मासी का घर
अध्याय 5.5 – नज़ारा
पिछले update में, मासी अपनी पुरानी तस्वीरें देख रही थी। मैंने उनके पास जाकर उनसे काफी बातें की और उन्हें फ्लर्ट किया, उनके मन में प्यार एक बीज बो दिया। अब देखना था कि क्या वह पेड़ बनेगा या नहीं।
अब, देखते ही देखते श्याम हो गई। आसमान भी गुलाबी दिख रहा था। मैं सोफे पर बैठ कर अपना मोबाइल चला रहा था। तभी वहां विशाखा आ कर मेरे बाजू में खड़ी हो जाती है।
पहले तो मेरा ध्यान नहीं रहता, क्योंकि मैं मोबाइल पर कुछ जरूरी देख रहा था (how to seduce aunt )। विशाखा ने मुझे बुलाने के लिए शू शू की आवाज निकली।
मैंने एकदम से उसकी ओर देखा, उसने एक लाल सलवार पहना हुआ था। खुले बाल और एक छोटी सी बिंदी। क्या लग रही थी वह।

उसने अपनी आंखें और सिर हिला कर इशारे में बाहर चलने को कहां। मैं अपना मोबाइल बंद कर के उठ गया और एक मुसकूराहट के साथ उसके पीछे पीछे चला गया जैसे उसने मुझे सम्मोहित कर दिया हो।
बाहर निकल कर मैंने उससे पूछा,
मैं: “कहां चलना है?”
उसने मुस्कुराते हुए मुझे पीछे मुड़ कर देखा और बस आगे चलने लगी।

मैं उसके पीछे पीछे चलता गया। हम दोनों रोड पर पहुंचे ही थे कि मैंने फिर से पूंछ लिया,
मैं: “अरे अब साथ फेरे लेकर ही बताओगी क्या? बताओ ना कहा जाना है?”
विशाखा पीछे मुड़ी और गुस्से में बोली,
विशाखा: “बुद्धू!”
जब वो मुझे बुद्धू कहती है तो कितनी प्यारी लगती है, ऊपर से गुस्से में तो इतनी क्यूट की धरती पाताल एक हो जाए।
विशाखा: “तुम बस मेरे पीछे पीछे चलते रहो, जैसा मैं कहती हूं वैसा करो!”
गहरी साँस छोड़ते हुए मैंने कहा,
मैं: “अब जिंदगी भर यही करना है।”
विशाखा आगे देखती हुए खिलखिलाते हुए हंसी। मैं उसके बाजू में आकर मुस्कराने लगा।
चलते चलते मेरी नजर एक घर पर पड़ती है, वहां से एक महिला हमें अपनी बालकनी से देख रही थी।

वह वही सुबह वाली भाभी जी थी जो मासी से बातें कर रही थी। मैने विशाखा को पूछा,
मैं: “ये कौन है? सुबह अपने घर भी आई हुई थी।”
विशाखा ने उसे देखा और फिर आगे देखते हुए कहा,
विशाखा: “अरे ये तृषा भाभी है, मम्मी के गॉसिप क्लब में से एक।”
मैं: “गॉसिप क्लब?”
विशाखा: “अरे हा, ये आजू बाजू की सारी औरतों का एक ग्रुप है जो एक दूसरे से गॉसिप करते रहते है, मैंने इन्हें नाम दिया है गॉसिप क्लब।”
मैं (हस्ते हुए): “अच्छा, तो तुम भी इसका हिस्सा हो?”
विशाखा: “छी छी, ये गॉसिप वॉसीप मुझे नहीं आता।”
मैं इसी बात पर हंस दिया। कुछ देर और चलते ही हम घर से काफी दूर आ चुके थे। मैंने हमारे बीच की शांति तोड़ने के लिए यूं ही विशाखा से पूछा।
मैं: “तुम्हारा आगे क्या प्लान है?”
विशाखा: “आगे… सोचा है कि फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर लू। तुम्हारा क्या प्लान है?”
मैंने एकदम हल्की आवाज कहा कि उसे सुनाई न जाए,
मैं: “तुमसे शादी करने का।”
उसने मेरी और देखा, शायद उसे सुनाई नहीं गया, उसने पूछा,
विशाखा: “क्या?”
मैं (खिलखिलाते हुए): “अरे कुछ नहीं, इंजीनियरिंग कर रहा हु ना, घर पर बैठ कर सिर्फ मोबाइल देखूंगा, बेरोजगार बनूंगा सबकी तरह।”
अब उसने आगे देखा और हल्की आवाज में जिससे मुझे कुछ सुनाई ना दे, कहा,
विशाखा: “फिर हमारे बच्चों क्या खिलाओगे?”
मैं (शर्माते हुए): “क्या?”
विशाखा: “कुछ नहीं!… बुद्धू!”
उसे लगा मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया, मगर मैंने सुन लिया था, और शायद उसने भी मेरी बात सुन ली थी। हम दोनों शर्माते हुए, मुस्कुराते हुए चल रहे थे।

