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अगले दो दिन हम सबने खूब मस्ती की। गोवा और आस पास कि जगह घूमे।  पर प्यार तय जोड़े में ही हुआ , पति पत्नी के बीच ही हुआ।  उस जोड़े में मैं एक तरह से नकली तो नहीं कहूंगा पर असली पति भी नहीं था। पर मुझमे और सुधा दी में सबसे ज्यादा प्यार था।  दीदी के चेहरा निखार गया था।  वो ज्यादा खुश थी और उनके चेहरे पर ग्लो भी आ गया था।

घुमते समय वो मेरी बाहें छोड़ती नहीं थी। अक्सर मेरे को चेहरे को देखती जैसे एक प्रेमिका अपने प्रेमी को देखती है।  मैं कहता – ऐसे देखोगी तो नजर लग जाएगी। दीदी बोलती  – नजर लगे तुम्हारे दुश्मन को।

जब भी कमरे में होते हम भरपूर सेक्स करते , पर हमारे सेक्स में वासना से ज्यादा आपस का प्यार होता। गोवा से लौटने का कब समय हो आया हमें पता ही नहीं चला।

जो जैसे आये थे वैसे ही उन्हें लौटना था।  सुधा दीदी को  राजीव जीजा के साथ ससुराल लौटना था।  तय हुआ था कि वो वहां कुछ दिन रहेंगी ताकि समाज को लगे कि जीजा और दीदी घूम कर आये है। कुछ एक हफ्ते में मुझे सुधा दी को अपने घर लाने का प्लान था। अगर गर्भ ठहर गया तो तो वो हमारे साथ बच्चा होने तक रहेंगी।  नहीं ठहरा तो हम दोनों को और कोशिश करनी थी।  बीच बीच में जीजा हमारे यहाँ आते रहते जिससे किसी को शक नहीं होता।

पर सुधा दी अब मेरे बगैर नहीं रहना चाहती थी।  उनका मन ससुराल जाने का नहीं था।  वो एक हफ्ते भी मुझसे अलग नहीं रहना चाहती थी।  वापस अलग जाने के नाम पर वो फुट फुट कर रोने लगी।  उनको रोता देख मुझे भी रोना आ गया।  सरला दी और मामी उन्हें समझा भी रहे थे और हंस भी रहे थे। उनके इस प्यार और बचपने से सब हैरान थे।  हैरानी वाली बात भी थी।  घर में सबसे बड़ी जो थी।  लगभग मामा मामी के

उम्र के बराबर कि थी।  पर उनका ये रूप देख कर मैं अंदर से बहुत  दुखी था। मुझे ये महसूस हो रहा था कि दीदी प्यार कि कितनी भूखी हैं।

उनको कभी प्यार मिला ही नहीं।  अब मिला है तो वो उस प्यार से दूऱ जाना नहीं चाह रही थी।

खैर जो तय था वो होना ही था।  मैं, मामा और मामी वापस ट्रैन से अपने शहर लौट पड़े।  सरला दी और शलभ जीजा अपने यहाँ।  सुधि दी को राजीव जीजा एक हफ्ते के लिए अपने घर ले गए।  बाकियों का तो पता नहीं पर ट्रैन से वापसी का सफर सोते सोते ही बीता।  मस्ती तो हुई थी पर हम सब थके हुए था।

स्टेशन पर ये तय हुआ कि हम सब मेरे घर ही चलेंगे।  वहां से एक टाइम का खाना खाकर मामा मामी अपने घर चले जायेंगे।  पर मामी को नाना कि चिंता थी।  उन्होंने कहा कि नहीं वो अपने घर ही जाएँगी नाना अकेले होंगे।  इतने दिनों से मेड के हाथ का खाना खा रहे होंगे।

सो दोनों अपने घर चले गए और मैं अपने घर। 

जैसे ही मैं घर पहुंचा तो देखा कि नाना यहाँ थे।  मैंने उनका और माँ का पेअर छुआ।  माँ मुझसे ऐसे मिली जैसे मैं उनसे बरसों बाद मिला हूँ।

नाना ने भी मुझे खूब सारा आशीर्वाद दिया। 

उन्होंने मुझसे पुछा – मस्तो खूब किये न ? उम्मीद है घर में तीन तीन बच्चों कि किलकारियां गूजेंगी।

मैं – हाँ कोशिश तो सबने की है।  देखते हैं कौन कौन सफल होता है।

नाना – सुधा को क्यों नहीं लेकर आया ?

