मेरी माँ बहने और उनका परिवार – Update 6

मेरी माँ बहने और उनका परिवार - Family Sex Story
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उस रात की धमाकेदार चुदाई के बाद से मेरी चांदी हो गई थी।  हम दोनों भाई बहन घर के किसी भी कोने में कभी भी शुरू हो जाते थे। दीदी को जैसे मैं एक खिलौना लगता था।  माँ ने एक आध बार टोका भी जिसपर दीदी ने कहा – यार कुछ दिनों की बात है फिर ससुराल चली जाउंगी और सास ससुर कके रहमो करम पर जिन्दा रहना पड़ेगा। ख़ुशी तो क्या ही मिलेगी।

पर दीदी को भी अपने ससुराल में चल रहे खेल का पता नहीं था।  और बहुत ही जल्दी वो राज खुलने वाला था।  पर उसकी चर्चा बाद में। अभी बात करते हैं माँ के मायके की।  माँ की बातों से ये तो अंदाजा  था की माँ शादी के बाद सिर्फ पापा की हो कर रह गईं पर शादी से पहले उनकी चुदाई जरूर हो रखी होगी और ये पसीने से नशा भी खानदानी है। 

एक दिन मैं कॉलेज से लौट कर आया तो देखा की माँ किचन में खाना बना रही है।  दीदी कही नजर नहीं आ रही थी।  मैंने माँ से पुछा – सरला दी कहाँ हैं तो वो मुस्कुरा कर बोली – घर में ही है।

मैंने पुरे घर में  ढूंढ डाला दी कही नहीं दिखी।  मैं फिर किचन जा पंहुचा।  पास जाकर फिर पूछने ही वाला था तो देखा माँ की साडी आगे से फूली सी है। मुझे सारा माजरा समझ आ गया। साडी उठाया तो देखा तो दीदी माँ की साडी के अंदर जमीन पर नंगी बैठी हैं और उनकी चूत चाट रही है।  वो सिर्फ चूत ही नहीं , बल्कि माँ की जांघो पर बहता पसीना भी चाटे जा रही है।  दीदी एक कुतिया की तरह जीभ निकाल कर चाटे जा रही थी। उनको  इस हाल में देख मेरा लंड आपे से बाहर हो गया।

मैंने दीदी से कहाँ – ये तो चीटिंग है।

दीदी ने मुझे गाली देते हुए कहाँ – भोसड़ी के मैं बड़ी हूँ पहला हक़ मेरा।  चीटिंग कैसे ?

मैंने भी गाली का जवाब गाली से देते हुए कहाँ – बहन की लौड़ी।  अब आ गया हूँ न हट।

मैंने माँ की साडी को उनके कमर तक उठा दिय।  उनकी कमर पीछे की तरफ किया और डायरेक्ट उनके चूत में लंड डाल दिया।  दोनों को देख कर मैं उत्तेजित तो था ही।  मैं तेजी से शॉट लगाने लगा। 

माँ – मादरचोद , आराम से कर।  खानदान भर में सबसे बड़ा लंड तेरा है और तू कुत्ते की तरह ताबड़तोड़ मेर लिए जा रहा है।  फट जाएगी मेरी चूत।  आह आह माआआआ देखो तेरे नाती का लंड तेरी बेटी की चूत में तूफ़ान मचा रहा है।

मैं – नानी को बीच में क्यों ला रही हो।  जिन्दा होती तो उनको भी चोद देता मैं।  और ये बता रंडी माँ की तूने कितने लंड अंदर लिया है जो मेरे साइज से कम्पेयर कर रही है।  क्या पूरा खानदान चोदू है क्या ?

इस पर दीदी जो निचे बैठे अब भी माँ की चूत पर जीभ लगाए बैठी थी , हंसने लगी। मुझे गुस्सा आ गया।  मैंने कहाँ – हंस ले कुतिया अभी तेरी बारी भी आएगी।  मैं ताबड़तोड़ शॉट पे शॉट मारे जा रहा था।

मा – मेरे लाल चोद अपनी माँ को अपने मुसल से। तेरी बहनो के ससुराल को छोड़ दूँ तो खानदान का हर लंड मैंने देखा है। तू सच में बड़ा लंड वाला है।  चिंता मत कर तेरे लिए चुतों की महफ़िल लगेगी। तू जिस औरत पर हाथ लगाएगा वही तुझसे चुदने को तैयार हो जाएगी।  बस अभी तू अपनी माँ की सेवा क।  आह आह।  लगा जोर का धक्का।  तेरी बहन ने तो वैसे ही आज मेरा सारा जूस निचोड़ लिया है बस बची खुची तू भी निकाल दे, निकाल दे मेरी चूत की गरमी।  मिटा दे मेरी गरमी।

माँ की गरम गरम बातें और चुड़क्कड़ खानदान का सुन कर मेरा भी लंड पानी छोड़ने को तैयार था।  तभी दीदी ने मेरी गांड में अपनी एक ऊँगली डाल दी।  उसकी इस हरकत से मैं झाड़ता चला गया। मेरा लंड फचाक की आवाज के साथ ही बाहर आ गया।

मैंने बहन को गाली दी – स्साली  रंडी मेरी गांड में ऊँगली क्यों की ?

