45 देहस्य शांतिः
अन्दर, अन्दर, और अन्दर, मिस्टर शर्मा का लिंग धकेलता गया, और पुत्री के कोमल, कुंवारे गुदा- छिद्र में ढूंस-ठूस कर उनके विशाल सम्भोगांग की मोटाई से भरता चला गया। अचानक जय को अपने फड़कते लिंग पर एक विलक्षण दबाव का अहसास हुआ। जैसे ही पिता का लिंग उसकी गुदा में आधा घुसा, सोनिया उचकने लगी,
और अपनी योनि को भाई के लिंग पर कसमसाने लगी, साथ ही साथ, आतुरता से अपने गुदा-छिद्र को पिता के लिंग पर वापस ढकेलती रही।
“ऊहहह! डैडी आप घुस गये मेरे अन्दर ! मेरी गाँड के अन्दर !”, सोनिया चीखी, “हे राम! कितना अच्छा लगता है! ओहहह, चोदो मुझे ! साले, दोनों चोदो मुझे !” ।
सोनिया के नितम्ब अति तीव्र गति से लोटने लगे, एक ही साथ दोनो विशाल लिंगों को अपनी देह में रौन्दवाने का भरसक प्रयत्न करते हुए।
ओह, बहनचोद, जय! चोद मेरी चूत ! चोद, कस के! :::: म्म्म्म, हे राम! दम लगा के, डैडी! मारो मेरी टाइट गाँड! कितना मस्त लग रहा है आपका लौड़ा मेरी गाँड में! … भगवान के नाम मुझे चोदो !” | मिस्टर शर्मा अपने गुर्राते हुए अपने कूल्हों द्वारा रौन्दे जा रहे थे। अपने धुखते पौरुष-स्तम्भ को पुत्री की मक्खन सी चिकनी गुदा की भींचती संकराहट में गहरे, और गहरे मारते जा रहे थे वे। उनका मोटा, रक्त से धौंकता लिंग सोनिया की गुदा की लचीली माँसपेशी को विलक्षणता से खींच -तान रहा था।
कईं सेकन्ड तो जय टस से मस नहीं हुआ। बहन की कसी योनि माँसपेशियाँ उसके लिंग को प्रेम से दुह रही थी, और वो लम्बी-लम्बी आहें भरता रह गया था। फिर उसे अहसास हुआ कि पिता ने सोनिया की गुदा में मैथुन क्रिया प्रारम्भ कर दी है। वे अपने नितम्बों को भींच कर, अपने पत्थर से कठोर लिंग को सोनिया की सकुचाती गुदा में अन्दर-बाहर सरकाये जा रहे थे।
। “मार मेरी गाँड, बेटीचोद बाप !”, सोनिया ने आह भरी। उसका मुखड़ा वासना के मारे विकृत हो गया था। इतना मजा, इतनी तृप्ति तो राज और डॉली के साथ चुदाई में भी नहीं प्राप्त हुई थी। “उह : ऊहह ! भगवान! जय, मेरी चूत चोदता रह !”