मैं – एक हफ्ते बाद ले आऊंगा।

नाना थोड़े निराश से हुए।  मैंने फिर उनसे पुछा – आप कब आये ?

नाना कुछ जवाब देते उससे पहले ही माँ बोली – अरे तू सफर से थका मंदा आया है।  आराम कर।  शाम को सब आराम से बात होगी।  मैं अपने कमरे में फिर फ्रेश होने चला गया।  नहाकर मैंने सोचा थोड़ा लेट लिया जाए।  सच में मैं इतना थका हुआ था की मुझे नींद आ गई।

मेरी नींद शाम को खुली तो घर में मैंने थोड़ी चहल पहल देखि। देखा तो मामा मामी दोनों आये हुए थे। 

मैंने मामा से कहा – आप तभी यहीं आ गए होते तो नाना से मुलाकात हो गई होती।

मामा – हमें क्या पता था बाबू जी की ठरक शांत नहीं होगी। 

माँ – कुछ भी बोलता है।  वहां अकेले थे तो मैं लेटी आई।

मामी हँसते हुए बोली – ये अकेले थे और आप लेती आई या आपको अकेलापन लग रहा था  इस लिए इन्हे यहाँ लेकर आ गई।

खैर चाय नाश्ते के बाद मामा मामी और नाना चले गए। 

उनके जाते ही मैंने माँ को बाँहों में भर लिया।  माँ ने अपने आप को मुझसे छुड़ाया और कहा – तेरा मन नहीं भरता है क्या ?

मैं – तुमसे मन कभी नहीं भरेगा

माँ – चल हट , तारीफ करके ले लेगा मेरी।

मैं – मैं तो वैसे भी ले लूंगा पर तुम नाना को यहाँ क्यों ले आई ? लगता है बिना लैंड के तुम भी जी नहीं सकती।

माँ – तेरे पापा के जाने के बाद तो जी ही रही थी।  अब तूने ऐसी लत लगाई है की क्या ही काहू।  वैसे भी बाबूजी अकेले पद गए थे।  मुझे भी उनके साथ समय बिताये काफी दिन हो गए थे।

मैं – तो हम सबको हनीमून पर भेज कर खुद यहाँ मजे लेने लगी।  पर तुम तो काफी नाराज थी।  उस दिन लीला दी के कांड के बाद से मुझे तो लगा की तुम उन सबसे नाता तोड़ लोगी।  नाना ने मना  कैसे लिया ?

माँ – अरे मेरे सगे हैं वो उनसे कितने दिन तक नाराज रह सकती हूँ। तुमसब के जाने के बाद नाना ने जिद में खाना पीना छोड़ दिया।  तेरी दोनों मौसियों का फ़ोन आया की मैं अपने पास ले आऊं वर्ण बीमार पद जायेंगे।  क्या करती लेकर आना ही पड़ा।

मैं – सही है। माँ वो तुमने बताया नहीं कि नाना ने छोटी नानी के साथ कब सेक्स किया और छोटे नाना कि शादी के बाद चारों कैसे रहते थे। 

माँ – चल पहले खाना पीना कर लेते हैं।  सोते समय बताउंगी। 

मैं फ़ोन पर सुधा दी से बात करने लगा और माँ ने झट से खाना बना लिया।  खाना खाकर हम माँ के बैडरूम में पहुंचे।  आज माँ नाना लोगों की आगे की कहानी बताने वाली थी।

—————————————————————माँ की जुबानी उनके परिवार की कहानी [फ्लैशबैक 3] ————————————–

चाचा और चची शादी के कुछ दिन तक एक दुसरे में ही खोये रहे।  चाची थोड़ा बहुत घर के काम में मदद करती थी पर माँ ने उन्हें कहा अभी  मजे लें , काम करने का बहुत समय है । चाची थोड़ा बहुत फिर भी मदद कर देती थी।  पर चाचा का काम तो बस खाना , अपनी बीवी चोदना और सोना था।  घर तो क्या अपने कमरे से भी काम ही निकलते थे।  चाची भी घर के काम में मदद करके अपने कमरे में घुस जाती थी।  उनके कमरे से बस चुदाई की आवाजें आती थी।  उन दोनों के अधिकांशतः कमरे में रहने से ये हुआ कि अम्मा और बाउजी कि सेक्स करने कि फ्रीक्वेंसी बढ़ गई थी। इतना ही नहीं चाचा चाची अपने कमरे में रहते तो बाउजी माँ को कहीं भी धार के चोद देते थे।