मैं दर्द से बिलबिला उठा था।  दीदी ने कहाँ तब से जो हमारी ले रहा है  अब समझ आया हमें कैसा दर्द होता है।  मैं पिछवाड़े पर हाथ लगाए भाग कर सोफे पर बैठ गया।

माँ की रोटी और पावरोटी दोनों सिक चुकी थी। दीदी लगता था जैसे नशे में हों। वो भी आकर बगल में बैठ गई और मुझे छेड़ने लगी ,

माँ ने साडी लपेटी और  वो भी आ कर बैठ गई। 

कुछ देर बाद मैंने माँ से पुछा – माँ तुमने सचमुच में कई मर्दों से चुदाई करवाई है।  मुझे थोड़ा बुरा लग रहा था की पिता के अलावा भी माँ के औरों से सम्बन्ध थे।  बात कितनी अजीब है न अधिकांश मर्द कितनी भी औरतो को चोद ले पर अपनी माँ बहन और बीवी सती सावित्री ही चाहिए होती है।  अगर चूत वैसे न मिले तो चछुचोदन कर लेंगे पर खुद की औरत किसी गैर मर्द पर नजर भी डाल ले तो उनको चरित्रहीन बना देंगे। मेरे आवाज में तीखापन देख दोनों चिढ गईं।  दोनों उठ कर कमरे में चली गईं। माँ वापस पुरे कपडे में आई और बोली खाना निकाल दूँ तेरा ?

मैंने कहा – निकाल दो।

खाने के वक़्त दोनों चुप थे।  मुझे उनको ख़ामोशी चुभ रही थी। अब अगले दो दिन में घर एकदम दुसरे घरों जैसा बन गया।  सब पुरे कपड़ो में।  चुदाई का खेल बंद।  दीदी और माँ दोनों बस काम भर की बातें करते थे।  मुझे गलती का एहसास तो हो गया था।  मैंने सॉरी भी बोलै पर दोनों

मानने को तैयार नहीं थे।  मैं एकदम से परेशान था।  सुधा दी को भी फ़ोन किया।  वो भी मुझसे काफी नाराज थी।  पहली नाराज तो इस बात पर थी की दीदी और माँ के साथ मेरे सम्बन्ध बने थे।  उस पर मेरा टॉन्ट भरा सवाल।  माँ को बहुत तकलीफ हुई थी। मैंने एक तरह से उन्हें रंडी ही घोसित कर दिया था बिना कुछ जाने बुझे।

मुझे समझ नहीं आ रहा था।  चूँकि बात ननिहाल के साइड से शुरू हुई थी तो मैंने सोचा नाना से ही बात करता हूँ।  वो लोग हमारे शहर में ही रहते थे तो मैं पहुंच गया एक दिन। देखा तो घर में सिर्फ मामा और मामी थे।  नाना बड़ी मौसी के यहाँ गए हुए थे।  दोनों ने मेरी घूब आवभगत की।  पर मामा से कुछ भी पूछने की मेरी हिम्मत नहीं हुई।  मामी से तो पूछने का कोई सवाल ही नहीं था।

मैंने फिर रास्ते में लौटने वक़्त रिवर्स माइंड गेम लगाने का सोचा।  मैं सबसे कई बार माफ़ी मांग ही चूका था। अब मैं घर जाकर अपने कमरे में सो गया।  माँ ने खाने का पुछा मैंने मन कर दिया।  माँ वापस चली गई।  अगले दिन मैं कमरे से नहीं निकला।  दीदी एक बार आई तो मैंने कहा की तबियत ठीक नहीं है।  मैंने दिन में भी खाना नहीं खाया।  रात को माँ थोड़ी चिंतित हुई।  मेरे पास आई तो मैंने कमरा नही खोला और अंदर उन्हें वापस भेज दिया।  उन्होंने कहा – नाटक क्यों कर रहा है चार टाइम से ऊपर हो गया है।  खाना नहीं खाऊंगा तो बीमार पद जाऊंगा।

