और अपनी सहमति देणे के लिए थोड़ा पीछे हो गई और बिलकुल मुझ से सट गई
मेरे हाथ सरकते हुए उसकी बाँहों को सहलाने लगे, में उन्हे अपनी तरफ घूमाना चाहता था, उनके सुन्दर चेहरे को देखने चाहता था, उनके रूप के रस को पीना चाहता था
माँ धीरे धीरे सिसक रही थि, उनका बदन कांप रहा था शायद या यक़ीनन वो भी मिलन के लिए तड़प रही थी और मेरा तो बुरा हाल होता जा रहा था
वक्त सरकता जा रहा था, और हम दोनों अपने दिलों की धड़कन बढ़ाते हुये वहीँ खड़े थे किचन में, गरम दूध भी ठण्डा हो चला था
आखीर माँ बोल ही पडी
‘आप चलिये न में आती हु’
लेकिन शायद में चाहता था की मेरी दुल्हन पहले कमरे में जाये और मेरा इंतज़ार करे.
‘तुम चलो में आता हूँ’
माँ ने गर्दन घुमा कर अपने नशीली आँखों से मुझे देखा … जैसे कह रही हो … प्लीज मान जाओ न.
‘दूध ठण्डा हो गया है … में गरम कर के आती हु’
‘ऐसे ही रहने दो … गरम करने की जरुरत नहीं’
‘प्लीज….’
आगे मैंने बोलने नहीं दिया और दूध का गिलास उठा लिया और अपने माँ के कंधो पे अपनई बाँह फैला कर उसे अपने साथ खिंच लिया.
ओर माँ भी कुछ बोल न पाइ और मेरे साथ खिंचति चलि गई
कमरे में पहुँच कर जब माँ ने बिस्तर को देखा जो गुलाब की पंखुडियों से मैंने सजाया था वो शर्म के मारे दोहरी हो गई और मुझ से छिटक के अलग हो गई
मैने दूध का गिलास बिस्तर की साइड में रख दिया.
वह पल आ चुक्का था जिसका मुझे सदियों से इंतज़ार था, में अपनी माँ की तरफ बढा, जैसे ही उनके पास पहुंचा मुझे लगा वो सूखे पत्ते की तरह कांप रही है शायद आने वाले पलों के बारे में सोच कर.
मैने धीरे से मंजू को अपनी तरफ घुमाया. उसने अपना चेहरा झुका लिया, आँखें बंद कर ली. उनके होंठ कांप रहे थे, जिस्म थरथरा रहा था
मैने माँ की थोड़ी पे अपनी ऊँगली को रखा और उनके चेहरे को ऊपर उठया.
माँ के लाल सुर्ख़ होंठ मुझे बुला रहे थे,
कह रहे थे, कब से तड़प रहे है,
अब बर्दाश्त नहीं होता, आओ और चूम लो.
‘आँखे खोलों ना’
माँ ने ना में सर हिलाया.
‘देखोना ना मेरी तरफ’
माँ ने अपने नशीली आँखें थोड़ी खोली जैसे बहुत जोर लगाना पड़ा हो.
मैं उन अधखुली आँखों में बस प्यार के समुन्दर में डुबता चला गया
और मेरे होंठ माँ के होठो से मिलने के लिए तडपने लगे.
धड़कते दिल से में झुक्ने लगा और अपने
होंठ माँ के होठो के करीब करता चला गया.
फर एक बिजली सी कौंधी और मेरे होंठ माँ के होठो से चिपक गये,
माँ की बाहे मेरे गले में हार की तरहा पड़
गई और हम दोनों चिपक गये
मुझे भी कुछ ऐसा लग रहा था जैसे बरसों से वीरान जंगल में चलते हुए आज अपने पड़ाव पे पहुंचा हु,
क्यूँकि आज मेरी माँ मेरी बाँहों में थि, मेरी पत्नी का रूप लेकर.
इस चुम्बन से शुरुवात होनि थी हमारे वैवाहिक जीवन कि,
कितने सपने सजा लिए होंगे माँ ने, और में तो अपनी माँ की खुशबु को अपने अंदर समेटता चला जा रहा था
हम दोनों के होंठ चिपके हुये थे, शायद माँ के अंदर अब भी एक युद्ध चल रहा था अपने बेटे को पति का रूप दे चुकी थी पर उस बेटे को अपना जिस्म सोंपना इतना आसान नहीं था
मै माँ के दिल की हालत समझ रहा था जो इस वक़्त बहुत जोर से धड़क रहा था
मंजिल मेरी बाँहों में थी और धीरे धीरे मुझे ही माँ की झिझझक दूर करनी थी.