एक दिन अपना और चाचा का खाना लेकर चाची अपने कमरे में चली गई।  कुछ देर बाद बाउजी खेत से लौटे। माँ ने उनसे भी खाना खाने को पुछा।

बाउजी- छोटा कहा है , उन दोनों ने खाना खा लिया ?

माँ ने खाना निकलते हुए कहा  – कहाँ होंगे , दिन भर अपने बीवी कि चूत में ही घुसे रहते है।

बाउजी – ठीक है , यही तो समय है।  भूल गई , हम कितना मजा करते थे।

माँ – अब तो और भी करने लगे हो।

बाउजी – अभी कहाँ।  अब इन दोनों का आपस से मन भरे तो मिलकर प्यार करें।  मजा तो तब आएगा।

माँ – हांजी , उस दिन आप दोनों ने मिलकर मेरी जब ली थी माजा आ गया था।

बाउजी – ऐसा ही मजा छोटी को भी देना है।

माँ – लल्ला उसे छोड़े तो तुम्हारे पास आये न।  शादी से पहले तो तुम्हारे साथ बहुत चिपटम चिपटाई करती थी।  गोद तक में बैठ जाती थी।

बाउजी- आएगी , गोद में भी आएगी।  पहले छोटे से खुल कर मजा ले ले।

माँ- बातें ही करोगे या खाना भी खाओगे।

बाउजी – अपने हाथ से खिला दो।  बहुत दिन हो गए।

बाउजी चौके में जमीन पर चटाई के ऊपर पर पालथी मार कर बैठे थे।  माँ भी उनके बगल में बैठने लगी तो बाउजी ने उन्हें बाएं पैर के जांघो पर बिठा लिया।  अम्मा हमेशा कि तरह सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में थी और बाउजी सिर्फ एक बनियान और लुंगी में। अब अम्मा बाउजी कि तरफ नब्बे डिग्री  कोण पर उनके गोद में बैठी थ।  माँ को गोद में बैठाते ही बाउजी का लंड अपना पोजीशन से खड़ा होने लगा।

अम्मा – ये नीचे कैसी हलचल है

बाउजी – कुछ नहीं, छुटकू को भी खाना चाहिए।

अम्मा – पहले आप खा लो।

अम्मा अपने हाथो से उन्हें खिलाने लगी।

बाउजी ने कहा – तुम भी खाओ न।

अम्मा – तुम्ही खिला दो।

बाउजी ने थाली की तरफ हाथ बढ़ाया।  अम्मा – हाथ काहे गन्दा करते हो।  वैसे खिलाओ न।

बाउजी – अच्छा , ठीक है कौर दो।

अम्मा ने बाउजी के मुँह में एक कौर दिया।  बाउजी ने कौर को मुँह में लिए और अम्मा के मुँह की  तरफ अपना मुँह किया।  दोनों के मुँह एक दुसरे के नजदीक आ गए।  बाउजी ने अपने मुँह से वो कौर उनके मुँह में दे दिया।  बाउजी ने अम्मा से कहा तुम भी ऐसे ही खिलाओ।

अम्मा ने अगला कौर अपने मुँह में लिया और बाउजी के मुँह में डायरेक्ट डाल दिया। दोनों एक दुसरे को ऐसे खिला रहे थे।

बाउजी ने अम्मा के ब्लाउज का हुक खोल दिया था और उनके मुम्मे दबाने लगे थे।

अम्मा – लगता है आपका मन दूध रोटी खाने का है।

बाउजी – हाँ।

उन्होंने फिर अम्मा के मुम्मे पर मुँह लगा दिया।

अम्मा – पी लो इन्हे।  जब तक तुम्हारा मुँह नहीं लगता है मुझे चैन नहीं आता है।  अब तुम जल्दी से मुझे माँ बना दो , ताकि सच में मैं तुम्हे अपने दूध के साथ रोटी खिला सकूं।

