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निर्माला : मन ही मन में मुस्कुराते हुए अपनी गर्दन झुका कर अपनी फटी चुत और उसकी फुली फाँको को देखति हुई, सोचने लागि, बाप रे कल्लु का लंड कितना मोटा और बडा लग रहा है, कैसे मेरी भोस को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, उसका लंड मेरी भोस को देख कर कैसे किसी डण्डे की तरह खड़ा हो गया था, संतोष सच ही कहती है आज कल के लड़को का कोई भरोषा नहीं है।

पर मेरी बुर क्यों फूल रही है, और निर्मला ने अपनी बुर को हाथ लगा कर देखा तो उसके हाथ में पानी आ गया, उसके अपनी बुर को रगडा और फिर कुछ सोच कर, खड़ी हो गई और कल्लो की ओर देख, और उसकी नजर कल्लु के तने हुए लंड पर पडी, तो वह सोचने लगी हाय राम यह तो और भी बड़ा हो गया, कितना मस्त लंड है कल्लु का।

निर्माला : बेटे मै वहा का गठ्ठर इसमें मिला देती हु तू यही बैठ कर बांध लेना और निर्मला अपने भारी चूतडो को मटकाते हुए जाने लगी, उसकी घुटनो तक के घाघरे में उसकी गोरी पिण्डलिया और मोटी जांघो की झलक दिखाई दे रही थी, और वह यह देखना चाहती थी की कल्लु उसके भारी चौड़े चौड़े चूतडो को देखता है की नही, जब उसने पीछे मुड कर देखा
तो कल्लु अपनी माँ की मोटी लहराती गाण्ड को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, और निर्मला की साँसे तेज चलने लगी, निर्मला गठ्ठर लेकर वापस कल्लु की ओर आने लगी और उसकी निगाहें कल्लु के मोटे लोडे पर ही थी।

निर्माला को तभी संतोष की काँटा लगने वाली बात याद आ गई और निर्मला को यह भी याद आया की कैसे संतोष का बेटा काँटा निकालने के बहाने अपनी माँ की
गुलाबी रसीली बुर को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, क्या सोच रहा होगा बिरजु अपनी गदराई माँ की मस्त चुत देख कर, जरुर उसका मन अपनी माँ की चुत में मुह डाल कर चुस्ने का कर रहा होगा।
या फिर वह अपनी माँ की फुली हुई चुत देख कर अपने मोटे लंड को ड़ालने के बारे में सोच रहा होग, पर यह सब मै क्यों सोच रही ह, मेरी चुत इतनी क्यों मस्त हो रही है।

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