मैने माँ के होठो पे अपनी जुबान फेरनी शुरू कर दी
और थोड़ी देर बाद मुझे लगा जैसे माँ के होंठ खुल रहे है,
वो मेरे प्रेम को स्वीकार कर रही है,
और में माँ के नीचले होंठो को अपने होठो में दबा लिया.
मुझे जैसे स्वर्ग के रास्ते की पहली सीढ़ी मिल गई
माँ के होंठो को चुसते हुए ऐसा लग रहा था जैसे गुलाब का रस चुस रहा हु.
मेरा जिस्म झनझना रहा था और मेरा पेनिस इतना सख्त हो चुका था की उसमे उठता दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा था
मेरे पेनिस की चुबन से माँ भी अछुती न रेह पाई होगी.
मैने माँ को अपनी बाँहों में और कस लिया और अपने होठो का दबाव और बड़ा दिया.
माँ की आँखें बंद थि, वो अपनी दुनिया में थि, शायद बरसों बाद हो रहे इस चुम्बन के अहसास को महसुस करने की कोशिश कर रही होगी.
आज बरसों बाद कोई माँ के होठो का चुम्बन ले रहा था, और वो कोई और नहीं उनका बेटा था
जो उनके पति का रूप ले चुका था
माँ का जिस्म अब जोर से काँपने लगा था
और वो मुझ से लिपटति चलि जा रही थी जैसे अभी हम दो जिस्म एक जान बन जाएंगे.
मैने जोर जोर से माँ के होठो को चुसना शुरू कर दिया और मुझे लग रहा था जैसे वो पिघलती जा रही है
उसकी बंद आँखों के कोर से मुझे दो ऑंसू मोती बन के निकलते दिखाइ पड़े
हमारी साँस भी उखडने लगी थी
मजबुरन मैंने माँ के होठो से अपने होंठ अलग कर दिये. वो तेज तेज हाँफने लगी.
‘मुझ से रहा न गया और में पूछ बेठा.
‘ये आंसू…?’
‘माँ ने अपनी नशीली आँखें खोली मुझे देखा और चेहरा झुका लिया
शर्म के मारे उनके मुंह से कोई बोल नहीं निकल रहा था
मै फिर पूछ बैठा
‘बोलो न’
“मुझ से कोई ग़लती हो गई क्या? ‘मैंने कोई दुःख दे दिया क्या?’
माँ ने तड़प के मेरे होठो पे अपना हाथ रख दिया.ओर बहुत धीमे स्वर में बोली
‘ये तो ख़ुशी के ऑंसू हैं’
ओर मैंने तड़प के फिर माँ को अपने बाँहों में भर लिया और हम दोनों के होंठ फिर जुड़ गए इस बार माँ भी चुम्बन में मेरा साथ दे रही थी मैं उनका नीचला होंठ चूसता तो मेरा उपरवाला.
मेरे हाथ माँ की पीठ को सहलाने लगे और माँ के हाथ मेरे सर को.
दिल कर रहा था वक़्त यहीं रुक जाए और हम अपनी नयी दुनिया के आरम्भिक शण में खोते चले जाए.
जितनी शिदत से में अपने माँ के होंठ चुस रहा था,
मुझे ये अहसास ही नहीं रहा की मेरी माँ को कोई तकलीफ भी हो रही होगी,
में तो जैसे रस के एक एक कण को चुसना चाहता था,
जैसे एक भूके के सामने सालों बाद रोटी रख दी गई हो
भावनाओं के जिस भँवर में में अब तक घूम रहा था और सोच रहा था की माँ के दिल की क्या हालत होगी
वो सब जैसे कहीं बहुत पीछे छूट गया था.
