पापी परिवार की पापी वासना – Update 66 | Incest Story

पापी परिवार की पापी वासना – Dirty Incest Sex Story
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66 यौवन का संचार

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान, रजनी जी अपने कंठ के भीतर ही भीतर किसी लाचार घायल प्राणी के जैसे कराह और बिलबिला रही थीं, जैसे जय उनकी कुलबुलाती काँपती योनि को चूसता और चाटता जाता था, वे इस रीति में सिसक-सिसक कर अपने दैहिक आनन्द की अभिव्यक्ति कर रही थीं।

ओहहह, मजा आ गया !”, वे चिल्लायिं, … बड़वे की जीभ से चटकर मजा आ गया! चूस मुझे माँ के बड़वे ! : : चाट मुझे, जय! मेरी भीगी लिसलिसी चूत को चाट मादरचोद :: :: ऊ ऊ ऊ ऊ, शाबाश , चाट ले .. चोंचले को भी चाट ::: अपने बाप का लन्ड समझ कर चूस मेरे चोंचले कोः : ‘ या ऊपर वाले! और अंदर घुसा माँ के बड़वे! ::: मुझे चोद अपनी जीब से, बेटा! … आँह … ऊहह ऊपर वाले तेरे लन्ड को बरकत दे … बेटा तेरी माँ के बदन पर ग्राहक खूब पैसे लुटायें! अँह ::: ऊँह :: अँह अँह अँहहह” जब जय के होठों ने उनके चोंचले को अपने बीच में लपेटकर उसके चूसते गरम मुँह में चूस कर खींचा, तो रजनी जी की सम्पूर्ण देह स्पंदित होकर थरथराने लगी।

“ओह, ऊपर वाले! • चः ‘चोद! :: शाबाश, मेरा चोंचला, बेटा! : चूस इस हराम की जड़ को! शाबाश ऐसे ही! माँ के बड़वे, चोंचले को ऐसे चूस रहा है, जैसे तेरी माँ के ग्राहक का लौड़ा हो, ..• अँहहह … ऊँह ::: अँह :: अँह अँह अँहहह … बोल साले , ‘ अँह … चुदने के बाद तेरी माँ तुझसे अपने ग्राहकों का लन्ड इसी तरह से चुसवाकर फिर खड़ा करवाती है ?? आँह • आँह मादरचोद !”

रजनी जी कामोन्माद में बेसुध होकर इस अपनी अति विकृत मनोवृत्ति से पनपी हुई ऐसी अने बातें कहे जा रही थीं! नवयुवक जय के मैथुन कौशल होंठ और जिह्वा उन्हें पागल करे देते थे’ :: अपनी कामोत्तेजित योनि पर उसका मुख मैथुन इतना प्रभावकारी था, कि अब उन्हें किसी भी सैकन्ड चरम यौनानन्द प्राप्त होने वाला था।

“या ऊपर वाले, जय! ::: मैं झड़ने वाली हूँ जानेमन! ::: मैं तेरे मादरचोद मुँह में झड़ने वाली हूँ! अँहहहह! तू आँटी को अपने मुँह में झड़ाना चाहता है, है ना बेटा, बोल ?”

रजनी जी उसके सर के ऊपर ऐसा तीव्र दबाव डाल रही थीं, कि जय लाख चेष्टा करता तो भी अपने मुख को उनके पेड़ में से मुक्त करा कर उनके प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में नहीं था। उसने स्वीकृति के रूप में केवल अपना सर भर हिलाया। उसने अपने मुंह को रजनी जी के मोटे-मोटे रोमयुक्त योनि कोपलों पर अब भी कस के चिपटा रखा था।

“चल मेरे पट्ठे, तैयार होजा पहलवान !”, वे चीखीं, “आ आँहह! दम लगाकर चूस, जय! आँटी की चूत को पूरा जोर लगाकर चूस! चूस मेरी चूत को अपने मुंह में, बेटा, और फिर देख मेरी चूत तुझे कैसे जन्नत का मजा चखाती है ! | रजनी जी ने अपने पेड़ को उसके चेहरे पर फुदका – फुदका कर दबाया और जय अपने खुले होठों को उनकी योनि पर चिपकाये हुए चूसता रहा, अपनी जिह्वा द्वारा उनके चोंचले पर क्रमवार दंश करता रहा, और अन्त में उसके टटोलते सिरे को उनकी टाइट भीगी योनि की गहनता में भोंक डाला।

रजनी जी को उसी क्षण परम यौनानन्द की प्राप्ति हो गयी! । “ओहहह! ऊपर वाले! ::: अहहह, अहहह, अहहहहह! :: : ऊपर वाले, शाबाश ! ::: ऊँह ऊ ऊहहह! मैं झड़ रही हूँ जय! :: : चूस इसे , माँ के बड़वे ! :: : चूस निकाल मेरी चूत से! ::: एक एक बून्द को चाट कर पी जा! :: आहहहह आँहह आँहहह ::: आँहहह ::: अपनी माँ के चूत चाटने वाले मादरचोद बड़वे !”