मैंने कहा – गलती की है तो सजा मिलनी चाहिये।  आप लोग चिंता मत करो।  पश्चाताप करके ही वापस निकलूंगा। 

मुझे सच में कमजोरी हो गई थी।  मुझे अपने ही शब्दों पर हंसी भी आ रही थी।  थोड़ा गिल्ट भी था ही।

उसके अगले दिन माँ ने सुबह सुबह फिर दरवाजा खटखटाया।  मुझे इतनी कमजोरी हो गई थी की आवाज भी नहीं निकाल रही थी और मैं लगभग बेहोश सा ही था।  दरवाजा पीटने पर भी जब मैंने कोई जवाब नहीं दिया तो दीदी भागकर मेरे कमरे की खिड़की की तरफ गईं।  किसी तरह से उन्होंने अंदर जाकर दरवाजा खोला।  मेरी हालत देख कर दोनों रोने लगी। 

माँ – तू ही तो मेरा सहारा है।  ऐसे क्यों कर रहा है।  क्या हाल बना लिया है।

मैं – पहले ये बताओ मुझे माफ़ किया की नहीं। 

माँ – अरे मेरा गुस्सा तो कब का ख़त्म हो गया था।  तुझसे नाराज हो सकती हूँ क्या मैं

मैंने दीदी की तरफ देखा और कहा  – तुम ?

दीदी – साले ,मेरी चूत कुलबुला रही है।  छुट्टी के चार दिन तूने ख़राब कर दिए और कहता है नाराज हूँ। 

दोनों मेरे गले लग गईं।  माँ ने दीदी को कुछ खाने के लिए लाने को कहा। 

मैंने कहा – पहले दूध दो।  याद है बीमार पड़ने पर तुम अपने मुम्मे मेरी मुँह में दे देती थी। 

माँ सुनकर तुरंत मेरे बगल में लेट गईं और अपने मुम्मे मेरे मुँह में दाल कर कहा – ले पी ले।  पर इनमे दूध कहाँ आता है।

दीदी भी मेरे लिए दूध में ड्राई फ्रूट्स , मलाई वगैरह मिलकर लाइ थी। 

मुझे माँ के मुम्मे चूसता देख वो भी सेम सेंटेंस बोली – अब इसके लिए किसी दूधवाली का जुगाड़ करना पड़ेगा।

माँ – दूध के चक्कर में ही तो सारा खेल हुआ था।  मेरे घर में भी और यहाँ भी।  ये सब दूध के ही दीवाने हैं। 

दीदी ने दूध से मलाई निकाल कर माँ के मुम्मे पर रख दिया था जिसे मैं लपक कर खाने लगा।  दीदी ने फिर दूध एक कटोरी में डाला और अपने कपडे उतार दिए।  उसने फिर अपने मुम्मे कटोरी में डाल कर दूध से गिला कर दिया और मेरे मुँह में डाल दिया।  दोनों बारी बारी से ऐसे करने लगी।  मेरा लंड फिर से खड़ा होने लगा था।  माँ ने मन किया।  कहा – इसे ठंढा रखो।  बहुत कमजोरी है। 

दीदी फिर उठ।  जब लौटी तो उनको देख हम दोनों दंग रह गए।  मैं अपने लंड को क्या समझातावो तो दीदी को देख आपा खो बैठा।

दरअसल दीदी नहीं लौटी थी।  फलों और मिठाई की टोकरी आई थी । अपनी चूत में उन्होंने एक केला फंसा रखा था।  बड़ी बड़ी गोल गोल नाभि में एक अंगूर अटका हुआ था। स्तनों पुरे सफ़ेद हो रखे थे, केक के क्रीम से सरोबार थे।  निप्पल पर पता नहीं कैसे आधे आधे गुलाब जामुन चिपका रखे थे।  एक केला मुँह में था और हाथो से एक थाली पकड़ रखा था। जिसमे दो कटोरीया थी। एक में रबड़ी जिसके अंदर एक गुलाब जामुन और कुछ फल के टुकड़े थे। और एक कटोरी में बचा हुआ केक ौस उसका क्रीम था ।  प्लेट में दो और केले, कुछ अंगूर और सेव के छोटे छोटे टुकड़े थे। उनके मुँह में एक केला और पकड़ रखा था। 

