च को छ बोलता है ,और इसका नाम छेदीलाल चिचोरे है “

“बड़ा अजीब सरनेम है है यार तुम्हारा “

वो फिर से अपने सड़े हुए दांत मुझे दिखा दिया ,मेरी बहने थोड़ी सी हँसी लेकिन इस बार ज्यादा नही …

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