पापी परिवार की पापी वासना – Update 60 | Incest Story

पापी परिवार की पापी वासना – Dirty Incest Sex Story
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60 तांक-झांक

जय शीग्रता से टॉयलेट में घुसा, और अपने स्विमिंग ट्रैक को नीचे उतारकर कमोड पर जा बैठा। उसने पीठ को आराम से पीछे टेककर अपनी घुटनों को फैला दिया, उसका लौह की छड़ जैसा कठोर और तना हुआ लिंग विजय पताका की तरह उसके पेड़ से ऊपर निकल कर फहरा रहा था। जय ने उसपर उंगलियाँ लपेटीं और अभ्यासानुसार रगड़ता हुआ हस्थमैथुन करने लगा।

हस्तमैथुन क्रिया करते हुए, जय के युवा मस्तिष्क में रह-रह कर रजनी जी की तस्वीरें उभर रही थीं, जिनमें वे उत्कट कामुक मुद्रा में दिखलायी देती थीं। उन अश्लील मैगजीनों जैसी ही, जिनकी सहायता से वो अक्सर हस्तमैथुन करते हुए अपनी यौन कल्पनाओं को प्रेरित करता था। जय ने रजनी जी को बिस्तर पर लेटा हुआ कल्पित किया, एक हाथ से अपनी योनि की कोपलों को फैलाते हुए, और दूसरे से जय को बिस्तर के निकट, अपनी तरफ़ आमंत्रित करते हुए। वे उसे नाम लेकर पुकार रही थीं, अपनी देह पर चढ़कर यौन क्रिया करने का आग्रह कर रही थीं। जैसे-जैसे वो अपनी लिंग को रगड़ता गया, उसकी कल्पनाओं की उड़ान और ऊपर होती गयी, उसने शीघ्र ही उनकी जाँघों के बीच स्थान ग्रहण किया, और अपने लिंग को उनकी लाल, कसी हुई योनि में प्रविष्ट करा कर, बलपूर्वक और तीव्र गति से सम्भोग करने लगा।

“ओहहह! मादरचोद! रजनी आँटी! साली रन्डी की चूत !”, वो कराहा। “मेरे लन्ड को तेरी चूत की जरूरत
उसका मस्तिष्क यौन क्रीड़ा की हर उस संभावना से भर गया था जो किसी कामतत्पर नवयुवक की कल्पनाओं में आ सकती थी। अपने काल्पनिक लोक में, जय ने पड़ोस में रहने वाली दो बच्चों की माँ की देह के हर छिद्र में अपने लिंग को घुसा कर, और हर संभावित मुद्रा में, संभोग किया। ऐसी अनेक कल्पनाएं उसके मन में मादक धुएं की तरह फैल गयी थीं, उसकी मुट्ठी लिंग पर अति – तीव्र गति से चल रही थी। फिर आखिरकार उसे अपनी जाँघों के मध्य वही चिरपरिचित अनुभूति हुई। रिकर्ड समय में उसने हस्तमैथुन से यौन तृप्ति प्राप्त कर ली थी!
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उधर दूसरे बेडरूम में, डॉली ने भी अपने कपड़े उतार कर बिकीनी पहनी ही थी, और रूम में तौलिया खोज रही थी, जो कहीं नहीं दीख रहा था। हालांकि सोनिया ने उससे कहा अवश्य था कि तौलिये बेडरूम में ही हैं।

कम्बख्त !”, वो बुदबुदायी, और निराश होकर बाथरूम की दिशा में चल पड़ी। ‘इधर नहीं तो बाथरूम में तो होना ही चाहिये।’, उसने सोचा, और बाथरूम का दरवाजा खोला। डॉली बाथरूम में प्रविष्ट हुई तो उसके नंगे पाँवों ने फ़र्श की टाइलों पर तनिक भी पदचाप नहीं की। टॉयलेट के दरवाजे के पास दीवार में बने आलों में चार-पाँच तौलिये तह करे रखे हुए थे। डॉली ने एक तौलिया उठाकर झट से निकल जाना चाहा, पर जैसे ही बाथरूम से निकलने को पलटी, तो टॉयलेट से निकले एक स्वर ने उसे चौंका दिया। उसने सावधानी से कान लगाकर सुनने का प्रयत्न किया, पर जब कोई आहट नहीं हुई, तो सर हिलाती हुई बाहर निकलने को अग्रसर हुई। जैसे ही उसने दरवाजे के हैंडल पर हाथ रखा, तो उसे वही आहट फिर सुनाई दी, इस बार कहीं अधिक ऊंचे स्वर में।