नंगी तो दोनों थी।  उनको उस हाल में देख कर मैं भी तुरंत नंगा हो गया और बैठ गया।  मुझे देखना था की आगे होता क्या है।  दीदी जैसे ही पास आई माँ ने उनसे थाली ले ली। मैंने सबसे पहले उचक कर दीदी के नाभि में फंसा अंगूर खाया। दीदी ने अपने चूत मेरे चेहरे के सामने कर दिया।  मैं चूत में फंसा केला खाने लगा।  पता नहीं क्या खेल था जैसे जैसे केला ख़त्म हुआ दीदी ने अपनी चूत न जाने कैसे सिकोड़ी की अंडा का फंसा हुआ टुकड़ा फक की आवाज से ब्याह निकाल पड़ा।  मैंने भी बिना मौका गँवाए उस टुकड़े को बिनका हाथ मुँह से ही लपक लिया और खा लिया।  तब तक माँ भी खड़ी हो चुकी थी। उन्होंने प्लेट से एक केला निकाल दीदी की तरह ही अपने चूत में डाल लिया।  जब तक मैं दीदी की चूत पर लगा केला खा रहा था,  दीदी ने अपने मुँह माँ के सामने कर दिया और माँ ने दीदी के मुँह से लगा डायरेक्ट खाना शुरू कर दिया। दीदी की चूत का केला ख़त्म होते ही मैं माँ की चूत में लगे केले को खाने लगा। दीदी फिर से माँ को प्लेट में रखा दूसरा केला वैसे ही खिलाने लगी। दरअसल दो दिन से मैं ही नहीं भूखा था उन दोनों ने भी कुछ नहीं खाया था।

अब मैं बेड पर घुटनो के बल हो गया।  दीदी और माँ अब भी कड़ी थी।  दीदी के मुम्मे मेरे सामने थे। मैंने देखा उन्होंने गुलाब जामुन में ऐसे छेद किया था की वो इनके निप्पल पर अटक सा गया था।  मैंने लपक कर पहले गुलाब जामुन मुँह में लिया।  फिर दोनों स्तनों पर लगे केक के क्रीम को चाटने लगा।  मैं एक स्तन चाट रहा था और माँ दुसरे को । लेकिन माँ सिर्फ खा नहीं रही थी।  जो कुछ केक वो अपने जीभ पर समेट कर  दीदी को डायरेक्ट खिला रही थी।  दोनों अपने जीभ से जीभ , मुँह से मुँह लगा कर शेयर कर रही थी। हाथ तो खाली था। कमरे में से बस सडप सडप कर चाटने और खाने की आवाज आ रही थी।  सिसकियाँ दबी हुई थी।

दीदी के स्तनों पर लगा केक ख़त्म हो गया तो दीदी ने प्यार माँ को पकड़ कर लेटा दिया।  मैं बस देख रहा था।  मुझे पता था की वही करना है जो दीदी कहेंगी।  माँ को पीठ के बल लेटा देने के बाद दीदी ने पहले माँ के स्तनों पर केक लगाया , फिर उनकी चूत की फ़ांको को  कटोरी में रखे राबड़ी से सजाया , लपेटा और फिर उस पर गुलाब जामुन रख दिया।  खुद वो उनके बगल में जमीन पर बैठ कर स्तनों पर लगा केक खाने लगी।  मैंने अपना सर झुकाया और माँ की चूत पर रखे गुलाब जामुन को तोड़ तोड़ कर खाने लगा। कुछ मेरे मुँह में जा रहा था कुछ बिखर रहा था।

मैं गुलाब जामुन के बादमजे लेकर चूत में लगी राबड़ी खाने लगा।  माँ की चूत वो भी राबड़ी से सरोबार।  क्या आनंद था।  मैं पुरे मन से चूत चाटे जा रहा था।  ऊपर दीदी उनके स्तनों पर लगे केक को खा भी रही थी और मुँह से मुँह  लगा उनको खिला भी रही थी। माँ ना जाने कितनी बार झाड़ चूँकि थी। अब मुझसे बर्दास्त नहीं हो रहा था।  माँ की चूत से रबड़ी चाट कर हटाने के बाद मैंने अपने पैर माँ की कमर की दोनों तरफ किया और अपना लंड उनकी चूत पर सेट करके एक झटके में ही अंदर कर दिया।

माँ फिर से वही बोल पड़ी – मअअअअअअअदर चऊऊऊद फाड़ेगा क्या मेरी।  खानदान का सबसे बड़ा लौड़ा है संभाल कर डाला कर। 

अब मैं उनके ऊपर पूरा लेट गया।  उनके चेहरे पर केक पुता हुआ था।  दीदी नई जितना खिलाया था उतना ही चुपड़ भी दिया था। 

मैंने अपना कमर नहीं हिलाया।  अंदर ही डाले स्थिर हुआ। 

कुछ केक खाने के बाद मैं उनको प्यार से देखते हुए बोला – और खानदान का सबसे छोटा लंड किसका है ?