सोनिया पूरा दम-खम लगा के उचके जा रही थी। भूखी नागिन जैसी, अपने दोनो छिद्रों में पिता और भाई के लिंगों को निगलने का प्रयत्न कर रही थी। मिस्टर शर्मा ने सैक्स-क्रीड़ा की गति अधिक की। उनकी पुत्री का गुदा- छिद्र उनके लिंग पर बार-बार लपक लपक कर चूसता जा रहा था, और उन्हें आनन्द से कराहने पर मजबूर किये जा रहा था। जय अण्डकोष में वीर्य उबलकर उमड़ने को बेचैन हो रहा था। जय अपनी बहन की टाइट, भीगती योनि को अपने पूरे सामर्थ्य से रौन्द रहा था।
पिता और पुत्र, दोनो मचलती, बलखाती रूपवान नवयौवना के संग अपना पूरा पौरुष बल लगा कर सम्भोग कर रहे थे। एक दूसरे से समन्वय बैठा कर, अपने दीर्घ लिंगों द्वारा उसकी संकरी योनि और गुदा में, एक ही लय में, प्रणय-लीला में रत थे वे।
। “चोद मेरी चूत ! मार मेरी गाँड !” सोनिया चिंघाड़ी। उसका सम्पूर्ण तन उसकी योनि और मलमार्ग के साथ फड़क रहा था। उसके दोनों सम्भोग-छिद्र अनियंत्रित होकर संकुचित होते जा रहे थे। दोनो रौन्दते लिंगों को लावण्यपूर्वक पुचकारते हुए अपने प्रेम की अभिव्यक्ति कर रहे थे। सोनिया का मुख-मंडल लाल हो गया था। लगातार उचकने और फुदकने के कारणवश उसकी नग्न देह से पसीने की अनेक बून्दें टपक रही थीं।
“चोद इसे, दीपक! तू भी, जय! दोनो अच्छी तरह से इसको चोदो !” टीना जी फुकारीं। वे लिंगों के प्रत्येक बलशाली और गहरे ठेले को देख रही थीं। अचानक उन्हें सूझी कि उनकी योनि पर ध्यान केन्द्रित करने की अवश्यकता है। वासना-ज्वर से पीड़ित वयस्का ने हस्त-मैथुन प्रारम्भ कर दिया। उनकी हवस भरी कल्पनाओं का प्रेरणा स्रोत थे मिस्टर शर्मा और उनका पुत्र, जो पास में उनकी पुत्री सोनिया के संग दोहरे सम्भोग का आनन्द ले रहे थे। |
पाठकों, यह देख कर अचरज न कीजिये के किस प्रकार दो नर एक मादा के संग सैक्स-क्रीड़ा में रत थे। यह तो प्रकृति का नियम है, मादा दानी है, आनन्द व सन्तोष का वितरण वह नर से अधिक सहजता से कर सकती है। नर स्वकेन्द्रित प्राणी है, अपनी देह की तृप्ति उसका सर्वप्रथम ध्येय होता है। स्त्री चाहे तो अपनी देह में स्थित तीनों छिद्रों द्वारा एक साथ तीन पुरुषों को दैहिक -आनन्द की प्राप्ति करा सकती है। साथ ही नारी हृदय अथाह करुणा, ममता और प्रेम का संचय है, जो विमुक्त होकर अपने प्रियों को हर्ष व सन्तोष प्रदान कर सकता है। पुरुष ऐसे नि:स्वार्थ आनन्दोपार्जन के काबिल कहाँ ? उसका तो एकमात्र लिंग होता है, जिससे एक समय में, वो एक ही स्त्री को यौन सन्तुष्टि दे सकता है। स्त्री के मुकाबले नर, अधिक शीघ्रता से उत्तेजित होता है, और वीर्य का स्खलन करता है। अतः नियति का विधान यही है कि वीर्य स्खलन के पश्चात नर को पुनः लिंग सजीव करने के लिये निश्चित समय की आवश्यकता है। अतः दो या उससे अधिक पुरुष ही सम्पूर्ण रूप से मादा को सन्तुष्ट कर सकते हैं। जैसे द्रौपदी और पाण्डव । बहरहाल, मैं पापी शर्मा परीवार की सैक्स गाथा आगे कहता हूँ। ।