चलते चलते उसने मेरे हाथों को कनिष्ठा (छोटी उंगली) से छुआ और फिर मेरा हाथ थाम लिया।

ऐसे हाथों में हाथ रखे हुए हम चुपचाप चलते रहे, काफी romantic moment था।
कुछ ही देर में हम एक जगह पहुंच कर रुक गए। वहां से जो नजारा हम देख पा रहे थे, बेहद शानदार। आसमान में गुलाबी और बैंगनी रंग का मिक्सचर जिस पर बादल लटक रहे थे, चांद की पहली धुंधली झलक, पक्षियों का समूह जो शायद अपने घर लौट रहा था। आजू बाजू से पेड़ और बीच में सुना रास्ता जिस पर इस समय एक स्ट्रीट लैंप और हम दोनों ही मौजूद थे।

विशाखा की love language ही यही थी, ऐसे प्यारे प्राकृतिक दृश्य दिखाना। उस समय का वह सन्नाटा, झाड़ियों से टकरा कर आ रही ठंडी हवा और पेड़ के पत्तों का आवाज, विशाखा का मेरे नजदीक होना, उसकी गर्माहट, ये सब काफी अनमोल था।
विशाखा मेरे हाथों से लिपट गई, उसने उस दृश्य को छोड़ मुझे देख कर कहा,

विशाखा: “चलें?”
मैं: “अब कहां?”
विशाखा: “अब सीधा घर चलो, अंधेरा हो रहा है, बुद्धू!”
उफ्फ, क्या क्यूट लगती है वह जब मुझे बुद्धू कहती है। फिर हम घर की ओर निकल पड़े। इस बार हम कोई नए रस्ते से घर की ओर जा रहे थे।
विशाखा ऐसे ही मेरे हाथों से लिपट कर चल रहे थी, शायद उसने यह रास्ता इसलिए ही चुना कि कोई हमें देखे भी तो कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि यहां हमें कोई नहीं पहचानता।
उसके साथ चलते चलते कब हम घर पहुंचे पता ही नहीं लगा। हमारी कॉलोनी में घुसते ही हम एक दूसरे से थोड़ी दूरी पर हो गए।
विशाखा के पास spare key (घर की दूसरी चाबी) थी जिससे हमने दरवाजा खोला और अंदर दाखिल हुए। हॉल में तो कोई दिख नहीं रहा था, फिर मैंने TV चालू करके सोफे पर बैठ गया और विशाखा अपने कमरे में चली गई।
TV की आवाज सुन कर मेरी मासी अपने कमरे से निकल कर मेरे पास आई, वह चिंतित नजर आ रही थी।

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Writter’s Note: Thankyou for supporting guys. Story ki pace slow ya fast ho toh please batana aur kuch idea Dena chaho to bata skte ho.