माँ – शर्माते हुए बोली तेरे छोटे मौसा का। 

सुन कर मैंने कमर उठाया और एक बार जोर से फिर पेल कर पुछा और मेरे बाद किसका लंड बड़ा है।

माँ – तेरे नाना का , मैंने फिर लंड निकाला और पुछा – उसके बाद

माँ – तेरे बाप का था

अब मैंने सवाल नहीं पुछा बस  कमर ऊपर किया

माँ – तेरे बड़े मौसा और मामा का लगभग बराबर है।

मैंने कमर ऊपर किया और रुका रहा।

माँ बोली – बहनचोद और किसी का नहीं लिया है।  तेरा चाचा भडुआ है , गांडू का खड़ा ही मुश्किल से होता है वो क्या मुझे चोदेगा ।  तेरे बड़े जीजा का भी वही हाल है तभी तो दीदी की कोख अब तक सूनी है।  छोटे से तो अभी ठीक से मिली भी नहीं।

इतना सुनते ही मैंने एक जोर का धक्का लगाया और फिर मेरे धक्के चलते रहे। 

माँ – पेल दे।  तेरे जैसे चोदू तो बस तेरे नाना और पापा ही थे।  तूने दोनों का गुण पाया है।  क्या मस्त चोदता है रे तू।  आह आह आह फाड़ दे मेरी  चूत।  सुजा दे उसे।  खानदान की साड़ी औरतें बस तुझसे ही चुदने का इंतजार कर रही है।  आह आह  आह।

मैं – पापा को सब पता है।

माँ – आह आह तेरे पाआपाआ क्या कम थे रे।  ससुराल में उनको फुर्सत कहा मिलती थी।  पहली रात तो नानी के नाम थी।  साली रंडी चीख चीख कर पिलवाती थी।  आह आह  मेरी चूत तो वैसे ही चाट चाट कर सुजा थी तूने।  अब अपना माल डाल दे मेरे अंदर।  तेरे पापा जिन्दा होते तो तेरे बच्चे की माँ बन जाती रे।  अब कैसे बनु।  लोग कहेंगे बिना पति के माँ बन गई।  आह आह

मैं – तू नहीं बन सकती तो सुधा को बना दे।  उसकी कोख हरी कर दूंगा।

माँ – उसी को तो मना रहे हैं सब।  साली मान रही है।  सीधे तरीके से नहीं देगी वो उसे जबरदस्ती पटक कर ही चोदना पड़ेगा।  आह आह।  बुलाऊंगी उसको बहुत जल्द।  तू मुझे पेल।

सरला दीदी जो बगल में बैठी थी उठ बैठ गई और बोली – अरे छिनाल , तेरी रंडीबाजी के किस्से हो गए हो तो बेटे का लौड़ा छोड़ दे।  मेरी चूत में कीड़े कुलबुला रहे है।  मुझे गाली देते हुए बोली – मायआदार चाऊऊऊद बहन के लौड़े माँ को पाते ही मुझे  भूल गया।  इतना कुछ खिलाया है अगर तेरा लंड बैठा तो मैं काट लुंगी उसे।  उसकी सारी तारीफ धरी की धरी रह जाएगी।

मैंने दीदी को खिंच कर माँ के ऊपर पेट के बल लिटा दिया और माँ की चूत से लंड निकाल कर उसकी चूत में डाल कर पेलने लगा।

मैं – ले बड़ी बेचैन थी न।  ला तेरी चूत भी फाड़ दू।  साला रंडियों का खानदान है।  चोदू बाप का चोदू बेटा  हूँ तेरी गर्मी शांत कर देता हूँ।

मेरे पापा अभी जिन्दा होते तो दोनों मिलकर तेरी गरमी निकाल देते।

दीदी – बाप पर मत जा अपनी औकात दिखा।  देखूं तेरे लौड़े में कितना दम है।

मैं अब दीदी को पीछे से लगातार चोदे जा रहा था।  माँ और दीदी एक दुसरे के चेहरे को छौं और चाट रही थी।  अब इतनी घमासान के बाद मेरे लंड महाराज को शहीद तो होना ही था।  मैं और दीदी एक साथ कांपना शुरू किये और दोनों ने लगभग एक ही टाइम पर पानी निकाल दिया। माँ तो पहले ही न जाने कितनी बार आ चुकी थी एक बार फिर से आ गईं।