“मादरचोदों! और अन्दर, और अन्दर चोदो !”, सोनिया ने आह भरी, “मैं झड़ने वाली हूँ! ओ: ‘उ ऊहह, हे राम! बस झड़ी! ओह, बहनचोद :: ‘अह अहः ‘आँह दे मारो मुझे अपने काले मोटे ल लन्डों से! उफ़्फ़ः ”आह’ ऐंह ‘ऐंह! और कस के चोदो ! हरः ‘रामियों, और कस केऽ! | मिस्टर शर्मा और जय उसकी कमसिन देह में और बलपूर्वक सम्भोग क्रिया करने लगे, उनकी प्रणय लीला की आवेगपूर्ण लय के मारे पूरा बिस्तर बड़े वाहियात ढंग से चूं-चूँ चरमराता हुआ उछल रहा था। सोनिया ने अपनी पलकें कस के मुंद लीं। फिर उसकी योनि से द्रव प्राहित होने लगे, और योनि भाई के सम्भोगरत लिंग पर सिकुड़ने लगी। साथ में उसका गुदा छिद्र पिता के गुदा-भेदी लिंग को जकड़ – जकड़ कर चूसने लगा। । “उहहहह! अब मैं झड़ रही हूँ !”, वो चीखी, “ओह, भोसड़ वालों, अब तो सच में झड़ रही हूँ! चोदो मुझे, मैं …. ओह! ओ ओह ओह ! ओह, ओह, ओ ओहह, झड़ी • झड़ी !! अ अहह उफ़ :: ‘ऐंह :: ऊह” ‘अँह :: अअहः अह: ऊह अः ऊँ अह अह अह !”
सोनिया की तड़पती देह के हर कोने में विशाल लिंग के अने प्रहार हुए, जिनके प्रभाव से उसकी योनि निरन्तर भाई के मोटे लिंग पर लिपट कर कंपकंपाती रही। पिता के रौन्दते लिंग की मसलती कठोरता को उसकी गुदा लगातार चूसती रही। जंगली पशुओं की तरह मिस्टर शर्मा और जय किशोरी सोनिया के यौवन का आनन्दभोग लेते रहे। दोनो रौद्र पुरुष अपने शिला लिंगों को सोनिया के चूसते सम्भोग छिद्रों में जोतते हुए, अपने अण्डकोष के भीतर उबलते वीर्य को बचाये रखने में संघर्षरत थे।
सोनिया पूरे एक मिनट तक अपने ऑरगैस्म की छटपटाहट में उचकती और फुदकती रही। वो अपना पूरा बलबूता लगाकर अपने तन के भीतर गहरी पैठ जमाये दो लिंगों को दुहती रही। अन्त में उसके स्नायुओं से तीक्षण कामानन्द की लहरें थम गयीं, और छोड़ गयीं उसके पूरे तनबदन में सम्भोग-तृप्ति की भीनी-भीनी, मादक महक।
66 नारी शक्ति जिन्दाबाद मिस्टर शर्मा ने ध्यानपूर्वक पुत्री के गुदा छिद्र में से अपने लिंग को खींच कर बाहर निकला। वह सोनिया के गुदा-द्रवों से चुपड़ा हुआ था। ठिठोली करते हुए उन्होंने उसे हाथ में पकड़कर पत्नी की दिशा में लहराकर हिलाया।
डार्लिंग, साफ़ नहीं करोगी मेरे लन्ड को ?”, मिस्टर शर्मा अपनी बत्तीसी दिखाये हँस रहे थे।