इस वक़्त तो सिर्फ उन होठो के रस में डुबा जा रहा था
ये भी अहसास नहीं हुआ की की माँ को कोई तकलीफ भी हो रही होगी
शायद बरसों से कोई भूखा रहे तो यही हाल होता होगा जैसा मेरा हो रहा था
मैन तो होश गावं चुका था फिर ये अहसास हुआ की जो हाथ मेरे सर को सहला रहे थे वो अब दूर हो चुके थे. माँ की साँस घुट रही थी फिर भी मेरा साथ दिए जा रही थी.
प्रेम की प्रगाढ़ता की कोई सीमा नहीं होति,
प्रेमी तकलीफ झेल कर भी प्रेमी को पूरा सुख देता है
और मेरी माँ दर्द झेल रही थी
में गुनह्गार बनता जा रहा था
जैसे ही मुझे इस बात का अहसास हुआ में एक दम से माँ से अलग हुआ और उस वक़्त माँ की दशा ठीक नहीं थी
वो बस हाँफती हुई अपनी साँसों को दुरुस्त करने की कोशिश कर रही थी
सांस तो मेरी भी फूल चुकी थी पर इतनी नहीं जितनी माँ की फूली हुई थी.
उफ़ पागलपन में ये क्या कर डाला मैने.
अपणे आप मेरे मुंह से निकल गया
‘सॉरी’
माँ ने एक नजर मेरी तरफ देखा और फिर नजरें झुकाली उसकी सांस अभी भी तेज चल रही थी जैसे १०० मीटर की रेस में प्रथम आ गई हो.
मैन भी हाँफता हुआ अपने माँ के चेहरे की छठा को देखता रहा
सब्र का प्याला छलकता जा रहा था पर फिर भी सब्र करना था मैंने माँ को गोद में उठा लिया.
‘आउच डर के मारे माँ चीखी और मुझ से लिपट गई
फिर धीरे से माँ को बिस्तर पे लीटा दिया गुलाब की पंखुडियों के उप्पर और मन्त्रमुग्ध सा माँ को देखने लगा.
गुलाब से सजे बिस्तर पे माँ के रूप की छठा का और भी निखार आ गया था
मुझे तो बस यही लग रहा था जैसे कोई अप्सरा मेरे सामने बिस्तर पे लेटि हुई है.
मुझे इस तरहा देखते हुए पा कर माँ ने शर्मा कर अपनी हथेलियों से अपना चेहरा धक् लिया और एक दम मेरी तन्द्रा भंग हो गई
अपणे आप ही मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गई और में माँ के करीब जा कर बैठ गया.
शायद माँ को कुछ याद आ गया.
उसने धीरे से अपने हाथ अपने चेहरे से हटाये और बोली
‘दूध तो ठंडा…..’
आगे मैंने बोलने ही नहीं दिया और दूध का गिलास उठा कर आधा पि गया और फिर गिलास माँ की तरफ बड़ा दिया
सकुचाते शरमाते माँ ने गिलास मेरे हाथ से लिया और नजरें झुका कर पि गई माँ ने गिलास साइड टेबल पे रख दिया और बैठि रहि.
मै माँ के करीब सरक गया. मेरे पास आते ही उसकी साँसे फिर तेज होने लगी में उनके दिल की हर धड़कन को सुन रहा था यूँ लग रहा था जैसे वो धधकन मुझ से कुछ कहना चाहती हो.
एक डर का अहसास जो माँ के दिल में इस वक़्त बसा हुआ था उनका अहसास दिला रही थी मुझे,
और मुझे उस डर को दूर करना था
करीब पहुँच कर में माँ के साथ ही बैठ गया हमारे जिस्म आपस में छुने लगे.
तेज चलति हुई सांस के साथ माँ के उभार भी ऊपर निचे हो रहे थे और मुझे यूँ लग रहा था जैसे मुझे ये सन्देश दे रहे हो आओ और छू कर देखो.
मै इतनी हिम्मत नहीं जोड पाया की अपनी माँ के उभारों को छू सखु
एक डर मेरे अंदर भी था पता नहीं क्या सोचेगी वो
जिस प्रेम ने हमें बांधा था वो कहीं वासना के प्रभाव में बिखर न जाये
और में माँ को भूल कर भी कोई दुःख नहीं दे सकता था
मैने बहुत धीरे से अपनी बाँहे माँ के कांधों पे रखी और उसे अपने से सटा लिया.
माँ की आँखें फिर से बंद हो गई
मैने माँ के चेहरे को उप्पर किया और फिर अपने होंठ माँ के होठो पे रख दीये.