अभी खेल ख़त्म नहीं हुआ था।  घमासान चुदाई के बाद पहले का लाया हुआ दूध दीदी ने मुझे दिया।  फिर हम सब एक दुसरे को घंटो तब तक चाटते रहे जब तक से शरीर के एक एक अंग से मिठास नहीं निकाल गई।

उसके बाद से मेरे दिन और रात फिर से रंगीन हो गए।  मैंने लेकिन माँ से उनके सम्बन्धो के बारे में बात नहीं की।  डरता था की कहीं फिर से नाराज न हो जाये।  पर मेरे चेहरे पर हमेशा सवाल रहता था।  माँ सब देखती समझती थी।

एक दिन दीदी ने कहा – यार श्वेता को मिलने चले ? जब से आई हूँ आपस में ही खोये हैं।  उसे घर भी ली आते हैं।  मैंने कहा कल ही चलते हैं कल शनिवार भी है।  वो एक दिन के लिए तो आ भी सकती है।

अगले दिन मैं और सरला दी दोपहर में श्वेता के कॉलेज पहुंचे।  वहा श्वेता से मिलने का एप्लीकेशन डाला और वेटिंग रूम में उसके आने का वेट कर रहे थे की तभी वहां से एक लम्बी सी खूबसूरत औरत गुजरी।  उसकी हाइट जाफी अच्छी थी।  मेरे बारबर ही रही होगी।  बाल भी बॉब कट थे  उस पर से साडी।  बड़े बड़े मुम्मे और उभरा हुआ पिछवाड़ा।  एकदम कमाल लग रही थी।  सच में माल लग रही थी। उस लेडी ने दीदी को देखते ही कहा – अरे सरला तुम यहाँ ?

दी भी उन्हें देख कर चौंक गई बोली – हेलो दीप्ति मैम , कैसी हैं ? आप यहाँ क्या कर रही हैं ?

दीप्ति – पहले तुम बताओ।

दीदी – मेरी कजन यहाँ पढ़ती है और यहीं हॉस्टल में रहती है।  श्वेता नाम है उसी से मिलने आई हू।  परमिशन मिल गई तो ले जाउंगी एक दिन के लिए।

दीप्ती – अरे परमिशन क्यों नहीं मिलेगी।  मैं यहाँ फिलोसफि की प्रोफेसर हूँ और एडमिन हेड भी।

दीदी – वाह।  अच्छा लगा।  दीदी ने फिर मेरा इंट्रोडक्शन करवाया।  उन्हें बताया की मैं भी ग्रेजुएशन कर रहा हूँ और मेरा भी सब्जेक्ट फिलोसोफी है।

दीप्ती – वाह , शादी के बाद से तुमसे मुलाकात नहीं हुई । पर तुम यहाँ आई हो तो मुझसे मिलने जरूर आना।  एड्रेस तो है न।

मुझे देख कर कहा – कभी सब्जेक्ट में कोई डाउट हो तो पूछ लेना। मिलने आना तो इसे भी ले आना।

कुछ ही देर में श्वेता भी आ गई। उसके सामने मैम एकदम से स्ट्रिक्ट हो गईं।  मैम से परमिशन तो मिल ही गई थी।  हम घर के लिए चल पड़े।

श्वेता – सरला दी आप दीप्ति मैम को कैसे जानती हैं।

सरला – अरे वो मेरे ही कॉलेज में पहले पढ़ाती थी।  मुझे बहुत मानती थी।  एकदम दोस्त जैसी थी।  मुझे नोट्स और सैंपल पेपर इनके बदौलत मिल जाते थे।

श्वेता – यार वो यहाँ तो बहुत ही खड़ूस टीचर के तौर पर फेमस हैं।  आपसे कैसे दोस्ती हो गई।

दीदी – कुछ था ऐसा।  हम दोनों में कुछ कॉमन है। पुरे कॉलेज में कुछ ही लड़के लड़कियां थे जो इनसे बात करने की हिम्मत रखते थे।  और मेरी पहुँच इन तक लम्बी थी।

श्वेता – हम्म्म।  पर आप इस लंगूर को अपने साथ क्यों लाइ हैं।  लड़कियों को ऐसे ताड़ता है जैसे खा जायेगा।  मैम को देख ाकैसे ललचाई नजरो से देख रहा था।

दीदी – अरे तू भाई से इतना चिढ़ती क्यों है ?अभी तो उम्र है मस्ती करने की।  पर इस लल्लू की कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं है।  तुझे कहाँ तो इसे मदद करनी चाहिए और तू इससे चिढ़ती रहती है।