“बेटीचोद, अपना लौड़ा मुँह में ले और खुद ही पोंछता बन !”, टीना जी ने नटखट अन्दाज में उन्हें डाँटा था। हँसते हुए मिस्टर शर्मा बाथरूम को चल दिये। सोनिया भाई के चिर – उत्तिष्ठ लिंग से हटकर अलग हुई और अपनी माँ के समीप लेट गयी। । “ओहह, मम्मी!”, उसने लम्बी आह भरी। “मजा आ गया! डैडी का लौड़ा मेरी गाँड में घुसकर कितना बड़ा लग रहा था।”
मुझे सब मालूम है, बिटिया।”, टीना जी ने अपनी नग्न पुत्री को कस के गले लगाकर उत्तर दिया।
सोनिया के पुखता, जवान स्तन माँ के स्तनों पर दब गये। अपनी नन्हीं बिटिया के उभरे हुए निप्पलों का अपनी त्वचा में गड़ने का आभास पाकर अचानक उनकी योनि में नवीन सरसराहट, एक विचित्र इच्छा उत्पन्न कर दी। वे कईं बार अन्य स्त्री के संग यौन सम्बन्ध बनाने का विचार कर चुकी थीं, पर हमेशा उसे अपने मन की कोरी कल्पना मानकर भुला दिया करती थीं। परन्तु अब, उनके समक्ष अपनी कल्पना को साकार करने का सुअवसर था … स्वयं उनकी पुत्री के साथ! अपने ही बच्चों के साथ सैक्स क्रीड़ा करने से आने वाले वर्जित-आनन्द और पापकर्म से उत्पन्न मोहक आनन्द के मारे टीना जी ऐसी रोमांचित हो गयी थीं, कि वे मन के आवेग में में बह गयीं …
कंठ से कराह निकालकर, टीना जी ने सोनिया को पीठ के बल लेटाया और पुत्री के छोटे-छोटे स्तनों का चुम्बन करने लगीं। उन्होंने चूस – चूस कर सोनिया के नन्हें-नन्हें निप्पलों को कड़ा कर दिया। सोनिया देह को तना कर कराहने लगी, और अदा से अलसाती हुई अपनी जाँघों को खोलने लगी। अपने स्तनों पर माँ के मुख का स्पर्श उसे भा रहा था। क्या वही स्पर्श उसे अपनी योनि पर :: : किशोरी सोनिया कल्पना कर रही थी कि क्या उसकी माँ डॉली की तरह क्या उसकी योनि पर अपने मुख से मैथुन करेंगी। टीना जी ने जैसे उसकी मन की बात भांप ली, वे अपनी कमर को नीचे ले गयीं, और अपने होंठों को सोनिया के पेट से सटाती हुई उसके मुलायम रोमों से सज्जित योनि – कोपलों पर ले गयीं।। | माँ-बेटी के निकट जय अपने वज्र से कठोर लिंग पर हस्तमैथुन करता हुआ माँ को अपनी जिह्वा को उसकी बहन की रसीली योनि की गुलाबी कोपलों पर हलके-हलके फेरता हुआ देख रहा था।
। “ओहहह, आह! चाट ले, मम्मी! चूस हरामजादी की चूत! डाल दे अपनी जीभ साली की चूत में, मेरी कुतिया मम्मी !” अपने काले लिंग पर निर्ममता से हाथों द्वारा घर्षण करता हुआ वो कराह कर बोला। वह टीना जी की जिह्वा को मंझे अंदाज में चाटता देख पछता रहा था कि उसने अपनी बहन की ललचाती योनि को पहले ही क्यों नहीं चाट लिया। पर उसने स्वयं को दिलासा दिया कि इसका अवसर फिर आयेगा!