माँ का जिस्म कांप उठा और उनके होंठ खुल गये
मैने फिर से माँ के होठो को चुसना शुरू कर दिया और अपने दूसरे हाथ को
माँ के पेट पे ले गया और धीरे धीरे सहलाने लगा.
जैसे ही मेरा हाथ माँ के पेट को छूआ वो सिहर गई और मुझ से चिपक गई
माँ के होठो को चुसते हुये में मेरे हाथ को धीरे धीरे ऊपर सरकाता जा रहा था और जैसे मेरा हाथ माँ के स्तन तक पहुंचा माँ का हाथ मेरे हाथ पे आ गया.
मुझे यूँ लगा जैसे वो मुझे रोकना चाहती थी.
मैंने अपने हाथ की हरकत रोक दि.
माँ का हाथ मेरे हाथ पे ही रहा.
माँ अब थोड़ा खुलने लगी और हमारी जुबाने आपस में मिलने लगी एक दूसरे से बात
करने लगी
और इसी मस्ती में मैंने अपना हाथ आगे बड़ा कर माँ के स्तन पे रख दिया.
हम दोनों को ही एक झटका लगा.
मेरे लिए उस पल की अनुभुति को बयां करना बहुत मुश्किल है मैंने अपने माँ के स्तन के उप्पर अपना हाथ रखा हुआ था
और शायद माँ ये सोच रही होगी की उनके बेटे का हाथ उनके स्तन को छू रहा है.
हम दोनों ही अलगहुए फिर हमारे होंठ आपस में मिल गये
हाय राम हीतेश ने तो मेरे उरोज़ पे हाथ रख दिया.
“उफ़ क्या करूँ?
“अजीब लग रहा है कुछ अच्छा कुछ बुरा सा पर अब तो हीतेश मेरा पति बन गया है पत्नी धर्म है तो रोक भी नहीं सकती.
आज सुहागरात है,
कैसे झेलूंगी पता नहीं क्या क्या करेगा, बहुत अजीब अनुभुति हो रही है,
कैसे मेरे होंठ चुस्ने में लगा है
पहले तो शर्म के मारे जान निकल रही थी.
अब अच्चा भी लग रहा है, ऐसा लग रहा है जैसे खुला आसमाँन मुझे उड़ने के लिए बुला रहा हो
मेरे दिल की धड़कन बढ़ती जा रही है और साथ ही साथ हीतेश की शरारतें
एक दिल करता है उडती जाउ और कभी रुकूँ नहीं दूसरा दिल थोड़ा डरता है क्या में उनका साथ निभा पाउंगी
अगर कहीं में ज्यादा उत्तेजित हो गई तो ? हर पल एक नयी तरंग मेरे जिस्म में उठ रही है एक नयी अनुभुति आ रही है
दिल उन तरगों में डुब जाने को कह रहा है आज सब कुछ भूल कर एक नई जिंदगी की तरफ कदम रखना है
मुझे मेरे पति को सब कुछ सोंप देना है उनकी बाँहों में सिमट के रहना है”
माँ शायद ऐसा ही कुछ सोच रही थि, उनके दिल की धड़कन मुझे बता रही थी.
मैंने माँ से अपने होंठ अलग किये
जैसे ही मेरे होंठ अलग हुए माँ की आँखें खुल गई उनमे मुझे एक सवाल दिखाइ दिया की मैंने होंठ अलग क्यों किये
फिर फट से उसने शर्मा के नजरें निचे झुका ली.
फिर मैंने धीरे धीरे माँ को बिस्तर पे लीटा दिया.
माँ की आँखों में देखा तो उसने शर्मा के अपना चेहरा अपने हथेलियों में छुपा लिया.
मैंने धीरे से उनके हाथों को हटाया और अपना चेहरा माँ की क्लेवेज पे रख दिया माँ तड़प सी उठि और उसने मेरे सर को अपने सीने पे दबलिया.
उफ़ क्या खुश्बु है मेरी माँ की मेरा दिल यही कर रहा था की सारी जिंदगी बस ऐसे अपने माँ की सुगंध में खोया रहू.
मेरे होंठ अपना कमाल दिखाने लगे और मैंने माँ की क्लीवेज को चुमना शुरू कर दिया.