श्वेता – आपको पता नहीं है ये कितना घाघ है।  ये लल्लू नहीं है। आपको पता नहीं इसने माँ के साथ क्या किया है ? बड़ी अम्मा के साथ भी लगता है।  आप भी बचकर रहना।  वो सब बात एक ही सांस में बोल गई।

मैंने उसकी चोटी खींच ली और कहा – तुझे बड़ी तकलीफ है मुझसे।  लगता है जलन है तेरे अंदर।  पिछली बार कहा था आ गर्मी शांत कर दू पर बड़ी देवी बनती है।

दीदी – क्या रे , छोड़ उसे।  मत परेशान कर।  लड़की मन से माने तो सही है।  जोर नहीं।

हम सब शांत होकर बैठ गए।  घर पहुंची तो माँ बहित खुश हुई।  उन्होंने उसके लिए पसंद का खाना बनाया था।  सब बड़े खुश थे।  श्वेता आई थी तो चाची का भी वीडियो कॉल आया।  सुधा दीदी ने भी काफी देर तक बात की। सब खुश थे।

रात दीदी और श्वेता एक साथ सोये थे।  चूँकि उसे बुरा लगता था तो मैं अकेले सोया था और माँ अलग अपने कमरे में।  हम सबसे छोटी थी।  सबकी दुलारी थी।

सरला दी – क्या श्वेता , तुम्हे राज से परेशानी क्या है ? बेचारा वैसे ही लड़की नहीं पटा पा रहा।  और जिस तरह से तू बिहैव कर रही है तेरा तो बॉयफ्रेंड पक्का नहीं होगा।  पर शादी के बाद तो तू अपने पति को फटकने भी नहीं देगी।

श्वेता – मैं शादी ही नहीं करुँगी।

सरला दी को लगा की कुछ तो है जिससे श्वेता के मन में लड़को, सेक्स और शादी से चिढ है।

उन्होंने उससे कहा – तू तो फिर मास्टरबेट भी नहीं करते होगी ?

श्वेता – क्या दी , आप भी न।

सरला दी – बता बता

श्वेता – नहीं करती।

सरला दी सीरियस हो गईं।  उठ कर बैठ गई और बोली – सच बता तेरे में कोई प्रॉब्लम तो नहीं है ? तू लड़की पैदा हुई है ये तो मुझे पता है।  पर सन्यासिन तो नहीं बनेगी ? हमारे जैसे खानदान में जहाँ सब खुला माहौल है तू कैसे पैदा हो गई।

श्वेता – ऐसा खानदान है तभी तो चिढ सी हो गई है।

सरला दी को लगा की श्वेता कुछ तो ऐसा जानती है जो उन्हें खुद ही नहीं पता।  उन्होंने कहा – हमारे जैसा खानदान ? क्या बुराई है इसमें ?

श्वेता रोने लगी – बोली आपको पता है मेरा बाप कौन है ? आपको पता है मैं रवि को नजदीक क्यों नहीं आने देती ? आपको पता है गाओं के पास अच्छा कॉलेज है मैं फिर भी यहाँ शहर में क्यों रहती हूँ ? आपको पता है की आप सबके रहते हुए , यहाँ इतना बड़ा घर होते हुए भी मैं हॉस्टल में क्यों रहती हूँ ?

सरला दी – तुझे इन सारे सवालों का जवाब पता है।  मैं कुछ नहीं जानती।  और अपने बाप के बारे में क्या बोल रही है तू ?

श्वेता – जिसको आप मेरा बाप समझती है वो मेरा बाप नहीं है।

सरला दी के लिए शॉक की तरह था।  वो दांग रह गईं।  बोली – क्या बोलती है ? ये सब तुझे कैसे पता ?

श्वेता – तो सुनो सारी बात।  आपको नहीं पता पर हम दोनों की मैं सिर्फ अलग है।  हमारा बाप एक ही है।  ये बात खुद मुझे मेरे असली पिता यानी हमारे पिता ने बताई है।

सरला दी – मुझे यकीन नहीं है।  ये बात क्या माँ को पता है ?

श्वेता – हाँ।  बल्कि उन्ही के कहने पर पापा ने माँ के साथ सेक्स किया था। आपके चाचा यानी की मेरे पिता के लंड में इतनी ताकत नहीं थी की वो किसी को अपना बाप बना सकें।  उनका सामान तो खड़ा होता है और थोड़े ही देर ने झाड़ जाता है।  उनके माल में भी दम नहीं है।

सरला – चाचा को पता है ?