मारे रोमांच के सोनिया की आँखें फटी की फटी रह गयी थीं। वो अपनी माँ के मुख को निर्लज्जता से उसकी योनि के संग मजेदार और गन्दी हरकते करता देख रही थी। टीना जी की जिह्वा तो उसकी जाँघों के बीच का चप्पा-चप्पा छान रही थी, एक पल उसकी योनि की कोपलों के दरम्यान सनसना कर उठती, दूसरे पल उसके मूत्र छिद्र को दबाती, फिर यदा कदा किसी फड़कते लिंग की भांती उसकी ज्वलन्त योनि में भेद कर गहरी उतर जाती। लाख कोशिशों के बावजूद सोनिया अपने कूल्हों की हलचल पर काबू नहीं कर पा रही थी, क्योंकि उसकी माँ अपनी अनुभवी जिह्वा द्वारा उसकी योनि को भूखी कुतिया की भांति चाटती चुपड़ती और चूसती हुई अति शीघ्रता से ऑरगैस्म के करीब ले आई थी।
“अहहहह, मम्मी! र रन्डी! ओ ओहह, रुकना मत ! रुकना मत ! चूसती रह मेरी चूत ! ओ : ‘ऊऊहह ऊँह, मम्म ::: मम्मीऽ!”, अपने हाथों को माँ के सर के पीछे लगाकर दबाते हुए सोनिया चीखी।
माँ को अपनी बहन के साथ मुख-मैथुन करते देख जय की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। उसका लिंग बड़ी आक्रामक शली में फड़क रहा था। इससे पहले कि उसका वीर्यकोष स्फोटित हो, जय को अपने लिंग का कुछ न कुछ बन्दोबस्त तो करना ही था। उतावले जय ने अपने समक्ष विकल्पों पर गौर किया – वह हस्तमैथुन करके माँ
और बहन के ऊपर वीर्य स्खलित कर सकता था, अपने लिंग को बहन के मुख में डाल कर उसे लिंग चूस कर वीर्य स्खलन करवा सकता था, अथैव : जय ने अपनी माता के नितम्बों को लोलुपता से हवा में लहराते और झूमते हुए देखा।
टीना जी किसी मादा पशु की तरह अपने हाथों और घुटनों के बल बैठी सोनिया की पटी हुई जाँघों के बीच अपने सर को फुदकाये जा रही थीं। उनके सुडौल वक्राकार नितम्ब ललचाते अंदाज में बिस्तर से ऊपर उठकर झूम रहे थे। जय ने अवसर ताड़ा और बेझिझक होकर अग्रसर हुआ। लपक कर बिस्तर से उठा और अपनी योनि चाटती माँ के सम्पुष्ठ आ खड़ा हुआ। टीना जी अपना सर नीचे गाड़े और अपने नितम्ब गगन में उठाये थीं। इस मुद्रा में वे अपनी योनि को उत्कट अश्लीलता से पुत्र की वासना भरी निगाहों के सम्मुख प्रदर्शित कर रही थी ::: उनकी टपकती योनि जय को न्यौता दे रही थी, कि अपनी किशोर देह की आनन्दपूर्ति के लिये मनचाही शैली में वह उसका भोग करे। कुछ ही मिनटों पहले जय के ही लिंग द्वारा भेदित हो चुकी उनकी योनि की कोपलें अब भी रक्त-प्रवाह और कामोत्तेजना के प्रभाववश लालिमा- रंजित और फूली हुई थीं।
जय ने अपने लिंग को माँ की निर्लज्जता से खुली हुई योनि की दिशा में साधा पेल दिया अन्दर। फिर अपने लिंग के सूजे सुपाड़े को टीना जी भीगी प्रजनन गुहा में बैठाता दिया। इस प्रकार अपने सुपाड़े को माँ की रोमयुक्त योनि की कोपलों में सुरक्षित स्थापित करने के बाद, जय ने उनके कूल्हों को मजबूती से जकड़ा और फिर एक बलशाली ठेले के साथ लिंग को उनकी योनि की संकरी, सिकुड़ती माँसलता में उतार डाला। उसके अण्डकोष थप्प-चप्प ध्वनि के साथ उनके नितम्बों पर जा टकराये।
पुत्र के दैत्याकार लिंग को अपनी कोख में चीरता हुआ पाकर, टीना जी सहर्ष चीत्कार कर उठीं। उन्हें अनुभव होता आनन्द सचमुच स्वर्ग तुल्य था :: संसार में कितनी महिलायें होंगी जिन्हें सगी पुत्री की मीठी, भीगी योनि को चाटने का अवसर मिला होगा, वो भी तब जब उनका सगा पुत्र अपने विलक्षण कठोर लिंग द्वारा उनकी योनि के संग सम्भोगरत हो ? कोई भी कामुक, सैक्सी माँ इससे अधिक किसकी कामना कर सकती है ?

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