अध्याय 31
कार अपने रफ्तार में चल रहा था,पीछे पूर्वी बैठे बैठे ही सो गई थी ,मेरे मन में कई सवाल मचल रहे थे वही उसके साथ ही एक उत्सुकता भी मेरे मन में थी ,
मेरे बाजू में बैठी हुई निशा जैसे पूर्वी के सोने का ही इंतजार कर रही थी वो बार बार मेरे हाथो से अपने हाथो को टच करती और ऐसे दिखाती जैसे की वो बिल्कुल ही अनजाने में हो गया हो ,मैं गाड़ी चला रहा था और वो मेरे बाजू की सीट पर ही बैठी थी ,उसके इस हरकत से मेरे होठो में एक मुस्कान सी खिल जाती थी ,
ऐसे लग रहा था जैसे कोई जोड़ा अभी अभी बंधन में बंधा हो और एक दूसरे को लुभाने का प्रयास कर रहा हो ,मुझे काजल के साथ बिताये कालेज के समय की याद आ गई जब हमारे जिस्म नही मिले थे लेकिन मन मिल चुके थे,छोटी छोटी बातो पर शर्माना फिर हल्के से मुस्कुराना,छोटी छोटी सी वो शरारते,वो जवानी के सबसे अच्छे दिन होते है ,हल्की छेड़छाड़ और बहुत सारा प्यार ….
मैं वो सब सोच कर एक गहरी सांस ली ,और निशा की तरफ देखा ,काजल इसी उम्र की थी जब हम दोनो प्यार में पड़ गए थे,ये उम्र होती ही ऐसी है …..
मैं निशा को देखकर मुस्कुराया और वो बिल्कुल ही स्वाभाविक रूप से शर्मा गई …
मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे हम दोनो हनीमून में जा रहे हो ,वही एक अजीब सा डर और उत्साह दोनो ही एक साथ होता है…
शायद निशा मुझसे एक प्रेमी सा वर्ताव चाहती थी ,शायद वो चाहती थी की मैं ही आगे बढूं लेकिन क्या मैं ये कर पाऊंगा ,वो मेरी प्रेमिका नही थी वो मेरी बहन थी ,मेरी सगी छोटी बहन …..ये सब सोच कर मेरे शरीर में एक झुनझुनी सी भर गई ,बड़ी अजीब सी दशा थी मेरी ,मेरी बहन चाहती थी की मैं उसके साथ प्रेमियों जैसा वर्ताव करू,और मेरे दिल में भी उसके लिए एक आग उठने लगी थी ,बस डर यही थी की कही उस आग में हमारी मर्यादा ही ना जल जाए ,उस आग में रिश्तों की महीन डोर ही ना जल जाए ,हवस की आग बड़ी ही जालिम होती है वो कभी भी नही देखती की सामने कौन है …
मैं इस सोच में जैसे डूब ही गया ,मेरा शरीर हल्के से कांप गया था,लेकिन मेरे नजरो के सामने उस दिन का नजारा भी घूम गया जब मैं और निशा आगे बढ़ चुके थे ,उसके जिस्म का हर कटाव मेरे आंखों के सामने से होकर गुजर गया,मैं बुरी तरह से घबराया और तुरंत ही निशा की ओर देखा ..
वो मुझे ही घूर रही थी लेकिन उसकी आंखे कुछ और ही कह रही थी ,
क्या वो भी वही सोच रही थी जो की मैं सोच रहा था ,जैसे वो एक नशे में थी ,आंखे हल्की सी बोझील थी,क्या वो हवस के नशे में थी ????