बाउजी – दोष न सही घी रोटी खिला दो

अम्मा ने एक रोटी का आधा टुकड़ा लिया और अपने पेटीकोट के अंदर ले गई।  उन्होंने उसे अपने रिसते हुए चूत के पानी से चुपड़ लिया और बाहर निकाल कर उसमे थोड़ी सब्जी मिला लिया और खुद के मुँह में डाल लिया।  बाबूजी ने फिर उनके मुँह से वो कौर खा लिया।

बाउजी – कितना स्वाद आता है तुम्हारे घी लग जाने से।

अम्मा – अब तुम ऐसे करोगे तो डायरेक्ट दूध के बिना घी ही निकलेगी न।

दोनों का ऐसे ही प्रेम मिलाप चलता रहा।  खाना ख़त्म हो गया तो अम्मा ने बाउजी के लुंगी से उनका लंड निकाल कर पकड़ लिया।

वो बोली – अब तो हमको कुल्फी खाना है।

बाउजी – खा लो।

अम्मा ने थाली किनारे की और घुटना मोड़ कर बाउजी कि तरफ झुक गई।  उन्होंने बाउजी का लंड अपने मुँह में ले लिए।  बाउजी ने अम्मा का

ब्लाउज उतार दिया और पेटीकोट भी कमर तक कर दिया।  अम्मा अब एकदम झुक कर बाउजी के लंड को कुल्फी कि तरह चाट रही थी और बाबूजी कभी उनके चूड़ादो को सहलाते तो कभी उनके पीठ को।

कुछ ही देर ऐसे ही चूसने के बाद अम्मा उठकर बोली – अब मुझे चोद दो।

बाउजी ने अपनी टाँगे सीधे कर ली और अम्मा उनके पैरो के के दोनों तरफ अपने पैर करके उनके ऊपर गोद में बैठ गई।  बाउजी ने उन्हें ऊपर उठाया और लंड उनकी चूत में डाल दिया।  उन्होंने अम्मा को अपने बाहो में चार लिया और पूरी तकर से कमर उठा कर उन्हें चोदने लगे।

अम्मा – हाँ जी डाल दो अपना पूरा लंड मेरी चूत में।  मेरी चूत को तुम्हारे लंड के बिना चैन नहीं है।  आह आह आह

बाउजी – तू भी एकदम रंडी है और तेरी चूत भी।  कितना किस्मत वाला हूँ जो इतनी  चुड़क्कड़ बीवी मिली है।  आह ले मेरा लंड अंदर तक ले।

अम्मा – आह , फाड़ दो मेरी चूत।  आह आह।

दोनों एकदम पागलो कि तरह एक दुसरे को चोद रहे थे। एक दुसरे में समां जाने को तैयार।  कुछ ही देर में अम्मा कि चूत ने पानी छोड़ दिया।

बाउजी – तुम बड़ी जल्दी आ जाती हो मेरा नहीं हुआ है।

अम्मा- तो भाई से बात करो , चोद दो उसकी लुगाई  उसने भी तो मुझे चोदा था।  कितने दिन तक बीवी कि चूत लेगा।  कभी तो सब मिलकर खेले।

बाउजी – तुम्हारी रंडीबाजी समझ रहा हूँ।  मेरे लिए चूत का इंतजाम कम अपने पिछवाड़े के लिए लंड का जुगाड़ चाहिए।

अम्मा – वो तो मिल ही जायेगा।  पर मेरी बहन को चोद लो अब।  बहुत उछलती थी शादी के पहले।  अब उसे पेल दो।  दिखा दो कि लंड क्या होता है ।  आह मेरा तो दुबारा हो गया।।

बाउजी – मेरा भी होने ही वाला है।  आह आह।

बाउजी के लंड ने भी अपना पूरा लोड अम्मा के चूत में डाल दिया।  दोनों कुछ देर तक वैसे ही लिपटे रहे।

थोड़ी देर बाद अम्मा ने कहा – खेत नहीं जाना है क्या ?