रजनी जी के स्नायुओं में जबरदस्त विस्फोट हुआ, वे रॉकेट जैसी झड़ी थीं। उनके कूल्हे एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ उचक रहे थे, और उनकी योनि को उनके युवा प्रेमी के मुख पर बार-बार कुचले जा रहे थे। जय दोनो हाथों के प्रयोग से किसी तरह उनके तूफ़ानी अंदाज में फटकते नितम्बों पर अपनी पकड़ बनाये रहा, और अत्यंत कठिनायी से अपने मुख को रजनी जी की कुलबुलाती योनि पर दबा कर चस्पाये रहा। परन्तु जय ने उनके योनि द्रवों की एक भी बून्द को व्यय न होने दिया, उसे पौष्टिक बलवर्धक पराग मानकर निगलता ही चला गया था वो।

सहसा, वो अपने सर को एक बाजू से दूसरी बाजू हिलाने लगा, और उनके योनि द्वार को फैला कर खोल दिया, जिससे उसका पूरा चेहरा उनकी कसमसाती योनि में नाक से लेकर ठोड़ी तक गड़ गया। रजनी जी को सम्पूर्ण जीवन में इस प्रकार का अनुभव कभी नहीं हुआ था, यौनानन्द ऐसा तीव्र था, के वे लगभग मूर्छित ही हो गयीं। | कामानन्द की चरम शिखर के समय वे श्वास लेने को छटपटा रही थीं, तभी उनके कुत्सित अन्तःकरण में अचानक एक बेसरपैर का विचार कौंध उठा। ‘साला अंदर घुसा हुआ साँस ले कैसे पा रहा है ?’

उनकी विचित्र कुंठा पल भर में ही विलुप्त हो गयी, उनके अंग-अंग में उमड़ते काम उन्माद की लहरों में कहीं गायब हो गयी। उस क्षण तो रजनी जी को रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि जय साँस ले पा रहा था भी या नहीं, बशर्ते वो उनके फड़कते चोंचले को चूसना न थामे। उनके विचारों में केवल एक ही विशय का प्राधिपत्य था, जय का मुंह और जिह्वा उनकी विकराल रूप से उत्तेजित योनि में कैसा अविश्वस्नीय आनन्द संचरित कर रहे थे। उनका मुख खुला और रजनी जी हर्ष के मारे चीख पड़ीं।
आहहह आँहहह ऊँह आँहैंह! ओह मादरचोद! ओह, मेरे ऊपर वाले!::ओहहहह! ओहहहहह ! ऊ ऊहह ऊहहह !” ।

अपनी हर गतिविधि से लड़के का मुँह उनकी कंपकंपाती योनि को रोमांच के नये शिखर पर उड़ा ले जाता था, और हर बार वे यौनानन्द की नयी सीमा को लांघ कर असीम संतुष्टि का अनुभव करती जाती थीं।

जैसे अनेक छोटे ऑरगैस्म उनके उचकते पेड़ में से उत्पन्न होकर अंग अंग में संचरित होते जाते, जय को रजनी जी की देह अनेकों बार अकड़ कर थरथराती हुई प्रतीत होती। रजनी जी पीठ को ताने हुए बड़ी कठिनाई से जैकूजी के किनारे का सहारे लिये अपनी स्थिति बनायी हुई थी। वे अपनी योनि को जय के चटोरे मुंह पर, और अपने आगे को उभरे हुए स्तनों को उसके हाथों में दबाये हुए, अपने बदन में थमती हुई अंतिम यौन तृप्ति की अनुभूतियों का आस्वादन कर रही थीं।

अह म्म्म! ओह, बेटा, मजा आ गया!”, रजनी जी ने आह भरी, और अपने पेडू को उसके चेहरे से नीचे हटाया। अपनी टाँगों को उसके तन के दोनो तरफ़ चौड़ा पसार कर, रजनी जी ने अपनी योनि को उसके सीने पर नीचे फिसलने दिया, जब तक उनके नितम्ब जय की जंघाओं पर नहीं बैठ गये, वे उसके ठोस लिंग को दोनो बदनों के बीच में फंसा कर, उनके गुप्तांगों पर आतुरता से दस्तक करता हुआ अनुभव कर पा रही थीं।

किशोर जय एकटक रजनी जी के तमतमाये हुए चेहरे को देख रहा था। उनकी सूरत में उसे एक विशेष अनूठापन दीखता था, फिर अचानक जय को यह ज्ञान हुआ कि यौन तृप्ति का अद्वितीय तेज उनके मुख को ज्योतिर्मय कर उनके नैन-नक्श से यौवन का विलक्षण प्रकाश बिखेर दे रहा था।

बहुत खूब , रजनी आंटी, बहुत खूब!”, वह धीमे स्वर में बोला

 

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