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मासी का घर

अध्याय 3 – प्रेम भ्रमण

विशाखा की जिद्द पर मैं और वह घर के बाहर घूमने निकल गए। उसने एक white camisole, grey jacket और denim shorts पहना था।

उसका outfit:

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गर्म मौसम था और सीमेंट के रोड पर, आजू बाजू के पेड़ों की ठंडी छांव थी। मैं उसे पूंछ की नहीं की कहां जाना था, बस उसके साथ साथ चलते रहा। फिर मैंने पूँछ ही लिया।

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मैं: “कहां चलना है?”

विशाखा: “तुम बस चलो मेरे साथ।”

मैं: “अरे बता नहीं तो जा रहा हूं मैं।”

विशाखा: “अरे, तुम्हे एक मस्त जगह दिखानी है।”

फिर मैंने ज्यादा पूछ ताज नहीं कि, कौन एक सुंदर लड़की के साथ घूमना नहीं पसंद करेगा। कुछ दूर चलने पर रस्ते में कुछ कुत्ते हमें देख कर भोंकने लगे। डर के मारे विशु मुझसे चिपक गई और मेरा हाथ थाम लिया।

विशाखा: “मुझे कुत्तों से डर लगता है।”

मैं हंसते हंसते उसे लेकर आगे बढ़ता रहा। वह पल काफी बेहतरीन था।

कुछ देर में हम पार्क पहुंचे, वहां काफी ठंडक थी, काफी पेड़ और झाड़ियां थी। कुछ देर हम पैदल ही चले।

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विशाखा: “ये हमारे यहां का सबसे अच्छा पार्क है।”

मैं: “काफी बढ़िया है, गर्मियों में भी ठंड है यहां।”

विशाखा: “ये पार्क काफी टूरिस्ट को आकर्षित करता है। मेरी योगा की क्लास भी यही होती है सुबह।”

मैं: “अच्छा, तो तुम सुबह सुबह यहां आती हो।”

विशाखा: “हां, सुबह के समय यह काफी अच्छा लगता है।”

कुछ दूर चलने पर हमें कुछ आवाज आई। कुछ दूर पर झाड़ियां काफी जोर से हिल रही थी। कोई लड़की बड़ी जोर से सिसकारियां ले रही थी झाड़ियों में। मैं समझ चुका था यहां कोई किसी को पेल रहा था मगर मैं चुप था। विशाखा के सामने मैं एकदम शरीफ बनने की कोशिश कर रहा था। तभी विशाखा बोली,

विशाखा: “देखो, ऐसे जानवरों को भी आकर्षित करता है ये पार्क।”

मैने मेरा मुंह उसकी तरफ किया, उसने भी मुझे देखा। हम दोनों के सिर एक दूसरे की तरफ था। हम दोनों के बीच सन्नाटा था। फिर एकदम से हम दोनों ही जोर से हंसने लगे।

सबसे अच्छी बात तो ये थी कि अब भी उसका हाथ मेरे हाथों में था। पार्क के दूसरे कोने में हम दोनों एक बेंच पर जाकर बैठ गए।

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विशाखा हंसते हुए बोली,

विशाखा: “क्या लोग है, कही भी चालू हो जाते है।”

मैंने भी मुस्कुराहट के साथ कहा,

मैं: “बहुतों की तो fantasies ही ऐसी होती है।”

विशाखा: “अरे मगर अपने घर करो ना जो करना है।”

मैं: “छोड़ो न, अपने को क्या करना है!”

विशाखा: “सही है। वैसे तुमने किसको पटाया कि नहीं?”

मैं: “अरे तुम्हे लगता है मुझसे कोई सेट होगी!?”

ऐसे ही बातें करते करते है काफी देर हो गई, श्याम होने को आई थी। विशाखा उठकर बोली,

विशाखा: “चलो, तुम्हे अब तो एक इससे भी प्यारी जगह देखनी है।”

फिर हम दोनों पार्क से निकल कर फिर बातें करते हुए चल पड़े। काफी दूर तक चलने के बाद विशाखा रुक गई। मैंने उससे पूछा,

मैं: “क्या हुआ, क्यों रुक गई?”

विशाखा: “अपने left side देखो।”

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मैं जैसे बाईं ओर मुड़ा, मैंने काफी सुंदर नजारा देखा। श्याम का वह केसरिया आसमान जो एक तालाब में दिख रहा था। तलब और उसके आजू बाजू का नजारा भी काफी सुंदर था।

विशाखा ने तालाब की ओर देखते हुए हल्के टोन में बोली,

विशाखा: “मुझे जब भी low feel होता है, या मैं बोर हो जाती हूं, या कुछ करने का मन नहीं होता तो मैं यही आती हूं।”

मैं सिर्फ तालाब और देखता रहा।

विशाखा: “मैंने इस जगह के बारे में आज तक किसी को नहीं बताया, सिर्फ तुम्हें आज दिखाया।”

मैं: “ऐसा क्यों?”

वो शांत रही और सिर्फ उस तालाब की ओर देखती थी, मैं भी तालाब की खूबसूरती को ही निहार रहा था। एकदम सन्नाटा था, हल्की हवा चल रही थी।

एकदम से विशाखा से मेरी हाथों को जोर से जकड़ लिया। मैंने कुछ हरकत नहीं की। अचानक, उसने मेरे गालों पर किस किया और मेरा हाथ छोड़ कर वहां से जाने लगी।

मैं हैरान था, गालों पे हाथ लगते हुए बस उसे आगे चलते हुए देखते रहा। जब वो कुछ दूरी पर चली गई उसने पीछे मुड़ कर देखा और फिर में भी उसके पीछे पीछे चला गया।

पूरे रस्ते मैं हैरान था और विशाखा मेरे एक-दो फूट की दूरी पर आगे चल रही थी। लौटते वक्त हमारे मुंह से एक शब्द नहीं निकला।

उनकी कॉलोनी में पहुंचने के बाद हम दोनों को उसे एक साथ देख कर काफी लोग हमे ही घूर रहे थे। फिर हम घर पहुंचे।

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