लगता था जैसे आहट टॉयलेट से आयी है, सो डॉली शटर के समीप आ खड़ी हुई। दरवाजा थोड़ा सा खुला हुआ था, बस इतना ही, कि झाँक कर अंदर देखा जा सकता था। अंदर का बल्ब भी जल रहा था, रहस्यमयी आहट के स्रोत को देखकर डॉली अत्यंत कुटिलतापूर्वक मुस्कुरायी। अंदर जय था, सम्पूर्णतय नग्नावस्था में टॉयलेट की सीट पर बैठा हुआ अपने विकराल लिंग को बायें हाथ से रगड़ा जा रहा था। उसने पलकें कस के मुंद रखी थीं, और मुंह खुला हुआ था। कर्कष और पाश्विक कराहें उसके खुले होठों से निकल रही थीं, और जय अपनी मुट्ठी को तीव्रता से लिंग के ऊपर और नीचे फटके जा रहा था, बाह्य जगत से पुरी तरह अनभिज्ञ होकर हस्तमैथुन कर रहा था। नवयुवक जय के विकट आकार व लम्बाई को देख डॉली की आँखें फटी की फटी रह गयीं।

अतिथी होने के नाते, डॉली के अंतःकरण ने उसे चुपचाप निकल जाने, और जय को एकांत में अपनी निजी गतिविधियों को निर्विघ्नता से करते रहने देने की राय दी। परन्तु जय के तने हुए स्थूलाकार लिंग की छवि ने उसके कदमों को रोक लिया, कैसा मोटा लम्बा और सम्मोहक था :: लगभग उसके भाई जितना ही बड़ा। जय सचमुच अब बच्चा नहीं रहा था! डॉली ने अपनी दृष्टि उसके विकराल लिंग से फेर ली, और उसके बदन के अन्य भागों पर फेरने लगी। उसने अपनी निगाह उसकी लम्बी पुट्ठेदार टाँगों पर, सरपट पेट और मजबूत कमर पर, चौड़े विशाल सीने, ताक़तवर भुजाओं पर फेरीं, और उसके हट्टे-कट्टे डील-डौल को सराहा। उसके देखते-देखते , जय के सीने और भुजाओं की माँसपेशियाँ उसके उग्रतापूर्वक हस्तमैथुन करते हाथों की गति के साथ-साथ फूलती सिकुड़ती जाती।

डॉली ने उसके युवा आकर्षक मुख को देखा, कितना हैंडसम है’, डॉली ने सोचा। यौन तृप्ति के समय पुरुष के मुख भाव को देखना उसे बहुत भाता था। उसे एक बार फिर बाथरूम से निकलने की सूझी, पर उसकी योनि में रोमांच की एक टीस उठ रही थी और वो अपने आप को बाहर जाने के लिये नहीं मना पायी। किसी भी कीमत पर वो नौजवान जय को हस्तमैथुन करते हुए देखने का अवसर नहीं गंवाना चाहती थी। उसने अपना एक हाथ अपनी बिकीनी की जाँघिया के इलास्टिक को उठाकर अंदर को घुसाया और अपनी रोममम्डित योनि स्थल को सहलाने लगी। बड़ी सावधानी से हस्थमिथुनरत जय को देखते हुए, डॉली ने अपनी एक उंगली को अपनी संकरी योनि की मांद में घुसेड़ा और अपने चोंचले को उत्तेजित करते हुए कड़ा कर दिया।

जैसे जैसे वो उसे सहलाती गयी, उसकी योनि और नम होती गयी, उसकी उंगली हलके हलके छपाके करने लगी, जब वो उसे अपनी टपकती योनि में घुमा-घुमा कर फेरने लगी। डॉली अचानक ठिठक कर रुक गयी, जब उसे संदेह हुआ कि कहीं जय ने उसकी उपस्थिति भाँप तो नहीं ली, किंतु फिर उसके मुख के भाव को देखकर डॉली आश्वस्त हो गयी कि उस क्षण यदि हाथीयों का झुंड भी वहाँ आ धमकता, तो भी जय का सचेत होना बड़ा कठिन था।

अब वो सुरक्षित महसूस कर रही थी, इस कारण डॉली ने अपनी योनि से हतमैथुन फिर जारी किया, और यथासंभव स्वयं को उत्तेजित करती हुई जय से पहले यौन तृप्ति प्राप्त करने की चेष्टा करने लगी। और उसके पास चारा भी क्या था, जानती थी कि अन्यथा, उसे अपनी यौन तृप्ति से पहले ही नौ-दो-ग्यारह होना पड़ेगा। परंतु वो ऑरगैस्म के वास्ते ऐसे तरस रही थी, कि यह विकल्प उसे क़तई स्वीकर नहीं था! उसकी उंगलियों के दबाव के तले उसका चोंचला सूज कर फड़क रहा था, और उसका दूसरा हाथ स्तनों की प्रेमपूर्वक मालिश कर रहा था। डॉली की दृष्टि जय के फड़कते लिंग पर लगी हुई थी। सोचती थी कि अगर मिस्टर शर्मा का लिंग भी अपने पुत्र के जैसा ही दीर्घाकार है, तो अवश्य वो और उसकी मम्मी इस रात रतिक्रीड़ा से विलक्षण आनन्द का भोग करने वाली हैं।

 

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