कुछ देर बाद फिर से निर्मला कल्लू के लण्ड को चूस चूस कर खड़ा कर चुकी थी। दोबारा उसे अपने अंदर लेने की चाह उसे बेचैन कर रही थी।
कल्लू;अपने पास में पड़ी हुए तेल की बोतल उठा लेता है और उसे अपने लण्ड पर उंडेल कर लंड चिकना कर देता है।निर्मला को समझते हुए देर नहीं लगती की कल्लू ऐसा क्यूँ कर रहा है।फिर वह तेल को निर्मला के गांड के छेद पर भी खूब प्यार से लगाता है और साथ ही साथ उसमे अपनी ऊँगली भी पेलता रहता है।
लण्ड और गांड पर तेल लगाने के बाद कल्लू निर्मला को एक कुतिया के पोज में कर देता है।
बडी सी चमकती हुए गाण्ड कल्लू के सामने आ जाती है। इस गाण्ड को तो देख देख कितने बार कल्लू अपने लंड को खड़ा करके गुड़िया और चाची की चूत में घुसाया करता था।और आज यही गाण्ड कल्लू के सामने झुकी हुई थी।
कल्लू;एक थप्पड निर्मला के गाण्ड पर जड़ देता है।
निर्मला:आह। क्या करते हो माँ हूँ मै तुम्हारी।
देवा;उसे सहलाते हुए।रांड भी तो है।
इतने सालों से तडपा जो रही है इस गांड के लिए। एक गाण्ड पर थपड क्या मारा चीख पड़ी साली रंडी।
निर्मला;आहह दर्द होता है ना।
कल्लू ;असली दर्द अब होंगा मेरी जान को।
कल्लू अपने लंड को हाथ में पकड़ कर उसे निर्मला के गाण्ड के सुराख़ पर घिसता है। निर्मला अपनी ऑंखें बंद कर लेती है।वो जानती थी दर्द भी होंगा मगर मीठा मीठा और वही होता है कल्लू के लंड का सुपाडा निर्मला की कुँवारी गाण्ड में अटक जाता है।
निर्मला ;आहह गया क्क्या………
वह पीछे मुड़ कर देखती है।
सिर्फ सामने का हिस्सा गया था और निर्मला की आँखों में ऑंसू आ गये थे। कल्लू उसे पूरी तरह सीधा कर देता है और निर्मला अपने कमर को ऊपर के तरफ उठा लेती है।और अपने दोनों हाथो को पीछे करके अपनी गांड के छेद को फैला देती है।
कल्लू;दोनों हाथों में अपनी माँ के काँधे को पकड़ कर लंड को धीरे धीरे अपनी माँ निर्मला के गांड में उतारता चला जाता है।

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