माँ के होठो से हलकी हलकी सिसकियाँ फूटने लगी.
उफ्फ्फ ये क्या सनसनी मेरे जिस्म में फैल रही है
आज बरसों बाद यूँ लग रहा है में एक बंद कली से फिर एक खिलता हुआ फूल बनने वाली हूँ
और इस फूल की खुश्बु खुद मेरा बेटा ही लेगा
जो अब मेरा पति बन चुक्का है.
जिस्म में रोमाँच भर्ता जा रहा है
एक अजीब सी उल्झन साथ साथ चल रही है
क्या जो हो रहा है ठीक हो रहा है
कहीं मैंने कोई ग़लती तो नहीं करदी
अपने बेटे को अपने पति के रूप में स्वीकार कर के
ये ख्याल बार बार उठता है पर हीतेश के होंठ मुझे पागल करते जारहे हैं
दिल कर रहा है हीतेश के साथ कस के लिपट जाऊ फिर डर लगता है पता नहीं क्या सोचेगा मेरे बारे में
ओह माँ हीतेश ने तो मेरे स्तन को दबाना शुरू कर दिया
है मुझे ये क्या होता जा रहा है ओह कैसे मसलने लगा है आराम से नहीं कर सकता आह दर्द हो रहा है
उफ़ कैसे बोलूँ आराम से करे —– ओह इस दर्द में भी एक नया सकून मिलने लगा है कितना तडपती थी में एक मर्द के हाथों को अपने जिस्म पे महसुस करने के लिए
आज मेरा बेटा ही वो मर्द बन गया है
‘ओह क्या मनमोहिनी सुगंध आ रही है मेरी माँ से
अब नहीं रहा जा रहा मेरे हाथ खुद ही माँ के स्तन पे चले गए
और जाने मुझे क्या हो गया में माँ के स्तन दबाने लग गया,
न जाने कौन सा जुनून चढ़ गया मुझ पर में बहुत जोर जोर से माँ के स्तन दबाने लग गया और माँ के मुंह से सिसकिया निकलने लगि, मेरे कान उन सिस्कियों में बस दर्द को न पहचान पाए
में तो बस अपने माँ का दीवाना था
जो मेरी कल्पना में बसर करती थी आज वो मेरी हमबिस्तर थी
में अपने पेनिस में उठते हुए दर्द के आगे बेबस होता जा रहा था
अब मेरे हाथ मेरे क़ाबू से बाहर होने लगे और मैंने माँ के ब्लाउज के बटन खोलने शुर कर दिये’
‘यह ये तो बटन खोलने लग गए है
आज में अपने बेटे के सामने बेपर्दा होने वाली हु
ये मुझे क्या होता जा रहा है हीतेश मुझे उन प्रेम की वादियों में खिंच रहा है जिसका रास्ता भूले हुए मुझे बरसों हो गए थे—- आज फिर वो वादियां बांहें पसारे अपना रास्ता खोल रही हैं
ओह मा क्या करूँ मेरा जिस्म मेरा साथ छोड़ता जा रहा है अब मुझसे खुद पे क़ाबू नहीं रखा जायेगा
है राम क्या करूँ’’
‘ओह ये मैंने क्या कर दिया
मेरी नजर जैसे ही ऊपर उठि मैंने अपने माँ की आँखों से बह्ते हुए ऑंसू देख लिए
मेरा सारा जोश सारा पागलपन बरफ की सिल्ली में दब के रह गया
अपने उत्तेजना में मैंने अपने माँ की आँखों में ऑंसू ला दिए और में निकम्मा जो माँ की झोली दुनिया की खुशियों से भरना चाहता था आज पहली ही रात को उसे रुला दिया मेरे हाथ जो माँ के ब्लाउज के बटन खोल रहे थे वो वहीँ जाम के रह गये’
‘सॉरी’
मेरे मुंह से अपने आप निकल गया और में अपनी माँ के ऑंसू चाटने लग गया.
‘आप सॉरी क्यों बोले?’
‘आपकी आँखों में ऑंसू जो ले आय
“मुझे माफ़ कर दो’
‘बुद्धू हैं आप’
‘मतलब !’
माँ के होठो पे वो मुस्कान थी जो मैंने आज तक नहीं देखि थी
“फिर ये ऑंसू क्यों निकले ये में समझ नहीं पाया”.