बाउजी – मन नहीं है।  अभी एक राउंड और हो जाये।

अम्मा उनके गोद से उठते हुए बोली – तुम्हे कोई काम हो न हो मुझे बहुत काम है। फिर दोनों बाहर निकले।

दोनों जैसे ही उठकर बाहर आये तो देखा बरामदे में रखे तखत पर में चाचा चाची को लिटा कर चोदे जा रहे थे। दोनों वहीँ ठिठक कर रुक गए।

चाची  – चोदो मुझे अपने भाई कि तरह।  देखो जिज्जी और जीजा क्या मस्त चुदाई करते है।  मुझे भी वैसी ही चुदाई चाहिए।

चाचा – महीनो से तुम्हे कमरे में चोद ही तो रहा हूँ। तुझे मजा नहीं आ रहा है क्या ?

चाची – नाराज क्यों होते हो मेरे साजन। मजा तो बहुत आता है पर अब  खुल कर प्यार करने में ही मजा है जैसे वो दोनों कर रहे थे।

चाचा – कहे तो अब भइआ से पेलवा दू।

चाची – हाँ , बहुत बड़ा लंड है उनका।  मुझे भी चाहिए।  अब अपना वादा पूरा करो तुम। सौंप दो मुझे उनको।

चाचा – हाँ , अब तो करना ही पड़ेगा।  मुझे भी भाभी कि गांड चाहिए।  तुमने तो देने से मन कर दिया है।

चाची – आह आह पहले मेरी चूत को तो फैलाओ।  इतना मोटा लंड है , मेरी गांड फाड़ देगा।

चाचा – मेरे से डर रही है।  भइआ का लेगी तो क्या होगा।

चाची – आह आह इस्सस , मिलेगा तो ले ही लुंगी।  पर  गांड में नहीं।

कुछ ही देर ऐसे मस्ती भरी बात करते करते दोनों झाड़ गए।  उनका काम होते ही।  अम्मा बाउजी भी बाहर आ गए।

उन दोनों को देख चाची ने कपडे ढूंढने शुरू कर दिया।

अम्मा – इतने देर से नंगे चुद रही थी तो शर्म नहीं थी।  और क्या कह रही थी , जीजा का लंड चाहिए।  फिर शर्मा क्यों रही है।

चाचा हँसते हुए – अरे भाभी ये बाहर पानी लेने के लिए  आई थी।  आप दोनों कि मस्त चुदाई देख अंदर से मुझे बुला लाई।  कुछ देर बाद खुद ही यहीं नंगी होकर बोली मुझे चोदो।

चाची शर्मा कर अंदर कमरे में भाग गई।  अम्मा बोली – सही है वक़्त आ गया है।  अब तो खुल कर चुदाई करने में ही मजा है।

बाउजी – अब कमरे से बाहर निकला है तो घर से भी निकल।  चल मेरे साथ खेत कि ओर।

चाचा और बाउजी फिर कुछ देर बाद खेतो कि तरफ निकल गए।

——————————————————————–वर्तमान समय ————————————————

माँ इतना सुना कर चुप हो गई थी। 

माँ की बातें सुनते सुनते मेरा लंड एकदम खड़ा हो गया था।  मैंने अपना अपना लोअर और अंडरवियर निकाल दिया था और नंगा हो गया था।  माँ ने मेरी तरफ करवट लिया हुआ था और मैं उनके ब्लाउज को खोलकर दूध में मुँह लगा चूका था।  माँ मुझे दूध पिलाते हुए ऐसे अपने घर की कहानी सुना रही थी जैसे कोई बच्चे को कहानी सुनाता है। मेरा लंड इतनी उत्तेजना में था कि हाथ लगाते ही पानी छोड़ देता पर मैंने कुछ नहीं किया था।  पिछली बार वाली माँ की बात याद थी।  मैं उन्हें नाराज नहीं करना चाहता था।  पर माँ की चूत ने शायद पानी छोड़ दिया था।

माँ चुप हो गई थी तो मैंने कहा – क्या हुआ ? आगे सुनाओ न ?