इससे पहले मैं कुछ भी समझ पाता वो इठलाकर मेरे पास आ गई और मेरे बांहो को अपने हाथो से जकड़ कर अपना सर मेरे कंधे में ठिका दिया,उसने अपनी आंखे बंद कर ली और मुझे बहुत ही सुकून का आभास हुआ,
मैं आराम से गाड़ी चला रहा था जबकि वो मुझे किसी प्रेमिका की तरह जकड़े हुए थी ,वो एक हल्के गुलाबी से कसे हुए सलवार कमीज में थी,भगवान ने उसे बहुत ही सुंदर बनाया था ना सिर्फ सुंदर चहरा दिया था जबकि कसे हुए शरीर से भी नवाजा था,उसकी छातिया जैसे किसी पहाड़ सी उसके कमीज से बाहर झांक रही थी ,ना जाने उसने ये जानबूझ कर किए था या ये किसी और कारण से हुआ था लेकिन उसका दुपट्टा उसके सीने से गिरकर उसके गोद में आ गया था और उसके वो पहाड़ मुझे अपने तराइयों को दिखा रहे थे,उसने जो काले रंग की ब्रा पहनी हुई थी उसकी इलास्टिक तक मुझे दिखने लगी थी ,मैं तो कुछ देर के लिए नजर जमा नही बैठा था जैसे पहली बार किसी महिला के यौवन को देख रहा हु ,
मैंने अपना सर झटका ,’ये मेरी बहन है ‘
मरे दिमाग ने मुझसे कहा ,लेकिन अगर ये मेरी बहन ना भी होती तो भी इसे देखने का कोई कारण मेरे पास नही था क्योकि मैंने कभी किसी पराई लड़कियों की तरह नजर नही गड़ाई थी ,मैं बहुत शर्मिला लड़का रहा हु ,हा ये बात अलग थी की कुछ लड़कियों के साथ मेरे संबंध बन गए है लेकिन वो सिर्फ एक इत्तफाक ही था और साथ ही साथ वो अभी किसी अलग तरह की लडकिया थी ,लेकिन मैंने कभी किसी अच्छी लड़की के लिए बुरा नही सोचा था ,मैं तो उन लड़कियों के लिए भी बुरा नही सोचा था ,लेकिन किस्मत ही ऐसी थी की लड़कियों की फ़ौज मेरे सामने आ गई ,और अब उनमे मेरी खुद की बहन भी शामिल हो गई थी ……
करीब 4 घण्टो के सफर के बाद हम केशरगढ़ के उस गेस्टहाउस में पहुच गए जंहा हमे रुकना था,कोई खास बड़ी जगह नही थी वो ,किसी कस्बे जैसा था लेकिन बहुत ही उन्नत लग रहा था ,हरियाली और साफ सफाई मेरी बहनों को ये जगह पसन्द आने वाली थी ,पास ही एक किला भी था और ऊंचे ऊंचे पहाड़ भी गेस्टहाउस से दिख रहे थे ,शहर से ऐसी जगह आने पर कुछ नही बस हरियाली ही दिख जाए तो काम हो जाता है ,मुझे बहनों को थोड़ा घूमना था और डॉ से मिलकर कुछ पता करना था ,वो भी मुझे यही मिलने वाले थे,
मैंने निशा को सीट में ही लिटा दिया था वो बैठे बैठे सो गई थी ,पूर्वी तो पहले से ही सोई हुई थी ,गेस्टहाउस पहुचते ही मैंने उन्हें उठाया …
“आइये साहब हम आपकी बहुत ही देर से प्रतीक्षा कर रहे थे ,”एक अधेड़ सा आदमी भागते हुए हमारे पास आया,ये सरकारी गेस्ट हाउस था,कुछ पुलिस के लोग भी दिख रहे थे ,सभी मुझे इतनी इज्जत दे रहे थे जैसे मैं कोई ऑफिसर हु ,शायद डॉ ने ही ये अरेंजमेंट किया था,पता नही डॉ मुझे क्या दिखाने वाला था और क्या समझने वाला था लेकिन इसके लिए मैं बहुत ही उत्साहित था साथ ही रश्मि भी ,उसने जल्दी से जल्दी मुझे डॉ से मिलने का आदेश दिया था,पता नही केशरगढ़ क्या क्या खेल खेलने वाला था,एक तरफ मेरी बहन थी जो मुझे अपना प्रेमी या शायद पति मान बैठी थी और दूसरी तरफ डॉ के द्वारा बताया जाने वाला रहस्य था …मैं एक गहरी सांस लेकर छोड़ा और गेस्टहाउस के अंदर जाने लगा ………..

Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.