‘छोडो आप नहीं समझ पाओगे’
‘नहीं अब तो में समझ के रहूँगा ये बुद्धू का लेबल फिर नहीं चाहिए बोलो ना’
‘धत!’
कह कर माँ ने खुद मेरे चेहरे को अपने क्लीवेज पे दबा लिया,
इस से पहले की में फिर उन वादियों में खो जाता मैंने अपना सर उठा के देखा तो माँ की आँखें बंद थी.
‘बताओ न’
माँ ने धीरे से आँखें खोली और में उस सागर में खोटा चला गया में भूल गया मेरा सवाल क्या था
‘आप बहुत जोर से …..’
आगे माँ बोल न पाइ और में खुद को शर्मिंदा मेहसुस करने लगा पहली बार किसी नारि के जिस्म को छूआ था वो भी अपनी माँ के जिस्म को और उत्तेजना में ये भूल गया की में उन्हें दर्द दे रहा हु.
‘ओह सॉरी … सॉरी” वाकई में गधा हु मैं’ अपने आप मेरे मुंह से निकल गया और में माँ के चेहरे को चुमते हुए सॉरी सॉरी का आलाप रटने लगा.
‘देखो कितने बेवकुफ है”
‘ये भी नहीं पता की ये दर्द दर्द नहीं था, ये तो मेरी मुक्ति का रास्ता था, इस दर्द को ही तो मेहसुस करने के लिए कितना तडपि हु में
अब में खुद कैसे बताऊँ के ये दर्द वो दर्द नहीं जिसे दर्द कहा जाता है,
ये तो वो दर्द है जिसका हर नारि इंतज़ार करती है—बहुत सीधा है मेरा बेटा उफ़ बेटा नहीं … मेरा पति है मेरी सांस क्यों उछल रही है एक पल तो थम जा मुझे इस अनोखी अनुभुति को समेट्ने तो दे.’
‘सॉरी माँ सॉरी’
में बस यही बोलता जा रहा था और कुछ सुझ नहीं रहा था बस माँ के चेहरे को पगलों की तरहा चूमता चला जा रहा था
ये क्या माँ ने खुद मेरे अलग हुये हाथों को खुद अपने स्तन पे लेकर के रख दिया और में फिर उस वादी में खो गया हाँ अब मेरे हाथों में वो बेरहमी नहीं थी मेरे हाथ उन वक्षों का पूराअहसास करने लगे थे
ये वो स्तन हैं जिन्होंने मुझे जिंदगी दी थी मुझे मेरा पहला आहार दिया था माँ का दूध आज फिर दिल कर रहा है उस दूध को पिने के लिए क्या मुझे आज फिर वो अमृत मिलेगा जिसे पि कर मैंने अपने शरीर को रूप देना शुरू किया था’
‘मंजू’
‘हम्म’
‘क्या मैं?’
‘क्या?’
‘फिर से — ‘
‘क्या?’
वा समझ रही थी उनके चेहरे की हसि बता रही थी और मेरी वाट लगी हुई थी धडकते दिल से बोल ही दिया.
‘हसो मत … मुझे दूध पीना है’
ओर माँ का चेहरा देखने लायक हो गया था … जैसे सारी दुनिया की औरतों की शर्म उनके चेहरे पे सिमट के रह गई हो’
‘बे शर्म होते जा रहे हो’
ये अलफ़ाज़ बहुत ही अटक अटक के निकले थे जैसे माँ को बहुत जोर लगाना पड़ा हो इन शब्दों को कहने के लिये.
‘बेशर्म नहीं प्रेमी बनता जा रहा हूँ’
मुझे खुद ही नहीं पता चला की मेरे मुंह से क्या निकल गया.
इस वक़्त कोई एक दिया माँ के चेहरे के सामने रख देता तो उसकी गर्मी से वो खुद जल पडता और में तो झुलुस रहा था जल रहा था उस यात्रा पे जाने के लिए जिसके लिए मेरा तडपता हुआ पेनिस जोर लगा रहा था
‘आप बहुत….’
इसके आगे वो बोल नहीं पाइ और मेरे हाथ फिर उनके बटन्स के साथ उलझ गए उसकी आँखें फिर बंद हो गई . और मेरे होंठ फिर से उन प्यारे लबोँ का रसपान करने लग गये