माँ – तू भी बस सेक्स और सेक्स की बातें।  मैं बाथरूम से आती हूँ।

मैं – मुझे भी चलना है।

माँ ने मना कर दिया।  कहा , तू वह शुरू हो जायेगा।  मैं बस २ मिनट में आती हूँ फिर चले जाना।

मैं माँ को नाराज नहीं करना चाहता था।  मैं नहीं चाहता था कि माँ कहानी बीच में ही छोड़ दें।

माँ कुछ मिनट में वापस आई। उनके आते ही मैं भाग कर बाथरूम में गया।  वहां मेरा लंड नीचे हो ही नहीं रहा था , इस लिए मुझे पेशाब करने में दिक्कत हो रही थी। अंदर से माँ ने आवाज दिया , थोड़ा ठंडा पानी डाल ले तब निकलेगा।  माँ मेरी प्रॉब्लम समझ गई थी। मैंने एक मग ठंढा पानी लिया और अपने लंड पर डाला , तब कुछ देर बाद मेरा पेशाब निकलना शुरू हुआ।  पेशाब होते ही मुझे बहुत राहत महसूस हुई।  मैंने एक  मग पानी और डाला और फिर कमरे में अंदर आया।  देखा तो माँ ने एक चादर ओढ़ राखी थी।  मुझे गिला देख माँ ने मेरी तरफ एक कपडा फेंकते हुए कहा – ठीक से पोछ ले वरना बिस्तर गिला गिला हो जायेगा।

मैंने कपडा लपक लिया।  देखा तो माँ का पेटीकोट था।  इसका मतलब चादर के अंदर माँ नंगी थी।  मैंने जल्दी से खुद को पोछा और अपनी बनियान उतार नंगा हो बिस्तर पर कूद गया।  माँ ने मुझे चादर में घुसा लिया।

मैंने माँ को उसके गालो पर किस कर लिया और बोलै – तू कितनी अच्छी है।

माँ – जब तक मैं नंगी न हो जॉन तब तक अच्छी नहीं लगती।

मैं – माँ तू हमेशा अच्छी लगती है।  कपडे उतार के तो माल हो जाती है।

माँ – हाहाहाहा।  तू मुझे वैसे भी नंगा कर देता , मैंने सोचा खुद ही क्यों न हो जाऊं।

मैं – ये बताओ , नाना जब यहाँ थे तो नंगी रहती थी या कपडे पहन कर ?

माँ – अरे जैसा तेरे साथ है नाना के साथ नहीं।  बाउजी के साथ तो रिश्ता काफी कम रह गया था।  अबकी भी उनकी जिद्द थी वरना मैं सच में उन्हें हाथ नहीं लगाने देती।

मैं – पर तेरी नाराजगी के चक्कर में मेरा दूध का जुगाड़ चला गया।

माँ – आय हाय मेरे मुन्ने का क्या होगा ? चिंता मत कर अब तो तीन तीन गाय बिया रही हैं घर में। 

मैं – उसमे तो नौ महीने लगेंगे।

माँ – कोई नहीं , सुशीला जिज्जी से कह दूंगी कभी आ जाएँगी।

मैं – मौसा , विकास भइआ और सुरभि दी को अजीब नहीं लगता ?

माँ – अरे उनके यहाँ का किस्सा फिर कभी बताउंगी, या मौसी से खुद ही पूछ लेना।

मैं – अच्छा उस दिन फिर क्या हुआ बड़े और छोटे नाना शाम को आये तो फिर कमाल हुआ होगा।

माँ – देख फिर खड़ा हो गया।

मैं – माँ वो तो तेरे पास आते ही खड़ा हो जाता है।

माँ – खड़ा है तो काम पर लगा।  खड़े खड़े खाली बाते सुनेगा क्या ?

मैं झट से माँ के ऊपर होने लगा।  माँ ने मुझे रोक दिया, उन्होंने पास रखे दो तकियों को अपने दोनों तरफ रख दिया। मैं समझ गया की माँ लम्बे समय तक मजे लेना चाहती हैं और उतने देर तक मेरा वजन नहीं ले सकती थी।  मैंने उन दोनों तकियों पर घुटना रख दिया और घुटना मोड़ कर उनके ऊपर लेट गया।  तकिये की वजह से अब मेरा शरीर का पूरा भार माँ के ऊपर नहीं पड़ रहा था।  मैंने अब अपना लंड माँ की चूत में डाल दिया और मुँह उनके मुम्मे पर लगा दिया।

माँ – कितना समझदार हो गया है।  सुन आराम से कहानी सुनते सुनते पेलना।  पहले अपना पानी निकाला तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। रख लेगा न काबू ?

मैंने दूध पीते पीते कहा – हूँ।

माँ वापस अपने माँ बाप की कहानी सुनाने लग गई।

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