श्वेता – शायद उन्हें पता है।  उन्हें अपनी कमजोरी का अहसास है। उनके लिए यही काफी है की समाज जानता है की उनकी एक औलाद है।

माँ सारे गाओं में ये हल्ला फैला रखी हैं की पापा उन्हें अब भी बहुत प्यार करते है।  पर सच किसी को नहीं पता।

सरला दीदी सकते में थी।  उन्हें ये अंदाजा नहीं था।  माँ की बातों से ये तो पता चला था की पापा ने चाची की चुदाई की है पर श्वेता उनकी बहन है ये नहीं पता था।

श्वेता आगे बोली – इसी वजह से मैं राज से दूर रहती हूँ। जैसा हमारा खानदान है मुझे डर है की कहीं सच में मैं उसके सामने कमजोर न पड़ जाऊं।

सरला दी – तुझे ये सब कैसे पता ?

श्वेता – बचपन से ही पापा जब भी गाओं आते मुझे बहुत प्यार करते थे।  एक दिन मैंने उन्हें और माँ को प्यार करते देख लिया था।  मैं उस दिन बहुत रोइ थी।  मैंने उनसे बात करना बंद कर दिया।  उन्होंने बहुत कोशिश की मुझे समझाएं पर मैं चिढ गई थी।  वो इसी शोक में रहने लगे थे। उनकी मौत की जिम्मेदार उनका यही गम था।  चार बच्चे , तीन खुश पर एक उनका अपना खून उनसे दूर जाते जा रहा था।  आखिर में उनको टीबी हो गया  आप सभी को यही लगता है की उनकी बिमारी ऐसे कहीं से हो गई होगी। जब डॉक्टर ने उन्हें जवाब दे दिया तो माँ ने मुझे सारी बात बताई।  मुझे तो उनकी बिमारी का पता भी नहीं था।

आपको याद होगा आखिरी समय में पापा जायदाद का हिस्सा करने और चाचा को जिम्मेदारी देने जब गाँव आये थे तो मुझे बुलाकर बहुत रोये थे। मैं तब बड़ी हो चुकी थी।  कुछ समझदारी आ गई थी।  फिर पापा ने मुझे अपने खानदान की सारी बातें बता दी।  वो भी जो शायद कोई नहीं जानता था।  मरते मरते वो मेरा दिल जीत गए।  उनकी सच्चाई ने मेरे अंदर से सारे गीले सिक्वे दूर कर दिए।  उन्होंने मुझे माफी नहीं मांगी बल्कि सब मेरे ऊपर छोड़ दिया की मेरी मर्जी है की मैं सबके बारे में क्या सोचती हूँ। अब जब उनकी याद आती है तो मैं अकेले में रोटी हूँ।  मेरी जिद और नाराजगी ने उनकी जान ले ली।

इतना सब बताकर श्वेता फूट फूट कर रोने लगी।  सरला दीदी भी रोने लगी थी।  माँ और मैं बाहर खड़े थे।  मैं ही उनको लेकर आया था की शायद सरला दी उसके साथ कुछ करे तो हम अंदर उन्हें रंगे हाथ पकड़ लेंगे।  पर यहाँ तो कहानी ही कुछ और निकली।  अंदर वो दोनों रो रही थी और बाहर मैं और माँ।  अंत में माँ और मैं कमरे में घुस ही गए।

हमें देख कर दीदी माँ से लिपट कर रोने लगी और श्वेता मुझसे लिपट गई।  रोते रोते वो बोल रही थी  – मुझे माफ़ कर दो पापा।  मैं अब ये सब अपने दिल में नहीं रख सकती।  मुझसे अब बर्दास्त नहीं होता।  मैं अकेली दुखी होकर आपकी तरह नहीं मरना चाहती।

मैं बोला – नहीं मेरी बहन।  तू अकेली नहीं है।  हम सब तुम्हारे साथ है।  तू मेरी प्यारी बहन है।  तुझे हमेशा खुश रखूँगा।

उस दिन जाने मेरे मन में यही ख़याल आया की कुछ रिश्ते पवित्र रहने देने चाहिए।  मुझे एक तो बहन चाहिए थी जो मुझे राखी सच्चे मन से बांधे। जिसे देख कर मेरे मन में ममता जागे , मुझे अपने पापा की कमी बहुत खल रही थी।  उन्होंने जितने भी सम्बन्ध बनाये हो पर बेटियों के साथ रिश्ता पवित्र ही रखा था। आज एहसास हुआ की उन्होंने अपने चारों बच्चो को जान से भी ज्यादा प्यार किया था।

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